सूचना का आचार
मुद्दा
सूचना का आचार
कुमार कृष्णन,
पटना से
सूचना का अधिकार कानून या आरटीआई को स्वतंत्र भारत में एक क्रांतिकारी वदलाव के तौर
पर देखा गया था लेकिन लगता है कि सरकार साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करते हुए किसी
भी तरह से इससे मुक्ति चाहती है.
सरकारी तंत्र में पारदर्शिता लाने की गरज से 11 मई 2005 को यह कानून पारित हुआ
और 12 अक्टूवर 2005 को लागू किया गया था. पिछले चार वर्षो की अवधि में आम जनता
ने जनहित में लगातार इस कानून का इस्तेमाल किया और सरकारी तंत्र में इस कानून
का डर भी बढ़ा. लेकिन इस अधिकार के कारण भ्रष्ट अधिकारियों में बौखलाहट भी बढ़ी
और फिर शुरु हुआ इस कानून में चोर दरवाज़े तलाशने का काम और इसमें पहली सफलता
मिली कर्नाटक को.
अब कर्नाटक और छत्तीसगढ़ के बाद बिहार सरकार भी सूचना देने के बजाय सूचनाओं को
छुपाने की दिशा में लगातार सक्रिय है. इसके लिए बजाप्ता सूचना के अधिकार कानून
में ही राज्य सरकार ने मनमाने तरीके से संशोधन कर दिया है.
बिहार सरकार ने सूचना का अधिकार कानून को लागू करते समय सरकारी तत्परता दिखायी
थी तो पूरे देश भर में इसकी सराहना हुई थी. बिहार सरकार ने प्रशासनिक
पारदर्षिता के क्षेत्र में विशिष्ट पहल करते हुए सूचना अधिकार अधिनियम के
अन्तर्गत 29 जनवरी 2007 को जानकारी सुविधा केन्द्र की स्थापना की. देश में पहली
बार जब बिहार सरकार ने आईसीटी का प्रयोग करते हुए सूचना अधिकार अधिनियम को
व्यापक स्तर पर प्रसारित करने एवं आम लोगों की पहुंच तक लाने का काम किया तो
बिहार सरकार की इस पहल को भारत सरकार द्वारा ई-गवर्नेंस का उत्कृष्ट उदाहरण
मानते हुए पुरस्कृत किया गया था. लेकिन आज स्थिति ठीक विपरित हो गयी है. बीते
माह मंत्रिमंडल के एक फैसले के बाद जारी अधिसूचना ने इस कानून के उद्देश्यों को
ही तार-तार कर डाला.
सूचना का अधिकार कानून 2005 राज्य सरकारों को कतिपय मामलों में नियम बनाने के
अधिकार देता है. सूचनाधिकार कानून 2005 की धारा 27 (2) कहती है- विशिष्टतया और
पूर्वगामी शक्ति व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम उपवंध कर
सकेंगे.
धारा 27 (2) के इसी उस्तरे का प्रयोग करते हुए बिहार में नीतीश कुमार की सरकार
ने अपने तरीके से नियम बना डाले. इन नियमों की बानगी देखें-
1. एक आवेदन पर, एक ही विषय का 150 शब्द से कम का सवाल होगा.
2. गरीबी रेखा के नीचे के आवेदक मात्र 10 पृष्ठ ही नि:शुल्क सूचना ले सकेंगे.
3. बीपीएल परिवारों से 10 पृष्ठ से अधिक सूचना की फीस ली जाएगी.
4. लोक सूचना पदाधिकारी अब यह लिख सकेंगे कि सूचना हमारे पास नहीं है और हमें
पता भी नहीं है कि यह किसके पास है -आवेदन निष्पादित.
5. आवेदन पाने वाला प्रथम अधिकारी अब सूचना देने के लिए जिम्मेवार नहीं होगा,
यदि वह धारा 6 (3) के तहत आवेदन का स्थानांतरण करता है.
6. अब आवेदकों को स्वपता लिखा लिफाफा संलग्न करना जरुरी होगा.
बिहार सरकार द्वारा किया गया संशोधन हर संवेदनशील नागरिक को नागवार गुजर रहा
है. इसकी वजह यह है कि बिहार की जनता के अधिकारों पर कड़े संशोधन लगाने वाले इन
नियमों ने एक तरह से सूचना अधिकार कानून के समूचे उद्देश्य को ही समाप्त कर
दिया है. यह संशोधन न सिर्फ नागरिको की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छिनता है,
बल्कि लोकतंत्र के वास्तविक स्वामी आम जन को मजबूर और लाचार बनाए रखने की साजिश
भी करता है.
