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कहानी | थैंक यू अंकल

कहानी

 

थैंक यू अंकल

सतीश जायसवाल

 

मदालसा का अर्थ ?

जो मदमाती हो. और जिसकी देह ने अभी निद्रालस्य को पूरी तह त्यागा नहीं हो, ऐसी नायिका.

satish jayaswal


पंजाब की तरफ के गाँवों में एक कहावत चलती है, “एक तो बहू ऐसे ही सुन्दर, उस पर अभी-अभी सोकर उठी.”

जिस नायिका को लेकर बात चल रही है वह पंजाब की नहीं. कहाँ की है ? क्या बताएँ. जब तक यह पता न चले कि कहाँ से आ रही है या कहाँ को जा रही है, कुछ अटकल भिड़ाने के लिए जमीन भी तो नहीं बनती. सो, लक्षणों के आधार पर ही इस नायिका का नामकरण ठीक रहेगा-मदालसा.

मदालसा रात-भर खुली पड़ी सोई. एक चादर तक काया पर नहीं ली. सिवा, रात-भर पड़नेवाली, नीली बत्ती की रोशनी के. करवट कम, उतान अधिक सोई. हाथों को कम, गझिन जूड़े को अधिक सहारा बनाया. फूलदार गिलाफ से ढँका तकिया, बेवजह बगल में पड़ा जगह घेरे रहा. ऐसे में साँसों के साथ संगत करता निद्रित शरीर कविता रचता रहाः

क्या इस बीच तुमने गौर किया
तुम्हारी छाती पर खुली पड़ी किताब
साँसों के साथ एक मिनट में कितनी बार
ऊपर आती है, नीचे जाती है ......

बीच के स्टेशन में एक और यात्री इस हिब्बे में आया. इसके साथ 72 यात्रियों वाले शयनयान में जगह पूरी भर गई. 72 वें यात्री ने 58 नम्बर की अपनी बर्थ पर, जो बीच वाली पटिया है, भीलनियों के हाथ छापेवाली गहरे लाल रंग की चादर फैलाई. डक-बैक के हवावाले तकिए को फुलाकर सिरहाने रखा. पीने के ठंडे पानीवाले, मिल्टन के इंसूलेटेड फ्लास्क को हुक में लटकाकर सोने जा रहा था कि उसकी नज़र में काले रंग का वह तिल गड़ गया जो नायिका के ऊपरी ओठ पर दाहिनी ओर है. आश्चर्य की बात है कि बकाया के 70 मुसाफिरों में से किसी की नज़र इस तिल पर नहीं पड़ी ?

रात–भर पड़नेवाली नीली बत्ती की रोशनी ने मदालसा के ओठों के नैसर्गिक रंग के ऊपर एक रहस्यमय नीली झाँई फैला रखी है. यह एक रहस्य-सरोवर है. आधे चन्द्रमावाली रात में फैला हुआ यह सरोवर नील कमल की गझिन खेती से भरा-पूरा है. इसके बीचोबीच एक पूर्ण प्रस्फुटित कुमुदिनी अर्द्धचन्द्र के साथ अभिसार कर रही है.

सोने से पहले 72 वें यात्री ने ईश्वर का स्मरण किया. यद्यपि यह उसकी आदत नहीं लेकिन आज किया.

72 वें यात्री ने प्रार्थना की, “ओ ईश्वर, मेरा निर्विकार अन्तःकरण याचना करता है, मुझे एक बार उस स्वप्न-सरोवर के तट पर पहुँचा दे, जिसमें नील कमल की गझिन खेती के बीच पूर्ण प्रस्फुटित कुमुदिनी अर्द्धचंद्र के साथ अभिसाररत है और यह स्वप्न जो व्याप्त है-मेरे सामने मुँदी पलकों के नीचे, निद्रा- निमग्न शान्ति के सुरम्य प्रसार में…” अपने प्रार्थना के उत्तर में उसने सुनी एक आकाशवाणी जो निर्विकार अन्तःकरण तक ही सीमित रही-“ यह अतिक्रमण होगा. और अतिक्रमण सर्वत्र वर्जित है.” इस ईश्वरीय निषेधाज्ञा के सम्मुख 72 वें यात्री ने सिर झुका दिया और आँखें मूँद ली. रात घटनाविहीन निकल गई.

लेकिन, रात की तरह सुबह घटनाविहीन नहीं निकल पाई. कुछ घटित हो गया. जो घटा, उसकी अश्लीलता ने भरे डिब्बे में एक औरत के बदन से उसका एक-एक तागा तक उतारकर रख दिया. सुबह, सबसे पहले मदालसा सोकर उठी. घर की आदत और बचपन के ब्राह्मणी संस्कार. उसने देखा कि बेटा अपने मामा के साथ सो रहा है. दोनों को सोए रहने दिया कि अभी से उठकर क्या करेंगे ? अभी तो रात का अँधेरा भी पूरी तरह नहीं छँटा है. फिर उसने सामने देखा. बर्थ नम्बर 58 को देखा. जब वह सोई थी तब यह खाली थी. अब खाली नहीं. 72 वाँ यात्री अभी सो रहा था. बाकी सभी सो रहे हैं.

