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दास्तां-ए-मानुष : नर्मदा देवी

दास्तां-ए-मानुष दो

वार्तालेख


पीयूष दईया

 

सन् 1999 में उत्तराखंड के रांउलेक गांव, ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए भू-स्खलन से प्रभावित कमला देवी और शेरीलाल के विवरण पिछले दिनों प्रकाशित हुए थे. कुछ और प्रभावितों के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में हैं.

 

दास्तां-ए-मानुष का पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

नर्मदा देवी

हम कखो छन चैणा

 

पति मिस्त्री का काम करते थे पर इस भू-स्खलन में उनकी मृत्यु हो गयी. स्वयं के पन्द्रह और तेरह बरस के दो लड़कों सहित देवर की पत्नी तथा देवर के बच्चों की भी.

इस घटना के बाद केवल देवर व इनकी एक विवाहित लड़की ही बची.

नर्मदा देवी

अब तो जब तलक ज़िंदगी है तब तक यादें आतीं रहेंगीं, मुझे घेरे रहेंगी. यादों से भला कैसे बचा जा सकता है.

 

मेरे पति-काशीलाल-भू-स्स्खलन में खत्म हो गये थे. तीन बच्चे हैं-एक लड़की , दो लड़के. उस समय पति की उम्र लगभग पैंतीस साल की थी.


जिस दिन यह घटना हुई उससे मात्र तीन दिन पहले ही हमारा नया मकान बन कर तैयार हुआ था. यह नया मकान हमारे पुराने घर से थोड़ा-सा हट कर बना था. भू-स्खलन वाले दिन हम घास काटने चले गये थे-दिनभर घास काटते रहे क्योंकि पिछले तीन दिनों से बरखा जोरो से गिर रही थी और हम अपने मवेशियों के लिए चारे का बंदोबस्त नहीं कर पा रहे थे-वे भूखे थे. सो उस दिन दो-तीन सोलटी लाईं थीं.


लेकिन तब क्या जाना था कि आज रात ऐसा होगा.


घर आकर मैंने खाना बनाया. फिर हम सभी जब भोजन करके उठे तो मेरे पति ने कहा कि वह हमारे नये घर में सोने जा रहे हैं. वे चले गये.


क़िस्मत का जोर अजब रहा कि जिस मकान में हम थे उस पर तो कुछ कहर नहीं बरसा लेकिन हमारे नये मकान पर जिसमें मेरे मालक/पति सोये हुए थे ; वह पूरा ही मलबे में बह गया. मुझे रात में ही पता चल गया था कि मेरे पति मकान-मलबे के साथ ही खत्म हो गये हैं , इसलिए मैं कहीं नहीं भागी. तब सोचती रही थी कि काश वह मकान भी बह जाय जिसमें मैं थी और उसी के साथ मैं भी बह जाऊं. दुख से कलेजा फटा जा रहा था और लगा कि अब हमारे ज़िंदा रहकर क्या फायदा. हम कहां के लिए चाहिए ? -हम कख़ो छन चैणा ? (अर्थात् जब पति ही नहीं रहे तो फिर अब जीने में क्या सार)

हमने खुद अपनी आंखों से रग्वाडो आते देखा था, अपना मकान बहते हुए भी. यह वे घड़ियां थी जब मैं अपने पति से यह कहने के लिए अपने घर से बाहर निकलने ही वाली थी कि वे भी हमारे साथ ही आ जायें क्योंकि न जाने क्यों मेरा जी किसी अनिष्ट की आशंका से अशान्त था. मुझे लगा कि हम सबको एक साथ ही रहना-सोना चाहिए और ज्योंहि मैं उन्हें आवाज़ देती कि मेरे सामने हमारा अभी तीन दिन पहले ही बन कर तैयार हुआ मकान व उसमें मेरे पति बह गये.


फिर जब लोग आ गये तो उन्होंने हमें बचाने की कोशिश की--मेरे तीन बच्चों और मुझे. मैं तो कहीं नहीं जाना चाहती थी, लोग ही ले गये. न तो उस समय बच्चों पर मेरी ममता गई न ही मैंने बचने की कोशिश की क्योंकि जब मेरे वो/पति ही चले गये थे तो सोचा कि मेरा बच कर के क्या करना.


जब सब चले गये तो हमारे बचे/बचने से क्या होने वाला है ?


अब तो पलट कर सोचने पर क्रूर बात लगती है पर उस वक्त तो मेरा बच्चों तक पर भी दिल नहीं जा सका था. बार बार यही हो रहा था कि -हम कख़ो छन चैणा ?

बाद में हम राउंगढ गये और वहां किन्हीं लोगों की गौशाला में रहे. इसके बाद राउंलेक के कैम्प/शरणार्थी शिविर में रहे फिर कुछ दिन ऊखीमठ में रह कर लगभग महीना भर विद्यापीठ के शिविर में रहे.


कुछ महीनों बाद जब वापिस घर लौटे तो पहले तो झप्पर में कई दिनों तक रहना पड़ा-क्योंकि न तो गौशाला थी न मकान था. धीरे धीरे करके एक गौशाला और एक कमरा बनाया. एक कमरे में गायें रहीं, एक कमरे में हम.


जब तक कैम्प/शिविर में रहे तब तक हमें सरकार की ओर से सहयोग मिला--राशन मिला और कुछ दूसरी राहत. अपना गुजारा हमने उसी से किया. शिविर में हमारे गांव के लोग ही थे सो सभी के साथ दुख-सुख बांटा-हमारी अनुसूचित जाति के लोग ही थे--सवर्ण कोई नहीं था.


ऊखीमठ वाले शिविर में कुछ सवर्ण लोग भी थे लेकिन विद्यापीठ शिविर में केवल एस.सी ही थे.


विभिन्न जगहों पर लगे शिविरों में सवर्णो के शिविर अलग थे और एस. सी. लोगों के अलग.

 

बहरहाल , कुछ सालों में हमने अपने मकान वगैरह बना लिए. लेकिन इस रग्वाडो में मेरे पति के खत्म होने की वजह से एक कठोर पहलू यह भी उभर कर आया कि पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गयी. पता नहीं कि यह कैसे व कब हुआ कि मैंने फिर से जीने की कोशिश करनी शुरू कर दी. धीरे धीरे इधर-उधर से लोगों के कामधाम कर बच्चों को पालने लगी. कुछ तो सरकार का दिया रहा जिससे काम चलता रहा , कुछ मैंने लोगों के साथ काम करके गुजारा चलाया. अब तो बड़ा बच्चा--जो उस समय पन्द्रह बरस का था--फौज में नौकरी कर रहा है.

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