इनकी रहबरी और लुटा हुआ कारवां
इनकी रहबरी और लुटा हुआ कारवां
एन अख़्तर
रांची से
जीइएल चर्च कंपाउंड, रांची. गॉस्सनर गर्ल्स हॉस्टल के मुहाने पर स्थित है एक खपरैल
घर. अंदर जाते समय यह आभास नहीं होता, बल्कि शक होता है कि क्या यह सही जगह है.
सुनसान, वीरान !
|
अब यहां कोई नहीं आता |
 |
|
किसी ज़माने में एन इ होरो के
घर लोगों की भीड़ लगा करती थी. अब भूले-भटके ही लोग यहां आते
हैं.
तस्वीरः अमित दास |
दरवाजे पर दस्तक देने की भी ज़रूरत नहीं. अंदर किसी का प्रवेश वर्जित नहीं. यकीन
नहीं होता कि इसी छप्परपोश मकान की एक अंधेरी कोठरी में अपने जीवन के दिन गिन रहे
व्यक्ति ने झारखंड आंदोलन की नींव रखी होगी. कमज़ोर याददाश्त वालों के लिए शायद नाम
बताना जरुरी होगा- निरेल एनिम होरो यानी एन इ होरो.
जिंदा रहने की खानापूर्ति कर रहे एन इ होरो आज अपनी पार्टी (झारखंड पार्टी) के
दग़ाबाज़ों और ढलती उम्र के कारण थोड़े कमज़ोर हो चुके हैं, लेकिन 83 साल की उम्र में
भी होरो के भीतर की राजनीतिक उम्मीदों ने दम नहीं तोड़ा है.
होश ज़्यादा नहीं रहता, खाने-पीने के बारे में पूछने पर जवाब नहीं दे पाते, लेकिन
‘जोहार ’ बोलते ही एक हाथ हवा में उठा कर होरो साहब जवाब देते हैं – “जय झारखंड.”
एन इ होरो के घर के बाहर बारामदे में एक पुराने टीवी सेट को बनवाने की जद्दोजेहद में
जुटे दिखे उनके बेटे रास होरो. परिचय दिया, तो रास ने कहा– “ पत्रकारों से क्या बात
करेंगे बाबा. फिर भी देखते हैं, शायद उठे होंगे, तो आपको फोटो मिल जायेगा.”
एन इ होरो जिस कोठरी में बैठे हैं, उसे देखकर लगा कि ज़िंदगी आदमी को कैसे-कैसे दिन
दिखाती है. कल तक जब होरो साहब एमएलए हुआ करते थे, झारखंड आंदोलन के मुखिया हुआ करते
थे तो इनके पास लोगों का तांता लगा रहता था. आज यहां भूले-भटके ही लोग आते हैं.
झारखंड युगे-युगे
पुरातन काल से ही झारखंड आदिवासी जनजातियों का गृहक्षेत्र रहा है. किसी किसी जिले
में तो जनजातिय आबादी ही बहुसंख्यक है. झारखंड में 32 जनजातिय समूहों का निवास है,
जिसमें असुर, बैगा, बंजारा, भथुड़ी, बेदिया, बिंझिया, बिरहोर, बिरिजिया, चेरो,
चिक-बराईक, गोंड, गोराईत, हो, करमाली, खैरवार, खोंड, किसान, कोरा, कोरवा, लोहरा,
महली, मलपहाड़िया, मुंडा, ओरांव, पहाड़िया, संथाल, सौरिया-पहाड़िया, सावर, भूमिज, कोल
एवं कंवर शामिल हैं.
1950 से पहले तक झारखंड आंदोलन जातीय आंदोलनों की जद में था. मुंडा, उरांव, खड़िया
आदि सभाओं के माध्यम से आंदोलन चल रहा था, जिसके बिखरे होने के कारण कोई लाभ नहीं
मिल रहा था. एन इ होरो ने ही सभी जनजातिय सभाओं को एकत्र किया और जयपाल सिंह से
आंदोलन के नेतृत्व की गुजारिश की.
जयपाल सिंह मुंडा ने 1950 में झारखंड पार्टी की घोषणा की और एन इ होरो के साथ मिल कर
काम करने लगे. होरो ज़मीन से जुड़े नेता थे, जबकि जयपाल सिंह मुंडा विदेश से पढ़ कर आए
थे. 1955 में पहली बार झारखंड राज्य बनाने के लिए इन लोगों ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया गया.
जिनसे उम्मीद थी बनाएंगे...
13 वर्षों तक आंदोलन चलता रहा और आंदोलन की धार तेज़ होती चली गयी लेकिन अचानक
आंदोलन को सबसे बड़ा आघात तब पहुंचा जब 1963 में जयपाल सिंह ने झारखंड पार्टी के
अन्य सदस्यों से विचार-विमर्श किये बिना ही पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.
इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप छोटानागपुर क्षेत्र में कई छोटे-छोटे झारखंड नामधारी दलों
का उदय हुआ जो आमतौर पर विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थीं. उस समय बकौल
एन इ होरो, जयपाल सिंह मुंडा ने उनसे कहा था – “चलिये मेरे साथ आंदोलन करने से स्टेट
नहीं बन जायेगा. मेरे साथ रहियेगा, तो पैसा-गाड़ी-घर और हेलीकाप्टर में घूमना, सब
मिलेगा.”
एन इ होरो के अनुसार उन्होंने जयपाल सिंह का प्रस्ताव ठुकरा कर आंदोलन तेज़ कर दिया
और झारखंड पार्टी को अलग अस्तित्व दिया. दूसरी बार 1973 में होरो ने
प्रधानमंत्री को अलग झारखंड राज्य के लिए फिर से ज्ञापन सौंपा और झारखंड आंदोलन की
अलख जगाते रहे.
इस बीच सैकड़ों लोग झारखंड पार्टी में आए और गए. झारखंड के नाम पर अलग-अलग पार्टियां
बनती गईं. नेता पार्टी दर पार्टी बदलते गए-कभी सत्ता के लिए, कभी धन के लिए. कभी
दबाव में, कभी प्रलोभन में. लेकिन होरो नहीं बदले. उन्होंने आज तक झारखंड पार्टी को
जिंदा रखा. वृहत झारखंड के सपनों के साथ.
झारखंड बनने के बाद होरो ने टिप्पणी की- “ यह कहां का झारखंड ? यह तो केवल बिहार का
बंटवारा है. हमें तो उड़ीसा, बिहार, मध्यप्रदेश के जिलों को मिला कर झारखंड चाहिए
था.”
फिर-फिर धोखा
झारखंड गठन के दौरान एन इ होरो चुनाव हार चुके थे. उनकी पार्टी से जिसने चुनाव जीता,
वह दूसरे संगठनों के साथ हो लिया.
|
एनोस और विधानसभा के स्पीकरों की सौदेबाज़ी के शिकार एन इ होरो आज भी इस उम्मीद के
साथ जिंदा हैं कि शायद आज या कल स्पीकर अपना फैसला सुना दें. |
उनकी पार्टी (झारखंड पार्टी) को तोड़कर उसके 30 फीसदी लोगों को अपने साथ मिला लिया
एनोस एक्का ने, जिन्हें 2005 में चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया था एन इ होरो ने.
चुनाव जीतने के बाद एनोस एक्का ने एनडीए का साथ दे दिया और राज्य में दोबारा अर्जुन
मुंडा की सरकार बनवा दी.
बतौर पार्टी अध्यक्ष एन इ होरो ने एनोस एक्का को निर्देश दिया कि आप मंत्रिमंडल से
इस्तीफा देकर पार्टी व्हिप के अनुसार काम करें, लेकिन एनोस एक्का ने इस्तीफा नहीं
दिया और उल्टे पार्टी अध्यक्ष एन इ होरो को ही चुनौती दे डाली.
इसके बाद जब एन इ होरो ने तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के यहां अपील
की और एनोस की सदस्यता समाप्ति की मांग की, तो नामधारी ने दो साल तक इस मामले को
लटकाये रखा और अंततः कोई फैसला नहीं सुनाया.
उनके बाद स्पीकर बने आलमगीर आलम, उनके यहां भी मामला लंबित है, लेकिन लगता नहीं कि
जब तक पाला बदल चुके एनोस एक्का यूपीए के साथ रहेंगे, तब तक उनके खिलाफ कोई
कार्रवाई होगी. इसी बीच एनोस ने होरो को ही पार्टी से निकालने की भी घोषणा कर दी है.
एनइ होरो के चौथे पुत्र रास होरो कहते हैं “ झारखंड पार्टी अब भी हमारी है, सिर्फ
कुछ स्वार्थी लोग एनोस के साथ गये हैं, जिन्हें हजार-दो हजार का ठेका पट्टा चाहिए.”
एनोस और विधानसभा के स्पीकरों की सौदेबाज़ी के शिकार एन इ होरो आज भी इस उम्मीद के
साथ जिंदा हैं कि शायद आज या कल स्पीकर अपना फैसला सुना दें. लेकिन, वृद्ध
हो चुके होरो को शायद ये नहीं पता कि झारखंड का कारवां लूट रहे लोगों के रहबर ही
रहजन हो चले हैं. सबकी इच्छा के केंद्र में सत्ता है, धन है, लोभ है और जाने कितनी
महत्वकांक्षाएं हैं. नहीं है तो बस उस आदिवासियों के राज झारखंड की चिंता, जिसका
सपना होरो की आंखों ने देखा था.
31.07.2008, 14.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित