पचास साल लंबा इंतजार
पचास साल लंबा इंतजार
रविवार प्रतिनिधि
मैनपाट से
छत्तीसगढ़ का हिल स्टेशन कहे जाने वाले मैनपाट में इस बार गरमी बढ़ी हुई है. मौसम
के साथ-साथ माहौल भी गरम है. इस इलाके में रहने वाले लोग उत्सुकता के साथ रेडियो से
चिपके हुए हैं. हज़ारों उद्वेलित लोगों की जुबान पर बस एक ही सवाल है- अब क्या ?
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से लगभग 75 किलोमीटर दूर है मैनपाट का यह पहाड़ी इलाका, जिसे
छोटा तिब्बत के नाम से भी जाना जाता है.
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मैनपाट यानी छोटा
तिब्बत |
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1960 के आसपास
बसे तिब्बती शरणार्थियों को उम्मीद है कि एक दिन तिब्बत आजाद
होगा. |
10 मार्च 1959 को तिब्बत पर कब्जे के बाद भारत के जिन पांच इलाकों में तिब्बती
शरणार्थियों ने अपना घर-परिवार बसाया, उसमें एक मैनपाट है. मैनपाट के अलग-अलग
कैंपों में रहने वाले ये तिब्बती यहां टाऊ, मक्का और आलू की खेती करके अपना
घर-परिवार चलाते हैं.
लगभग पचास साल होने को आए, जब बड़ी संख्या में तिब्बतियों ने यहां शरण ली थी.
लेकिन इन पचास सालों में भी इन शरणार्थियों की आंखों में तिब्बत ज़िंदा है. जिन
लोगों ने अपना बचपन तिब्बत में गुजारा है, उन बुझती हुई बुढ़ी आंखों में जाने
कितनी यादें हैं. लेकिन इन यादों के साथ-साथ एक न एक दिन तिब्बत के आज़ाद होने
की उम्मीद भी बची हुई है.
याद तो आना ही चाहिए
तसी उंदी 1960 में यहां आए और 1963 में उन्होंने तिब्बत के निर्वासित सरकार की फौज
में काम करना शुरु किया. वे भारत के कई इलाकों में रहे लेकिन तिब्बत उनके भीतर हमेशा
हहराता रहा.
फौज से रिटायर्ड होकर मैनपाट के कैंप नंबर 2 में वे चाय-नाश्ता और खासतौर पर मोमो
बना कर अपना गुजारा करते हैं. उंदी यहां अकेले रहते हैं, रोज अपने देश तिब्बत को
याद करते हुए “ तिब्बत तो याद आना ही चाहिए. तिब्बत की याद नहीं आएगी तो हम तो
जानवर की तरह हो गए न ? हम तिब्बत की स्वतंत्रता चाहते हैं. एक संप्रभू देश की तरह.”
कैमो
कब तिब्बत से यहां आईं, यह उनको याद नहीं है. जब आई थीं, तब भाई और माता-पिता साथ
थे. अब अपने भाई के बच्चों के साथ रहती हैं.
कैमो को भी तिब्बत की याद बेतरह सताती है.. “ लेकिन तिब्बत कैसे जाएंगे, कहां से
जाएंगे... चीन लोग हमारे देश को खा गया.”
इसके सिवा जाना कहां
कलसंग तिब्बती कोआपरेटिव सोसायटी से सेवानिवृत होने के बाद यहीं बस गए. मैनपाट की
गलियों में घुमते-टहलते हुए अपना समय निकालते हैं. थोड़ा वक्त यहां के मौनास्ट्री
यानी बौद्ध मंदिरों में गुजरता है.
क्या
तिब्बत लौटने को मन नहीं करता ?
कलसंग बहुत पीड़ा के साथ कहते हैं- “ मेरे दो भाई तिब्बत में छूट गया है, उन लोगों
से मिलने के लिए दिल तो करता है. लेकिन कभी ये सोचता है.... एक हिंदी में गीत जैसा
है न कि जाना कहां, मरना यहां है, जिसके सिवा जाना कहां है. एक बार कोशिश किया था,
उधर जाने का लेकिन चीन का लाल झंडा देख कर मुझे अच्छा नहीं लगा. ”
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कलसंग को चीन से घृणा
है |
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कलसंग के दो
भाई तिब्बत में ही रह गए और उनसे फिर मिलना नहीं हो सका. |
कलसंग बताते हैं कि उन्हें अपने भाइयों की बहुत याद आती है. लेकिन भाइयों से
कोई संपर्क नहीं है. एक बार जब वे देहरादून गये थे तो वहां फोन से संपर्क करने
की कोशिश की. भाइयों ने बताया कि टूंगू के देश में आने से कोई दिक्कत नहीं होगी.
टूंगू यानी चीन.
कलसंग भरभराती आवाज़ में बताते हैं- “ टूंगू का नाम लिया तो हमें अच्छा नहीं लगा.
हमारा जो नेटिव प्लेस है, वो अरुणाचल प्रदेश से नजदीक है...” बात करते-करते
कलसंग अपने गांव की याद में खो जाते हैं.
कलसंग के बच्चे तिब्बत नहीं लौटना चाहते. उनका तर्क है कि उन्होंने तो भारत में
ही अपनी आंखें खोली हैं, उनके लिए तो तिब्बत परदेस की तरह है. लेकिन कलसंग इन
बातों से सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं- “ हम अपने बच्चों को समझाते हैं कि इस
तरह निराश नहीं होना चाहिए. एक दिन तो तिब्बत आज़ाद होगा.”
दलाईलामा जिंदा तो हम भी
थीयंडम. हां, शायद यही नाम था बुजुर्ग महिला का. हंसते हुए बात करने वाली थीयंडम के
पांच बेटे और तीन बेटियां हैं. सबकी शादी हो गई और अब वे अपने दो बेटों के साथ रहती
हैं.
थीयंडम कहती हैं कि उनका मन भी तिब्बत लौटने का होता है लेकिन मन करने से क्या होता
है. वे सपाट अंदाज में कहती हैं- “ दलाई लामा जिंदा है तब तक हम भी जिंदा है, उसके
बाद तो हम भी मर जाएंगे.”
चीन में जो कुछ चल रहा है, उसका साफ असर इस पहाड़ी इलाके पर नज़र आ रहा है. तिब्बती
कोऑपरेटिव सोसायटी के अध्यक्ष तामडिन डूडा कहते हैं- “ तिब्बत के लिए यह आखरी लड़ाई
है.”
लेकिन मैनपाट में रहने वाले अधिकांश लोग उहापोह में हैं, उम्मीद और निराशा के बीच
तैरते-उतराते. हर शाम बौद्ध मंदिरों में गूंजने वाले मंत्रों के साथ जब सूरज पहाड़ी
के नीचे डूबने को होता है तो उम्मीद बंधती है कि शायद कल की सुबह कोई अच्छी खबर ले
कर आए. ऐसी खबर, जिसकी पिछले पचास सालों से प्रतीक्षा बनी हुई है.
04.05.2008, 05.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित