दस्तक देता दस्तावेज
विचार
दस्तक देता दस्तावेज
नरेश मेहता
'हिन्द स्वराज' दस्तक देता एक दस्तावेज है. हमारी यह सभ्यता की नई यात्रा अभी शुरू
ही हुई थी कि सन् 1905 में महान घटनाएं घटित हुईं. पहली थी रूस-जापान का युद्ध,
दूसरी थी बंग-भंग. रूस-जापान का युद्ध हाथी और चूहे का युद्ध माना गया था. पिद्दी
जैसे जापान ने जार के विशाल साम्राज्य में न केवल नकेल ही लगाई, बल्कि उसके खोखलेपन
को भी उजागर किया. भारत में लार्ड कर्जन की कृपा से बंग-भंग हुआ.
भारत में स्वाधीनता को लेकर जो जागरण और चेतना प्रस्फुटित होने लगी थी, बंगाल में
उसका जो उग्र रूप विकसित होने लगा था, उस पर अंकुश लगाने के लिए बंग-भंग किया गया,
ताकि वहां का मनोबल छिन्न-भिन्न हो जाये. दिल्ली परंपरा से ही इस देश की राजधानी
रही है. इस कारण भी और बंदी क्रांतिकारी के तेवरों से घबराकर राजधानी कलकत्ता से
दिल्ली लाई गई. इसके अलावा भी कई राजनीतिक समीकरण कारण थे.
सदी के पिछले दशक में ही वस्तुत: यूरोप के क्लासिकल सृजनात्मक वैभव का उत्कर्ष हुआ
था. इंग्लैंड जैसे छोटे से टापू की रानी से उस ब्रितानी साम्राज्य का वर्चस्व कायम
हुआ, जिसमें सूर्यास्त नहीं होता था. कहना न होगा कि वणिक मानसिकता के अंग्रेजों से
अधिक चालाक साम्राज्यवादी आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ. 'हिन्द स्वराज' में अंग्रेजों
की व्यापारिक और राजनीतिक कुटिलता का एक दिलचस्प प्रसंग आया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति से किसी ने पूछा कि चांद में सोना है या नहीं, तो उन्होंने जवाब
दिया कि चांद में सोना होने की कोई सम्भावना नहीं है क्योंकि वहां सोना होता तो
चांद अब तक ब्रिटिश साम्राज्य का अंग होता. निश्चित ही हमारी सभ्यता युद्धों,
आविष्कारों, वैज्ञानिक उपलब्धियों, तकनीकी विकास और प्रगति की दृष्टि से ही विशिष्ट
नहीं है, बल्कि हमारे हतभागेपन की दृष्टि से भी विशिष्ट है. लेकिन हम अपनी शताब्दी
की दशकवार पड़ताल करें तो मानवता के किसी एक दशक में तानाशाही, जन आंदोलन,
क्रांतिकारियों, नरसंहार, शस्त्रास्त्रों का चरम विकास ऐसा पहले कभी नहीं हुआ होगा.
प्रगति के नाम पर गति, परागति, तात्पर्य दुर्गति ही हुई. औद्योगिकता का भस्मासुर अब
उभार पर है. आज कुछ भी सुरक्षित नहीं है, न प्रगति, न मनुष्य. प्रगति के नाम पर जो
महाकब्रिस्तान निर्मित हुआ है-उसकी चर्चा इससे ज्यादा यहां संभव नहीं है. हम जिस
दस्तावेज की चर्चा करना चाहते हैं वह वस्तुत: हमारी सदी के हतभागेपन की ऐसी
जन्मकुण्डली है जिसे तब एक अनाम, अत्यन्त साधारण दुबले-पतले एटर्नी एम.के. गांधी ने
ऐसी अचूक तैयारी के साथ प्रस्तुत किया कि बड़े से बड़ा ज्योतिषी भी तैयार नहीं कर
सकता था. उन्होंने सन् 1909 में यह किया. तात्पर्य कि तब आधुनिकता और औद्योगिकता की
विभीषिका का भी आरंभ ही हुआ था. दुनिया तब रेल व बेतार वाली आरंभिकता से चकित और
आक्रांत हुई थी लेकिन गांधी ने औद्योगिकता के इस बीज की प्रगति के परिणाम तभी भांप
लिए थे.
