पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

शोषण का खेल चालू है

मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताबद्ध होने से डर कैसा

पीपली लाइव का सीधा प्रसारण

ब्रिटिश कंपनी से लड़ाई अभी जारी है

सामुदायिक समीकरण बनाम विकासीय समीकरण

विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी

अब तक नौ

हिज़ाब पर हंगामा क्यों

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से...

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है

डा. सुभाष राय

असलियत

रणेन्द्र

 
 पहला पन्ना > बहस > बात पते कीPrint | Send to Friend | Share This 

नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल

बहस
 

नक्सलियों से छत्तीसगढ़ के सवाल

कनक तिवारी
 

माओवादी



















इसमें इसमें कोई शक नहीं कि नक्सलवाद का सबसे सघन और भविष्यमूलक हमला छत्तीसगढ़ पर हो गया है. यह असर देश के सबसे बड़े भौगोलिक राज्य मध्यप्रदेश के इस दक्षिण पूर्वी हिस्से पर ही महसूस किया जाता था, लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की लगभग 27 प्रतिशत की आबादी के आधार पर बने छत्तीसगढ़ के तिहाई हिस्से में नक्सलवाद की सक्रिय, चिंताजनक और विवादग्रस्त उपस्थिति है. 'नक्सलवाद' और 'माओवाद' शब्दों का घालमेल समझना जरूरी है.

सोवियत गणराज्य और चीन समेत पूर्वी यूरोप तथा कुछ लातीनी अमेरिकी और दक्षिण एशियाई मुल्कों में मार्क्सवाद के बौद्धिक सिद्धांतों का परिणामकारी कम्युनिस्ट आंदोलन जीवन्त रहा है. इनमें से मुख्यत: चीन ने माओ त्से तुंग के नेतृत्व और उनसे भी ज्यादा उनके उत्तराधिकारी लिन पियाओ के बेहद हिंसात्मक दर्शन 'दुश्मन का उन्मूलन करो' का पाठ साकार करने की कोशिश की. नतीजतन सोवियत रूस के नेतृत्व से छिटकर चीन अपनी अहमियत का देश बना. उसने गुरिल्ला युद्ध की छापामार शैली को अपनाते हुए हिंसा की इतनी तल्ख वकालत की कि उसके राजदर्शन में असहमति का कोई स्थान ही नहीं रहा.

रूस और चीन के खेमों में कम्युनिस्ट आन्दोलन के बंट जाने का असर 1964 के आसपास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और बाद में उसके कई धड़ों में टूटते जाने से हुआ. जिस तरह किसान मजदूर प्रजा पार्टी जैसी समाजवादी पार्टी के इतने धड़े हुए कि उन्हें गिन पाना मुश्किल हुआ, वही भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ भी हुआ.

1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से उपजा चारु मजूमदार, कनु सान्याल, जंगल सन्थाल और सुशीतल राय चौधरी वगैरह दर्जनों बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में कोलकाता के महाविद्यालयीन परिसरों में नक्सलवाद पुष्ट हुआ. 1972 के आसपास कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व में उसे इतनी बुरी तरह कुचल दिया गया जिसकी नक्सलियों को कल्पना नहीं रही होगी. सिद्धार्थ बाबू लेकिन चाणक्य नहीं थे. उन्हें घास की जड़ों में मठा डालने की भविष्यमूलकता नहीं मालूम थी. लिहाजा नक्सली आंदोलन नागभूषण पटनायक और नागी रेड्डी जैसे उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के कई माओवादी नेताओं के हत्थे चढ़ गया. उसके बाद धीरे धीरे फैलता हुआ यह आंदोलन तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल में प्रवेश कर गया.

उसका एक बड़ा कारण आंध्रप्रदेश की सरकार का रवैया था जिसकी कड़ाई की वजह से नक्सलियों को आंध्र की सीमा पार कर छत्तीसगढ़ आना अनुकूल हुआ. भोपाल से बस्तर की दूरी ने प्रशासन को वैसे ही ढीला ढाला रखा. कुल मिलाकर वह नक्सलियों के लिए अप्रत्यक्ष वरदान ही हुआ.

छत्तीसगढ़ में लगभग 30 वर्षों में पला बढ़ा नक्सली आंदोलन अब बौद्धिक-राजनीतिक कम लेकिन यौद्धिक तेवर का ज्यादा दिखाई देता है. माओ और लेनिन ने यथासम्भव सुशिक्षित जनता की भागीदारी के बगैर जन आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. माओ ने सदैव कहा कि जनता में क्रांति का आशय बुनियादी और अंतिम तौर पर जनता के राजनीतिक शिक्षण से है.

ऐसा कोई आंदोलन नहीं हो सकता जिसमें जनता को गुलाम समझे जाने की परिकल्पना हो. इसी तरह भारतीय कम्युनिस्टों के एक शिष्ट मंडल से लेनिन ने साफ कहा था कि भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन में कम्युनिस्टों को प्रतिभागिता करनी चाहिए और धीरे धीरे आंदोलन से बुर्जुआ नेतृत्व की छुट्टी करनी चाहिए भले ही उसका नेतृत्व गांधी जैसे कद्दावर नेता कर रहे हों.

छत्तीसगढ़ का मौजूदा नक्सलवादी आंदोलन इस बात की परवाह क्या कर रहा है कि बस्तर के आदिवासियों को माओवादी आंदोलन की बौद्धिक संरचना, प्रासंगिकता और निर्विकल्पता को लेकर कोई राजनीतिक शिक्षण दिया जाए. मीडिया में नक्सलियों की ओर से भारतीय संवैधानिक गणराज्य की स्वीकृत प्रणाली के बदले चीन जैसे गणराज्य की कल्पना की पैरवी की जाती है. लेकिन क्या उसके लिए कोई जनतांत्रिक दस्तावेज, प्रदर्शनियां, विमर्श आयोजित किये जाते हैं? इतिहास को यह समझना ज़रूरी होगा कि महाराष्ट्र, आंध्र और ओडिसा जैसे प्रदेश भूगोल के उपनिवेश नहीं हैं. उनके पास सदियों पुरानी भाषाएं हैं जिन्होंने अपनी ज्यामिति की परिधि में मनुष्यता का संस्कार रचा. मातृभाषा स्कूली शिक्षण का परिणाम नहीं होती. इसलिए इन राज्यों के नक्सली नेतृत्व को माओवादी दर्शन को जनभाषा में परोसते हुए कोई सांस्कृतिक या रणनीतिक कठिनाई नहीं होती.

इसके बरक्स छत्तीसगढ़ केवल एक स्थानीय भाषा, उपभाषा या बोली का एकल क्षेत्र नहीं रहा है. यह समझना ज़रूरी होगा कि गोंडी, हलबी, मुरिया, मारिया जैसी आदिवासी बोलियां हिन्दी के करीब ठहरती उस छत्तीसगढ़ी का अंतर्भूत अंश नहीं हैं जो इन निपट आदिवासी क्षेत्रों के बाहर लगभग कस्बाई हिस्सों की अभिव्यक्ति है. नक्सलियों ने आदिवासी बोलियों में उस विदेशी साहित्य का अनुवाद, प्रचार और शिक्षण क्या व्यापक तौर पर किया है जिससे लगभग निरक्षर आदिवासियों को उनकी मादरी जुबानों में माओवादी राजदर्शन की घुट्टी पिलाई जा सके?

भारतीय संविधान में परिकल्पित लोकतंत्र हो या माओ के राजदर्शन के अनुसार स्थापित कथित कम्युनिस्ट जनवाद-उनके मूल में यही शिक्षा मुखर है कि शासन व्यवस्था को समर्थन देने वाले हर मतदाता को उसकी रूपरेखा की मोटी जानकारी ज़रूर हो. शिक्षा का एक फलितार्थ अक्षर ज्ञान भी तो होता है. लेकिन उसके मूल में संस्कृति से साहचर्य और तादात्म्य का ऐसा अंतर्निहित आग्रह है जिसके लिए औपचारिक अक्षर ज्ञान की ज़रूरत नहीं है. नानी और दादी की कहानियां स्कूली समर्थन से नहीं उपजी हैं. नक्सलियों ने बस्तर के लाचार और निहत्थे आदिवासियों को भौतिक, सामरिक, रणनीतिक और बौद्धिक रूप से बंधक बनाकर रखा है अथवा अनुवाद के जरिए आदिवासी बोलियों के लिखित और वाचिक ज्ञानकोष को समृद्ध बनाया है-यह सवाल तो ठहरा हुआ है.

पूरी दुनिया में पदार्थिक और व्यापारिक सभ्यता ने आदिवासी जीवन का मटियामेट किया है. न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर अमेरिका, केनेडा और दक्षिण अफ्रीका वगैरह में गोरी जातियों ने वहां के आदिवासियों माओरी, रेड इंडियन और नीग्रो लोगों का कत्लेआम किया है और उनकी सभ्यताओं को इतिहास में दफ्न कर दिया है. नक्सली भी ऐसा ही कुछ क्या नहीं कर रहे हैं?
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagat singh (bhagat.5270@yahoo.com) raipur

 
 कनक जी,
आपके प्रश्नों को मैंने छत्तीसगढ़ में भी पढ़ा था. सारे सवाल जायज़ हैं, इनके जवाब भी किसी के पास होंगे ही. मेरा एक सवाल आपसे है कि देश में आखिर कौन सी पार्टी या संगठन है जो आदिवासियों के लिए लड़ाई लड़ रही है. ज़मीन की बाद, खनिजों को लूटने की बात या सलवाजुड़ूम या ऐसे ही किसी पुलिस से जन बचाने की बात, उद्योगों के नाम पर विस्थापन की बात हो या स्वाभिमान से जीने की बात हो, आखिर पीड़ित समुदाय करे क्या? यदि को जनसंगठन इसकी बात करता है तो वो नक्सल समर्थक होकर जेल जा सकता है.

क्या आप चाहते हैं कि देश के पूरे पीड़ित समुदाय को इन विदेशी लुटेरों के रहमो-करम पर छोड़ दें या उन राजनीतिक दलों के भरोसे छोड़ दें जो इनकी दलाली कर रहे हैं. उनके तरीकों पर सवाल उठाए जाने भी चाहिए. आप जैसे चिंतक से हम ये अपेक्षा करते हैं कि लोग करें तो क्या करें.

आपको मैं तब से पढ़ता रहा हूं जब आप म.प्र में गांधीजी के बाबत 100 किताबें समाज को दे रहे थे और उर्दू अकादमी में हमेशा एक से एक कार्यक्रम करते रहे हैं. मैं लगभग सभी प्रोग्रामों में रहा हूं.
 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in