जानलेवा महंगाई
मुद्दा
जानलेवा महंगाई
देविंदर शर्मा
खाद्य पर्दार्थों की कीमतों ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. खाने की चीजों के दाम
में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और परिणाम यह है कि आम उपभोक्ता अपनी
खाली जेबें बाहर निकाले हताश-निराश खड़ा है. टेलीविजन चैनलों समेत पूरा मीडिया बढ़ती
कीमतों को लेकर बिना थके चिल्ला रहा है. बड़ी खबर मीडिया में बार-बार दिखाई-पढ़ाई जा
रही है. सभी संभावित कोण पर निगाह रखते हुए मीडिया ने बढ़ती महंगाई का मामला बड़ी
दिलचस्पी से आगे बढ़ाया है. खेतों से लेकर खाने की प्लेट तक, घरेलू महिलाओं से लेकर
राजनेताओं तक और योजना आयोग के उपाध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक-सभी महंगाई को
लेकर चिंतित नजर आते हैं, लेकिन इसके बावजूद आसमान छूते भावों से राहत का कोई संकेत
नजर नहीं आता.
सब्जियां बेहद महंगी हैं, फल तो न खाने में ही भलाई है और आम आदमी की दाल तो उसकी
पहुंच से ही बाहर हो गई है. हद तो यह है कि आटा और दूध के दामों में भी अभूतपूर्व
वृद्धि हुई है. अर्थशास्त्रियों ने हमेशा की तरह अस्वाभाविक महंगाई के लिए मांग और
आपूर्ति की कठिनाइयों को दोष दिया है. राजनेता एक-दूसरे पर दोष डाल रहे हैं. उनकी
ओर से अक्सर राज्य सरकारों को भी दोष दिया जाता है कि वे कीमतों पर नियंत्रण करने
में अक्षम साबित हो रही हैं और इसी दौरान केंद्र सरकार को भी जिम्मेदार ठहराकर सही
नीतियां लागू करने में उसकी असफलता को रेखांकित किया जा रहा है.
मुझसे अनगिनत बार यही सवाल किया जाता है और पिछले कई माह से मैं बार-बार इस पर जोर
दे रहा हूं कि खाद्य पर्दार्थों की कीमतों में वृद्धि का आपूर्ति की कठिनाइयों से
कोई लेना-देना नहीं है. मीडिया अक्सर मुझसे पूछता है कि फिर दालों की कीमतें राकेट
की तरह आसमान में क्यों जा रही हैं? मेरा उत्तर साधारण और सीधा होता है. कीमतें
इसलिए बढ़ रही हैं, क्योंकि बड़े पैमाने पर जमाखोरी की जा रही है, कालाबाजारी की जा
रही है और कीमतों को लेकर सट्टेबाजी हो रही है. मैं लंबे अर्से से इस तरह के
व्यापार के खिलाफ अभियान छेड़ने की वकालत कर रहा हूं. मैं नहीं समझ पाता हूं कि छोटे
विक्रेताओं और हाकरों को कैसे अपनी मनमानी के बल पर देश को बंधक बनाने की छूट दी जा
रही है. भावनाओं द्वारा संचालित बाजार आम उपभोक्ताओं पर भारी पड़ रहा है.
दालों का उदाहरण लें. अरहर दाल की कीमत आसमान छू रही है. अन्य दालों की कीमतों में
भी भारी वृद्धि हुई है और हमारे ऊपर यह विचार लादा जा रहा है कि चूंकि दालों के
उत्पादन में गिरावट आई है इसलिए कीमतें बढ़ रही हैं. हममें से कई लोग उत्पादन में
गिरावट को खरीफ के मौसम में सूखे की स्थितियों से भी जोड़ेंगे, लेकिन यह सही नहीं
है. दालों के उत्पादन में शायद ही कोई अंतर आया हो. 2008 में दालों का उत्पादन
147.6 लाख टन था, जबकि 2009 में यह 146.6 लाख टन रहा. इसका मतलब है कि उत्पादन में
मात्र एक लाख टन की गिरावट आई. दूसरे शब्दों में कहें तो 2008 और 2009 में दालों का
उत्पादन लगभग स्थिर रहा. महंगाई के मामले में दूसरी दलील यह है कि मांग के मुकाबले
आपूर्ति भारी पड़ रही है.
कुछ अर्थशास्त्रियों ने बताया है कि दालों की मांग 170 लाख टन के आसपास है, लेकिन
मैं नहीं जानता कि उनका यह आकलन किन तथ्यों पर आधारित है. रोचक बात यह है कि
अर्थशास्त्रियों का यह अनुमान यह धारणा उत्पन्न करता है कि 2009 में लोगों ने अचानक
ज्यादा दाल खानी शुरू कर दी है, क्योंकि यदि वाकई मांग में वृद्धि हो रही है तो
2008 में भी दालों की कीमतों में ऐसी ही वृद्धि होनी चाहिए थी. यदि आप इस तर्क को
स्वीकार भी कर लें तो इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भारत ने 25 लाख टन दाल का इस
वर्ष आयात किया है. यदि इस मात्रा को उत्पादित दालों में जोड़ दिया जाए तो बाजार में
दालों की कुल उपलब्धता 171.6 लाख टन हो जाती है. इसका अर्थ है कि हमने मांग और
आपूर्ति के अंतर को समाप्त कर दिया. अब क्या कोई यह बताएगा कि दालों की कीमतें
क्यों बढ़ती जा रही हैं?
मूल सवाल अभी भी कायम है कि कीमतें इतनी तेजी से ऊपर क्यों जा रही हैं? इसका जवाब
एकदम साधारण है. व्यापार ने आपूर्ति को रोक रखा है और वह भावनाओं का भरपूर दोहन
करना चाहता है-इतना अधिक कि एक छोटा सा रीटेलर भी 400 प्रतिशत तक कमीशन वसूल कर रहा
है. उदाहरण के लिए आलू का किसान अपनी उपज को मात्र तीन रुपये प्रति किलो बेच पाता
है, लेकिन आम उपभोक्ता को वही आलू करीब तीस रुपये प्रति किलो मिल रहा है. इसका मतलब
है कि बाजार के लोग, जिनमें थोक एजेंट, कमीशन एजेंट और अनगिनत बिचौलिये शामिल हैं,
आपकी जेब लूट रहे हैं.
खाद्य पर्दार्थों के दामों में बढ़ोतरी की कहानी विडंबनाओं से भरी हुई है. बढ़ती
महंगाई के लिए हर तरह के सिद्धांत बताए जा रहे हैं. वैश्विक वित्तीय मंदी के असर से
लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में वृद्धि तक की चर्चाएं की जा रही हैं,
लेकिन नियंत्रण के दो रास्तों पर किसी का ध्यान नहीं है. पहला और सबसे अधिक
महत्वपूर्ण है व्यावसायिक मीडिया की भूमिका, जिसमें बिजनेस टीवी चैनल शामिल हैं. ये
चैनल दिन-रात यह बताने में लगे हैं कि निवेशकों को किन खाद्य पर्दार्थों पर अपना
पैसा लगाना चाहिए. जब कुछ टीवी चैनल दिन-रात फायदे की चीजों की चर्चा कर रहे हैं तो
बाजार में उनकी कीमतों पर असर पड़ेगा ही. अनदेखा किया गया दूसरा पहलू यह है कि खाद्य
पर्दार्थों की बड़ी रिटेल कंपनियों को किसी नियामक नियंत्रण के अभाव में मुक्त रूप
से मुनाफा कमाने का मौका मिल रहा है.
इन कंपनियों को जब भारत में प्रवेश की अनुमति मिली थी तो उन्होंने बिचौलियों को
किनारे कर देने का वायदा किया था और इस आधार पर उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर चीजें
उपलब्ध कराने की बात कही थी. उनके इस वायदे पर ही सरकार ने उन्हें कई तरह की छूट दी
थी, जिनमें सस्ती दरों पर जमीन उपलब्ध कराना शामिल था. इन संगठित रिटेल कंपनियों ने
बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे-छोटे कस्बों में भी अपनी दूकानें स्थापित कीं. संगठित
रिटेल कंपनियों के प्रसार से कीमतों में किसी तरह की कमी नहीं आई. दाल, सब्जी और
फलों के जो दाम सुपर मार्केट में हैं वहीं खुले बाजार में भी हैं.
दूसरे शब्दों में कहें तो बड़ी रिटेल कंपनियां फेरी लगाने वालों से बेहतर नहीं सिद्ध
हुईं. वे भी चार सौ प्रतिशत तक कमीशन हड़प रही हैं. अंतर इतना है कि जहां खुले बाजार
में यह मुनाफा कई लोगों के बीच बंटता है वहीं बड़ी रिटेल कंपनियां अकेले ही सारा
मुनाफा हजम कर रही हैं. साफ है, जैसा सोचा गया था उसके विपरीत बड़ी रिटेल कंपनियां
उस मकसद को पूरा कर पाने में असफल रही हैं जो उन्हें अनुमति देते हुए सोचा गया था.
सरकार को चुनिंदा केंद्रों पर सस्ता आटा और दाल बेचने की दिखावटी कोशिश करने के
बजाय सख्ती दिखानी चाहिए. साथ ही उसे बड़ी रिटेल कंपनियों को निर्देश देना चाहिए कि
वे खाद्य पर्दार्थों की कीमतों में 25 प्रतिशत की कमी करें. एक बार जब सुपर मार्केट
में खाद्य पर्दार्थों की कीमतें नीचे आ जाएंगी तो खुले बाजार के पास भी कीमतें
घटाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होगा. स्पष्ट है, बड़ी रिटेल कंपनियों को
महंगाई पर नियंत्रण के लिए शक्तिशाली औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
09.01.2010, 00.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित