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इस अंक में

 

माफ़ी की वह माँग तो भाव-विभोर करने वाली थी

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
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अयोध्या के नाम

अयुद्धा जन्मभूमि में मजहबी युद्ध

 

अयुद्धा जन्मभूमि में मजहबी युद्ध
संघ परिवार और सुन्नी बोर्ड दोनों हाईकोर्ट से फैसले चाहते हैं, जिसका वे पालन भी करना चाहते हैं? क्या ऐसा वे कर पाएंगे? फैसला कुछ भी हो- उसके बाद जो भी विस्फोटक परिस्थिति बनेगी क्या सरकार, सुप्रीम कोर्ट और समाज उसे सम्हाल लेंगे? क्या दोनों पक्षों के लोग सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा देंगे कि फैसला कुछ भी हो देश में शांति रखने की उनकी गारंटी है.
संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी का विश्लेषण

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण संभव
यदि संघ परिवार चाहे तो विश्व हिन्दू परिषद के स्वामित्व वाली जमीन पर राम मंदिर बना कर इस विवाद को हमेशा के लिए विराम दिया जा सकता है.
संदीप पांडेय के विचार

अयोध्या पर नरसिंह राव ने कहा था...
देश में यह अधिकार किसी को नहीं है कि वह प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूलभूत आदर्श व विचारों पर कुठाराघात करे.
7 दिसंबर 1992 को संसद में नरसिंह राव का भाषण

अयोध्या पर फैसले की घड़ी
भारत में कई समस्याएं उभरती हैं और समय के ग्लेशियर में विलीन हो जाती हैं. लेकिन धार्मिक आस्था के साथ कुछ इस तरह की भावनाएं जुड़ी होती हैं कि उनके आगे समय भी हार मान लेता है. जो लोग धार्मिक आस्था की गहराई का अनुभव नहीं करते, वे मानते हैं कि यह मसला अब महत्वहीन हो चुका है.
एम जे अकबर की बाईलाइन

अदालत से बाहर
जहां एक ओर फैसले का इंतजार हो रहा है, वहीं इस मुद्दे पर तनाव बढ़ता जा रहा है. इस मामले को आस्था से जोड़ दिया गया है और काफी लंबे समय से इसका इस्तेमाल साम्प्रदायिक जुनून पैदा करने के लिए किया जाता रहा है.
राम पुनियानी का विश्लेषण

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) http://sainnyashesh.blogspot.com

 
 राम के साथ अब गाँधी की शामत आ गई है !
आजकल भाजपा यह प्रचार कर रही है कि राम मंदिर बन जाने से महात्मा गाँधी का सपना पूरा होगा, क्योंकि वे अंतिम सांस तक राम का नाम लेते रहे. 2 अक्टूबर को नरेन्द्र मोदी द्वारा इस बात की बाकायदा घोषणा भी की गई. दर-असल अब इन लोगों के पास एक उसी आदमी के नाम का आसरा रह गया है, जो शुरू से ही इनकी आँखों का काँटा था. आज गाँधी जी इनकी पोल खोलने के लिए मौजूद न सही, मगर उनकी किताबें मौजूद हैं.

गाँधी जी ने लिखा है : "मेरा राम, हमारी प्रार्थना का राम वह राम नहीं है, जो दशरथ का पुत्र और अयोध्या का राजा था. मेरा राम सदा से है और सदा रहेगा, क्योंकि मैं सत्य को ही राम या इश्वर मानता हूँ. मैं इसीलिए कभी मंदिरों में नहीं जाता."
 
   
 

zubair () bhind

 
 धर्म और मानवता के नाम का सहारा लेकर राजनैतिक दल अपनी रोटियां सेक रही हैं. ये बात आम जनता के समझ में आ जाना चाहिए. 
   
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