सूचना अधिकार पर काम करने वाली हस्तक्षेप समूह ‘जवाब’के अभिषेक, सौरभ रंजन,
कुमार प्रियतम इस संशोधन को पूर्णतया असंवैधानिक बताते हैं. अभिषेक कहते हैं- “
राज्य सरकार को सिर्फ बीपीएल सूची को संशोधित करने का अधिकार है. वहीं गरीबी
रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे नागरिकों से सूचना की फीस माँगना सूचनाधिकार
कानून 2005 के विल्कुल खिलाफ तो है ही, साथ ही गरीबों के साथ मजाक भी है. एक
आवेदन पर एक सवाल और इसकी शब्द सीमा तय करने वाले काले संशोधन के बाद सूचना का
अधिकार कानून पूरी तरह भोथरा और बेअसर हो गया है.”
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सब जानते हैं कि नीचे से उपर तक का सरकारी महकमा लूट में
शामिल रहता है. ऐसे में सूचना अधिकार के तहत कोई आम आदमी अगर घोटाले के राज खोलने
वाली जानकारी मांगेगा तो लूटेरों के बीच खलबली होगी ही. |
‘जवाब’ ने इस संशोधन को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए सूचना का अधिकार
कानून में संशोधन की वैधता, मुख्यमंत्री और मुख्य सूचना आयुक्त की भूमिका को ही
कटघरे में खड़ा कर दिया है. दायर जनहित याचिका में पटना उच्च न्यायालय के
अधिवक्ता दीनूकुमार ने इस संशोधन को सूचना के अधिकार कानून 2005 अभिव्यक्ति के
मौलिक अधिकार के साथ कई लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन बताते हुए इसके
कार्यान्वयन पर अविलंब रोक और निरस्तीकरण की आवश्यकता बतायी है.
सूचना के अधिकार कानून 2005 की धारा 27 में नियम बनाने की समुचित सरकार की
शक्ति का दुरूपयोग मानते हुए दायर याचिका में कई सवाल खड़े किये गये हैं. मसलन-
क्या नियम को विधानसभा के समक्ष वगैर रखे लागू किया जा सकता है ? क्या यह
संशोधन नागरिक को सूचना से दूर नहीं करता है? क्या यह संशोधन बीपीएल के लोगों
से शुल्क की मांग सूचनाधिकार कानून के मूल उद्देश्य और धारा 7.5 में उल्लिखित
निर्देश के विरूद्ध नहीं है? बिहार सरकार को सूचनाधिकार कानून की धारा 27 के
तहत धारा 7.5 में फीस विहित करने का अधिकार है पर उसमें रखी गयी शर्तो के
विपरित नियम बनाने की शक्ति है क्या ?
इस मामले में पटना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के अंदर हलफनामा
दायर करने का निर्देश दिया है.
इस संशोधन की वैधता को कानून के मैदान में तो चुनौती दे दी गयी है, लेकिन असली
विरोध जनतंत्र की गलियों में जनता की आवाज में उभर रहा है. यह स्थिति क्यों
पैदा हुई है, इस सवाल पर जेपी आंदोलन से जुड़े और तिलकामांझी, भागलपुर
विश्वविद्यालय में गाँधी विचार विभाग के प्राध्यापक डा. विजय कुमार कहते हैं- “
आमलोगों के बीच जाने से कई तरह की शिकायतें मिलती हैं. कहीं मुखिया और पंचायत
सेवक, तो कहीं प्रखंड, अनुमंडल और जिला स्तरीय पदाधिकारी सरकारी योजना राशि में
लूट मचाते हुए मिलते हैं, लेकिन इन्हें पकड़ेगा कौन? सब जानते हैं कि नीचे से
उपर तक का सरकारी महकमा लूट में शामिल रहता है. ऐसे में सूचना अधिकार के तहत
कोई आम आदमी अगर घोटाले के राज खोलने वाली जानकारी मांगेगा तो लूटेरों के बीच
खलबली होगी ही.”
बिहार सरकार के इस मनमाने संशोधन के खिलाफ 30 जनवरी को पटना के गांधी मैदान से
अहिंसात्मक मौन सत्याग्रह की शुरुवात की जा रही है. देखना है कि सुशासन का दम
भरने वाली राज्य की नीतिश कुमार सरकार अपने भ्रष्टाचार पर परदा डालने की कोशिश
करने वाले इस संशोधन को लेकर क्या रुख अपनाती है.
27.12.2009, 10.53 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित