बांध बंध रहा है | बिहारः बाढ़
बांध बंध रहा है...
रेयाज़-उल-हक़
कुशहा, नेपाल से

पूर्वी एफ्लक्स बांध पर बोल्डर लेकर कटान की ओर जानेवाले
ट्रकों की कतार लगी हुई है. बांध पर चढ़ते ही एक सरकारी कर्मचारी बोल्डरों की
माप करता है- एक फीट, दो फीट, तीन फीट...।
वह ट्रकों के नंबर दर्ज करता है और उन्हें आगे बढ़ने का इशारा करता है. ट्रक
बहुत धीमे-धीमे सरकते हैं. पूरा बांध आने और जानेवाले ट्रकों-ट्रैक्टरों से भरा
हुआ है. दायीं ओर साथ-साथ चलता है मधुबन जंगल... कोसी टापू वाइल्ड लाइफ रिजर्व.
अपने दलदल, अरना भैंस और प्रवासी पक्षियों के लिए मशहूर संरक्षित अभयारण्य.
पूरी दुनिया में यहां के अलावा सिर्फ असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में ही मिलती
है अरना भैंस-स्थानीय निवासी पूरे गर्व से बताते हैं. बांध इसी रिजर्व में बना
है.
ट्रकों का रेला देख कर एक नेपाली ग्रामीण हंसते हुए कहता है-लोगों को डुबा कर
अब नींद खुली है भारतीय इंजीनियरों की. उनके सिर मानो भूत सवार है, अभी. हम तो
पहले से ही कहते थे...
अब बांध के दोनों ओर बाढ़ में जान बचा कर आनेवाले शरणार्थियों के शिविर मिलने
लगे हैं. नीले-काले तंबू. बीच-बीच में जालियां बुनते मजदूर भी दिख रहे हैं.
नायलोन की पहले गोल चकती बनायी जाती है और फिर इस चकती से जाली बुनी जाती है.
इसी बोरीनुमा जाली में बोल्डर भर कर कटान को बचाया जाता है, बांध पर दबाव कम
किया जाता है. दाहिनी ओर सैकड़ों बोरियों में रेत भरी जा रही है. इनसे पाइलिंग
की जायेगी.
...दाहिनी तरफ पेड़ों के उस पार चमकता हुआ कुछ दिखता है...कोसी! काफी चौड़ाई में
फैली कोसी का वेग यहां उतना नहीं दिखता. लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, पश्चिम
की ओर मुख्यधारा की दिशा में रेत दिखने लगती है. यह सिल्ट है, जिसे कोसी ने
लाकर वर्षों से जमा किया है और जिसे कोसी प्रोजेक्ट और बिहार सरकार के इंजीनियर
निकालना भूल गये हैं. कोसी अब अपने को एक संकरे गलियारे में पाती है और पूरब की
ओर खिसकती हुई बांध से टकराती चलती है. इस हिस्से में उसका वेग बहुत तेज है.
अब ट्रकों का काफिला रुक गया है. आगे दूर तक गाड़ियां हैं. कटान तक पहुंची
गाड़ियां जब बोल्डर उतार कर लौटेंगी, तो पीछेवाली गाड़ियां आगे बढ़ेंगी. अब आगे
पैदल ही जाना होगा.
13.60 आरडी. कोसी अपनी पूरी ताकत से स्पर पर चोट कर रही है. इस पर खतरा बना हुआ
है. पचासेक मजदूर इसे बचाने में लगे हैं. क्रेटिंग की जा रही है. 12.90 आरडी
से, बांध जहां से कटा है, 13.60 आरडी तक सबसे अधिक दबाव है. स्थानीय लोग दिखाते
हैं, बांध पर जहां पहली बार पानी चढ़ा है-आज ही. शायद कंचनजंघा, महाभारत, वाराह
क्षेत्र में कहीं बारिश हुई है. नदी में पानी बढ़ा है. वह कुसहा गांव के बचे हुए
इलाकों में भी भर रहा है, कटे हुए हिस्से से निकल कर.
कटान. डेढ़ से दो मीटर प्रति सेकेंड के वेग से बहता हुआ पानी कटे हुए बांध से
निकल रहा है. अगले कुछ घंटों में वह वीरपुर, शंकरपुर, मुरलीगंज आदि से होता हुआ
कुरसेला में गंगा से मिल जायेगा. कटान को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि
इसने कितनी तबाही मचायी होगी पिछले 22 दिनों में.
कटान का दूसरा हिस्सा सामने है-लगभग दो किमी दूर. वहां की गतिविधियां नहीं दिख
रहीं यहां से. ठीक कटान पर 20-22 मजदूर कटान को बचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं,
लेकिन उनकी गति भी झुंझला देने की हद तक धीमी है. नीचे पानी में रखी गयी जाली
में एक-एक बोल्डर डाले जा रहे हैं.
मजदूरों से पूछो, तो वे सामग्री की कमी इसकी वजह बताते हैं. वे शिकायत करते हैं
कि उन्हें जाली नहीं मिल रही है. इसके अलावा वे रात में भी काम करना चाहते हैं,
लेकिन शुरू के कुछ दिनों को छोड़ कर अब सिर्फ दिन में ही काम होता है. ग्रामीण
कहते हैं-लगातार काम की जरूरत हैं. वे कहते है कि अपर्याप्त काम और धीमी गति के
कारण धारा पर कोई असर नहीं पड़ रहा. वह सारी मेहनत बहा ले जाती है. प्राय: हर
रोज नये सिरे से काम करना पड़ता है.
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बांध में काम कर रहे मजदूरों की शिकायत है कि
उन्हें जाली नहीं मिल रही है. इसके अलावा वे रात में भी काम करना चाहते हैं, लेकिन
शुरू के कुछ दिनों को छोड़ कर अब सिर्फ दिन में ही काम होता है. |
कट एंड को देखने से यह बात सही लगती है. पिछले कई दिनों से काम हो रहा है,
लेकिन आज भी कटान पर अभी जाली-बोल्डर की पहली परत डालने का ही काम चल रहा है.
मजदूरों का कहना है कि वे तो रात में काम करने के लिए आते हैं, लेकिन
इंजीनियर-ठेकेदार नहीं रहते. सो काम कैसे हो?
बांध के नीचे, कटान से थोड़ा पहले मिलते हैं प्रोजेक्ट इंजीनियर जेएन सिंह. वे
नायलोन, बोल्डर की फर्जी सप्लाइ दिखानेवाले सप्लायर्स पर बिगड़ रहे हैं-ऐसा कैसे
हो सकता है? आपने तो नायलोन की सप्लाई नहीं की. फिर आप डिलीवरी दिखा कैसे रहे
हैं ?
उनके पास कुछ आंकड़े हैं. अब तक 5078 नायलोन क्रेटिंग की जा चुकी है. 1359 की
संख्या में बोल्डर क्रेटिंग की गयी है. अब तक कुल 3729 घन मीटर बोल्डर सप्लाइ
हुई है, जिसमें से 10 सितंबर की शाम तक 1150 घनमीटर बोल्डर बचा हुआ है.
वे जल्दी-जल्दी कुछ सूचनाएं देते हैं- 13.60 स्पर पर खतरा था. उनकी क्रेटिंग
जारी है. कट एंड को सुरक्षित कर लिया गया है.
और काम? काम आप खुद देखिए. कितना हुआ है, आप देख ही रहे हैं. रात में काम न
होने की शिकायतों को वे गलत ठहराते हैं. दिन-रात काम हो रहा है. कहने दीजिए
मजदूरों को कुछ भी.
प्रोजेक्ट इंजीनियर यहां कार्यरत कुल मजदूरों की संख्या 1000 बताते हैं. लेकिन
ग्र्रामीण उनकी बात हंसी में उड़ा देते हैं.देवनारायण राउत कुशहा वार्ड नं 4 के
हैं. कहते हैं-बहुत ज्यादा होंगे तब भी 400 से अधिक संख्या नहीं होगी मजदूरों
की.
...दूसरे लोग उनकी तसदीक करते हैं.
...पश्चिम में सूरज डूब रहा है. बोल्डर गिरा कर गाड़ियां लौट रही हैं. ट्रक वापस
लौटते हुए रसीद लेना नहीं भूलते. उनके बीच से जगह बनातीं जल संसाधन विभाग,
बिहार सरकार की गाड़ियां तेजी से बांध से उतर रही हैं. ...वे सब लौट रहे हैं,
संभवत:...ठेकेदार, इंजीनियर. तो क्या ग्रामीणों ने सही कहा था कि रात में काम
नहीं होता?
सुदूर उत्तर में घने बादल घिर आये हैं. शायद उधर बारिश हो रही है. काले बादल
देख कर उस बूढ़े नेपाली मजदूर श्यामसुंदर की आंखों में भय छा जाता है- जाने क्या
होने वाला है इस साल.
14.09.2008,
10.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित