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दलित | औद्योगिक संस्थानों में आत्महत्याएं

विचार

 

एक सपने की मौत

अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में प्रतिभावान दलितों की आत्महत्या

सुधा अरोड़ा

 

 

यह पहली बार नहीं है और न आखिरी बार कि किसी अनुसूचित जाति के तबके से, जहां की पहली पीढ़ी इन अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में अपनी मेहनत और लगन से तकनीकी विज्ञान की स्नातक पढ़ाई तक प्रवेश पाने में सफल होने की ऊंचाई पर पहुंची, लेकिन सहपाठियों के एलीट वर्ग ने और व्यवस्था के तयशुदा हथकंडों ने उनकी विलक्षण प्रतिभा और कला का गला घोंट कर उन्हें अपने सुनहरे भविष्य का अंत करने पर मजबूर किया. इस तरह की आत्महत्या के मामले हर साल इस संस्थान में घटित होते हैं, पर न व्यवस्था का शिकंजा ढीला होता है, न आरक्षित सीट के तहत प्रवेश परीक्षा के नियम बदलते हैं, न सहपाठियों का उपेक्षा का नज़रिया बदलता है, न माता-पिता समय रहते चेतते हैं. हर साल एक नये दलित परिवार का होनहार, प्रतिभावान छात्र इस मकड़जाल में फंसकर अपने सपनों का मोहभंग होते देख अपनी ज़िन्दगी से हाथ घो बैठता है और शैक्षणिक संस्थान के आकाओं के कानों पर जूं नहीं रेंगती.



भारत के अग्रणी तकनीकी शिक्षा संस्थान आई. आई. टी. पवई, बम्बई के छात्रावास नं 10 में द्वितीय वर्ष की उन्नीस वर्षीय छात्रा चंद्राणी हालदार ने शाम साढ़े आठ बजे अपने कमरे में भीतर से सांकल चढ़ाकर आत्महत्या कर ली.

sudha arora

 

उस वक्त पहले माले के उस विंग में कोई अन्य लड़की उपस्थित नहीं थी. कुछ लड़कियां कैन्टीन में थी और अधिकांश छुट्टी का दिन होने के कारण अपने स्थानीय अभिभावकों के घर थीं. आग की लपटें और धुंआ देखकर छात्रावास में खलबली मची. बंद दरवाजे में से किसी के चिंघाड़ने की आवाज़ें आ रही थीं. दरवाज़ा तोड़कर आग बुझाई गई लेकिन तबतक चंद्राणी का शरीर बुरी तरह झुलस चुका था. घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में उसे मृत घोषित किया गया.

चंद्राणी हालदार विशेष इंजीनियरिंग फ़िजिक्स की छात्रा थी. यह विषय अच्छे प्रतिशत से प्रवेश परीक्षा पास करनेवाले,सभी क्षेत्रों से आनेवाले मेधावी छात्रों में से भी, सिर्फ 2 या 3 प्रतिशत छात्रों को ही मिलता है.

आई. आई. टी. में प्रवेश का समान अवसर देने के लिये एस सी, एस टी की दो चार सीटों के आरक्षण में पिछले दो वर्षों से प्रादेशिक भाषा में भी प्रवेश परीक्षा देने का प्रावधान रखा गया है. चंद्राणी हालदार ने शुरु से बांग्ला माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी, इसलिए आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा भी बांग्ला माध्यम से लिखकर पास करना उसके लिए टेढ़ा काम नहीं था. बचपन से ही वह बहुत मेधावी और प्रतिभावान छात्रा थी. लेकिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना उसके लिये एक बड़ी बाधा थी जिसके कारण छात्रावास की अपनी दूसरी सहपाठिनों से वह बातचीत नहीं कर पाती थी. इसी के तहत पहले साल में उसके अच्छे अंक नहीं आये थे और दूसरे साल भी वह पिछले साल के कुछ पेपर दुबारा दे रही थी.

दो दिन पहले ही उसे पता चला था कि संभवत: इस बार भी उसके अंक अच्छे नहीं आये हैं. संस्थान के नियमों के मुताबिक दो वर्ष लगातार औसत अंक न आने से छात्र को संस्थान छोड़ना पड़ता है, चंद्राणी को इस आशय का ' चेतावनी पत्र ' मिल चुका था.

शनिवार 6 फरवरी के दिन शाम को दूरदर्शन की फ़िल्म 'आसपास' उसने शुरू से आखिर तक देखी. इस फ़िल्म में हेमामालिनी अंत में खुदकुशी कर लेती है. साढ़े आठ बजे फ़िल्म ख़त्म होने पर वह सीधी अपने कमरे में गयी और निराशा और कुंठा की चरम आत्महंता मन:स्थिति में अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया.

चंद्राणी हालदार अपनी मातृभाषा बांग्ला में कविताएं लिखती थी, एक बहुत अच्छी चित्रकार भी थी और पेन्टिंग के ब्रश धोने के लिये अपने कमरे में डालडा के टिन में केरोसिन तेल रखती थी, जिसका इस्तेमाल उसने अपने जीवन का अन्त करने के लिये किया.

