गणतंत्र की संविधान कथा
बहस
गणतंत्र की संविधान कथा
कनक तिवारी

इसमें कोई शक नहीं कि संविधान की पोथी में गीता, कुरान शरीफ या बाइबिल की तरह पवित्रता है, लेकिन वह इन पवित्र ग्रंथों की तरह ईश्वर का संदेश नहीं है. संविधान भारतीय वांडमय के इतिहास में सामूहिक लेखन का सबसे बड़ा दस्तावेजी सबूत है. यह सहलेख वक्त की दीवार पर पपड़िया रहा है. उसके रंग रोगन की शुद्धता, उम्रदोजी और प्रामाणिकता इतिहास के बौनों द्वारा भी जांच का विषय हो रही है.
संविधान निर्माता तमाम अतीन्द्रिय बौद्धिकता के बावजूद दुतरफा भोले लोग थे. उनका भारत-ज्ञान विशद, प्रत्यक्ष और फर्स्ट हैंड था, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके उपचेतन में ऐसी कोई बात भी पैठ गयी प्रतीत होती है, जिससे भारत के लिए वेस्टमिनिस्टर पद्धति की संसद प्रणाली चुनकर वे बेखबर और आश्वस्त हो गये. उन्हें शायद यह अनुमान भी था कि संवैधानिक शासन का सदियों पुराना गोरा मॉडल समय-सिद्ध होने के कारण भविष्य की भारतीय संसदें उद्देशिका से किसी भी परिस्थिति में छेड़छाड़ नहीं कर पायेंगी. पश्चिम की उनकी समझ उससे उनके सीधे बौद्धिक साक्षात्कार की वजह से थी. संस्कृति, राजनीति, सभ्यता और मानवीय गरिमा के ब्रिटिश-मूल्य हिन्दुस्तान की धरती पर संविधान का सहारा लेकर रोपने की हमारे देशभक्तों की निर्दोष कोशिशें निस्संदेह संशोधन के लायक हैं. यह अलग बात है कि संशोधन करने का मुखौटा वे लोग उठाए हुए हैं, जो अंग्रेजी हुकूमत से मुकम्मिल संघर्ष के वक्त गुमनामियों की बांबियों में सुरक्षित बैठे थे.
समाजवाद
जवाहरलाल नेहरू संविधान सभा के स्वप्नदर्शी राजकुमार थे, ठीक यूनानी दार्शनिक प्लेटो की अनुकृति में. उद्देशिका संबंधी मूल प्रस्ताव नेहरू ने अपनी नायाब भाषण शैली और मोहक अदाओं के साथ रखा था. उनका भाषण शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ' हैमलेट ' के नायक की तरह लगभग स्वगत में बोला गया कथन था, जो शिलालेख की तरह संविधान सभा के याद घर की डायरी में दर्ज़ है.
'समाजवाद' भारत की उद्देशिका के सात सुरों का शायद सप्तम सुर ही है. वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सड़कों, गलियों के किनारे उगे ठेलों, दूकानों, होटलों में चूल्हे का धुआं बनकर खों खों करता है. समाजवाद अब तक देश के करोड़ों बाल श्रमिकों की समझ में नहीं आया है, जिनके लिए संविधान साफ-साफ घोषणा करता है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक किस्म के नियोजन में नहीं लगाया जायेगा.
प्रकारांतर से क्या वह यह कहता है कि इस देश के बच्चों को किसी भी उम्र से; स्पष्ट कानूनों के अभाव मेंद्ध गैरख़तरनाक कामों में ज़रूर लगाया जा सकेगा! समाजवाद संविधान की उद्देशिका में इतना धुंधला गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र क़ी इबारतों में उसे चश्मा लगाकर ढूंढ़ना पड़ता है. समाजवाद सेना के उस सेवानिवृत्त कर्नल साहब की तरह है, जो मोहल्ले के नामी गिरामी छोकरों पेटेन्ट विधेयक, बीमा विधेयक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों वगैरह को केवल पिस्तौल का लाइसेंस दिखाकर डरा रहे हैं क्योंकि कारतूस खत्म हो गये हैं.
'समाजवाद' शब्द भारत में गरीबी, जाति प्रथा और स्त्री के साथ सबसे ज्यादा पिटा है. जितनी समाजवादी पार्टियां भारत में बनीं, बिगड़ीं और फिर बिगड़ने के लिए बन रही हैं, उससे राजनीतिशास्त्र के इतिहास से ज्यादा ' गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड्स ' को सरोकार रखना चाहिए. ' समाजवाद ' और ' पंथ निरपेक्षता ' अस्पष्ट शब्द हैं. संविधान में इन शब्दों का स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, घालमेल तो यह है कि उद्देशिका की आत्मा अमेरिका, फ्रांस और आयरलैंड के संविधानों से ली गई है, लेकिन समाजवाद की आत्मा रूस सहित तमाम पूर्वी यूरोप के देशों से.
रूस सहित पूर्वी यूरोप के देश समाजवादी प्रतिबद्धता के बावजूद कमजोर पड़ रहे हैं और भारत अपनी उद्देशिका के प्रेरक देशों अमेरिका, फ्रांस और आयरलैंड (अब ग्रेट ब्रिटेन में शामिल) की गोद में बैठा जा रहा है. राजाओं की शाही शैली और विशेषाधिकार खत्म करने तथा बैंकों और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण करने जैसे कदम उठाकर विश्वसनीयता देने की कमजोर लेकिन खुल्लम-खुल्ला कोशिशें भी की गई, लेकिन कहाँ है वह समाजवाद ? देश तो मनमोहन और यशवंत इरादों के साथ समाजवाद को लेकर विश्व बैंक की यात्रा पर है. संविधान शायद हर गांव को विश्व बनाना चाहता था, लेकिन संविधान के ताजा तरीन व्याख्याकार विश्व को ही गांव बनाने चल पड़े हैं.
धर्म निरपेक्षता
भारतीय लोकतंत्र की सफलता का यह एक जगमगाता हुआ उदाहरण है जब कि उसके पड़ोसी जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और बर्मा ने धर्म विशेष को राज्य का धर्म घोषित किया है. “राज्य पंथ निरपेक्ष है”- का आशय राज्य के धर्म विरोधी होने से भी कुछ लोग अकारण लगाते हैं. ‘पंथ निरपेक्षता’ को भी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में उद्देशिका में शामिल किया गया है. यह समावेश आपातकाल में हुआ था. संविधान के मूल निर्माताओं ने उसे उद्देशिका में रखने की ज़रूरत नहीं समझी थी, क्योंकि उनकी राय में इस देश के नागरिकों को मूल अधिकारों के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता स्पष्ट और पर्याप्त थी.
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म ने विधर्मियों को मिटाने की धर्मान्ध मानसिकता का कभी समर्थन नहीं किया. धर्म और विश्वास कभी हमले का लक्ष्य नहीं होने चाहिए. गंगा नदी की तरह बहते पवित्र हिन्दू विश्वास के वे लोग प्रतिनिधि नहीं हो सकते, जो कठमुल्लापन से ग्रस्त होकर बर्बरता को धर्म का आदेश समझ बैठते हैं. संकीर्ण हिन्दू इस लिहाज से हिन्दू धर्म के सबसे बड़े दुश्मन हैं. लेकिन धार्मिक साम्प्रदायिकता कुंठित हिन्दुओं के अतिरिक्त ईसाई पादरियों और मिशनरियों के जेहन में भी घर कर गई है.
यही वह दोहरा जहर है, जो देश में साम्प्रदायिक फसादों की जड़ है. अपने धर्म को विधर्मियों पर लादने की बीमारी ने दुनिया का बहुत नुकसान किया है. उसने धर्मों के इतिहास को कलंकित किया है. यह आदमी के विश्वास पर डाला गया डाका है. उसके साथ की गई ठगी है बल्कि उसकी विवशता के चलते किया गया आत्मा के साथ बलात्कार है.
