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यहां दरवाजे बंद हैं

यहां दरवाजे बंद हैं

 

गीताश्री

जशपुर, छत्तीसगढ़ में
 


वे अपने घरों को लौट तो आईं हैं मगर बाकी बची जिंदगी की मुश्किलों का अंदाजा नहीं लगा पा रही हैं. उनके घर लौटने के बाद बूढे पिता की आंखें थोड़ी और सिकुड़ गईं हैं और माथे पर चिंता की लकीरें थोड़ी और गहरी. मां की कमर बोझ ढोते ढोते थोड़ी और झुक गई है.

जब बेटी घर से भागी थी किसी एजेंट के साथ, किसी को बिना बताए तब मां बाप ने यह सोच कर तसल्ली कर ली थी कि बेटी कमाने गई है और एक दिन इतने सारे पैसे कमाकर भेजेगी कि उनकी सारी गरीबी दूर हो जाएगी.

ना शहर से पैसा आया ना बेटी की कोई खबर आई. किसी तरह पता करके शहर पहुंचे और बेटी को दलालों के चंगुल ले छुड़ा लाए खाली खाली हाथ. बेटी के लौट आने की खुशी अब धीरे धीरे मातम में बदल रही है. चांद-तारों जैसे सपने देखने वाली बेटी के सपने भी तार-तार हो गए.

शहर नहीं जाना चाहती शशिकांता

चटकपुर की शशिकांता को एजेंट ने गुड़गांव के एक परिवार को और परिवार ने अपने गार्ड के हवाले कर दिया. मां बाप जब पता करके परिवार तक पहुंचे तो उनसे झूठ कह दिया गया कि शशि ने गार्ड से शादी कर ली है और उसके साथ विदेश चली गई है.

 

चटकपुर गांव की 22 वर्षीय शशिकांता किंडो को उसके घर वाले दिल्ली से एक गार्ड के चंगुल से छुड़ा तो लाए लेकिन अब उन्हें बेटी की शादी की चिंता सताने लगी है.

गार्ड ने अपने घर में शशि को जबरन कैद कर रखा था. एजेंट ने शशि को सौंपा गुड़गांव के एक परिवार को और परिवार ने अपने गार्ड के हवाले कर दिया. मां बाप जब पता करके परिवार तक पहुंचे तो उनसे झूठ कह दिया गया कि शशि ने गार्ड से शादी कर ली है और उसके साथ विदेश चली गई है. इधर गार्ड उसका शोषण करता रहा. घर वालों से संपर्क के सारे रास्ते बंद कर दिए गए.

मुश्किल जीवन की राह

लेकिन पिता विंसेंट और मां करमीला किंडो कहां हार मानने वाले थे. लाख जतन किए और एक दिन अपनी बेटी को शादी की पोशाक में कथित पति के घर से भगा ले आए. अब शशि अपने घर वालों के साथ खुश है लेकिन घर वाले उसकी शादी की चिंता में घुल रहे हैं.


अपने पैर के अंगूठे से जमीन को खुरचती शशि कहती है- “ मैं गांव की लड़कियों को बताना चाहती हूं कि शहर मत जाना. ”

शहर में घरेलु नौकरानी का काम करने वाली लड़कियों की शादी वैसे भी गांव में टेढी खीर है. कुछ हैं, जो शहर में ही किसी सजातीय या विजातीय लड़के से शादी कर लेती हैं. जो लड़कियां ब्याह के ख्वाब लिए गांव लौटती हैं, उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता है.

गांव के लड़के शहर से लौटी लड़की को पत्नी नहीं बनाना चाहते. एक तो शहर से आने वाली हर लड़की के साथ-साथ एक झुठा-सच्चा किस्सा चला आता है, दूसरे पिछले कुछ सालों में महानगरों से लौटने वाली लड़कियों की ‘अनजान ’बीमारी से हुई मौतों ने भी इस इलाके के लड़कों के मन में दहशत भर दी है.

पहले जहां गांव में लड़कियों की शादी 16 साल की उम्र में कर देते थे, वहीं अब शादी की उम्र 25 से 30 हो गई है. वो भी गांव में हो जाए तो गनीमत है.

मौत का सामान लेकर वापसी

सरगुजा संभाग में मानव तस्करी रोकने के लिए दो संस्थाएं आशा एसोसिएशन और ग्रामीण विकास संस्थान बेहद सक्रिय हैं. जिनकी बच्चियां गायब होती हैं, उनके घरवाले इनके पास आते हैं. थाने में रिर्पोट दर्ज कराने के बजाए ये सीधे यहां पहुंच जाते हैं. आगे की सारी कार्रवाई ये संस्थाएं देखती हैं.

आशा से जुड़े नौशाद बताते हैं- “ लौटी हुई लड़की या बाहर काम करने वाली लड़की की शादी नहीं हो पा रही है. इलाके में रोजगार का अभाव पहले से ही है, उपर से ये समस्या भी लगातार बढ रही है.”

नौशाद कहते हैं “ मेरे देखते- देखते इस इलाके में बहुत सी जवान लड़कियां यहां लौटी और कुछ दिन जीकर मर गईं. आते ही भयानक बीमारी की शिकार होकर बिस्तर पर पड़ गईं. बाद में कहानी सुनी तो पता चला कि वे एडस से पीड़ित थीं.”

मानव तस्करी रोकने में जुटी संस्थाएं अब इस दिशा में भी सोचने लगी हैं. अंबिकापुर की नवविहान कल्याण समिति ने तो बाकायदा अभियान के तहत पूरे आदिवासी इलाके में एचआईवी -एडस के प्रति जागरुकता फैलाने वाले परचे बांट रही है. बीमारी क्या है, कैसे होता है और इससे बचने के क्या उपाय हो सकते हैं, ये सब जानकारी गांव वालों के दी जा रही है.

स्थानीय कलाकारों के लेकर नुक्कड़ नाटक किए जा रहे हैं और जिसके जरिए ये बताया जा रहा है कि मानव तस्करी के कारण कैसे भयावह बीमारी को बढावा मिल रहा है. लेकिन संस्थाएं आदिवासी लड़कियों के गायब होने को सीधे सीधे यौन शोषण से जोड़ कर देख रही हैं और कहीं न कहीं इस तरह के अभियान ने इस इलाके से महानगरों में जाने वाली हर लड़की को शक के दायरे में खड़ा कर दिया है.

जशपुर इलाके में मानव व्यापार विरोध कार्यक्रम चलाने वाले ग्रामीण विकास केंद्र से जुड़ी सिस्टर एस्थर खेस की चिंताएं ऐसी लड़कियों के पुनर्वास को लेकर भी है, जिनकी न तो शादी हो रही है ना ही जिन्हें उनके घरवाले स्वीकार रहे हैं.

सरिता तिग्गा शादीशुदा थी, दो साल का बच्चा भी है. एक दिन वे भी एजेंट के झांसे में आकर घर से गायब हो गईं. लगभग दो साल तक गायब रहीं और जब गांव लौटी तो उनके पैरो तले जमीन खिसक चुकी थी. अनजाने शहर में जो नरक झेला उसने गांव लौटने पर मजबूर कर दिया. मगर अब पति अपने साथ रखने को तैयार नहीं. ससुराल वाले बच्चा लेने के लिए तैयार हैं, सरिता को स्वीकारने के लिए नहीं.

दोनों पक्षों में समझौते की बात चल रही है. सरिता पति से कसमें खा रही है कि वह कभी दुबारा शहर का मुंह तक नहीं देखेगी, यही गांव में रहेगी. पति ने साथ ले जाने के बजाए उसे सिर्फ इंतजार करने को कहा है. अपने मायके में दिन काट रही सरिता को उम्मीद है कि एक ना एक दिन पति साथ ले जाएगा. सरिता के घरवाले जानते हैं कि घर वापसी इतनी आसान नहीं है. रिश्ते में अविश्वास जहर की तरह घुल गया है. महानगर में काम करने वाली लड़कियों को जैसे गांव वाले अच्छी निगाह से नहीं देखते वैसे ही नजरों का सामना सरिता को करना पड़ रहा है.

नरक पर नज़र नहीं

सिस्टर एस्थर खेस ऐसा होम चाहती हैं, जहां घर से ठुकरा दी गईं लड़कियों को आसरा देकर उन्हें रोजगारोन्मुखी ट्रेनिंग दी जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर हो कर अपना शेष जीवन बिता सकें.

खेस की चिंता में वे लड़कियां भी शामिल हैं, जो बंधकों की तरह महानगरों में थीं और किसी तरह उन्हें मुक्त कराया जा सका. लेकिन जिन्हें इसकी चिंता करनी चाहिए वे इससे बेखबर हैं.

राज्य में समय-समय पर बंधक मजदूरों का पुनर्वास किया जाता है. दूसरी जगह से छुड़ाए गए बंधक मजदूरों को 20 हजार रुपए नगद और उनके स्वरोजगार के लिए मदद करने का प्रावधान है. इसके अलावा इन बंधकों की आर्थिक सहायता के लिए उन्हें बीपीएल कार्ड और रोजगार गारंटी योजना का जॉब कार्ड भी दिया जाता है लेकिन प्लेसमेंट एजेंसियों और महानगर के धनपशुओं के चंगुल से छुड़ा कर लाई गई लड़कियां अब तक इस तरह की सहायता से वंचित हैं.

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता प्रशांत जायसवाल कहते हैं- “ कानूनी तौर पर बंधक बना कर रखी गई लड़कियां भी मुक्त बंधुआ मजदूरों की तरह ही पुनर्वास की हकदार हैं लेकिन सामूहिक दबाव के अभाव में सरकार इन पर ध्यान नहीं देती.”

जाहिर है, सरकार का सारा ध्यान फिलहाल ‘विकास यात्राओं’ और ‘सुराज’ में है, जिसके दायरे में शशिकांता और उसकी जैसी सरगुजा-जशपुर की वे हज़ारों लड़कियां शामिल नहीं हैं, जिनके लिए जीवन नरक की तरह हो गया है. एक नरक, जहां उनके सपने तार-तार हुए और एक नरक जहां वे लौट तो आईं लेकिन एक प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह.

 

15.06.2008, 04.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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