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आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2

 

रामचंद्र गुहा

अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव

 

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-1

 


1960 के दशक तक आते-आते भारत सरकार द्वारा प्रायोजित की गई रिपोर्टें खुद इस बात की गवाही देने लगी थीं कि कैसे राज्य अपने आदिवासी नागरिकों को आत्मसम्मान से जीने की स्थितियां मुहैया कराने में नाकाम रहा है. यह कोई सामान्य किस्म की आलोचना नहीं थी, बल्कि आदिवासियों की विशिष्ट समस्याओं को पहचाना भी गया था. मसलन, सुस्त और भ्रष्ट अधिकारी, जमीन छीने जाना, ऋणग्रस्तता, वन के इस्तेमाल पर लगाया गया प्रतिबंध और बड़े पैमाने पर विस्थापन. इसमें तथा अन्य रिपोर्टों में जो साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे, उनकी प्रतिक्रिया में ऐसी नीतियां बनाए और लागू किए जाने की जरूरत थी जो यह सुनिश्चित कर पाती कि भारत का औद्योगिक और आर्थिक विकास इसके आदिवासी नागरिकों की कीमत पर होने नहीं जा रहा है.

आदिवासियों के बीच ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जो राज्य और भाषा की सीमाओं से परे लोगों के लिए प्रेम, एकजुटता और प्रेरणा का स्रोत रहा हो. मसलन, बिरसा मुंडा को झारखंड में सम्मान दिया जाता है, लेकिन आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में उनकी पहचान शायद ही है.


इन रिपोर्टों और इनमें की गई सिफारिशों पर बहरा कर देने वाली चुप्पी साध ली गई. ऐसा नहीं है कि इसका अंदाजा पहले से नहीं था. जैसा कि एल्विन समिति ने दर्ज किया, आदिवासी समस्या पर अतीत की रिपोर्टों को भी 'व्यवहार में उपेक्षित' किया गया है. उसने टिप्पणी की कि 'यह तो अद्भुत है...कैसे इसी तरह अक्सर एक सिफारिश सरकारी फाइल के निर्मम आगोश में दम तोड़ देती है और फिर कभी भी उसकी आवाज कानों में नहीं पड़ती.' कम से कम 20-30 साल तक तो ऐसा होता ही है.

 

1980 के दशक में यह बात साबित होती है जब सरकारी रिपोर्टों की एक अन्य श्रृंखला में आदिवासी की जारी बदहाली पर कठोर टिप्पणियां की गई थीं. इन्हें लिखा था अनुसूचित जाति और जनजाति के तत्कालीन आयुक्त बी. डी. शर्मा ने, एक ऐसे नौकरशाह जिन्हें आदिवासियों के साथ और समानान्तर काम करने का व्यापक अनुभव था.

 

जैसा कि शर्मा ने लिखा, आदिवासियों की प्रमुख समस्या अब भी भूमि अलगाव, जंगलों का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध, बांधों और अन्य बड़ी परियोजनाओं के चलते होने वाला विस्थापन ही हैं. उन्होंने कहा कि, 'आदिवासी लोग अपने इतिहास के निर्णायक बिंदु पर हैं...', वे 'संसाधनों पर अपना नियंत्रण बहुत तेजी से खो रहे हैं, लेकिन साथ ही वे एक ऐसे सामाजिक विघटन का सामना कर रहे हैं जो इतिहास में अभूतपूर्व है.' और इसके बावजूद 'आदिवासी इलाकों की बदहाली की कहानियां बाहर शायद ही सुनी जाती हों. और जब वे यहां आते हैं, तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता.' इससे भी बुरा यह है कि 'राज्य खुद ही विभाजक भूमिका में कभी-कभार आ जाता है और ऐसी कार्रवाइयों में उतर जाता है जिन्हें आसानी से हम कानूनी नहीं कह सकते क्योंकि मामला एक छोटे से समुदाय का है जिसके पास अपनी आवाज नहीं.'

इस बार विनम्र शब्दों में और बेहतर तरीके से लिखी गई इन रिपोर्टों पर सरकार की प्रतिकिय्रा फिर यही रही कि उसे संसद में प्रस्तुत करने से इनकार कर दिया गया.

3.
उपर्युक्त कुछ तथ्य स्वतंत्र भारत में आदिवासियों की उपेक्षा और शोषण से जुड़े हैं. अब मैं विद्रोहों और असंतोष के इतिहास की ओर रुख करना चाहूंगा. औपनिवेशिक युग में आदिवासी इलाकों में बड़े विद्रोह हुए, जैसे 19वीं शताब्दी के आरंभ में कोल और भुम्ज का विद्रोह, 1855 का संताल हूल, 1890 के दशक में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान, 1911 में बस्तर में आदिवासियों का उभार, 1920 के दशक में गुडेन-रम्पा का विद्रोह और 1945-46 में वर्ली का विद्रोह. इनमें से अधिकतर विद्रोह आम तौर पर जमीन छीने जाने या मुनाफे के लिए जंगलों के बेजा इस्तेमाल से जुड़े हैं. इन विद्रोहों का दमन सिर्फ बर्बर बल प्रयोग द्वारा ही संभव किया जा सका था.

आजादी के बाद के शुरुआती दो दशक अपेक्षाकृत आदिवासी इलाकों के लिए शांतिपूर्ण थे. संभव है कि जयपाल सिंह की ही तरह अधिकतर आदिवासियों ने सरकार के शब्दों पर भरोसा कर लिया था- स्वतंत्रता के बाद एक नए अध्याय की शुरुआत होगी, जहां 'अवसरों की समानता होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी.' हालांकि, जैसे-जैसे इसका सबूत इकट्ठा होता गया कि विकास के फलों का वितरण असमान रूप से होगा और इसकी कीमत आदिवासी समुदायों को सबसे ज्यादा चुकानी पड़ेगी, असंतोष फिर से फलने लगा.


इसी का नतीजा रहा कि 1966 में बस्तर में आदिवासियों का एक बड़ा उभार वहां के हाल ही में अपदस्थ किए गए राजा प्रवीर चंद्र भंज देव के नेतृत्व में देखने में आया. इसके बाद 1970 के दशक में इस असंतोष ने बिहार के आदिवासी इलाकों में सशस्त्र रूप धारण कर लिया जिसकी मांग थी कि सूदखोरों और वन विभाग द्वारा शोषण की समाप्ति हो और एक स्वतंत्र राज्य का गठन किया जाए जिसका नाम झारखंड हो. इसी दशक में महाराष्ट्र में भूमि सेना और काश्तकारी संगठन जैसे समूहों द्वारा आदिवासियों को उनकी जमीनों और वन अधिकारों के समर्थन में संगठित किया गया. इसके बाद 1970 के दशक में बिहार में कोयल-कारो परियोजनाओं के खिलाफ विरोध देखने में आया.

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