आगे पढ़ें
बहस धार्मिक कठमुल्लापन के चलते राष्ट्रीय धर्म निरपेक्ष ढांचे की क्षतिग्रस्तता के कारणों और निदान पर भी होनी चाहिए. यह भारत जैसे सहनशील लोकतंत्र में ही हो सकता है कि जिस पार्टी का गृहमंत्री अन्य धर्म के धार्मिक ढांचे को गिराने के अपराध का अभियुक्त हो, उसी पार्टी का प्रधानमंत्री धर्म परिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस की हिन्दूवादी अपील करे और उसे सब ठुकरा दें. धर्मों की स्वतंत्रता के सन्दर्भ में भारत का संविधान धरती का सबसे उदारवादी संविधान है.
‘समानता’ की समझ
उद्देशिका में भारत के समस्त नागरिकों को प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने का आश्वासन दर्ज है. अमेरिका में जो स्थिति काले हब्शियों की रही है, वही भारत में अछूतों की थी. अमेरिकी संविधान के चौदहवें संशोधन तथा भारतीय संविधान की रचना के द्वारा इन दोनों अभिशापों को खत्म करने का ऐलान किया गया है. लेकिन समता के अवसर का जुगाड़ करना संविधान ने अपना उक्तारदायित्व नहीं समझा.
पिछले पांच दशकों में करोड़ों व्यक्तियों को वह अवसर मिला ही नहीं है, जिसकी संभावना का संकेत संविधान की उद्देशिका में निठल्ले की तरह मुस्कराता रहता है. यह बेहद तकलीफदेह और मार्मिक बात है कि अपने कई प्रकरणों में वरिष्ठ न्यायालयों ने अस्पृश्यता को लेकर इस तरह के फैसले किए है, जिससे सदियों से सड़ांध मार रही वहशी जाति प्रथा ऐसे न्याय निर्णयों में इठलाती रहती है.
मसलन कोई व्यक्ति किसी कथित अस्पृश्य को ‘चमार’ शब्द से विभूषित (!) करे तो भी न्यायालय यह कहते है कि इस शब्द का उपयोग करने से अपृश्यता संबंधी अपराध भावना सिद्ध नहीं होती. इस देश में निर्वाचित राजनीतिक पद अन्य सभी व्यक्तियों; यहां तक कि धर्म गुरुओं से भी श्रेष्ठ समझे जाते हैं. आज़ादी के पचास वर्ष बीत जाने पर भी संविधान को यह समझ नहीं आ रहा है कि स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों के अतिरिक्त पूर्व मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन, यात्रा, चिकित्सा, प्रतिष्ठा और मरणोत्तर सम्मानों की ऐसी राजकीय सुविधाएँ क्यों मिलनी चाहिए, जो समानता के आदर्शों की खिल्ली उड़ाती हों.
लोग ब्राह्मणों की तरह असंतोष का प्रवचन करते रहें. तंत्र आईएएस नौकरशाह बनकर शोषक क्षत्रिय धर्म का पालन करता रहे. राजनेता गण बने हुए वैश्यों की तरह धन का संग्रह करते रहें और राज्य शूद्रों की तरह केवल अभिव्यक्ति का बहुमत बना रहे. |
कैसा बंधुत्व
यह महत्वपूर्ण है कि संविधान सभा और आजादी के आन्दोलन में देसी राजाओं के प्रतिनिधि और मुस्लिम लीग के सदस्यों तथा उस विचारधारा के प्रतिनिधि बहुत कम संख्या में थे जिसे ‘संघ परिवार’ कहा जाता है. आज़ादी के आंदोलन में समाज के वर्गों के बीच चट्टानी बंधुता दिखी थी. वह सीराजा बाद में बेतरह बिखर गया. जिस तरह के तत्व आज़ादी के आंदोलन और संविधान सभा में कम दिखाई पड़ रहे थे, आज उनके बीघोषित शत्रुता लेकिन मकसद हासिल करने के लिए चट्टानी बंधुता है. क्या संविधान की उद्देशिका बंधुता के अपने नारे का यही अर्थ समझ पा रही है ?