गांधी दक्षिण अफ्रीका क्यों और किसलिए गये थे इसकी जानकारी सबको है. वहां
काले-गोरों के बीच नस्ली भेद और घृणा का घिनौना रूप अपने चरम पर देखने को मिला- जो
शायद विलायत से सीधे लौट आने पर देखने को नहीं मिलता. अंग्रेज भारत में क्रूर
निरंकुश शासक जरूर थे लेकिन भारतीय संस्कृति, दर्शन और साथ ही भारत के लोगों की
आंतरिक प्रतिभा के प्रभाव ने उन्हें पूरी तरह बर्बर नहीं होने दिया. डेपुटेशन की
स्थिति में गांधीजी लंदन गये और जाहिर है कि वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा.
लंदन में भारतीय- अभारतीय विचारकों, राजनीतिज्ञों, आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों
से वे मिले. गांधीजी निश्चित ही उस समय तक विचार और अनुभव दोनों स्तरों पर परिपक्व
हो चुके थे. लन्दन से लौटते समय उनके पास जहाज में समय ही समय था. अब तक वे पश्चिम
के अनेक विचारों को भी पढ़ चुके थे जैसे रस्किन, थोरो, तॉलस्तॉय आदि. अनुभव के स्तर
पर दक्षिण अफ्रीका के लोगों, समाजों और आंदोलनों से एकात्म थे.
गांधीजी जान चुके थे कि केवल विचारों से कुछ नहीं होगा, जब तक कि उन्हें जीवन और
आचरण के द्वारा प्रमाणित नहीं किया जाता. लेकिन यह कठिन शर्त थी. इस संबंध में
गांधीजी ने पत्र व्यवहार किया था और अपने साथ भारत के लोगों को लेकर 'तॉलस्तॉय
फार्म' नाम से एक आश्रम खोला. यह उनके विचारों का आचरण है. गांधीजी ने जहाज में जो
दस्तावेज 'हिन्द स्वराज' के नाम से तैयार किया, वह सब आधारभूत बातों की ओर एक
प्रकार से अपनी भावनाओं और क्षमताओं की निर्मम पड़ताल है. महात्मा गांधी अपने को ही
इतिहास, राजनीतिक व्यवस्था, औद्योगिकता, समाज, शिक्षा, तात्पर्य सभी क्षेत्रों के
परिप्रेक्ष्य में तौल रहे थे.
गांधीजी के साथ न तो चालू शब्द ही थे और न ही 'फ्रीडम' का केवल अनुवाद. 'स्वराज' से
उनका तात्पर्य क्या था? क्या अंग्रेजों का इस देश से चला जाना ही स्वराज होगा?
मनुष्य सामाजिक और राजनीतिक आधिपत्य और शोषण से मुक्त कैसे हो सकता है? यंत्र मात्र
में दोष है या यांत्रिकता में? राजनीति से तात्पर्य क्या है? प्रशासन का स्वरूप
कैसा होना चाहिए?
अहिंसा, सत्य, सत्याग्रह, स्वावलम्बन की आधारभूत बातों से वैचारिक और आचरणगत टकराहट
का नाम है 'हिन्द स्वराज'. संवाद शैली में लिखा गया यह दस्तावेज आदि भारतीय ग्रंथों
की शैली में लिखा गया लगता है. पाठक भी वह स्वयं ही हैं और प्रश्नकर्ता भी. वैचारिक
असुविधाएं उत्पन्न करते हैं और उत्तर जानने वाले संपादक भी गांधी जी हैं. सारी
समस्याओं के पक्ष-विपक्ष में किये जाने वाले प्रश्नों को गांधीजी पहले ही करते हैं
और फिर अपनी चीरफाड़ करने लगते हैं. अपने मूल स्वरूप में, उनकी भाषा में, लेकिन उसके
हिन्दी स्वरूप से स्पष्ट लगता है कि हिन्दी भाषा की प्रकृति न जानने के कारण अनुवाद
समझने में थोड़ी कठिनाई पैदा होती है. पर इतना निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि
कोई बीसवीं सदी के आरंभ में इतने स्पष्ट रूप से सारी सभ्यता को विस्थापित कर सकता
है, यह आश्चर्य की बात है.
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गांधीजी ने स्वयं ही कहा है कि उनके विचार उनके अपने हैं भी और नहीं भी. यह तो सही
बात है कि विचार के क्षेत्र में विचार से ज्यादा वैचारिक दृष्टि का महत्व होता है.
कहीं यह नहीं लगता कि गांधीजी ने केवल विरोध के लिए विरोध किया हो, न तर्क के लिए
तर्क. तर्क के जिस अक्षांश पर खड़े होकर गांधीजी चीजों के समाधानों को प्रस्तुत करते
हैं उनसे सहमत न होना चाहें, लेकिन यह असंभव है.
हमें गांधीजी के संदर्भ में प्रचलित सफलता या असफलता जैसी कसौटी और परिभाषा को भी
छोड़ना होगा. वस्तुतः गांधीजी सफल होने के लिए नहीं बने थे क्योंकि इतिहास, राजनीति
या समाज जैसे किसी भी तंग दायरे में उनको रखकर नहीं देखा व समझा जा सकता है. कहा जा
सकता है कि यदि सामान्य अर्थ में सफल हो जाते तो आज वह मात्र एक बीते हुए प्रसंग भर
होते.
गांधी यदि असफल हैं, जैसा कि हैं, तो यह असफलता गांधी के व्यक्तित्व की नहीं बल्कि
गांधी के बाद के बाकी के लोगों की है. तात्पर्य इतना है कि गांधी ने जो भी विचार
अपने आचरण में उतारा, वह निर्भीक होकर. तभी तो अंग्रेजी राज व्यवस्था बाकी सबको,
चाहे वे राजनेता रहे हों या और कोई, चुप कर सकी, परन्तु गांधीजी को नहीं. उसका
मुख्य कारण था कि बिना किसी कटुता के, निर्भीक होकर किसी भी अन्यायी कानून को भंग
करने के लिए अकेले तैयार हो जाते हैं. उनकी दृष्टि में निर्भय हो जाना ही स्वराज की
कुंजी है. कभी गांधीजी ने स्वराज को राजनीतिक उद्देश्य नहीं माना बल्कि यह मनुष्य
की मुक्ति का पर्याय है. गांधीजी की दृष्टि में स्वराज का अर्थ क्या अंग्रेजों का
मात्र चला जाना भर था? या और कुछ?
'हिन्द स्वराज' में प्रश्नकर्ता से जब यह पूछते हैं कि मान लीजिए हम जो मांगते हैं,
जैसा कि अंग्रेज हमारा धन बाहर नहीं ले जाय, हमें बड़े ओहदे दे दे, तात्पर्य शासन
में भागीदारी दे दें, तो क्या अंग्रेजों को बने रहने दें? इसमें क्या हर्ज है?
प्रश्नकर्ता कहते हैं कि बाघ जिस तरह से स्वभाव नहीं बदल सकता उसी तरह अंग्रेज नहीं
बदल सकता. तब प्रश्नकर्ता से संपादक पूछते हैं कि अंग्रेजों के जाने के बाद आप क्या
करेंगे? उसी तरह वह कहते हैं कि हम उनके जैसे ही विधान चालू रखेंगे. वैसे ही राजकाज
चलायेंगे, लाव लश्कर रखेंगे.
तात्पर्य यह हुआ कि हमें अंग्रेज-राज्य तो चाहिए पर अंग्रेज शासक के रूप में नहीं
चाहिए. बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं लेकिन बाघ नहीं चाहते. कहने का मतलब यह कि हम
अपने हिन्दुस्तान को अंग्रेजों के द्वारा नहीं, बल्कि अपने द्वारा इंग्लिस्तान
बनाना चाहते हैं. उसके आगे टिप्पणी करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि स्वाधीनता के
बाद क्या हुआ. इतना अवश्य माना जाना चाहिए कि प्रश्नकर्ता वाला हिन्दुस्तान तो
फलीभूत हुआ, परन्तु गांधीजी का नहीं.
गांधीजी ने सभ्यता पर ही तार्किक विचार किया. सामान्य तौर पर सभ्यता का अर्थ
वस्तुपरक प्रगति समझा जाता है. गांधीजी ने ग्राम सभ्यता और नगर सभ्यता के आधारभूत
भेद को स्पष्ट करते हुए बताया कि इस शताब्दी में मूलत: औद्योगिक विकास और प्रगति के
नाम पर जो अभूतपूर्व उत्पादन विकास हुआ था, उसके साथ ही मनुष्य उतना ही दु:खी,
असंतुष्ट, असुरक्षित होता गया. तब भी क्या हमें ऐसा लगता है कि गांधीजी ने जिस
भारतीय ग्राम सभ्यता, स्वभाषा और पारंपरिक जीवन शैली और मूल्यों की वकालत की थी, वह
निहित उत्थानवादी, पुनरुत्थानवादी या प्रतिगामी अवधारणा थी?
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यह गांधी की विवशता थी कि उन्हें इतिहास और मूल्यों की बिसात पर राजनीतिक मोहरों से
चालें चलनी पड़ीं. अपनी राजनीति के मोहरों की वास्तविकता निश्चित ही वे बखूबी जानते
थे. यह विडंबना ही थी कि इन आंदोलनों का परिणाम उसी अंग्रेजी पार्लियामेंटरी शासन
व्यवस्था के रूप में सामने आया. गांधीजी ने रेलों, वकीलों और डॉक्टरों को देश की
कंगाली का कारण माना. सन् 1909 तक यही स्थिति थी. परन्तु कालांतर में? इसमें हमारे
शासक, प्रशासक, बुद्धिजीवी, उद्योगपति कौन नहीं शामिल हैं?
इन्हीं लोगों के लिये इन चीजों-जैसे रेल, विमान, रेडियो, सिनेमा, टी.वी. आदि के
कारण आज दुनिया बहुत पास आ गई है. लोगों की द्वेष, विद्वेष और खुरापातें भी तो पास
आ गई हैं. आज सुरसा के मुंह की तरह अपराधी वृत्ति में वृद्धि हुई है. उसका कारण
क्या और कौन है? अंग्रेजी भाषा ने हमारे स्वत्व, अस्तित्व और अस्मिता पर गुणात्मक
परिवर्तन का कुठाराघात किया है. उसकी ओर वर्षों पहले गांधीजी देख रहे हैं. लेकिन
हमने उनको, इस तरह की सारी चिंताओं को, भारतीयता को, सबको एक पुण्य स्मरण के रूप
में समर्पित कर दिया. गांधीजी क्यों सन् 1947 के स्वतंत्रता आयोजनों में अनुपस्थित
थे? राज्य जश्न और उत्सव मना रहा था जबकि राष्ट्र लहूलुहान धू-धू जल रहा था और
लपटों में अकेला गांधी था.
सत्य यह है कि प्रत्येक तत्ववेत्ता जीवित पुरुष ही होता है. आज गांधीजी व्यक्ति के
रूप में नहीं हैं, परन्तु इस दस्तावेज के रूप में वर्षों से लगातार दस्तक देकर खड़े
हैं. अपने लिए नहीं. किसके लिए यह दस्तक है? राम का पाठ क्या उनके यहां दस्तक देने
के लिए होता है? दस्तक तो आम लोगों के लिए होती है, और एक बूढ़ा यही कर रहा है.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित