कमजोर पड़ता उल्फा
मुद्दा
कमजोर पड़ता उल्फा
नवा ठकुरिया ,
गुवाहाटी से
वे संगठित, हथियारबंद, ताकतवर और प्रभावी हैं लेकिन न तो वे तार्किक हैं और न ही जवाबदेह. असम के प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के चरित्र को आप इसी तरह से परिभाषित कर सकते हैं. अपने अस्तित्व के 30 वर्षों के दौरान कम से कम दो दशकों तक यह संगठन संगठित भी रहा है. वास्तव में उल्फा हथियारों और गोलाबारूद से संपन्न है और अब भी उसमें असम में हमला करने की ताकत है, बेशक, यही उनका एकमात्र विकल्प भी बन गया है.
वह असरदार है क्योंकि राज्य में अब भी कुछ ऐसे लोग हैं जो इस संगठन पर एक क्रांतिकारी समूह के रूप में भरोसा जताना पसंद करेंगे. लेकिन गुवाहाटी में ऐसे बहुत से रसूखदार व्यक्ति हैं जो उल्फा की बीमारी को जारी रखना चाहते हैं क्योंकि इससे उन्हें अच्छा-खासा लाभांश जो मिलता है.
लेकिन वास्तव में उल्फा नेता, कुछ कट्टर कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया जाए तो, शुरुआत से ही अतार्किक और गैरजवाबदेह बने हुए हैं. ऐसा यही संगठन कर सकता है कि वह एनजीओ कार्यकर्ता संजय घोष की हत्या कर दे और उनकी पत्नी से कहे कि वे अब भी जिंदा हैं. और जब घोष की पत्नी ने उनके बारे में जानना चाहा ( वे जिंदा हैं या मार डाले गए) तो उल्फा नेता ने उनकी अपील को नजरअंदाज कर दिया था. आज तक घोष के परिवार को उनका शव नहीं मिला. घोष की हत्या पर उल्फा नेता हिंदू मिथकों का सहारा लेकर कहते हैं कि देवता तो मृत शरीर में वास करते हैं.
इस संगठन ने एक शिक्षक और पत्रकार कमला सैकिया, जिन्होंने उल्फा की करतूतों के बारे में अखबारों में लेख लिखकर उसकी आलोचना की थी, को भी मार डाला. उल्फा के कुछ विद्रोही रात को सैकिया के घर पर आए और उन्हें अपने “शिक्षकों” के साथ विमर्श करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया. उस वक्त सैकिया की तबियत ठीक नहीं थी इसके बावजूद वे उनके साथ गए क्योंकि वे बहादुर थे और उन्हें अपने ज्ञान पर भरोसा था. लेकिन उल्फा के उन कुख्यात लड़कों ने सैकिया को मार डाला क्योंकि वे सैकिया को संवाद में परास्त नहीं कर सके थे. अगली सुबह उनका शव बरामद हुआ. उनके पूरे शरीर पर जली सिगरेट से उन्हें प्रताड़ित किए जाने के निशान थे.
अपनी अगुआई में असम की आजादी चाहने वाले इसी संगठन ने एक युवा लड़की रोशमी बोरो का भारतीय सेना का जासूस बताते हुए मार डाला था. वास्तव में यह लड़की सेना के एक अधिकारी के बच्चों को संगीत सिखाती थी. उल्फा का एक लड़का उससे शादी करना चाहता था लेकिन जब उसने इनकार कर दिया तो उसने रोशमा को उल्फा विरोधी करार दिया. लिहाजा उसे मार डाला गया. अपनी सांसें थाम लीजिए क्योंकि इससे पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया.
वे असम में भारत के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर होने वाले आयोजनों का विरोध करते हैं. एक बार तो उन्होंने इस मौके पर राष्ट्रध्वज फहराने वालों के खिलाफ कड़ी कारर्वाई करने की धमकी तक दी थी. अपने फरमानों को लागू करवाने के लिए इस संगठन ने 2004 में स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम के दौरान धेमाजी में बम धमाका भी किया था जिसमें 13 निर्दोष महिलाएं और बच्चे मारे गए थे. इस मुद्दे पर कई बरसों तक मौन साधे रहने के बाद उल्फा के महान कमांडर इन चीफ ने हाल ही में असम के लोगों से धेमाजी के उस कुख्यात कृत्य के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी है.
क्या उल्फा के नेताओं को अपनी घातक गतिविधियों से होने वाले नुक्सान का अहसास हो गया है और इसलिए ही उन्होंने सुधार करने का फैसला किया है? इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि आखिर उल्फा इन दिनों क्यों गंभीर संकट से गुजर रहा है. दरअसल पिछले कुछ सालों में उल्फा का जनसमर्थन तेजी से घटा है. मीडिया ने भी समय-समय पर जारी किए जाने वाले उसके “अनावश्यक और बेमतलब” के बयानों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है. असल में जब उल्फा की विध्वंसकारी गतिविधयां मीडिया में सुर्खियां बन जाती थीं उसके बाद गुवाहाटी में मौजूद उनके शुभचिंतक उनके अपराधों को जायज ठहराने की कोशिश करने लगते थे. लेकिन आज असम के मीडिया का हाथ नब्ज पर है और वह ऐसी बर्बर कारर्वाइयों की शुरू से निंदा करने लगता है.
उल्फा के संस्थापकों में से एक अरविंद राजखोवा और उल्फा के एक अन्य प्रमुख नेता राजू बरुआ को उनके परिवारों और सामान के साथ भारत भेजा गया. उल्फा चेयरमैन राजखोवा को बांग्लादेश-मेघालय सीमा पर भारतीय सुरक्षा बल को सौंपा गया और उसके बाद इन सबको असम पुलिस के हवाले कर दिया गया. |
इससे भी अहम यह कि बांग्लादेश (जैसा कि 2003 में भूटान ने किया था) ने अपने यहां छिपे उल्फा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने का साहस दिखाया है. हाल के महीनों में अवामी लीग की शेख हसीना की अगुआई वाली बांग्ला सरकार ने सूझबूझ से उल्फा के चार शीर्ष नेताओं को भारत भेज दिया. सबसे पहले उल्फा के विदेश सचिव शशा चौधरी और वित्त सचिव चित्रबन हजारिका को जबर्दस्ती ढाका में भारतीय मशीनरी के हाथों पकड़वा दिया. इससे पहले तक वे फर्जी पहचान (संभवतः बांग्लादेशी मुसलमान के रूप में) के साथ ढाका में रह रहे थे और बेशक खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रहे थे.
अंत में इसी शहर से भारत के लिए बड़ी कामयाबी कही जाने वाली धरपकड़ हुई. यहां से उल्फा के संस्थापकों में से एक अरविंद राजखोवा और उल्फा के एक अन्य प्रमुख नेता राजू बरुआ को उनके परिवारों और सामान के साथ भारत भेजा गया. उल्फा चेयरमैन राजखोवा को बांग्लादेश-मेघालय सीमा पर भारतीय सुरक्षा बल को सौंपा गया और उसके बाद इन सबको असम पुलिस के हवाले कर दिया गया. इस बीच, केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने संसद में बयान दिया कि उल्फा के शीर्ष नेताओं ने भारतीय एजेंसियों के समक्ष आत्म समर्पण किया है. लेकिन जब स्थानीय पत्रकारों ने राजखोवा से पूछा तो वह भड़क गए और समर्पण किए जाने से इनकार किया. राजखोवा ने चिल्लाकर कहा कि वह कभी भी ऐसा नहीं करेंगे.
लेकिन क्या इसे समर्पण नहीं कहा जाएगा? आप एक सशस्त्र संघर्ष में यकीन करने वाले एक प्रतिबंधित संगठन के नेता हैं और अपने खुद के सशस्त्र कैडर की सुरक्षा से घिरे रहते हैं. कुछ घटनाक्रम के बाद आप सरकार की हिरासत में होते हैं. इस पूरे घटनाक्रम में आपकी ओर से एक गोली तक नहीं दागी जाती. आश्चर्यजनक रूप से आप अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर थे और आज आप सब सुरक्षित हिरासत में हैं.
यह भले ही औपचारिक रूप से किए जाने वाले आत्समर्पण का मामला न हो जिसमें राजखोवा और उनके सहयोगियों की परेड कराई जाती. मगर सैन्य और नैतिक रूप से उल्फा के तकरीबन सभी शीर्ष नेताओं ने भारतीय सरकार की एजेंसी के समक्ष समर्पण किया है. लाख टके का सवाल है कि क्या उनमें असम के लोगों के सामने अपने रहस्यमय समर्पण करने के पीछे के सच को स्वीकार करने और अंततः तार्किक, ईमानदार और जवाबदेह बनने का नैतिक साहस है?
17.01.2010,
23.00 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित