यहां सरकार भी डूब गई | बिहारः बाढ़
यहां सरकार भी डूब गई है...
मनीष शांडिल्य
बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों से
लौटकर
कटैया पावर हाऊस
रमजान के पाक महीने में सफाई का खास ख्याल रखना पड़ता है, पर बसंतपुर प्रखंड की
लालपुर पंचायत के युनुस अंसारी इस बात से खासे परेशान हैं कि सरकारी बदइंतजामी के
कारण न सिर्फ उन जैसे रोजेदारों को खासी परेशानी हो रही है, बल्कि बीमारियों का भी
प्रकोप शुरू हो चुका है. डायरिया से अब तक दो जानें जा चुकी हैं.
कटैया पावर हाउस के पास लगभग 11 सौ परिवार बसे हैं, जिनमें मुस्लिम परिवारों की
संख्या 400 के आसपास होगी. इस इलाके में सरकारी लापरवाही का आलम ये है कि बाढ़ से
तबाह हो कर इस इलाके में रह रहे लोगों के लिए यहां अब तक अस्थायी शौचालयों की
व्यवस्था भी नहीं हो पाई है. पीने के पानी का भी ठीक-ठीक इंतजाम नहीं है. भीमनगर के
समद अंसारी प्राथमिकता के हिसाब से जरूरतें गिनाते हुए कहते हैं “ पहले शौचालय और
फिर डॉक्टर व दवाएं चाहिए.”
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सैकड़ों लोग
ऐसे हैं, जिन्हें आस-पास के ग्रामीणों ने बांस और लकड़ियां दी
और अब वे उन्हीं लकड़ियों और बांस-बल्लियों की खप्पचियों पर
साड़ी-कंबल बांध कर गुजारा कर रहे हैं. |
यहां रह रहे अधिकतर लोग, सरकार खास कर नीतीश और विजेंद्र यादव से बेहद नाराज़ हैं.
लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि विजेंद्र बाबू बिजली मंत्री थे, तो उन्होंने जिले
के हर गांव में बिजली पहुंचा दी और अब जल संसाधन मंत्री बनते ही हर गांव में पानी
घुसा दिया.
जिस तरह कोसी के तांडव ने इलाके का भूगोल बदला है, वैसे में सुदामा मंडल का कटाक्ष
सटीक लगता है कि नीतीश बाबू ने नया बिहार बना ही लिया.
इस इलाके में सरकार द्वारा फिलहाल एक भोजनघर चलाया जा रहा है और मेडिकल कैंप.
मेडिकल कैंप के सदस्य झुग्गियों में घूमने के बजाय स्थानीय स्कूल में डेरा डालना
ज्यादा पसंद करते हैं और भोजन घर भी बस एक समय का खाना देने में भी जलावन और पानी
के अभाव का रोना रोने लगता है.
सरकारी स्तर पर यहां अब तक टेंट की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है और झुग्गियों की
तादाद हर घंटे बढ़ रही है. जो मवेशी बचा कर ले आये, उनके सामने चारे की समस्या है.
यहां लगभग एक दर्जन ऐसे बच्चे भी हैं, जिनका अब इस दुनिया में कोई नहीं बचा.
गर्भवती महिलाओं की भी संख्या कम नहीं है.
प्रलय के इतने दिनों बाद भी प्रशासन सड़क मार्ग से सीधे जुड़े कटैया पावर हाऊस तक कम
ही पहुंचा है. यह पहुंच भी महज उपस्थिति की पहुंच रही है. जाहिर है, हालात बेहद
खराब हैं. ब्रह्मानंद यादव कहते हैं- “ अगर हालात नहीं सुधरे तो एक पब्लिक दूसरे
पब्लिक को खायेगा.”
सिमराही, राघोपुर
सिमराही, राघोपुर से होकर गुजरनेवाली एनएच-57 से मिथिलावासियों को बड़ी आशा है कि यह
सड़क उनके घरों तक खुशहाली लायेगी. पर महाप्रलय ने इस अर्धनिर्मित सड़क को कई जगहों
से दहा दिया है. पर फिर भी यह सड़क छातापुर और प्रतापगंज प्रखंड के बाढ़ पीड़ितों के
काम आते हुए उनके नये बासडीह के रूप में काम आ रही है.