हम प्रभूत्व संपन्न
भारत डोमिनियन नहीं बना और 1949 में संविधान की रचना के बाद से उसने अपने आपको गणराज्य घोषित किया. फिर भी उसने ब्रिटिश राष्ट्रकुल से अपने सभी सम्बन्ध समाप्त नहीं किए. यह ध्यान देने योग्य है कि यह घोषणा विधि बाह्य थी. भारत की यह कथित संप्रुभता ब्रिटिश कामनवेल्थ की सदस्यता से अपनी यात्रा पर चली और अब यूरोपीय समुदाय के सम्मेलनों में शिरकत करती है. वह विश्व बैंक के दरवाजे पर गाहे बगाहे दस्तक भी देती है. उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में गुर्राते हुए गोरे देश झिड़की भरी समझाइश देते हैं. संविधान की संप्रभुता अशक्त होने के कारण कभी कभी राष्ट्रीय शर्म की मुद्रा में मुस्कराती भी है. संप्रभुता उस ब्रेन डेन को पहचानती भी है जिसके कारण देश के लाखों नवयुवक नियाग्रा और वियाग्रा के मुल्क की ओर उड़े चले जा रहे हैं.
‘गणराज्य’ का अर्थ ?
संविधान की उद्देशिका के तीन बड़े आदर्शों प्रभुत्वसंपन्नता, समाजवाद और पंथ निरपेक्षता का उचित प्रबंध करने के बाद लोकतंत्रात्मक गणराज्य का सपना हमारे प्रात: स्मरणीय राजनेताओं ने देशराग में डूबकर साकार किया है. बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध ने संविधान की उद्देशिका का परचम उनके हाथों में थमा दिया है, जो झंडे के समीकरण को डंडे और कपड़े में अलग कर भारत को ऐसा लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाते रहे, जिसमें लोक, तंत्र, गण और राज्य चारों वर्णाश्रम व्यवस्था की तरह फलते फूलते रहें. लोग ब्राह्मणों की तरह असंतोष का प्रवचन करते रहें. तंत्र आईएएस नौकरशाह बनकर शोषक क्षत्रिय धर्म का पालन करता रहे. राजनेता गण बने हुए वैश्यों की तरह धन का संग्रह करते रहें और राज्य शूद्रों की तरह केवल अभिव्यक्ति का बहुमत बना रहे.
हम भारत के लोग
संविधान को लेकर एक मिथक और गढ़ा गया है, जो न्यायविदों के जुमलों में निसृत होता रहता है. वह यह है कि हमारा संविधान भारत की जनता के अनुदेश से लिखा गया है और इसलिए उसे जनसमर्थन प्राप्त है. संविधान की उद्देशिका इसीलिए “हम भारत के लोग... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं” के उद्घोष में डूब जाती है. हमारे संविधान निर्माताओं ने “हम भारत के लोग” वाला नारा अमरीकी संविधान के उद्घोष से प्रेरणा लेकर लिखा था.
सूक्ष्म पड़ताल से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत की महान लेकिन बेचारी जनता को संविधान रचना से कुछ लेना देना नहीं था. 1935 के गवर्नमेन्ट ऑफ इंडिया एक्ट की छठी अनुसूची के अनुसार मतदान का अधिकार सीमित लोगों को ही था. भारत के अधिकांश किसान, छोटे दुकानदार और सर्वहारा के लोग टैक्स संपत्ति और शैक्षणिक योग्यताओं की कमी आधार पर मतदाताओं के रूप में पंजीकृत नहीं थे.
अमरीका के अनुसरण में भारतीय संविधान कथित रूप से जनता द्वारा निर्मित होना कहा गया. कुछ मुठ्ठी भर लोगों द्वारा रचे गये अमरीकी संविधान का अनुसमर्थन तो राज्यों की संसदों विधानसभाओं से कराया गया था लेकिन भारत में तो यह भी नहीं किया गया.
25.01.2010, 02.30 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित