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आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र
आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-3
रामचंद्र गुहा
अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव
आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-1
आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2
इसके ठीक उलट माओवादी अपनी बैठकें करने के लिए पहाड़ी इलाकों में बसे सूदुर गांवों
में पैदल तक चलते को तैयार रहते हैं, बैठकें करते हैं और काफी
सहानुभूतिपूर्वक आदिवासियों की शिकायतों व समस्याओं को सुनते हैं. हाल ही में जैसा
कि एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने खुद स्वीकार किया, " किसी भी
सरकारी सहायता की गैर मौजूदगी में तथा वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन
प्रबंधन विभागों के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते नक्सलियों को यहां अपनी पैठ बनाने
के लिए बहुत उर्वर जमीन मिल गई है...."
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छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने सलवा जुडूम के रूप में खुद एक ऐसी
सशस्त्र सेना खड़ी कर दी है, जो क्षेत्र में समानान्तर सरकार चलाती है. |
इस बात में कोई आशंका नहीं कि माओवादी भी आदिवासियों के ही बीच उन्हीं की बदहाल
स्थितियों में गुजर बसर करते हैं. यह भी माना जा सकता है कि उनकी कुछ कार्रवाईयों
ने कई बार आदिवासियों की मदद भी की है. यह बात खासकर तेंदुपत्ता जैसे वन उत्पादों
के मूल्य पर बहुत लागू होती है जो नक्सली इलाकों में 200 फीसदी ऊपर जा चुका है
क्योंकि ठेकेदारों को वहां नक्सलियों का डर है. हालांकि, माओवादियों का प्रमुख
उद्देश्य आदिवासियों की सामाजिक या आर्थिक उन्नति नहीं है, बल्कि सशस्त्र संघर्ष के
रास्ते दिल्ली की सत्ता पर कब्जा जमाना है. इस वृहत् उद्देश्य में आदिवासी सिर्फ
साधन भर हैं या जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, वे चारे का काम करते हैं.
अपनी शुरुआत से ही नक्सली आंदोलन अंदरूनी खींचतान से जूझता रहा है, विभिन्न धड़ों के
बीच अक्सर खूनी संघर्ष हुए हैं और प्रत्येक का यह दावा रहा है कि वही समूह माओ त्से
तुंग की विचारधारा का सच्चा भारतीय वाहक है. हालांकि, पिछली शताब्दी के अंत तक
पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) का उभार दो
ऐसे समूहों के रूप में हुआ जिनका संगठन अब भी अस्तित्व में है और जिनके पास
क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं की एक समर्पित कतार है. पीडब्ल्यूजी आंध्र प्रदेश में
बहुत सक्रिय हुआ करती थी जबकि एमसीसी का आधार मूलत: बिहार में था.
2004 में पीडब्ल्यूजी और एमसीसी के विलय के साथ नक्सली आंदोलन को बहुत बड़ी ताकत
मिली. जो नई पार्टी बनी, उसका नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) रखा गया. यह
संयोग नहीं था कि इस पार्टी के नाम के पहले अक्षर उस पार्टी से मेल खाते हैं जो
भारतीय संविधान के तहत चुनाव लड़कर जीत चुकी है. इस माध्यम से यह संदेश दिया गया कि
क्रांतिकारी मार्क्सवाद की विरासत के सच्चे वाहक हम ही हैं और केरल व पश्चिम बंगाल
की सत्ता हाथ में रखने वालों को हम महज मुट्ठी भर बुर्जुआ सुधारवादी ही मानते हैं.
इस नई एकीकृत पार्टी को अस्तित्व में आए अभी सिर्फ तीन साल ही हुए हैं, लेकिन इस
दौरान इसने बहुत तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ा लिया है. पूर्व के एमसीसी
कार्यकर्ता अब झारखंड और पश्चिम बंगाल के इलाकों में भेज दिए गए हैं. जो
पीडब्ल्यूजी के साथ थे, उन्हें उड़ीसा और छत्तीसगढ़ भेज दिया गया है. छत्तीसगढ़ ऐसे
राज्य के रूप में उभरा है जहां नाटकीय तरीके से माओवादियों ने भारी बढ़त ली है,
खासकर दंतेवाड़ा जिले के अधिकतर हिस्से उनके कब्जे में हैं. इंद्रावती नदी के एक ओर
भारतीय राज्य का नियंत्रण दिन के वक्त जहां अनिश्चित होता है वहीं रात में गायब हो
जाता है. दूसरी ओर, जिसे अबूझमाड़ कहा जाता है, दिन या रात कभी भी राज्य की मौजूदगी
है ही नहीं.
दंतेवाड़ा उस वन क्षेत्र का हिस्सा है जो छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक
जाता है. मिथकीय युग में इसे दण्डकारण्य कहा जाता था, इस नाम को अब माओवादियों ने
अपना लिया है. दण्डकारण्य की स्पेशल जोनल कमेटी के अन्तर्गत कई डिवीजनल कमेटियां
संचालित होती हैं. इनके नीचे रेंज कमेटियां आती हैं जो डिवीजनल कमेटियों को रिपोर्ट
करती हैं. संगठन का सबसे निचला स्तर गांव में काम करता है, जहां की कमेटी को 'संघम'
कहा जाता है.
पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के मुताबिक दंतेवाड़ा में संघम का काम लोगों के जल,
जंगल और जमीन के अधिकारों की सुरक्षा करना है. साथ ही, माओवादी राज्य के
अधिकारियों, खासकर पुलिस पर लक्षित वार करते हैं. आम लोगों को सताने से रोकने के
लिए पुलिस थानों पर छापेमार कार्रवाई की जाती है. यह गुरिल्ला सेना को हथियार
मुहैया कराने के लिहाज से भी बहुत जरूरी है. लोगों के बीच संगठनीकरण और राज्य के
अधिकारियों के उत्पीड़न के माध्यम से माओवादियों को उम्मीद है कि वे समूचे
दण्डकारण्य पर अपना शासन स्थापित कर लेंगे. एक बार यदि इस इलाके को 'मुक्त क्षेत्र'
में तब्दील कर दिया गया, तो समूचे भारत की सत्ता कब्जाने का यह प्रस्थान बिंदु
होगा.
भारत में आखिर कितने माओवादी हैं? इसके अनुमान अस्पष्ट हैं और काफी भिन्न भी.
संभावना है कि पूर्णकालिक गुरिल्ला सैनिकों की संख्या 10000 से 20000 के बीच है
जिनमें अधिकतर के पास एके-47 है. ये क्रांतिकारी ग्रेनेड, बारूदी सुरंगें और रॉकेट
लाँचर चलाने में भी माहिर हैं. इनके सम्पर्क दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में चल
रहे गुरिल्ला संघर्षों के साथ है, एलटीटीई के साथ ये सूचना और प्रौद्योगिकी का
आदान-प्रदान करते हैं और हाल तक नेपाली माओवादियों के साथ भी सम्बन्ध रहे हैं.
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जितना हम जानते हैं, उससे कह सकते हैं कि अधिकतर माओवादी नेता और कार्यकर्ता निम्न
मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं. इन्हें शिक्षा मिली होती है और इनमें से अधिकतर
का क्रांतिकारी रूपान्तरण कॉलेजों में ही होता है. अन्य कम्युनिस्ट आंदोलनों की ही
तरह यहां भी नेतृत्व भारी संख्या में पुरुष ही करते हैं. पार्टी पदानुक्रम में ऊंचे
पदों पर आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं होता है.
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आदिवासियों को आर्थिक विकास में साझीदार बनाने के बजाय ये नीतियां
उन्हें और ज्यादा हाशिए पर डाल देती हैं. |
भाकपा (माओवादी) के महासचिव गणपति के नाम से जाने जाते हैं और वे आंध्र प्रदेश के
रहने वाले हैं. उनका यह नाम निश्चित तौर पर एक छद्म नाम है. अक्सर उनके नाम लिखे
हुए पर्चे इंटरनेट पर वितरित किए जाते हैं, जैसा कि इसी साल फरवरी में एक पर्चा
सामने आया था जिसमें 'देश के कई गुरिल्ला क्षेत्रों में से एक के घने जंगलों में'
पार्टी कांग्रेस के 'सफल समापन' की बात कही गई थी. पार्टी कांग्रेस में 'नव जनवादी
क्रांति की सामान्य लाइन की ही दोबारा पुष्टि की गई जिसकी धुरी किसान आंदोलन होगा
और जिसका रास्ता जनयुध्द से होते हुए भारतीय क्रांति तक जाएगा....' यह बैठक 'महान
उत्साह के साथ समाप्त हुई जिसमें दुनिया के लोगों से आह्वान किया गया: साम्राज्यवाद
और उसके पिछलग्गू कुत्तों के नाश के लिए ज्वार बनकर खड़े हो! क्रांतिकारी युध्द को
पूरी दुनिया में फैला दो!'
इसी जन युध्द का रास्ता अख्तियार करते हुए माओवादियों ने राज्य के प्रतीकों और उसकी
सम्पत्तियों पर दुस्साहसिक हमले किए हैं. नवम्बर 2005 में उन्होंने जहानाबाद जिले
को घेर कर वहां की जेल से सैंकड़ों कैदियों को छुड़ा लिया. मार्च 2007 में उन्होंने
छत्तीसगढ़ में एक पुलिस शिविर पर हमला बोल 55 पुलिसकर्मियों को मार डाला और भारी
मात्रा में हथियार लूट लिए. अन्य मौकों पर उन्होंने रेलवे स्टेशनों और बिजली के
खम्भों पर आगजनी की है.
हालांकि, क्रांतिकारियों द्वारा की जाने वाली हिंसात्मक कार्रवाईयां अक्सर राज्य के
खिलाफ ही लक्षित नहीं होतीं. मई 2006 में गढ़चिरौली में उन्होंने बारूदी सुरंग
बिछाकर एक बारात के कई सदस्यों की जान ले ली. माओवादियों ने उनकी जान को भी नहीं
बख्शा है, जिन पर उन्हें गुप्तचर होने का अंदेशा रहा है.
6.
एक लोकतांत्रिक राज्य अपने आदिवासी इलाकों में माओवादी अतिवाद के उभार से कैसे लड़
सकता है? ऐसा किया जा सकता है, यदि एक ओर विकास के फल आदिवासियों के बीच वितरित किए
जाएं तथा दूसरी ओर पुलिस द्वारा प्रभावी कार्रवाई को अंजाम दिया जाए. हालांकि, आज
की तारीख में भारत सरकार जिन नीतियों पर चल रही है वे इस तरह की सिफारिशों के ठीक
विपरित हैं. आदिवासियों को आर्थिक विकास में साझीदार बनाने के बजाय ये नीतियां
उन्हें और ज्यादा हाशिए पर डाल देती हैं. गैर आदिवासियों द्वारा चलाए जा रहे
राज्यों में उन्हीं के वर्चस्व वाले शासन खनन निर्माण और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए
आदिवासी जमीनों को बेचे दे रहे हैं. वहीं दूसरी ओर प्रभावी पुलिस कार्रवाई की जगह
हम नियम और कानूनों का प्रशासन से इतर बाहर से निर्यात किए जा रहे हैं, जैसा कि
छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के रूप में देखने में आया है जहां राज्य सरकार ने खुद एक
ऐसी सशस्त्र सेना खड़ी कर दी है, जो क्षेत्र में समानान्तर सरकार चलाती है.
सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण दौर में भी राज्य अक्सर आदिवासी इलाकों में कानून व्यवस्था
बहाल करने में विफल रहा है. संविधान की पांचवीं और छठवीं अनुसूची में आदिवासी बहुल
जिलों में स्वप्रशासन का प्रस्ताव किया गया है. इसके बावजूद आदिवासी जमीन और जंगलों
की सुरक्षा करने सम्बन्धी, सूदखोरों की गतिविधियों पर लगाम लगाने तथा ग्राम और जिला
परिषदों के गठन को अनिवार्य बनाने सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधानों का असम्मान ही
किया जाता रहा है. इन अनुसूचियों में यह व्यवस्था की गई है कि आदिवासी जमीन पर पाए
गए खनिजों की रॉयल्टी का एक हिस्सा स्थानीय परिषदों को प्राप्त हो सके, लेकिन
वास्तव में होता यह है कि आदिवासियों को खनन से आया हुआ एक भी पैसा देखने तक को
नहीं मिलता और उसे ठेकेदार और राज्य स्तर के नेता (खासकर गैर आदिवासी) आपस में
मिलकर बांट लेते हैं. जहां तक आपराधिक न्याय व्यवस्था का सवाल है, वह ढहाने की कगार
पर है. हम छत्तीसगढ़ में आदिवासी अस्मिता और अधिकारों के लिए लड़ने वाले निस्वार्थ
योध्दा शंकर गुहा नियोगी की हत्या देख चुके हैं. यह बात बड़े तबके में मानी जाती है
कि नियोगी की हत्या उद्योगपतियों द्वारा ठेके पर लिए गए हत्यारों से करवाई गई थी,
और जिन्होंने इस हत्या की योजना बनाई और इसे अंजाम दिया, वे आज खुले घूम रहे हैं.
इस किस्म के रिकॉर्ड का ही दूसरा अध्याय दरअसल सलवा जुडूम है. अतीत में तो राज्य
आदिवासी इलाकों में भूमि कानून लागू नहीं ही कर पाता था, लेकिन आज वह खुले तौर पर
गैर कानूनी गतिविधियों और अव्यवस्था को फैलाने में खुद सक्रिय है. छत्तीसगढ़ के
दंतेवाड़ा जिले में सलवा जुडूम के प्रभाव पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अकादमिकों,
पत्रकारों और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों का एक तथ्यान्वेषी दल कई अध्ययन कर
चुका है. उनकी रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि इस अभियान में उस इलाके में हिंसा को
बढ़ाया है.
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एक ओर जहां सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं ने गांवों को जलाया है और महिलाओं
को प्रताड़ित किया है, वहीं दूसरी ओर नक्सलियों ने भी उन व्यक्तियों की जान ली है
जिन्हें वे राज्य का नौकर मानते हैं. पूरे जिले में भय और असुरक्षा का वातावरण है.
परिवार और गांव बंट चुके हैं. कुछ माओवादियों के भय के साथ जी रहे हैं तो अन्य सलवा
जुडुम के शिविरों में उसके आंतक से जूझ रहे हैं. करीब 50000 लोगों को उनके घरों से
विस्थापित कर दिया गया है. ये आदिवासी शरणार्थी बदहाल हैं, फटे हुए तंबुओं में जी
रहे हैं और स्वास्थ्य सेवा या किसी रोजगार तक इनकी कोई पहुंच नहीं है. हजारों अन्य
सीमा पार कर आंध्र प्रदेश चले गए हैं.
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क्या भाकपा (माओवादी) सशस्त्र संघर्ष के रास्ते नई दिल्ली की सत्ता पर
काबिज हो पाएगी? मेरा ख्याल है कि यह संभव नहीं. |
दंतेवाड़ा जिले में एक नागरिक संघर्ष का माहौल है और जिसका नागरिक युध्द में बदल
जाने का खतरा लगातार बना हुआ है. राज्य और क्रांतिकारी दोनों की ही गतिविधियों के
इर्द-गिर्द रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है और जिस आंतक के चलते आदिवासी थानों में
एफआईआर करवाने से कतरा रहे हैं, इस वजह से इस युध्द के शिकार लोगों का कोई प्रमाणिक
आंकड़ा अभी तक नहीं मिल सका है. संभवत: 500 से 1000 लोग पिछले साल अकेले दंतेवाड़ा
में इसके शिकार हुए. इनमें कुछ सुरक्षाकर्मी और नक्सली भी शामिल हैं. हालांकि,
आदिवासियों का एक व्यापक तबका बीच में पिस रहा है.
इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि नागरिकों को हथियार पकड़ा कर राज्य ने दूसरे पक्ष के
ही तरीकों की नकल कर ली है. जिस तरह पहले आदिवासी युवकों ने नक्सलियों के साथ मिलकर
हथियार उठा लिए थे, अब वही काम वे उनके खिलाफ सलवा जुडुम के साथ कर रहे हैं. ये
लड़के इतने ही पढ़े-लिखे हैं कि खेतों और जंगलों में काम कर सकें, लेकिन आधुनिक
अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने के लायक ये नहीं हैं. इसी का फायदा उठाकर सरकार ने
इन्हें ऐसे काम में डाल दिया है जहां ये आसानी से खप जाते हैं और समाज में एक
प्रतिष्ठा भी मिल जा रही है. वेतन भले ही 1500 रुपए माह हो, लेकिन कंधों पर बंदूक
उठाए वे पूरे गांव में चहलकदमी कर उन्हें भी इसके लिए उकसा रहे हैं, जिनके हाथ खाली
हैं.
इस तरीके से क्रांति का जवाब प्रतिक्रांति से दिया जा रहा हैं. उन्हें आप संगम
संगठनकर्ता कह लें या स्पेशल पुलिस ऑफिसर, दण्डकारण्य के युवक अपनी इस नई खोज के
जाल में फंस चुके हैं और उत्साहित है- सत्ता. दंतेवाड़ा जिले में अकेले ऐसे हजारों
युवक हैं जो सत्ता के मद में पूरी तरह चूर हैं.
इस तरह आदिवासी भारत में दो त्रासदियां एक साथ काम कर रही हैं. पहली त्रासदी यह है
कि राज्य ने अपने ही आदिवासी नागरिकों के प्रति अहसान भरा नज़रिया रखते हुए
उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया है, और दूसरी यह कि उनके संरक्षक माने जाने वाले
नक्सलियों के पास भी उनके लिए कोई दीर्घकालिक समाधान मौजूद नहीं है.
क्या भाकपा (माओवादी) सशस्त्र संघर्ष के रास्ते नई दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो
पाएगी? मेरा ख्याल है कि यह संभव नहीं. आज 2007 में भारतीय राज्य भीतर से इतना
भ्रष्ट होकर घिस चुका है कि 1940 के चीन से उसकी तुलना नहीं की जा सकती. यह बहुत
संभव है कि माओवादी सिध्दांतों पर आधारित एक क्रांति भारत में विफल रहेगी. दरअसल,
मैं तो यह कहूंगा कि यह असंभव है. घने जंगलों में भले ही माओवादी एक कम प्रशिक्षित
खराब हथियारों वाले भयभीत पुलिस बल को आसानी से मार सकते हैं. यह भी संभव है कि वे
अपने संघर्ष के किसी चरण में दण्डकारण्य के कुछ हिस्सों में मुक्त क्षेत्र स्थापित
कर लें. लेकिन एक बार जब वे खुले में अपनी क्रांति का विस्तार करने का प्रयास
करेंगे, तो भारतीय सेनाएं उन पर भारी पड़ेंगी.
जहां तक माओवादियों की उनके उद्देश्य के प्रति प्रतिबध्दता का सवाल है, उस पर शक
नहीं किया जा सकता. ये ऐसे युवक और युवतियां हैं जिन्होंने एक कामयाब क्रांति का
सपना पाले बरसों कठिनतम परिस्थितियों में गुजर-बसर की है. मेरा मानना है कि सैन्य
दृष्टि से देखें तो यह सपना एक फंतासी ही है. माओवादी कभी भी लालकिले पर लाल झंडा
नहीं फहरा पाएंगे. त्रासदी यह है कि इस निष्कर्ष तक पहुंचने में उन्हें बरसों लग
सकते हैं. एक ओर जहां माओवादियों को अपने आधार इलाकों के बाहर विस्तार करने में
दिक्कत आएगी, वहीं राज्य इतनी आसानी से अपनी पकड़ से निकल चुके आदिवासी इलाकों में
नियम व्यवस्था लागू नहीं कर पाएगा. हमारे सामने इन्हीं अंतरविरोधों का एक भयावह
युध्द खड़ा है जिसमें भारी संख्या में इंसानों की जान जाएगी- पुलिसकर्मियों की,
माओवादियों की और साथ ही निर्दोष नागरिकों की.
मोटे तौर पर यही तात्कालिक तस्वीर दिखाई देती है. यदि इतिहासकार की दीर्घकालिक
दृष्टि से देखें तो कह सकते हैं कि माओवादी स्वप्न को फंतासी के रूप में नहीं,
बल्कि एक दुस्वप्न के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि 20वीं शताब्दी में हमने
इकलौता सबक यही सीखा है कि एक पार्टी के शासन पर आधारित तंत्र मानवीय आत्मसम्मान और
इंसानी तरक्की का बुरी तरह उल्लंघन करता है.
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हम सब इस बात से सहमत होंगे कि आधुनिक
युग का सबसे ज्यादा शैतानी व्यक्तित्व हिटलर था. उसने जो तबाही मचाई, उसमें तीन
करोड़ जानें गईं. यदि जनसंहार को देखें तो स्तालिन और माओ बहुत पीछे नहीं हैं. कुछ
अनुमान बताते हैं कि क्रांतिकारी साम्यवाद ने फासीवादी समेत दक्षिणपंथ की अन्य
अतिवादी विचारधाराओं की तुलना में कहीं ज्यादा जानें ली हैं.
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भारत में अतिवाद और चुनावी लोकतंत्र के बीच समझौते का काम ज्यादा
तात्कालिक और अनिवार्य है क्योंकि वह नेपाल से बहुत बड़ा और बहुत भिन्न
है. |
कुछ आदिवासी खुद इस तथ्य की अनुशंसा करते हैं कि बहुदलीय लोकतंत्र यदि सर्वश्रेष्ठ
तंत्र नहीं है, तो कम से कम ऐसा राजनीतिक तंत्र है जो न्यूनतम हानिकारक है. 2006 की
गर्मियों में दंतेवाड़ा की अपनी यात्रा में मैंने एक मुरिया आदिवासी के साथ लंबी
बातचीत की. वह पहली पीढ़ी का साक्षर था जिसे नदी पर एक आश्रम में पढ़ने को भेजा गया
था. स्नातक के बाद वह अपने गांव लौट आया था और वहीं एक स्कूल में पढ़ाने लगा. उसी
वक्त उसे पत्राचार से बीए की डिग्री हासिल हुई. एक अध्यापक यदि अपना काम ठीक से
करता है तो गांव में उसका बहुत सम्मान किया जाता है. यह मुरिया आदिवासी ऐसे ही
सम्मानित था, लेकिन जब माओवादी गांव में आए तो उसके सम्मान में अचानक उसने कमी का
अनुभव किया क्योंकि उनकी दृष्टि में वह अध्यापक भारत सरकार का एक अधिकारी था और इस
लिहाज से प्रताड़ना और वसूली का हकदार.
पिछले वर्ष 25 साल की अवस्था में वह मुरिया अध्यापक अपना पैतृक गांव छोड़कर
इंद्रावती नदी पार कर जिले के सरकारी हिस्से में चला गया और उसे एक स्कूल में नौकरी
भी मिल गई. वह स्कूल के पास में ही पहले एक तंबू गाड़ कर रहने लगा, बाद में सरकारी
जमीन पर उसने अपने हाथों अपना एक मकान बना लिया. मैं उससे पहली बार तब मिला जब वह
अपने घरों की दीवारों पर रंगाई कर रहा था.
एक छरहरा गहरे रंग का मूंछ वाला आदिवासी साधारण लुंगी पहने मुझसे देर तक बातें करता
रहा जबकि उसके दो बच्चे आसपास ही खेलते रहे. उसके मुझे बताया कि जब माओवादी पहली
बार जिले में आए थे, तो उनका आदर्श उफान पर था और नीयत अच्छी थी. समय के साथ
हालांकि, वे भी भ्रष्ट होते गए. आदिवासियों के संरक्षक से वे उनके उत्पीड़क बन गए.
मैंने जवाब दिया कि यह तो सलवा जुडुम के बारे में भी सच है. वह कभी लोगों का आंदोलन
रहा होगा, लेकिन बाद में उस पर अधिकतर गैर आदिवासी अपराधियों और ठेकेदारों का कब्जा
हो गया. हमने देर तक इस मसले पर चर्चा की और हमारे आसपास इसमें दिलचस्पी लेने वाले
काफी लोग इकट्ठा हो गए. आखिरकार, मुरिया अध्यापक ने कहा कि वह भले ही सार्वजनिक रूप
से और अन्य लोगों के सामने मुझसे असहमति जाहिर कर सकता है, लेकिन माओवादियों के बीच
विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान सहज रूप से संभव नहीं. उसने कहा, 'नक्सलियों को
हथियार छोड़ने और जनता के सामने बातचीत करने की हिम्मत नहीं है.' वास्तव में, भारतीय
माओवादियों के पास इतना साहस ही नहीं कि वे हथियार छोड़कर लोगों के सामने खुले तौर
पर अपने पक्ष को रखें.
फिर सवाल उठता है कि आखिर माओवादी उग्रवाद को कैसे समाप्त किया जाए या कम से कम उसे
समाहित ही कर लिया जाए? सरकार की जिम्मेदारी इसमें यह बनती है कि वह संवेदनशील
तरीके से गंभीरतापूर्वक क्रियान्वित की गई विकास परियोजनाओं में आदिवासियों को
सच्चा सहभागी बनाए. इसके लिए आदिवासियों द्वारा जोती जा रही जमीनों को उनके नाम कर
देना, उन्हीं के द्वारा वनों के सतत प्रबंधन को मंजूरी देना और उनके रिहाइश के
स्थान पर बनाए जा रहे औद्योगिक या खनन परियोजनाओं में उनको हिस्सा बनाया जाना शामिल
हो सकता है.
जहां तक माओवादियों का सवाल है, वे बुर्जुआ लोकतंत्र के साथ ठोस रूप से एकीकृत होने
की सोच सकते हैं. वे सीपीआई या सीपीएम अथवा नेपाल के माओवादियों का रास्ता चुनाव
में हिस्सा लेकर अपना सकते हैं जिसमें संभव है कि वे जीत भी जाएं. कॉमरेड प्रचंड इस
बात को स्वीकार करते हैं कि 21वीं सदी के लिए सबसे उपयुक्त राजनीतिक विचारधारा
बहुदलीय लोकतंत्र ही है. भारत में अतिवाद और चुनावी लोकतंत्र के बीच समझौते का काम
ज्यादा तात्कालिक और अनिवार्य है क्योंकि वह नेपाल से बहुत बड़ा और बहुत भिन्न है.
जैसी कि चीजें दिखाई दे रही हैं, इतना आसान नहीं लगता कि भारतीय माओवादी सशस्त्र
संघर्ष के प्रति अपनी वचनबध्दता को इतनी आसानी से छोड़ पाएंगे. न ही ऐसा लगता है कि
भारतीय राज्य खुद में क्रांतिकारी सुधार लाकर एक अरक्षित अल्पसंख्यक समूह
आदिवासियों के हितों की ओर अचानक प्रवृत्त हो जाएगा- जबकि यहां न पैसा है और न ही
सत्ता.
इस लंबी दौड़ में यह उम्मीद ही की जा सकती है कि शायद माओवादी भारतीय गणराज्य के साथ
शांति कायम कर सकेंगे और गणराज्य अपने आदिवासी नागरिकों को सम्मान के साथ बरतेगा.
मैं यह नहीं कह सकता कि ऐसा मेरे जीवनकाल में ही हो पाएगा. मध्य और पूर्व भारत के
जंगलों में संघर्ष व विभाजन के बरसों बरस हमारे आगे पड़े हैं. जिन जंगलों और पहाड़ों
को वे अपना कहते थे, वही आदिवासी एक ओर राज्य तो दूसरी ओर अतिवादी ताकतों द्वारा
प्रताड़ित किए जाते रहेंगे. जैसा कि बस्तर के एक आदिवासी ने मुझसे कहा, 'हमें दोनों
तरफ से दबाव हैं, और हम बीच में पिस गए हैं.' उसकी यह बात दूर अंग्रेजी की एक
पंक्ति की याद दिलाती है, 'दोनों ओर से दबे और भिंचे, हम यहां बीच में पिस रहे
हैं.'
15.08.2008,
00.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
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