मदालसा उठी और किसी के उठने से पहले तैयार हो गई. लेकिन दुर्घटनाग्रस्त हो गई. इस दुर्घटना ने मदालसा के मन को क्षतिग्रस्त कर दिया. लेकिन इसका असर सीधे उसके दिमाग पर पड़ा. उसे देर तक ऐसा लगता रहा कि अपने बदन के सारे कपड़े वह भारतीय रेल के दूसरे दर्जे के शयनयान के उस संडास में छोड़कर वैसे ही बाहर निकल आई है. और अब किसी भी समय उसका बेटा जाग सकता है, भाई और इस डिब्बे के बाकी सभी यात्री जाग सकते हैं. जब सब उसे देखेंगे तो क्या होगा ? अब एक साथ सात-सात रजाइयाँ भी उसे नहीं ढाँक पाएँगी.

वहाँ मदालसा के साथ ऐसा क्या घट गया, जिसने उसे इस हद तक विचलित किया ? इसे एक मात्र 72 वाँ यात्री ही जान पाया. और वही समझ पाया कि कोई एक दुर्घटना जीवन को इतना अपरूप नहीं कर सकती जितना कि मदालसा भयभीत हो उठी. मदालसा ने बेटे को मामा के पास से उठाया. और अपनी छाती के साथ लगाकर खूब दुलराया. ऐसा लगा जैसे कई सदियों से दूर रहा, उससे उसका बेटा. या एक छोटी-सी दुर्घटना ने समय को ही सदियों से भी लम्बा कर दिया.

धूप दिखी और उसके बेटे ने, जिसे प्यार से वह बेटू कहती है, पूरी तरह आँखें खोल दीं और माँ की छाती से स्वतन्त्र होकर उसने धूप को छूने के लिए खिड़की की छड़ों से बाहर अपने नन्हे-नन्हे हाथ निकालकर हथेलियाँ फैला दीं. माँ ने अनुभव किया कि उसका बच्चा धूप में बढ़ पा रहा है. और फूल की तरह खिल रहा है. माँ का क्षतिग्रस्त मन स्वस्थ हो चला. शिशु को दुलारनेवाली धूप ने माँ को भी छुआ. मदालसा धीर-धीरे संयत हुई.

भारतीय रेल के दूसरे दर्जे के इस शयनयान के, संडास में भीतर से दरवाजा बन्द करते ही 72 वें यात्री ने देखा-फर्श से लेकर छत तक और खिड़की से लेकर दरवाजे तक सब वही बना हुआ है और लिखा हुआ है जो भारतीय रेल के किसी भी दूसरे दर्जे के डिब्बे के संडास में मालूम नहीं कौन बना जाता है और लिख जाता और अन्तर्धान हो जाता है. यह सब न तो देखकर बर्दाश्त किया जा सकता, न ही पढ़कर अपमानित महसूस किए बिना रहा जा सकता. फिर भी कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि वहाँ तो कोई होता ही नहीं है. ऐसे में करें तो क्या करें ?

आश्चर्य है कि बकाया के 70 यात्रियों में से किसी का सामना इस सवाल से नहीं हुआ. 72 वें यात्री के सामने किसी नारी देह का बेहद घृणास्पद नंगा ढांचा चित्रित है, जिसे न मालूम कौन बनाकर अन्तर्धान हो चुका था.

घृणास्पद सही फिर भी यदि नारी-देह है तो यहाँ स्तन भी हैं और कोख भी है. वह सब है जिससे कोई औरत किसी मर्द से अलग दिखती है या जिससे वह माँ बनने का गौरव हासिल करती है, “ यह बेटू की माँ हो सकती है, जिसका निद्रित शरीर रात-भर साँसों के साथ संगत करता और कविता रचता रहा.”
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

nisha bhosle bilaspur chhattisgarh

 
 कहानी अच्छी लगी. आपकी और भी कहानियां मैंने पढ़ी हैं. पढ़ कर अच्छा लगा. 
   
 

rakesh singh patel delhi

 
 कहानी का टाइटल-शाबास बेटे रखते तो...  
   
 

उदय, बिलासपुर, छत्तीसगढ

 
 बहुत रोचक कहानी है पढकर अच्छा लगा।  
   
 

सुमेधा रायपुर, छत्तीसगढ़

 
 बिलासपुर के श्री सतीश जायसवाल जिस तरीके से कहानियों को बुनते हैं, वह बहुत शानदार है लेकिन उनकी सारी कहानियों में देह इतना हावी है कि लगता है, जैसे वे राजेंद्र यादव के छत्तीसगढ़िया संस्करण हैं. बिलासपुर में उनके जो भी अनुभव हों, वे जैसी कहानियां लिखते हैं वह हमारे मध्य वर्ग का सच नहीं है. 
   

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