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सबकी दीदी | राधा भट्ट

मिसाल बेमिसाल

सबकी दीदी, राधा दीदी

 

प्रसून लतांत

उत्तराखंड से लौटकर

 

 

राधा भट्ट यूं तो पहाड़ की आम महिलाओं जैसी ही नजर आती हैं. लेकिन वे आम नहीं हैं. साधारण तो कतई नहीं. हां, आप उनसे बातचीत करें तो परत दर परत संघर्ष और अनुशासन का एक ऐसा रचनात्मक संसार खुलता चला जाता है, जो उन्हें सबसे अलग करता है.

राधा भट्ट


राधा भट्ट का नाम आज गांधी-विनोबा युग के बचे हुए थोड़े से गांधीवादियों में प्रमुखता से शुमार किया जाता है. वे आज देश और दुनिया के शीर्षस्थ गांधीवादी संस्थाओं और संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और इन पदों की जिम्मेदारियों का निर्वाह एक मिसाल की तरह करती रही हैं. यही वजह थी कि उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए मनोनीत होने वाली सौ महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था. वे अपनी उपलब्धियों को लेकर असाधारण हैं पर वे आम लोगों से कोई दूरी नहीं बनने देती हैं.

राधा दीदी को आज की राधा भट्ट होने के लिए भले लंबे प्रयत्न करने पड़े हों और ढेरों निजी आकांक्षाओं की कुरबानी देनी पड़ी हों लेकिन वह अपने जीवन के 75वें साल के सफर में आज जिस मुकाम पर हैं, वह उनकी सूझबूझ, दृढ़ता और हिम्मत की उपलब्धि है. यह उपलब्धि बहुतों के लिए प्रेरणास्रोत्र है.

आज 75 साल की उम्र में भी वह लगातार सक्रिय हैं. पहाड़, देश और दुनिया के अनेक देशों में उनका आना-जाना लगा रहता है. उन पर उम्र का कोई असर नहीं है. यात्रा और यात्रा! इन यात्राओं से गुजर कर वे कभी थकती नहीं हैं, बल्कि और आगे और देर तक चलने के लिए नई ऊर्जा भी अर्जित कर लेती हैं.

बचपन में अल्मोड़ा जिले में अपने गांव धुरका से नैनीताल जिले के रामगढ़ तक की लंबी पदयात्रा से लेकर विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और उत्ताराखंड में चिपको आंदोलन, शराबबंदी और खनन व नदी बचाओ जैसे आंदोलनों के दौरान की गई पदयात्राओं ने राधा दीदी के व्यक्तित्व का निर्माण किया है. बचपन में बड़े भाई और बाद में सरला बहन, फिर लक्ष्मी आश्रम की बच्चियों के साथ और अब देश भर में जगह-जगह चल रहे विभिन्न आंदोलनों के लिए चलने वाली यात्राओं में भी वे शरीक होने में वे हमेशा आगे रहती हैं.

राधा दीदी की छह-सात साल की उम्र की स्मृतियों में जाएं तो उन्हें अपने गांव धुरका स्थित अपने घर से पोखरी तक अपनी मॉ के पीछे-पीछे चलने की यात्रा आज भी याद है. इसके बाद जब उन्होंने घर से ननिहाल तक करीब बारह किलोमीटर की उतार-चढ़ाव वाली लंबी पहाड़ी पगडंडियों पर यात्रा की तो इसके अनुभवों ने उनमें इतना उत्साह भर दिया था कि वह कभी भी कहीं भी अपने उद्देश्यों के लिए चल देतीं.

अल्मोड़ा जिले में अपने गांव में पढ़ाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण राधा दीदी और उनके बड़े भाई को नैनीताल जिले के रामगढ़ में दादा की निगरानी में पढ़ने के लिए रखा. राधा दीदी और उनके बड़े भाई की छुट्टियों में अपने गांव धुरका लौटते थे. साठ-सत्तर मील की यात्रा पैदल ही करते थे. घर पहुंचते-पहुंचते उन्हें रास्ते में दो-दो रातें अनजान गांवों में पड़ाव डालना पड़ता था. इन भाई-बहनों को इन्हीं दिनों में हलद्वानी मंडी से साल भर की जरूरत के लिए गुड़ लाने वाले जत्थे मिल जाते, जिससे इनकी यात्रा न सिर्फ सुरक्षित और मजेदार बल्कि आसान हो जाती थी.

राधा दीदी बताती हैं “ मैं हर साल बड़े उत्साह से इन दिनों की प्रतीक्षा करती थी जब गांवों के बीच ऐसी टोली के साथ हम फिर से पैदल चलते. गांव, उनके लोग व उनके सोच के प्रति मेरी रूचि जागी थी, पहली बार नौ-दस वर्ष की लड़की की शादी और विदाई पर उस बच्ची का जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोना भी मैंने तभी देखा था और मन की मन दृढ़ता से सोचा था कि मैं नहीं करूंगी शादी.”

वे अपने इस संकल्प पर टिकी रहीं. राधा दीदी ने तय कर लिया कि वह आजीवन समाज सेवा ही करेंगी. “ सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों को भी बेहतर से बेहतर काम के लिए आगे आना चाहिए”, यह संदेश उन्हें बचपन में आर्य समाज के स्कूल में पढ़ते हुए मिल गया था, जिसे राधा दीदी ने अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखाया.

स्कूल में राधा दीदी अपनी पाठय-पुस्तकों में रमी रहतीं लेकिन सार्वजनिक जीवन का पहला पाठ उन्होंने इन यात्राओं में ही पढ़ा. ये जत्थे जिस गांव में रूकते वहां राधा दीदी ही घर-घर जाकर खाने के बर्तन और अन्य जरूरतों के लिए गृह स्वामियों से संपर्क करतीं. विश्राम के दौरान विभिन्न विषयों पर चर्चा होती. मसलन स्त्री-शिक्षा, आर्य समाज, गांधी और देश-विदेश के बारे में चर्चा होती.

राधा दीदी कहती हैं “ बचपन की इन बातों का किसी और के लिए क्या महत्व हो सकता है, नहीं जानती. लेकिन मेरे पदयात्रा के जीवन में इन यात्राओं का बड़ा महत्व है. दिन भर चलने के बाद शाम का सहजीवन हो, ग्रामवासियों का वह निष्छल विश्वास और उनकी उत्सुकतापूर्ण चर्चाएं हों या दिन में जंगलों के बीच घाटियों को गुंजाने वाले हमारी टोली के गीत हों या मन को मोहने वाली ऐसी कहानियां जो अधिकतर लंबी चढ़ाइयों को पार करने के लिए बड़े ही विश्रांत तरीके से कही जाती थीं या फिर मानव रहित स्थान पर ठिनक पाड़ कर आग जलाना, लोगों का तंबाकू पीते हुए ठहाका लगा कर हंसना हो, इस सबके बारे में मेरे मन में एक रस पैदा होता था.”

राधा दीदी ऐसी यात्राओं के आने के दिन गिनते हुए उत्साह के साथ प्रतीक्षा करती थीं. बचपन की इन यात्राओं ने उन्हें सामूहिक जीवन जीने की सीख दी. उनका यह अनुभव ही बाद में लक्ष्मी आश्रम को आगे बढ़ाने में काम आया. यह संयोग ही था कि यात्राओं को अपने जीवन की पाठशाला मानने वाली राधा दीदी को इस आश्रम में आने बाद और भी बड़ी-बड़ी यात्राओं में शामिल होने का मौका मिला और ये यात्राएं उनके व्यक्तित्व को तराशती रहीं.

17 वर्ष की उम्र में 1951 में लक्ष्मी आश्रम में प्रवेश किया तो उन्होंने यहीं सबसे पहले भूदान पदयात्रा के बारे में जाना. यात्रा से दीदी को तो कोई बैर कभी रहा नहीं, सो वे भूदान और ग्रामदान यात्राओं में शरीक होने लगी. इसके बाद तो उनकी यात्राओं का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा.

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और असम में सैंकड़ों किलोमीटर पैरों से ही नाप लिया. इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्हें देश भर के सर्वोदय साथियों को भी करीब से जानने का मौका मिला. इन यात्राओं का जिक्र चलता है तो राधा दीदी अक्सर कहती हैं, “ सरला बहन के साथ पदयात्रा करना जीवन को गढ़ने की एक सचल पाठशाला होती थी, एक जंगम विद्यापीठ होती थी.”

पचास के दशक में उन्होंने सरला बहन के साथ सघन यात्राएं की.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ashwani sharma(bhatt ) (www.mjashwanisharma@gmail.com) bhopal

 
 प्रसून जी, आज के समय में ऐसे लोगों के बारे में पढ़कर खुद भी प्रेरणा मिलती है इस युग में गांधी विचारधारा का जो रूप राधा दीदी के बारे में पढ़कर मिला वह कहीं नहीं मिला. 
   
 

Sunanda S Banglore

 
 बहुत सुंदर लेख है. राधा बहन के बारे में अब तक केवल सुना था. आज उनके बारे में पढ़ उनके प्रति सिर झुक गया. 
   

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