देश के नामी प्रतिष्ठित संस्थानों में आत्महत्या की यह घटना पहली नहीं है. अहमदाबाद के मैनेजमेंट के सुप्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट में भी इस तरह के मामले सुनने में आये है. आत्महत्या करनेवाले छात्रों के मानसिक असंतुलन या व्यक्तिगत समस्याओं (पारिवारिक कलह, तनाव, असुरक्षा या असफल प्रेमप्रकरण) को जिम्मेदार ठहराकर इन मामलों को खारिज कर दिया जाता है और इस तरह की ख़बरें अख़बार के तीसरे या पांचवे पन्ने के एक छोटे से कॉलम तक सीमित रहकर ख़त्म हो जाती हैं.

चंद्राणी हालदार निम्न मध्यवर्ग की अनुसूचित जाति से थी. उसके पिता, जो रेलवे स्टाफ में हैं, खडगपुर से सोमवार को बम्बई पहुंचे. चंद्राणी की मां, जो ट्रेन से आ रही थी और ट्रेन अठारह- बीस घंटे लेट थी, मंगलवार की रात को ही बम्बई पहुंच पाई. बुधवार की दुपहर को ही चंद्राणी का दाह - संस्कार किया जा सका. इलेक्ट्रिक क्रेमोटरियम में चंद्राणी की मां की चीखों और आख़िरी विनती ''आमी ऐकबार आमार मेयेर मुख देखबो'' से वहां एकत्र हुई छात्राओं के दिल दहल गये.

सोमवार 8 फरवरी को आई. आई. टी के लेक्चर थियेटर और मेन बिल्डिंग के सामने सभी छात्रों ने रजिस्ट्रार और डीन के सामने प्रदर्शन किया और अपनी कुछ मांगे रखीं जिनमें प्रमुख यह थी कि आई. आई. टी. परिसर के भीतर स्थित अस्पताल में कुछ आवश्यक उपकरण और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधायें उपलब्ध करवायी जायें और अस्पताल को एमरजेंसी की हालत में उपयोग करने लायक स्थिति में रखा जाये.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

debashish california

 
 Extremely unfortunate . It's criminal to loose such brilliant student who come to this level in their illiterate families . they should be treated as human beings .Institutions like IIT & IIM should change their rules of first taking students in the reservation quota and then throwing them for a cultural shock with the privileged class . The story made me cry over a talented girl's tragedy . 
   
 

Anees Kazmi Delhi

 
 When is our education system going to change? It provides protection and job security to privileged class. Why take brilliant SC/ST student to fill the reservation quota and then unable to adjust they are prone to depression and suicide ultimately.

The Big Institutions like IIT and IIM should change their strategies. If they cannot provide a friendly and cozy atmosphere to the underprivileged class student, Stop giving them admissions. They will definitely prove their intelligence elsewhere.
 
   
 

Disha Portland

 
 Something should be done by these reputed educational institutions -- They take the most talented students from SC/ST on the name of reservation , only to make them frustrated and commit suicide due to humiliation from the affluent class students. 
   
 

Rajiv Pandey (rajivreal@gmail.com) Bombay

 
 चंद्राणी की आत्महत्या हमारी शिक्षा के प्रभाव पर एक बेहद कुरुप सवाल है. 
   
 

Kumar Prashant Mumbai

 
 Any comments Sandeep Pandey ji ! You are also an IITian and Magsayse award winner for social upliftment of under privileged class ! Last month there was a news from IIT mumbai about a student trying to end his life by cutting his wrist ! Who is to be blamed ?

 
   
 

Drishti Bhuvaneshwar

 
 It's very sad and depressing to loose brilliant students who are the first educated generation of their underprivileged class !Counselling cells should immediately be created ,developed and start functioning to stop such tragic incidents !! 
   
 

jayanti prasad ()

 
 
I think students who are not qualified or cannot compete should not be admitted in institutes like iits using reservations only then such incidents can be stopped.
 
   
 

kumar prashant Hyderabad

 
 औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इस तरह के छात्रों के लिए एक स्पेशल रचनात्मक विभाग होना ही चाहिए - जहाँ २४ घंटे काउन्सलिंग की व्यवस्था हो. आख़िर प्रतिभावान छात्रों को खोकर देश कैसे आगे बढ़ सकता है. सुधा अरोरा जी ने जिस जिम्मेदारी की और इंगित किया है; वह जिम्मेदारी इन संस्थानों की है, इस से मुंह चुराना अपने दायित्व के प्रति गैर इमानदार होना है. संदीप पाण्डेय जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस सन्दर्भ में आगे आने की ज़रूरत है. 
   
 

sanjaysingh (sanjaysinghpalamu@gmail.com) ranchi

 
 यह एक दलित या लड़की की मौत नहीं थी। यह भाषा की मौत थी। उस भाषा की जिसमें राष्ट्रगीत और वंदे मातरम लिखे गये। मेरी समझ में नहीं आता कि जिस भाषा में पढ़ाई की सुविधा बड़े तकनीकी संस्थान नहीं देते,उस भाषा को प्रतियोगिता परीक्षा के लिए चुनने की अनुमति क्यों देते हैं? चंदराणी हलदार जैसी लड़िकयों को क्यों आत्महत्या के लिए मजबूर करते हैं? 
   
 

Shreeharsh Kolkata

 
 दलितों के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. दलित हमेशा से इसी तरह उपेक्षित रहे हैं.सामाजिक तानाबाना चाहे जितना भी बदल जाए, हमारी मानसिकता नहीं बदल सकती. सदियों की परंपरा को ढोने वाले इस समाज में दलितों को अपनी जमीन खुद मजबूत करनी पड़ेगी. 
   

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