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प्रेम का पेड़ः मैती

प्रेम का पेड़

मैती आंदोलन दूल्हा-दुल्हन से वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रह गया है

 

मैती आंदोलन अब केवल विवाह के मौके पर दूल्हा-दुल्हन से वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रह गया है. इस आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत ने इस भावनात्मक आंदोलन को बहुमुखी बनाने में भी कामयाबी पाई है. अपने अनेक अभिनव प्रयोगों और गरीबों, विकलांगो, महिलाओं और छात्रों के बीच सामाजिक कार्यों के कारण मैती संगठन की पहचान सभी वर्गों के बीच बन गई है. इस संगठन ने वैलेंटाइन डे जैसे आयातित मैके को भी गुलाब फूल लेने-देने के प्रचलन से बाहर निकाल कर `एक युगल एक पेड़’ के कार्यक्रम से जोड़ दिया है. अब उत्तराखंड़ के गांव-गांव में वेलेंटाइन डे पर भी प्रेमी जोड़े अपने प्रेम की याद में पेड़ लगाते हैं.

मैती बहनों ने एक और भावनात्मक कार्यक्रम को अंजाम दिया. जब टॉस वन प्रभाग उत्तरकाशी में स्थित एशिया का सबसे बड़ा देवदार वृक्ष गिर गया तो उसकी याद में मैती बहनों ने इस पेड़ के महाप्रयाण पर एक भव्य औऱ शिक्षाप्रद क्रार्यक्रम का आयोजन किया. इस मौके पर जहां हजारों लोगों की मौजूदगी में महाप्रयाण किए देवदार वृक्ष को भावभीनी विदाई दी गई, वहीं उसकी जगह इसी जाति का एक नया पेड़ भी लगाया गया.

मैती बहनों ने पर्यावरण संरक्षण और वन्यप्राणियों की रक्षा के लिए कई नए मेलों का भी शुभारंभ किया जो आज भी हर वर्ष अपने समय पर आयोजित होते आ रहे हैं.


मैती बहनों ने पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण के अलावा वन्यजीवों की रक्षा के साथ अंधविश्वास के खिलाफ न सिर्फ चेतना जगाई बल्कि लंबा संघर्ष भी किया. चौरींखाल पौड़ी गढ़वाल में बूंखाल मेरे के दौरान पशुवध के खिलाफ संघर्ष किया. संघर्ष का परिणाम यह हुआ है कि जहां हर वर्ष इस मेले में चार सौ भैंसों की बलि दी जाती थी, वहीं उनकी संख्या अब चालीस से भी कम हो गई है. इसी तरह विनसर और सरनौल क्षेत्रों में भी वन्य प्राणियों की रक्षा के अभियान चलाए गए. सरनौल में सौ से अधिक वन्यप्राणियों की रक्षा की गई. मैती संगठन ने पूरे उत्तराखंड में वन्य़प्राणियों के प्रति प्रेम पैदा करने के लिए आठ सौ किलोमीटर की महायात्रा का आयोजन किया और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए लोगों को जागरुक किया.

मैती बहनों ने रूद्रनाथ बुग्याल में जड़ी-बूटी दोहन के खिलाफ भी संघर्ष किया. चामोली गांवल में पाटला गांव को गोद लेकर उसे पूरी साक्षर बनाने में कामयाबी पाई. बांधों के कारण डूब गए टिहरी शहर की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए डूबते समय तैंतीस ऐतिहासिक स्थलों की मिट्टी को लाकर स्वामी रामतीर्थ कॉलेज के हाल में उसे अलग-अलग गढ़ों में स्थापित किया गया और उस पर वृक्ष लगाए गए.


इसी तरह मैती बहनों ने राज्य सरकार की मदद से पंद्रह दिसंबर 2006 में सौ साल पूरा करने वाले एफआरआई देहरादून का शताब्दी समारोह मनाया. इस समारोह में राज्य भर के बारह लाख बच्चों के हस्ताक्षर युक्त दो किलोमीटर लंबे कपड़े से एफआरआई भवन को लपेटा गया. तत्कालीन राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल ने मुख्य अतिथि के रूप में कपड़े की गांठ बांधी और दो ऐतिहासिक वृक्षों का जलाभिषेक किया.

मैती बहनों ने पर्यावरण संरक्षण और वन्यप्राणियों की रक्षा के लिए कई नए मेलों का भी शुभारंभ किया जो आज भी हर वर्ष अपने समय पर आयोजित होते आ रहे हैं. ग्रामीणों के बीच स्वास्थ्य चेतना अभियान युवाओं के लिए खेलकूद और बेसहारों को सहारा देने के लिए भी अनेक कर्यक्रम संचालित होते रहे हैं.
 

08.08.2008, 14.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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