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अंधेरी गलियों के रौशन सितारे

मिसाल-बेमिसाल

अंधेरी गलियों के रौशन सितारे

शिरीष खरे, मुंबई से

शहरी झोपड़पट्टियों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बोझिल, बेबस और हताश जानकर अक्सर उनसे मुंह फेर लिया जाता है. मगर एक सूझबूझ भरे प्रयास के चलते उसी दुनिया की कुछ लड़कियां आज न केवल सामाजिक अनदेखियों और तमाम बाधाओं से आगे निकल रही हैं, बल्कि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के रास्तों से उजाला भी दिखा रही हैं. चेन्नई से शक्ति और दिल्ली से अस्मिना वंचित समुदाय की ऐसी ही लड़कियां हैं जो इस बदलाव को सिर्फ महसूस ही नहीं कर रही हैं बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रही हैं.

शक्ति बदलाव की
दक्षिण भारत के सबसे तेज बढ़ते शहर चेन्नई का एक चेहरा यहां की अनगिनत झोपड़पट्टियां भी हैं, जिन्हें बदनुमा दाग समझा जाता है. मगर तमाम बाधाओं के बीच यहां सपने देखने का हौसला भी है और उसे हकीकत में बदलने का जज्बा भी. शहर के उत्तरी हिस्से की ऐसी ही एक गुमनाम-सी झोपड़पट्टी में शक्ति नाम की लड़की इसी बदलाव की इबारत लिख रही है.

शक्ति


उसकी हमउम्र दूसरी लड़कियां जहां तीन साल की उम्र में नर्सरी स्कूल जाने लगी थीं, वहीं 6 साल की उम्र में शक्ति मछली बेचने की एक दुकान पर काम करने लगी थी. मछलियां छांटते और नंगे हाथों से बर्फ फोड़ते हुए उसने जाना कि उसके लिए तमाम खेल सपने की तरह हैं फिर वह फुटबाल ही क्यों न हो जो कि उसे बेहद पसंद था.

छह घंटे के काम के बदले उसे रोजाना महज 15 रु. मिलते थे. काम से छुट्टी मिलते ही वह घर की तरफ दौड़ पड़ती और स्कूल जाने को मचल पड़ती. इसकी एक वजह यह भी थी कि उसे वहां के मैदान पर फुटबाल खेलने को जो मिलता था. वैसे तो उसके जैसी कुछ और लड़कियां भी फुटबाल खेलती थीं, मगर गरीबी उसे स्कूल की दूसरी लड़कियों से अलग कर देती थी. इसी गरीबी के चलते एक रोज उसे पढ़ाई, फुटबाल और दोस्तों को छोड़ना पड़ा था. इसके बाद वह 12 घंटे काम करके रोजाना 30 रू. कमाने लगी. शक्ति के पिता को रोज-रोज काम नहीं मिलता था, लिहाजा घर चलाने के लिए उसकी मां को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था.

बदली ज़िंदगी
शक्ति से फुटबाल का खेल क्या छूटा उसकी जिंदगी से खुशियां ही गायब हो गईं. मानो उसका बचपन ही उजड़ गया. मगर उसके चेहरे पर खुशियां तब लौट आई जब वह एससीएसटीईडीएस यानी `स्लम चिल्ड्रन स्पोर्ट्स टेलेंट एजुकेशन डेवल्पमेंट सोसाइटी´ से जुड़ गई.

एससीएसटीईडीएस एक सामुदायिक संस्था है जो वहां की झोपड़पट्टियों के बच्चों को इकट्ठा करती है और नगर-निगम के मैदान पर फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित करती है. दरअसल यह बच्चों के व्यवहार को जानने का पहला कदम होता है. यहीं से स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के बारे में भी पता चलता है और उन्हें स्कूल से जोड़ा जाता है. शक्ति भी कुछ इसी तरीके से जुड़ी और यहां से उसे एक स्टॉर फुटबाल खिलाड़ी के तौर पर जाने जाना लगा.

एससीएसटीईडीएस के थंगराज कहते हैं "जब शक्ति स्कूल जाती थी तो उसके टीचर उसे मछुआरा समुदाय की होने की वजह से अक्सर अपमानित करते थे." संस्था ने उसे हौसला दिया और शक्ति के माता-पिता को इस बात के लिए राजी किया कि वह अपनी बेटी को एक बार फिर से नगर-निगम के स्कूल में भेजे.

थंगराज याद करते हैं, "इस बार शक्ति के माता-पिता ने उसकी पढ़ाई की कमियों को देखा और उसके आने वाले कल में संभावनाएं तलाशी. अब वह अपनी बेटी की पढ़ाई फिर से शुरू करवाने को उत्सुक थे." इसी विश्वास के साथ शक्ति के बड़े और छोटे भाईयों को भी स्कूल में भर्ती कराया गया. उनके भीतर पढ़ाई से लेकर खेल जैसी तमाम प्रतिभाओं का मूल्यांकन किया गया और उसके मुताबिक सबको मौका दिया गया.

शानदार गोल
एससीएसटीईडीएस ने शक्ति की मजबूरियों और जरूरतों को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाया. मसलन, स्कूल जाने के लिए बस का किराया, यूनीफार्म, दिन का खाना और फुटबाल खेलने से जुड़ी जरूरतें. शक्ति की खेल प्रतिभा को देखकर एससीएसटीईडीएस ने उसके नियमित तौर पर फुटबाल के अभ्यास की व्यवस्था की. धीरे-धीरे उसके भीतर छिपी खेल प्रतिभा उभरकर सामने आने लगी और उसके भीतर से स्कूल को लेकर पैदा हुए सारे डर भी दूर हो गए. कुछ टीचर तो शक्ति के प्रशंसक और सहयोगी तक बन गए.

उसे नियमित प्रशिक्षण मिला जिसके चलते शक्ति ने अंडर-14 की राज्य स्तरीय फुटबाल टीम में अपनी जगह बनाई. बीते 4 सालों में उसने जिला और राज्य स्तर के कई मैच खेले हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rangnath Singh New Delhi

 
 क्या कहा जाए ....अंधेर है...थोड़ी से उम्मीद की रोशनी भी है 
   

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