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आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-3

 

रामचंद्र गुहा

अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव

 

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-1

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2

 

इसके ठीक उलट माओवादी अपनी बैठकें करने के लिए पहाड़ी इलाकों में बसे सूदुर गांवों में पैदल तक चलते को तैयार रहते हैं, बैठकें करते हैं और काफी सहानुभूतिपूर्वक आदिवासियों की शिकायतों व समस्याओं को सुनते हैं. हाल ही में जैसा कि एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने खुद स्वीकार किया, " किसी भी सरकारी सहायता की गैर मौजूदगी में तथा वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन प्रबंधन विभागों के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते नक्सलियों को यहां अपनी पैठ बनाने के लिए बहुत उर्वर जमीन मिल गई है...."

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने सलवा जुडूम के रूप में खुद एक ऐसी सशस्त्र सेना खड़ी कर दी है, जो क्षेत्र में समानान्तर सरकार चलाती है.


इस बात में कोई आशंका नहीं कि माओवादी भी आदिवासियों के ही बीच उन्हीं की बदहाल स्थितियों में गुजर बसर करते हैं. यह भी माना जा सकता है कि उनकी कुछ कार्रवाईयों ने कई बार आदिवासियों की मदद भी की है. यह बात खासकर तेंदुपत्ता जैसे वन उत्पादों के मूल्य पर बहुत लागू होती है जो नक्सली इलाकों में 200 फीसदी ऊपर जा चुका है क्योंकि ठेकेदारों को वहां नक्सलियों का डर है. हालांकि, माओवादियों का प्रमुख उद्देश्य आदिवासियों की सामाजिक या आर्थिक उन्नति नहीं है, बल्कि सशस्त्र संघर्ष के रास्ते दिल्ली की सत्ता पर कब्जा जमाना है. इस वृहत् उद्देश्य में आदिवासी सिर्फ साधन भर हैं या जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, वे चारे का काम करते हैं.

अपनी शुरुआत से ही नक्सली आंदोलन अंदरूनी खींचतान से जूझता रहा है, विभिन्न धड़ों के बीच अक्सर खूनी संघर्ष हुए हैं और प्रत्येक का यह दावा रहा है कि वही समूह माओ त्से तुंग की विचारधारा का सच्चा भारतीय वाहक है. हालांकि, पिछली शताब्दी के अंत तक पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) का उभार दो ऐसे समूहों के रूप में हुआ जिनका संगठन अब भी अस्तित्व में है और जिनके पास क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं की एक समर्पित कतार है. पीडब्ल्यूजी आंध्र प्रदेश में बहुत सक्रिय हुआ करती थी जबकि एमसीसी का आधार मूलत: बिहार में था.

2004 में पीडब्ल्यूजी और एमसीसी के विलय के साथ नक्सली आंदोलन को बहुत बड़ी ताकत मिली. जो नई पार्टी बनी, उसका नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) रखा गया. यह संयोग नहीं था कि इस पार्टी के नाम के पहले अक्षर उस पार्टी से मेल खाते हैं जो भारतीय संविधान के तहत चुनाव लड़कर जीत चुकी है. इस माध्यम से यह संदेश दिया गया कि क्रांतिकारी मार्क्सवाद की विरासत के सच्चे वाहक हम ही हैं और केरल व पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ में रखने वालों को हम महज मुट्ठी भर बुर्जुआ सुधारवादी ही मानते हैं.

इस नई एकीकृत पार्टी को अस्तित्व में आए अभी सिर्फ तीन साल ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान इसने बहुत तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ा लिया है. पूर्व के एमसीसी कार्यकर्ता अब झारखंड और पश्चिम बंगाल के इलाकों में भेज दिए गए हैं. जो पीडब्ल्यूजी के साथ थे, उन्हें उड़ीसा और छत्तीसगढ़ भेज दिया गया है. छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य के रूप में उभरा है जहां नाटकीय तरीके से माओवादियों ने भारी बढ़त ली है, खासकर दंतेवाड़ा जिले के अधिकतर हिस्से उनके कब्जे में हैं. इंद्रावती नदी के एक ओर भारतीय राज्य का नियंत्रण दिन के वक्त जहां अनिश्चित होता है वहीं रात में गायब हो जाता है. दूसरी ओर, जिसे अबूझमाड़ कहा जाता है, दिन या रात कभी भी राज्य की मौजूदगी है ही नहीं.

दंतेवाड़ा उस वन क्षेत्र का हिस्सा है जो छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक जाता है. मिथकीय युग में इसे दण्डकारण्य कहा जाता था, इस नाम को अब माओवादियों ने अपना लिया है. दण्डकारण्य की स्पेशल जोनल कमेटी के अन्तर्गत कई डिवीजनल कमेटियां संचालित होती हैं. इनके नीचे रेंज कमेटियां आती हैं जो डिवीजनल कमेटियों को रिपोर्ट करती हैं. संगठन का सबसे निचला स्तर गांव में काम करता है, जहां की कमेटी को 'संघम' कहा जाता है.

पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के मुताबिक दंतेवाड़ा में संघम का काम लोगों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की सुरक्षा करना है. साथ ही, माओवादी राज्य के अधिकारियों, खासकर पुलिस पर लक्षित वार करते हैं. आम लोगों को सताने से रोकने के लिए पुलिस थानों पर छापेमार कार्रवाई की जाती है. यह गुरिल्ला सेना को हथियार मुहैया कराने के लिहाज से भी बहुत जरूरी है. लोगों के बीच संगठनीकरण और राज्य के अधिकारियों के उत्पीड़न के माध्यम से माओवादियों को उम्मीद है कि वे समूचे दण्डकारण्य पर अपना शासन स्थापित कर लेंगे. एक बार यदि इस इलाके को 'मुक्त क्षेत्र' में तब्दील कर दिया गया, तो समूचे भारत की सत्ता कब्जाने का यह प्रस्थान बिंदु होगा.

भारत में आखिर कितने माओवादी हैं? इसके अनुमान अस्पष्ट हैं और काफी भिन्न भी. संभावना है कि पूर्णकालिक गुरिल्ला सैनिकों की संख्या 10000 से 20000 के बीच है जिनमें अधिकतर के पास एके-47 है. ये क्रांतिकारी ग्रेनेड, बारूदी सुरंगें और रॉकेट लाँचर चलाने में भी माहिर हैं. इनके सम्पर्क दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में चल रहे गुरिल्ला संघर्षों के साथ है, एलटीटीई के साथ ये सूचना और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान करते हैं और हाल तक नेपाली माओवादियों के साथ भी सम्बन्ध रहे हैं.

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