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इस अंक में

 

माफ़ी की वह माँग तो भाव-विभोर करने वाली थी

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
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उधार के आन्दोलन से इन्कलाब

बहस

 

उधार के आन्दोलन से इन्कलाब

समर


ख़ुमैनी को वापस ला कर मुल्लाओं के हवाले कर देना, लगता है हम बुद्धिजीवियों और इंकलाबियों का कुल जमा काम इतना ही था.

-अबुल हसन बानी सद्र, इस्लामिक क्रान्ति के बाद ईरान के पहले 'निर्वाचित' (फिर 'निर्वासित') राष्ट्रपति.

lal-ratnakar


1 फरवरी 1979 के उस खुश्क दिन तेहरान एअरपोर्ट पर उतरते हुए बानी सद्र दोहरी खुशी से लबालब थे. न केवल वह बरसों बाद अपने 'वतन' लौट रहे थे, बल्कि इस वापसी में उनके साथ ईरान की बर्बर पहलवी शाह तानाशाही को उखाड़ फेंकने वाले 'आंदोलन' के एक महत्वपूर्ण नेता होने का गौरव भी शामिल था. यह और बात है कि यह खुशी देर तक नहीं टिकी.

आलम यह था कि एअरपोर्ट से लेकर शहर तक उमड़ती 50 लाख से ज्यादा की भीड़ भी उनको उत्साह नहीं दिला पा रही थी. वह बदलाव का जूनून देख पा रहे थे, पर इस बदलाव को लाने वालों की सफ़ेद और काली इस्लामिक पगड़ियां उन्हें और साफ़-साफ़ नजर आ रही थी. उन्होंने जीवन भर एक वामपक्षीय लोकतान्त्रिक (भारतीय अर्थों में नहीं, वरन यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस में प्रचलित 'सेंटर-लेफ्ट' वाले अर्थों में) राजनीति की थी. ईरान की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'वैधता' (लेजिटिमेसी) और समर्थन दोनों दिलाने में इस राजनीति की बड़ी भूमिका थी. इस राजनीति ने घरेलू स्तर पर भी एक साझा संघर्ष खड़ा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी, एक ऐसा संघर्ष जहाँ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, उदार लोकतंत्रवादी और इस्लामिक क्रान्ति समर्थक कंधे से कंधे मिला कर लड़ रहे थे कि 'बदलाव' का सपना हकीकत में तब्दील कर सकें.

उस आंदोलन में, उसके समर्थन में भी एक अतिरेक था. उस अतिरेक में कुछ लोगों ने अपनी आंखें बंद कर लीं थीं, हवाओं में साफ़ नजर आते संकेत पढ़ने से इनकार कर दिया था. वह 'जनता' के साथ थे, यह जाने बिना कि जनता कौन है, कहां है और किसके साथ है.

उन्होंने जनता की "नुमाइंदगी" का दावा कर रहे (ध्यान दें नुमाइंदगी नहीं, सिर्फ दावा) कर रहे मुल्लाओं को 'जनता' मान लिया था. उसके परिणाम भी सामने आये, वह भी बहुत जल्दी. सत्ता पर धीरे-धीरे इस 'जनता' का कब्जा हो गया और बावजूद इस तथ्य के कि बानी सद्र इस्लामिक क्रान्ति के बाद राष्ट्रपति पद के लिए 1980 में हुए पहले चुनाव न सिर्फ जीते, बल्कि 76 प्रतिशत वोटों के साथ जीते थे. 1981 में उन्हें पदच्युत कर दिया गया. इसके पहले कि आप यह सोचें कि यह एक व्यक्ति का पराभव था, यह जानना शायद बेहतर होगा कि इसी के साथ ईरान में 'इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी' को छोड़ कर प्रमुख विरोधी पार्टयों पीपुल्स मुजाहिदीन, फदाइन खल्क़ और तुदेह सहित सभी पार्टियों को 'गैरकानूनी' घोषित कर उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. उम्मीद है कि उसके बाद का ईरान का इतिहास, उसकी इस्लामिक क्रान्ति का इतिहास हम तमाम लोग जानते ही होंगे. यह भी कि इस इतिहास में उस क्रांति के बाद किसी किस्म के विरोध की कोई जगह नहीं बची, न किसी किस्म के लोकतंत्रवादियों (उदार या सामाजिक) के लिए न कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के लिए. यह भी कि उसके बाद का इतिहास ईरान में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए लड़ रहे लाखों लोगों की शहादत का इतिहास है.

यह इतिहास सिर्फ ईरान का इतिहास नहीं है. आप चाहें तो ईराक की बाथिस्ट क्रान्ति को याद कर सकते हैं. यह भी कि उसमें कितने लोकतंत्रवादी और वामपंथी साथियों को जान गंवानी पडी. याद तो खैर इंडोनेशिया को भी किया जा सकता है. कहीं गलती से भी लगने लगे कि बात सिर्फ इस्लामिक देशों की हो रही है, तो बेहतर होगा इंडोचाइना (याद हो कि न याद हो, 60-70 के दशक तक उस पूरे इलाके को कहा यही जाता था) का इतिहास याद करना. और उससे भी ऊपर नाजीवाद और फासीवाद का उभार याद करना.

यह दोनों आंदोलन बहुमत के आंदोलन नहीं थे. इन दोनों आंदोलनों का इतिहास दुश्मन गढ़ने, उसे नेस्तनाबूद करने और फिर नया दुश्मन गढ़ने का इतिहास है. (याद करें पेस्टर मार्टिन निमोलर की वह कविता- पहले वह यहूदियों के लिए आए, मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था...) यह भी कि अलग-अलग वक्त में इटली और जर्मनी की वाम से लेकर लोकतांत्रिक तक, तमाम राजनैतिक पार्टियां इन अल्पमत वाले दलों को समर्थन देती रही थीं. तब भी बहाना यही था- जनता के साथ, जन संघर्षों के साथ खड़े होने का. तब भी झूठ यही था, जनता के प्रभु वर्ग के एक छोटे-से हिस्से को "जनता" बना देने का.

आप देखना चाहें तो बहुत साफ़ देख सकते हैं कि इन तमाम आंदोलनों (आप उन्हें आंदोलन कह सकें तो) में समाज का सबसे धनी हिस्सा हमेशा इनके साथ था. इनके प्रतिपक्ष होने के समय भी, इनके धीरे-धीरे जनता की आवाज हड़प "जनता" बनते जाने के दौर में भी और फिर इनके सत्ता पर कब्जा करने में सफल होते समय भी. आप ध्यान दीजिये, चाहे नाजी जर्मनी हो, फासीवादी इटली या इस्लामी ईरान, इन तीनों प्रतिक्रान्तियों के साथ इन मुल्कों के पूंजीपति, कार्पोरेट और इनके मध्यवर्ग का सबसे धनी हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा था. फिर शायद यह भी दिखेगा कि यह मध्यवर्ग 'राष्ट्र का मध्यवर्ग' नहीं था, बल्कि केवल और केवल राष्ट्र के बहुमत वाले धर्म का मध्यवर्ग था. यह सभी प्रतिक्रान्तियां इतिहास की तार्किकता का नकार थीं, हैं. और अब सबसे जरूरी बात, कि ये सारे प्रतिक्रियावादी आंदोलन अपने-अपने मसीहा के साथ आए थे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नरेंद्र तोमर [nakutom@yahoo.com] गाजियाबाद,उप्र - 2011-06-05 13:21:16

 
  सुधासेन जी ऐसा लगता है कि बामपंथियों पर जबरदस्‍ती कीचड उछालने के जोश में आप सामान्य ऐतिहासिक तथ्‍यों को या जानबूझकर अनदेखा कर रही हैं अथवा उनसे वाकिफ नहीं है। बहरहाल आपकी जानकारी के लिए मैं बहुत संक्षेप में आपका ध्‍यान भारत के पिछले लगभग 65 साल के इतिहास के कुछ तथ्‍यों का ओर खींचना चाहूंगा: भारत की आजादी के बाद से ही कम्‍युनिस्‍टों और सोवियत संघ का अंध विरोध करने के लिए आरएसएस और संघ परिवार का राजनीतिक मुखौटा,जनसंघ अमरीका जैसे घोर साम्राज्‍यवादी ताकत के हाथों खेलता रहा हैं। दरअसल दुनिया भर में सांप्रदायिक और विश्‍व साम्राज्‍यवादी ताकतों के बीच गहरा रिश्‍ता रहा हैं,जो द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद नव-स्‍वाधीन देशों के जनतांत्रिक और साम्राज्‍यवाद विरोधी आंदोलनों को तोडने का काम करता रहा है। प्रगतिशील और जनपक्षधर आंदोलनों का विरोध और पूर्व राजा महाराजाओं की हिमायत करते हुए जनसंघ और स्‍वतंत्र पार्टी जैसे राजनीतिक दल 20 वीं सदी के सातवें दशक के लगभग मध्‍य तक बेशर्मी के साथ साम्राज्‍यवादी अमरीका के हित साधक बने रहे है। इसके विपरीत बामपंथियों ने सदा ही साम्राज्‍यवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ जम कर लडाई लडी है।  
   
 

nand [nand.kashyap@yahoo.com] bilaspur - 2011-05-29 04:34:06

 
  आलेख गहन विश्लेषण के साथ है. इस सिस्टम में अन्ना के जैसे आन्दोलन प्रायोजित होते ही रहेंगे और अजय जैसों को यही समग्र क्रांति लगेगा. वाम को गाली देने का बहाना चाहिए, बस, उनकी वाणी खुल जाती है. उन्हें सत्ताधारियों द्वारा देश और समाज को गिरवी रख साम्राज्यवाद की गुलामी को मजबूर करना नहीं दीखता. 
   
 

अरविंद [] - 2011-05-11 12:25:33

 
  अजय जी, मार्क्सवादी होने की घोषणा करना जरूरी नहीं होता। दशा तो यह है कि बहुत सारे लोग प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ कर अपना निज निबाहना ही सबसे परम धरम समझते हैं। चलिए, मैं आपके हिंदूवादी होने की घोषणा नहीं करूंगा, किया भी नहीं है। वह तो पता नहीं, आपके भीतर कहां से यह भय समा गया। बहरहाल, थरथराने की जरूरत अभी मुझे महसूस नहीं हो रही।

वाम दलों की भूमिका और भारतीय राजनीति को इतने उथले नजरिए से देखने पर हैरानी नहीं है। आपके मुताबिक, जब ये \"सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे थे, इन्हें महंगाई और मजदूरों की पिटाई से कोई वास्ता नहीं था।\" साहब, रविवार डॉट कॉम पर अपनी बात कह रहे हैं। पहले चेक तो कर लेते कि \"सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे\" होते हुए भी यूपीए-एक में इनकी भूमिका क्या थी। महंगाई के मसले पर कौन लगातार चिल्लाता रहा या मजदूरों की पिटाई के मसले पर केवल किस पक्ष का विरोध सामने आ रहा था। वे कौन-से कारण थे कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मुख्य विपक्षी दल के रूप में भाजपा के होने के बावजूद विपक्ष के रूप में वाम ही दिखाई देता है। भाजपा को लकवा क्यों मार गया है? जरा विदेश नीतियों से लेकर निवेश के मसले पर इनकी क्या भूमिका रही, या दूसरे जनपक्षीय नीतियों के मसले पर सरकार को समर्थन देने के बावजूद और उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रश्नों पर इसने कौन-सी भूमिका निभाई, कैसे नाक में दम कर दिया था कि कांग्रेस को उससे मुक्ति एक जरूरत लगने लगी, उसे एक बार याद कर लेते तो यह नौबत न आती। बाकी वाम दलों के धरने और प्रदर्शनों और नीतिगत विरोध और उसका विकल्प पेश करने की \"आदत\" को भी याद रखने की जरूरत नहीं। जहां दुराग्रह हावी होते हैं, वहां कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं। यह सिर्फ आपकी जरूरत नहीं, इस देश के दोनों पक्षों को वाम से मुक्ति की जरूरत लग रही है, ताकि खुला खेल फर्रूखाबादी निर्बाध तरीके से चलाया जा सके। परमाणु मसले पर समर्थन मुद्दे पर समर्थन वापस लेकर आज भी वाम वहीं खड़ा है, जिसे विकीलीक्स ने जरा ज्यादा साफ किया है कि उस दौरान क्या और कैसे खेल खेले गए थे। फूकुशिमा के बाद भी कुछ समझ में आ रहा है या नहीं सर? खैर, परमाणु मसले पर बाहर होने के बाद से यह साफ दिख रहा है और अब बंगाल का किला ढहने के बाद यह रास्ता शायद संपूर्ण मुक्ति मिल जाएगी। अब आप यह जरूर कहेंगे कि बंगाल से क्यों गए। आपके यह कहने पर हैरानी नहीं होगी।

बहरहाल, मीडिया की मेहरबानी किस पर कितनी और किस रूप में रही है, यह समझने के लिए आपको बहुत मेहनत नहीं करनी होगी, जरा कोशिश तो कीजिए सर जी...। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं होगी। मैंने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूं कि जंतर-मंतर पर दो हजार की भीड़ मीडिया के लिए जनसैलाब हो जाता है और तेईस फरवरी की रैली में आए तीन लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ उसके लिए शहर की परेशानी का सबब होती है। ऐसा क्यों है राजा जी...? तेईस फरवरी की रैली का भी मुद्दा तो भ्रष्टाचार और महंगाई ही था।

वाम का पूरा पक्ष कभी परजीवी नहीं रहा, बल्कि इनके भरोसे जीने वाले पक्ष भले रहे। भारतीय राजनीति में व्यावहारिकता के तकाजे क्या होते हैं, उसे राजनीतिक नजरिए से देखने की जरूरत होती है बाबू साहब...।

रही बात नवीन जिंदल की, तो आप अपनी सीमा में उसका उल्लेख कर रहे हैं। लगभग पूरा हरियाणा उस खापवादी जिंदल के कब्जे में है। नवीन जिंदल जब सालबनी में इस्पात कारखाना लगाने जाता है तो वह अपराधी है, सही है। लेकिन ये तो बताया नहीं आपने कि वही जिंदल जब आपके आंदोलन को पच्चीस लाख रुपए (घोषित) देता है तो धर्मात्मा कैसे हो जाता है? डी-बियर्स के बारे में जो आप सोचते हैं, उससे मैं भी सहमत हूं। लेकिन उसी के समानधर्मा कारपोरेट जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को अपना जोरदार समर्थन देते हैं तो क्या यह आपको अजीब नहीं लगता? 2-जी का उल्लेख आ चुका है। पौने दो लाख में से कितने राजा या कनिमोझी की जेब में गए होंगे? बाकी के तो कारपोरेटों ने ही खाया न सर...। निशाने पर केवल नेता और नौकरशाह क्यों?

नवउदारवादी नीतियों के मसले पर भ्रम ने वाम को पर्याप्त घाव दिए हैं जिसके साथ तालमेल बनाने में शायद उसे लंबा वक्त लगेगा। आप बताइए जरा अगर नवउदारवादी नीतियों का विरोध करने के चक्कर में एक ही देश के किसी खास इलाके में सारे उद्योग-धंधों को उजाड़ दिया जाए या लगने ही न दिया जाए, तो तस्वीर कैसी होगी। खेती और सरकारी नौकरियां कितनों का पेट भर रही हैं, इसे बताने के लिए क्या किसी सीबीआई की रपट चाहिए हमें? वाम के लिए तो अच्छा यह है कि जरा-सा इधर-उधर हुए नहीं कि पचास सवाल सामने हाजिर हो जाते हैं। इससे निपटना भी उसे ही है। लेकिन इस बहाने बाकी दो पक्षों को जिस तरह सवालों से परे मानने की कोशिश हो रही है, उसे समझना क्या इतना मुश्किल है साहब जी। असहजता पैदा करने वाले प्रश्न कई बार त्रिशूल की तरह दिखने लगते हैं। बहरहाल, वाम की बेइमानियों को लोग अगर माफ नहीं करते, तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। बाकी के चरित्र को बेईमान कहना भी लोगों को अब जरूरी नहीं लगता...। निश्चिंत रहिए। बस थोड़े दिनों की बात है, इस देश से वाम की विदाई के बाद \"सुंदर\" और \"स्वच्छ\" पर्यावरण में सांस लेने का मौका मिलेगा। एक तरफ कांग्रेस, दूसरी तरफ भाजपा- दोनों की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक नीतियां एक...! कोई शक?
 
   
 

Ajay kumar Kashyap [ajaykumarkashyap@gmail.com] Kanpur - 2011-05-07 12:47:41

 
  अरविंद जी, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप खुद को या समर को मार्क्सवादी और मुझे हिंदूवादी घोषित करने की उत्तेजना में इतनी थरथराहट से क्यों भर गये हैं. आपने जो सवाल खड़े किये हैं, उनके जवाब आपको भी पता हैं. हिंदुत्ववादी व्यवस्था की चूलें हिला देने वाले शब्द और उनकी जयजयकार करने वाले आज कहां हैं, यह आपको भी पता है. इनकी धजा उठाकर दौड़ने वाले करात और येचुरी की पार्टियां आज तक भारतीय सत्ता में परजीवी की तरह रही हैं. याद करें, पिछली बार जब ये सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे थे. इन्हें महंगाई और मजदूरों की पीटाई से कोई वास्ता नहीं था. उसके लिये गीदड़भभकी भी इन वाम पार्टियों ने नहीं दी लेकिन परमाणु मुद्दे पर रो-धो कर पल्लू छोड़ दिया. लेकिन जिस मुद्दे को उठा कर आपने सरकार से समर्थन वापस लिया था, उस मुद्दे का क्या किया ? देश में उस मुद्दे को लेकर माहौल बनाने की एक भी कोशिश की आपने ? एक रैली, एक धरना, एक बड़ा प्रदर्शन ? नहीं, क्योंकि आपको लगता था कि अंगुली कटा कर आप शहीद हो जाएंगे.
आप जिस मीडिया को कोस रहे हैं, उसी मीडिया के भरोसे छपने वाली विज्ञप्तियों के आक्सीजन पर देश के कई हिस्सों में आपकी पार्टी घर के उस बुजुर्ग की तरह कम से कम सांस ले पा रही है, जिसका मरना तय है. आपकी वामपंथी पार्टी पिछले कई सालों से केवल विज्ञप्तियां ही तो जारी करती आई है.
नवीन जिंदल से पैसे लेने वालों में प्रकाश करात भी शामिल हैं और फारवर्ड ब्लाक भी. आपको शायद पता होगा कि आपके भाई-बंधु कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को पिछले साल जो सम्मान मिला था, उसका प्रायोजक लुटेरा डी-बियर्स कंपनी था, जिसने अफ्रीका से लेकर तीसरी दुनिया के हर देश में नंगा नाच मचा रखा है. तो भैया राजा, थोड़ा आंखें खोलिये.
96 लोगों की कराह का पता तो सिंगुर में भी समझ में आता है और दूसरी जगहों में भी. छत्तीसगढ़ में आपके भाई-बंधु टाटा के खिलाफ हंगामा मचाए हुए हैं और बंगाल में आप उसे गोद में बैठा कर रखे थे. दोहरी बातें, दोहरा चरित्र वाम का इतिहास रहा है और ये हिंदूत्ववादी पार्टियां तो आपलोगों के करम से ही पैदा हुई हैं अरविंद जी. दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा तो ये बात समझ में आ जाएगी. संकट ये है कि संघियों की देखा-देखी आप लोग भी त्रिशुल ले कर दौड़ने में विश्वास करने लगे हैं.
 
   
 

prabhat [drprab@gmail.com] Varanasi - 2011-05-03 15:02:45

 
  पूरी तरह सहमत हूँ इस लेख से मै..........
सच ही कहा है किसी ने..........

सभी लोग बराबर हैं
सभी लोग स्वतंत्र हैं
सभी लोग हैं न्याय के हक़दार
सभी लोग इस धरती के हिस्सेदार हैं

बाकी लोग अपने घर जाएं
 
   
 

pramod yadav [pramod.yadav27@ymail.com] indore - 2011-05-03 06:38:38

 
  एक सटीक ,सार्थक,और यथार्थ का बोध करनेवाला उत्कृष्ट विश्लेषण है.पर क्या करें, हमारे देश में ऊँगली कटा कर शहीदों में नाम लिखने की परम्परा का बड़े शिद्दत से निर्वहन हो रहा हे.गांधी के ज़माने से ही भगत सिंह को उपेक्षित किया जा रहा है.और जहां तक मार्क्स और अन्य बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनके विचारों की प्रासंगिकता हमारी वसुदेव कुटुम्बकम की परम्परा में देखने को मिल जाएगी.निजी स्वार्थी तत्वों के द्वारा वामपंथियो के खिलाफ सदैव ही भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है.और रही वामपंथियो के द्वारा किये जाने वाले आन्दोलनो की बात तो उनके आन्दोलन स्वयं सिद्ध हैं .किन्हीं नागनाथ एवं सांपनाथ की विचारधाराओं से प्रेरित लोगों के प्रमाण की उन्हें आवश्यकता नहीं है.जो लोग वामपंथियो को नहीं समझा पा रहे हैं, उन्हें इन पंक्तियों से समझने में आसानी होगी. सबसे आगे हम हैं पाँव दुखाने में,और सबसे पीछे हम हैं पाँव पूजने में. सबसे नीचे हम है नींव उठाने में, सबसे ऊपर हम हैं व्योम झुकाने में. 
   
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-05-03 05:53:16

 
  में आपसे पूर्णतः सहमत हूँ. मैं लेखक के द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण से पूरी इत्तेफाक रखता हूँ. क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि जनता ही क्रन्तिकारी होती है. वो अपना नेता हालत के मुताबिक चुन लेती है. तथाकथित सिविल सोसायटी में तो कई कांग्रेस जैसी संस्था हैं, जो बदलाव के बजाये सुधार पर जोर देती हैं. अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी भी यही काम करेगी. यही इसकी ऐतिहासिक भूमिका होगी. अन्ना हजारे के आन्दोलन से जनता को अपनी अगली कार्रवाई के रास्ते वैसे ही खुलते दिखेंगे जैसे महात्मा गाँधी को हम से अलग तथा भगतसिंह को महात्मा गाँधी से अलग रास्ता अपनाना पड़ा था. लेकिन एक बात सच है कि जनता द्वारा लाये गए बदलाव चिरस्थायी होते हैं क्योंकि उसमें जनता की भागीदारी होती है और जो बदलाव नेताओं द्वारा लाया जाता है, उसमें हमारी आज़ादी की तरह जनविमुख राजनीति फैल जाती है. 
   
 

अरविंद [] - 2011-05-02 11:35:23

 
  मेरी टिप्पणी में नीचे से दूसरे पैरे को कृपया इस तरह पढ़ा जाए...

और इस तरह और इसीलिए आपको यह समझ नहीं आएगा कि यह भी एक आंदोलन ही था, जिसमें आए लोग ही असल में भ्रष्टाचार के शिकार हैं, जंतर-मंतर पर अपनी मर्सिडीज में ड्योड्रेंट में नहा कर मार्केटिंग करने या महज तफरीह (तहरीर चौक से कितना मिलता-जुलता शब्द-समूह है तफरीह चौक...!!!) करने आए वे चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे नहीं, जिनके लिए क्रांति का प्रतीक मशाल अब बदल कर मोमबत्ती हो गया है। यह क्रांति का आधुनिक रूपक है जो विद्रोह को शोक में तब्दील कर रहा है। यह भी याद रखिएगा कि यही चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे दरअसल पिछले दो दशक के \"उदारवादी आंदोलन\" से उपजे भ्रष्टाचार के असली उपभोक्ता हैं और जिन्हें भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा फायदा मिला है, रास्ता चाहे जो हो।
 
   
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-05-02 07:53:16

 
  मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं. 
   
 

अरविंद [] दिल्ली - 2011-05-02 07:36:59

 
  बंधु अजय कुमार कश्यप, अपने वामपंथी होने की इतनी खुली घोषणा के बावजूद समर आपको अपने वामपंथी खोल में -छिपे हुए- लग रहे हैं तो यह आपकी त्रासदी है। पहले क्रमिक तरीके से सोचना-समझना तो शुरू कर लीजिए! जनता की पीड़ा समझने में इस देश की साठ साल की आजाद सरकारों ने क्या किया है, इससे तो आपको कोई मतलब होगा नहीं। यह समझने में बहुत दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि आपलोग मार्क्स, हीगल या एंगल जैसे शब्दों से आतंकित क्यों होते हैं। हिंदुत्ववादी व्यवस्था की चूलें हिला देने वाले किसी भी शब्द या विचार से आप जैसे लोग आतंकित होगे ही, क्योंकि इससे कुछ सामाजिक सत्ताओं की सत्ता की कुर्सी उलट जा सकती है या उस पर किसी और का कब्जा हो सकता है। बहरहाल, भ्रष्टाचार के विरोध में ताजा आंदोलन ने देश की किस जनता के बीच विश्वास दिलाया है, यह आप भी बहुत भली प्रकार समझ रहे होंगे।

आपने ठीक कहा है कि पहली बार (दरअसल, पिछले डेढ़-दो दशक में) \\\"निराश लोगों\\\" को लगा कि अब भी दूसरी दुनिया के लिए लड़ाई संभव है। दरअसल, पिछले लगभग पांच सालों में समूचे देश में व्यवस्थावादी ताकतों ने जिस तरह फिर से अपनी सत्ता-वापसी की राहों के \\\"रोड़ों\\\" को साफ किया है, उसमें आपकी यह उम्मीद अचरज नहीं पैदा करती। वरना पिछड़े-दलित तबकों में जैसा आलोड़न पैदा हुआ था, अगर उसके नेता उस आलोड़न के प्रति बेईमान नहीं निकले होते तो आज और आगे देश और समाज की तस्वीर वही नहीं रहती, जिसे \\\"यूथ फॉर इक्वैलिटी\\\" बनाए रखना चाहती है।

आपको अपने इस सवाल का जवाब शायद मिल गया होगा कि इस देश में वामपंथियों ने कितने आंदोलन खड़े किए हैं। आप तो जानते ही होंगे कि आपके भ्रष्टाचार विरोधी ताजा आंदोलन की \\\"कामयाबी\\\" के लिए आपकी मीडिया ने आपको क्यों और किस तरह का तोहफा दिया है! तो यह भी समझने आता होगा कि तेईस फरवरी को वामपंथी दलों के आह्वान पर दिल्ली में तीन लाख लोग जमा होते हैं और आपके मीडिया के लिए खबर यह होती है कि इन लोगों ने दिल्ली वालों का जीना हराम कर दिया है। यह नहीं कि उस आंदोलन का भी मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार और महंगाई का विरोध ही था। वे तीन लाख मैले-कुचैले लोग फेसबुक या मोबाइल संदेशों से नहीं बुलाए गए थे जनाब और न उनके चेहरे इतने चिकने-चुपड़े थे कि उनको आपके भाई-बंधु अपने टीवी चैनलों पर चमकने लायक समझते।

\\\"भाई-बंधु\\\" का मतलब समझ रहे हैं न...! तो असली मतलब यही है कि भ्रष्टाचार विरोधी जंतर-मंतरी आंदोलन दरअसल, \\\"भाई-बंधुओं\\\" का आंदोलन है और अब उसे समझने के बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं रह गई है ये नरेंद्र मोदी से लेकर खाप समर्थक कॉरपोरेटर नवीन जिंदल तक किसके \\\"भाई-बंधु\\\" हैं।

और इस तरह और इसीलिए आपको यह समझ नहीं आएगा कि यह भी एक आंदोलन ही था, जिसमें आए लोग ही असल में भ्रष्टाचार के शिकार हैं, जंतर-मंतर पर अपनी मर्सिडीज में ड्योड्रेंट में नहाकर मार्केटिंग करने या महज तफरीह (तहरीर चौक से कितना मिलता-जुलता शब्द-समूह है तफरीह चौक...!!!) करने आए वे चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे नहीं, जो पिछले दो दशक के \\\"उदारवादी आंदोलन\\\" से उपजे भ्रष्टाचार के असली उपभोक्ता हैं और जिन्हें भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा फायदा मिला है।

समर ने अपने लेख में उसी को विश्लेषित करने की कोशिश की है। मुश्किल यह है कि छियानवे लोगों के सिर पर बैठे चार लोगों का हांक लगाना ही दुनिया को दिखाई पड़ सकता है, क्योंकि जो दिखता है, वही बिकता है। इसी सुर में नीचे के छियानवे लोगों का चिल्लाना भी गुम हो जाता है और मान लिया जाता है कि चिल्लाहटों में भी हांक लगाने की आवाज आ रही है। और इस तरह चार लोगों का आंदोलन देश भर का आंदोलन हो जाता है।
 
   
 

Ajay kumar Kashyap [ajaykumarkashyap@gmail.com] Kanpur - 2011-04-30 16:22:42

 
  समर जी, आप अपने वामपंथी खोल में छुपे हुये हैं, इसलिये जनता की पीड़ा समझने के बजाये मार्क्स, हेगल और एंगल के शब्द से आतंकित करने की कोशिश कर रहे हैं. आप इस बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करना चाहते कि अंततः अन्ना हजारे के अनशन ने पहले बार देश की जनता को ये विश्वास दिलाया है कि हां, अब भी एक दूसरी दुनिया संभव है. पहली बार निराश लोगों को लगा कि हां, लड़ाई अब भी संभव है. आखिर हमारे वामपंथी मित्र पिछलग्गू बनने के अलावा कितने आंदोलन इस देश में खड़ा कर पाये हैं? देश भर में मजदूरों की दुर्गति हो गई, लेकिन कॉमरेड केवल आदर्श और दर्शन झाड़ते रहे. 
   
 

Arun [] Fbd - 2011-04-29 09:00:44

 
  आपने अन्ना आन्दोलन के मूल चरित्र को सही व्याख्यायित किया है. अन्ना के मुखौटे के पीछे छिपे स्वर्ण,हिन्दू,मर्दवादी,इलीट,आरक्षण,दलित,अल्पसंख्यक,स्त्री विरोधी चेहरे को आसानी से पहचाना जा सकता है. बिलकुल सही कहा है- ...यह सामाजिक न्याय की लड़ाई में हारी गई जमीन को वापस पाने का मनुवादी युद्धघोष है.  
   
 

umashankar singh [uma.change@gmail.com] delhi - 2011-04-28 20:24:53

 
  अन्ना के जो समर्थक भावुकतावष मूर्खतावश या मीडिया के छलावे में आके उनके साथ हो गया है, उन्हें चेताने के लिए समर का यह एक लेख ही काफी है। हां! यदि उन्होंने सोच समझ कर अपना पक्ष ही सत्ता के परोक्ष साथ का चुना है तो उन्हें कौन बदल सकता है। तर्क, इतिहास, अनुभव, उदाहरण सबसे लैसे और समृद्ध इस लेख के बाद अन्ना और उनके नाटक को समझने के लिए और किसी औजार की जरूरत नहीं है। वैसे भी अन्ना के उन बुद्धिजीवी समर्थकों से संवाद की कितनी गुंजाइश रह जाती है जब वे बात और तर्क जवाब देने के लिए करते हैं आगे बढ़ने के लिए नहीं।  
   
 

दीपक् [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी - 2011-04-28 17:43:25

 
  आप से ना ही पूरी तरह से सहमत हुआ जा सकता है ना ही पूरी तरह से असहमत ...सहमत इस बात से कि अन्ना के आँदोलन में मनुवादी चरित्र है और असहमत इस बात से कि सिर्फ दलित कि भागीदारी कि वकालत उनकी हालत को नही बदल देगी ....ईरान की क्राँति से लेकर अन्ना तक आपने जो उदाहरण दिये कि कैसे क्राँतिया गर्त हो गयीं वैसे अनेको उदाहरण हैं जो कि बताते हैं कि कैसे मायावती से लेकर अनेक दलित सत्ता तक पहुँचे मगर दलितों की हालत नही बदली ,कैसे वामपँथी बँगाल में राज करते रहे मगर वहां गरीबी और अराजकता के सिवा कुछ नही ..दर-असल लेफ्ट की यह हाइपोथीसीस तो सही है कि समाज मे पूंजी का वितरण कैसे हो..मगर उसके पास इसका जवाब नही दिखता कि पूंजी पैदा कैसे हो ? आपने बड़ी अच्छी बात कही कि उधार के तर्को से बहस नही जीते जाते मगर आपको अँबेडकर दलित ही दिखते हैं शिक्षित भारतीय नहीं... यह उधारी बात है ... सच्चाई यह है कि लोकतँत्र मे शिक्षित और जागरुक ही अगवा होता है इसलिये तर्कगत फर्क शिक्षित होने और ना होने का है ना कि दलित होने और ना होने का ..दलित-ब्राहमण ,मार्क्स-प्रगतिवाद ये सब उधार बातें हैं ...ऐन वक्त प्रश्न है कि कैसे पूंजीवाद और मार्क्सवाद को मिलाकर एक नया किमीया बनाया जाये ना कि पुँजीवाद ,गाँधीवाद वगैरह का एकतरफा विरोध किया जाये !
चीन को ही देख लें, पूंजीवाद की हवा को वो खुद ही नही सम्हाल पा रहा है .पूरी दुनिया इसकी चपेट मे है इसलिये यह आधा-अधुरा भारत तो इससे लड़ ही नही पायेगा अलबत्ता इसका देशकाल और परिस्थिति के अनुसार सही उपयोग जरुर कर सकता है !
 
   
 

Amit Srivastava [] Lucknow - 2011-04-28 15:27:51

 
  इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. कुछ दिन में लोकपाल भी दूसरी सरकारी एजेंसियों जैसा ही हो जायेगा.

अच्छी बात बस इतनी है कि अन्ना जी ने काफी लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. इनमें से ज़्यादातर गलत हो सकते हैं लेकिन नीयत बुरी नहीं है. यह दुश्मन नहीं हैं, इनसे लड़ने की नहीं, इन्हें समझाने की ज़रुरत है.
 
   
 

ईश्वर दोस्त [] गोवा - 2011-04-28 12:05:28

 
  साथी समर, लेख का तेवर पसंद आया और भाषा भी। तर्क उधार की जगह नकद और मौलिक हैं। अभी यात्रा पर निकल रहा हूं। दो तीन दिन बाद संवादरत होउंगा। 
   
 

Sudha Sen [sudha.sen@gmail.com] Manila, Philippines - 2011-04-28 10:57:35

 
  आपने बहुत गंभीरता से यह लेख लिखा है लेकिन तमाम विश्लेषणों के बाद भी आप यह बताने में असफल रहे हैं कि आखिर समस्या का समाधान क्या है? क्या सीपीएम, सीपीआई या माओवादी पार्टियों को ही इस देश का ठेका दे दिया जाये ? इन पार्टियों ने आखिर इतने सालों में क्या कुछ किया ? सिवाय ऐतिहासिक गलतियों के ? इतिहास तीसरी आंख होती है, बुलडोजर नहीं और इरान के जिन उदाहरणों से आपने अपने तर्कों को सिद्ध करने की कोशिश की है, वे पुराने और एक हद तक अप्रासंगिक तर्क हैं. सांप्रदायिकता का हौव्वा बता कर आप जैसे वामपंथी चिंतकों ने ही अमरीका और अमरीका जैसे साम्राज्यवादियों को बढ़ाने का काम किया. अपने पूरे लेख को पढ़ कर जवाब दें कि भारत के संदर्भ में सांप्रदायिकता बड़ा खतरा है या साम्राज्यवाद ? 
   
 

sanjay prajapati [sanjaymanav2010@gmail.com] new delhi - 2011-04-28 05:15:27

 
  उधार की जनता के दम पर इन्कलाब नहीं होते, न उधार के तर्कों पर बहसें जीती जाती हैं. और जो यह कोशिश करते हैं, वे बानी सद्र की गति को प्राप्त होते हैं....ये पंक्तियां एकदम सटिक हैं. बहुत अच्छा लिखा है आपने. 
   
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