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एक दर्द का नाम है हरसूद

एक दर्द का नाम है हरसूद

 

दयाशंकर मिश्र

भोपाल से



कीमत तो चुकानी पड़ती है!

 

इंदिरा सागर बांध परियोजना से प्रभावित 250 गांवों और उनके दर्द के प्रतीक बने एक खंडवा जिले के हरसूद के विस्थापितों के बारे में नजदीकी जिलों और राजधानी के नेताओं, अफसरों से लेकर आम जनता तक यही राय रखते हैं.


30 जून को हरसूद डूबने के चार साल बाद विस्थापितों की बस्ती नया छनेरा में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार आपको मिल जाएंगे, जिनके लिए दो जून की रोटी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है. एक ऐसा सवाल जो हर रोज उनके घरों में सुबह होने के साथ जागता है और पूरा घर हर रोज उससे जुझता रहता है.

कभी धड़कता हुआ नगर था हरसूद

दरबदर होने से पहले तहसील का दर्जा पाने वाला ऐसा नगर था, जो कि अनेक गांवों से घिरा हुआ था. वहां लोगों के पुश्तैनी कारोबार थे. किसानों के लिए खेती थी तो मजदूरों के लिए मजदूरी.

मंगल ग्रह जैसी सुर्ख लाल जमीन पर बसाए गए लोगों की आजीविका का कोई साधन नहीं है. मुआवजे का पैसा धीरे-धीरे खत्म होता गया और अब हालात भुखमरी के हो रहे हैं. उन चंद लोगों की बात छोड़ दें जिन्होंने अलग-अलग तरीकों से मोटा मुआवजा हड़पा तो 250 गांवों के लगभग सवा लाख से अधिक लोग 1000 मेगावाट बिजली की कीमत अपनी जड़ों से कटकर, बेरोजगार होकर चुका रहे हैं. बरस दर बरस हरसूद सरकार और सरकारी योजनाओं के केंद्र से हाशिए पर जा रहा है.

लापरवाही की हद है कि अभी भी लोग खतरे के निशान की जद में है. ऐसे लोग मुआवजे की आस में अपने परिवारों को संकट में डाले हुए हैं. हर साल की तरह इस साल भी यहां जड़ों से खदेड़े गए लोग अपने प्यारे शहर को याद करने एकजुट हुए और नम आंखों से खंडहर में तब्दील हो चुके शहर में जाकर उसे याद किया.

हरसूद का मूल पेशा खेती-किसानी तो हरसूद डूबने के साथ ही खत्म हो गया. इसके साथ ही उस तबके की परेशानियां भी बढ़ गईं जो मजदूरी करके अपने परिवारों का पेट पालता था. इसी लिए नए छनेरा में तेजी से विस्थापन बढ़ा. आलम यह है कि हरसूद से विस्थापित किए गए 5600 परिवारों में से न्यू हरसूद में बमुश्किल हजार परिवार ही बचे हैं. बाकी कहां गए, विस्थापित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य किस कदर प्रभावित हुई है, इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है. कम से कम सरकार के पास तो नहीं ही है, जिसके जिम्मे इन विस्थापितों का पुनर्वास था.


दलितों की स्थिति तो और भी बदतर है. नए हरसूद में पचास से अधिक दलितों के घर हैं, जिनमें से अधिकांश घरों के बच्चों की पढ़ाई दम तोड़ चुकी है. स्वास्थ्य सेवा की हालत खराब है.


कौन देगा विस्थापन का सूद

जून 2004 में विस्थापित की गई ऐतिहासिक हरसूद नगरी को 1815 में राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाया गया था. आधुनिक समय का हरसूद दरबदर होने से पहले तहसील का दर्जा पाने वाला ऐसा नगर था, जो कि अनेक गांवों से घिरा हुआ था. वहां लोगों के पुश्तैनी कारोबार थे. किसानों के लिए खेती थी तो मजदूरों के लिए मजदूरी. कुल मिलाकर सबके लिए कुछ न कुछ जरूर था, जो अब नहीं रहा.

हरसूद: लोक और तंत्र की आशा का डूबना

बहुत रोमांटिक हिसाब है, 1000 मेगावाट बिजली के लिए 249 गांव की तबाही. अरुंधति राय, मेधा पाटेकर से लेकर तमाम संघर्षशील लोगों ने यहां आकर लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरवी का असफल प्रयास किया. एक अरब से अधिक आबादी वाले देश में इस हरसूद के आंदोलन पर गहरी नकारात्मकता रही है.

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बिजली के लिए इस नगर को विस्थापित होना पड़ा और जो यहां से विस्थापित हुए उनके हिस्से रोशनी नहीं थी, केवल अंधेरा था.

मध्यप्रदेश में ऐसी दूसरी जगह खोजना मुश्किल है, जहां लोगों के पास रहने के लिए पक्के मकान तो हैं, लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर लोग मकान बनवाते-बनवाते ही कंगाल हो गए.

नया हरसूद जिसे उस समय की मुख्यमंत्री रहीं साध्वी उमा भारती ने विस्थापितों का आदर्श नगर बनाने की घोषणा की थी, वास्तव में बेहद बंजर और कठोर जमीन का इलाका था. जिसमें नींव खुदवाने में ही लोगों को बहुत अधिक पैसा खर्च करना पड़ा. जब किसी की बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ दी जाए तो उसकी सबसे पहली जरूरत ठिकाना तलाशना होता है. इसी कमजोरी का सबसे अधिक लाभ नये हरसूद में बसने वालों से ठेकेदारों, सीमेंट, रेत और लोहे के व्यापारियों ने उठाया.


उन्होंने अमूमन 2300 रूपए प्रति क्विंटल में बिकने वाले लोहे और हजार-पंद्रह सौ की रेत-गिट्टी के लिए मजबूर लोगों से क्रमश: चार हजार और तीन हजार रूपए वसूले. इस तरह खदेड़े गए लोगों की मुआवजे की रकम घर बनवाने में ही खर्च हो गई.


2004 में हरसूद के लोगों ने अपने ही हाथों से घरों पर रोते हुए हथौड़े चलाए थे और बरसात की आहट के बीच मंगल ग्रह सरीखी लाल और कठोर जमीन पर खुले आसमान के नीचे आ बैठे थे, उनके लिए सबसे पहली जरूरत घर थे, इसलिए उनके पास जो कुछ था, वह सब कुछ उन्होंने अपना घर बनाने में लगा दिया.

 

घर के भीतर का सच
अब हालत यह है कि उनके पास घर और केवल घर ही हैं. सरकार के नुमाइंदे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पक्के मकानों के विहंगम दृश्य दिखाकर अदालतों को यह बताने में कामयाब हो जाते हैं कि लोगों के पुनर्वास के समूचे इंतजाम हैं, जबकि यह केवल एक छल है. सरकारी छल !


नए हरसूद के सरकारी रिकार्ड में वाणिज्य केंद्र के आगे यह दावा किया गया है कि भूखंड विकसित हैं और कार्य प्रगति पर है. जबकि सच्चाई तो यह है कि महज खाली भूखंडों वाला यह वाणिज्य केंद्र अपनी स्थापना के साथ ही नाकाम हो चुका है. क्योंकि न तो नये हरसूद में बस स्टैंड है, न ही मंडी और ही ऋण देने वाले बैंक. हां विकास दिखाने के लिए कांक्रीट की नालियां और अधचुपड़ी डामर की सड़कें जरूर मौजूद हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Nitin Kant Chaturvedi()

 
 Ye Harsud ka wo Syaah such he jo Rat ko Jagmagate Naya Chhanera ki Roshni me Siyasatdaro ko nahi dikhai deta. Aapne is dard ko bayaan kar un logo par bhi chot ki he jinhone kabhi harsud ko khub becha aur ab sarkar ki tarah bhool gaye, shayad ise padkar unhe bhi apni galti mahsoos hui hogi. 
   
 

Anand nayak(nayak34@hotmail.com)

 
 vikas ke nam par balidan hue harsood ke logon ke dard ko sametne ki shandar koshish. very good report.  
   
 

vipul gupta(meenumandvi@yahoo.co.in)

 
 harsud ka ulta dekh sakate hain un officers ke gharon main jinhone new harsud basaya?
 
   
 

Prashant kumar dueby (prashantd1977@gmail.com)

 
  अरुंधति राय, मेधा पाटेकर से लेकर तमाम संघर्षशील लोगों ने यहां आकर लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरवी का असफल प्रयास किया.
Daya ji ke in shabdon par aapatti bhi hai ki "loktantrik mulyon ki pairavi ka yeh prayas asfal nahin hai balki aaj bhi jo kuchh ummmed hai jo anya bandhon ke sambandh main bhi hai, vo inhi prayason ke chalte hi hai. nahin to ab taka kai HARSOOD dooba chuki hoti sarkar. Mujhe lagat hai daya ji aap jansangharsh ko chunoti de rahe hain. kya aap ye mante hain ki HRASOOD ka doobna asfal prayas ho gaya, shayad nahin lekin aap us yogdan ko nahin bisar sakte jiske karan aaj bade bandhon aur unse upji samaayaon par charcha ho rahi hai. mujhe lagta hai aapne sangahrsha ko kareeb se nahin dekha tabhi aapne fouri tipanni kar di. Phir bhi HARSPOOD ki is vyatha ko Behri sarkar tak pahunchane ke liye SADHUVAAD.
 
   
 

Prashant Kumar dubey(prashantd1977@gmail.com)

 
 Harsood ka darad lekh main aapne harsoodki paristhiyon ka behatar varnan kiyahai, estithi bahut gambheer hai. Sarjkar aaj bhi kah rahi hai FEEL GOOD lekin vastava main sab BAD BAD hi hai. 
   
 

vijay manohar tiwari(vijaye9@gmail.com)

 
 harsud ko khatm karne ke bad bhi bijli ki samasya barkarar hai...harsud hamesha ek case study ka jeevant vishay bana rahega... 
   

hh    

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