बेलही घाट, सिमरिया से आगे इस सड़क पर लगभग 6 किलोमीटर तक तीन-चार पंक्तियों में
हजारों की संख्या में झुग्गी-झोपड़ियां गड़ चुकी हैं. पर सुपौल से सड़क द्वारा सीधे
जुड़े इस इलाके तक प्रशासन की पहुंच अभी भी एक अधूरेपन के साथ ही है. इसे आप प्रशासन
की इच्छाशक्ति कह सकते हैं या फिर सरकार की नियत. हालांकि इलाके के लोग इसे अब अपनी
नियती मान चुके हैं.
सरकारी तंत्र इस इलाके में टिके लोगों में से आधे तक ही भोजन बांट पा रहा है, वह भी
एक पहर. उनके लिए टेंट, स्वास्थ्य, सफाई जैसी बाकी जरूरी चीजें प्रशासन कोसी प्रलय
के इतने दिनों बाद भी मुहैया नहीं करा पायी हैं.
प्रतापगंज प्रखंड की श्रीपुर पंचायत के तेतर यादव निराश होकर कहते हैं
“ जे आदमी मइर गेले ऊ बेसी बढ़िया. न माल के चिंता, न बच्चा के. जे बचलै ओकरा
माथा पर त बाहर टा चिंता है.”
यह हताशा प्रशासनिक असंवेदनशीलता और उपेक्षा की उपज है. इलाके में पिछले एक सप्ताह
से बारिश न होने के कारण भले कोसी प्रलय का पानी उतरा है, लेकिन चाम (चमड़ा) जला
देने वाले इस घाम (गर्मी) ने बिना पन्नी-तिरपाल के झुग्गियोंवालों की मुसीबत भी बढ़ा
दी है. ऐसे में जहां तेतर यादव जैसे लोग हताश हैं, वहीं प्रतापगंज प्रखंड की ही
भवानीपुर पंचायत के दुअनिया के मो हफीज जैसों के मन में तीव्र आक्रोश है.
हफीज सवाल करते हैं- “जब यही हाल करना था तो प्रशासन हमलोग को स्टीमर से छाक कर
(बचा कर) लाया ही क्यों? न कपड़ा, न खाना, न तिरपाल, न दवा.”
सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें आस-पास के ग्रामीणों ने बांस और लकड़ियां दी और अब वे
उन्हीं लकड़ियों और बांस-बल्लियों की खप्पचियों पर साड़ी-कंबल बांध कर गुजारा कर रहे
हैं.
इस सड़क पर टिके लगभग आधे लोगों को स्वयंसेवी संस्थाओं ने तिरपाल, दवा, पानी साफ
करने की गोली आदि मुहैया करवायी है. संस्थाओं ने ही कुछ जगहों पर अस्थायी शौचालयों
की भी व्यवस्था की है. पर संख्या को देखते हुए इसे अपर्याप्त कहना गलत नहीं होगा.
इसके अपर्याप्त होने के सबूत बीमारियों ने देनी शुरु कर दी हैं. इलाके में किसी दिन
अगर कोई बीमारी महामारी का रुप ले ले तो उसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
कोसी प्रलय के पीड़ित इस कड़कती धूप में पुरजी लेकर दौड़ते परेशान हैं. अबकी बाढ़ में
उनका घर और उनके सपने ही नहीं डूबे, अबकी बाढ़ ने सरकारी व्यवस्था को भी ध्वस्त कर
दिया है.
त्रिवेणीगंज
आशा मंजू डोपरखा बड़ी नहर पर बसी झुग्गी-झोंपड़ियों में 18 अगस्त के बाद से अब तक चार
गर्भवती महिलाओं का सुरक्षित प्रसव करा चुकी हैं. उन्हें यह पता है कि सरकार ने
बाढ़पीड़ित इलाकों में बच्चों के जन्म पर नकद सहायता देने की घोषणा की है और वे यह भी
देख रही हैं कि नकद सहायता तो दूर, इन जच्चा-बच्चों को अब तक जरूरी दवाएं और टीके
भी उपलब्ध नहीं हो पाये हैं.
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अभी बाढ़ का पानी निकलने में महीना लगेगा. तब
तक तो कोसी के पानी के साथ आये पहाड़ जैसे दुख से हर रोज हज़ारों लोगों को जूझना ही
होगा. लोग कोशिश कर रहे हैं पानी के साथ-साथ जीवन जीने की. |
इस नकद घोषणा की तरह ही डोपरखा बड़ी नहर (कोसी कॉलोनी चौक) पर टिके पांच हजार से
अधिक पीड़ितों तक मात्र घोषणाएं ही पहुंची हैं, जमीन पर कुछ भी दिखाई नहीं देता है,
जबकि यह पंचायत त्रिवेणीगंज अनुमंडल से तीन किलोमीटर से भी कम दूरी पर है.
ऐसे हाल में श्रीपुर गांव के राजकुमार मंडल की यह चुनौती स्वीकार करने के अलावा और
कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है कि अपने बलबूते पर जिंदा रह सकते हो तो रहो.
इसी नहर पर थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर 70 साल के बूढ़े बाबूजी यादव बताते हैं “ प-दादा से
सुना था कि पहले कोसी पंचायत से तीन किलोमीटर पूरब बहती थी और अबकी फिर कोसी वहीं
लौट आयी है. पर इस बार तबाही भी साथ लायी है.”
कोसी की धार ने त्रिवेणीगंज-जदिया को जोड़नेवाली सड़क को डोपरखा पंचायत भवन के थोड़ा
पहले लगभग 50 मीटर तक बहा दिया है. प्रशासन ने पानी उतरने के बाद कहा था कि हफ्ता
भर के भीतर सड़क चालू हो जाएगी.लेकिन महीना भर बीतने के बाद भी लोग नाव से ही उस
कटाव को पार कर रहे हैं. प्रशासन ने चार-पांच छोटे नावों की व्यवस्था जरूर की है
लेकिन इलाके के लोग कहते हैं कि इस सड़क मार्ग को जोड़ना सबसे जरूरी है, क्योंकि यही
एक मात्र सड़क है जो छातापुर और शंकरपुर (मधेपुरा) को सुपौल से सीधे जोड़ती है.
बाढ़ पीड़ित अन्य इलाकों की तरह यहां भी संस्थागत स्तर पर छोटे पैमाने पर ही सही भोजन
की व्यवस्था हुई है. पर दवा, टेंट जैसी चीजों की व्यवस्था सरकारी-गैर सरकारी
संस्थान भी नहीं कर पा रहे हैं.
दवाओं की अनुपलब्धता से लोग परेशान हैं. डोपरखा पंचायत के बिशुनपुर गांव में रहने
वाले विजेंद्र सरदार कहते हैं - “ दो-चार दिन भूखे रह लेंगे पर दवा और डॉक्टर जरूरी
है.”
इसी गांव के गोसाई यादव अपनी सूचना के आधार पर कहते हैं -“ खबर मिली है कि सुपौल
डीएम ऑफिस में हरियाणा से ढेरी तिरपाल आया है, पर सब कहां खत्म हो जा रहा है, पते
नहीं चलता है.”
उम्मीद की जा रही है कि अभी बाढ़ का पानी निकलने में महीना लगेगा. लेकिन तब तक तो
कोसी के पानी के साथ आये पहाड़ जैसे दुख से हर रोज हज़ारों लोगों को जूझना ही होगा.
लोग कोशिश कर रहे हैं पानी के साथ-साथ जीवन जीने की. जीवन की गति भले अपनी रफ्तार
नहीं पकड़ सके लेकिन इस आपदा वाले समय में भी मिथिला के लोग हमारे जैसे मेहमानों से
चाय-पान पूछना नहीं भूलते. ज़ाहिर है, जीवन के प्रति उनकी ललक को सलाम करने को जी
चाहता है.
28.09.2008,
17.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित