रेत पर हंगामा है क्यूं बरपा ?
बात
निकलेगी तो...
'रेत' पर हंगामा है क्यूं
बरपा
भगवानदास मोरवाल
हाल में प्रकाशित मेरे तीसरे उपन्यास 'रेत' को लेकर गत वर्ष के अंतिम महीनों में
कन्नौज जिले उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ तहसील में विवाद पैदा हो गया. विवाद का मुख्य
कारण गिहार समुदाय की स्त्रियों द्वारा देह-व्यापार बताया जा रहा है.
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किताब को फांसी देते लोग |
विभिन्न समाचार पत्रों में छपी खबरों से पता चला कि इस समुदाय की एक संस्था
'भारतीय आदिवासी गिहार विकास सेवक समिति' उत्तर प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष और
राज्य के एक पूर्व सभासद ने ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, छिबरामऊ की
अदालत में लेखक के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 के तहत मुकदमा तक दायर कर दिया गया
है. इस मुकद्दमे की सुनवाई 5 मई 2009 को हो चुकी है और एक सूचना के अनुसार 11
जून 2009 को लेखक के विरुध्द सम्मन जारी हो चुका है, अपना पक्ष रखने के लिए.
यहां यह बता देना आवश्यक है कि मुकदमे से पूर्व इस समुदाय के लोगों द्वारा पहले
उपन्यास को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई और बाद में उसे जला दिया गया. विरोध
का यह सिलसिला यही आकर नहीं रूका और फरवरी 2009 के मध्य में लेखक के
विरोधस्वरूप इस समुदाय द्वारा अनोखा तरीका अपनाया गया.
तरीका यह था कि इस समुदाय की महिलाएं स्थानीय सैयद बंगले शाह की मजार के पास तक
जातीं और उसके तने पर रंग-बिरंगे फीते बांध कर प्रार्थना करतीं कि अपने उपन्यास
में गिहार महिलाओं का गलत चित्रण करने वाला लेखक विद्या व धनविहीन हो जाए.
'रेत' उपन्यास को लेकर पैदा हुए इस विवाद से पहला और मुख्य प्रश्न यह पैदा होता
है कि उपन्यास के केंद्र में कभी अपराधी जनता की कहे जाने वाला कंजर समुदाय है.
उपन्यास पूरे उत्तर भारत में फैले कंजर समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक और
राजनीतिक चेतना पर आधारित है, फिर यह गिहार समुदाय कैसे जुड़ गया?
जहां तक उपन्यास के स्त्री पात्रों द्वारा किए जाने वाला यौन-कर्म का प्रश्न
है, तो इस पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हमारे तथाकथित
शुचितावादी-नैतिकतावादी, सभ्य समाज और मुख्यधारा के आलोचकों-चिंतकों द्वारा
काफी छाती कूटी जा चुकी है. शायद इस मुद्दे पर हमारे लेखक संगठनों और
बुध्दिजीवियों के मौन का कारण भी यही 'शुचितावाद' रहा है.
यहां इस तथ्य का उल्लेख करना जरूरी है कि ‘रेत’ को लिखने से पूर्व दो वर्ष से
अधिक समय तक अनुसंधान किया. इस दौरान कंजर समुदाय की धार्मिक और जातीय अस्मिता
से लेकर इसके विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया गया. पात्रों के रूप में आए लोगों
का बेहद नजदीकी से मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया. अपने इसी शोध के दौरान पता
चला कि कंजर यानी काननचर अर्थात जंगल-जंगल विचरण करने वाले इस समुदाय का इष्ट
देव एक मुसलमान बादशाह के कल्लू-मल्लू नामक दो पहलवानों को हरानेवाला माना गुरू
है.
गिहार समुदाय द्वारा विरोध करने के पीछे का रहस्य अभी हाल में अचानक घर पर
मिलने आए एक युवक रघुनंदन से पता चला. बातचीत के दौरान रघुनदंन ने पहला प्रश्न
यह किया कि 'रेत' में कंजर समुदाय के जिस इष्ट देव को मैंने अपने उपन्यास में
दिखाया है, उसे मैंने कहां से लिया है? मैंने यह संदर्भ दिखाया तो उसके चेहरे
का तनाव कुछ और बढ़ गया.
उसने तुरंत अगला प्रश्न किया कि जिस मुसलमान बादशाह का मैंने उल्लेख किया है,
उसका नाम क्या है? मैंने उसे बताया कि संदर्भ में बादशाह का नाम नहीं बताया गया
है.
रघुनंदन को इस जिज्ञासा ने उसके बारे में जानने की मेरी इच्छा प्रबल हो उठी.
क्योंकि इतनी बारीक जानकारी कम से कम आज के शोधार्थियों में तो है नहीं. मैं
अभी तक रघुनंदन को एक शोध छात्र माने हुए था. मैंने जब उसकी इस जिज्ञासा के
बारे में जानना चाहा, तब उसने बताया कि दरअसल वह गिहार समुदाय से संबद्ध है.
उसने आगे बताया कि 'रेत' को हमारे समुदाय के दर्जन भर प्रबुद्ध लोगों ने पढ़ा
है. इस उपन्यास को पढ़ने के बाद हम एक अजीब से द्वंद्व से घिर गए हैं, और वह यह
कि अपने पुरखों से अभी तक हम अपने जिस इष्ट देव का नाम सुनते आ रहे है, वह भी
माना गुरू है. जबकि 'रेत' के अनुसार कंजर समुदाय का इष्ट देव भी माना गुरू है.
हम दरअसल यह जानना चाहते हैं कि आखिर हमारा इतिहास और हमारी पहचान क्या है?
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'रेत' अगर अस्मितावादी सवालों से दो-चार होता हुआ संवाद का माध्यम बनता है, तो यही
इसकी अर्थवत्ता और सार्थकता है. |
उस युवक का यह प्रश्न सचमुच विचलित करने वाला था, जिसका कम से कम मेरे पास कोई
उत्तर नहीं था. फिर भी मैंने उसे समझाने का प्रयास किया कि दलितों, जनजातियों और
अति पिछड़ों अर्थात वंचितों का भी भला कोई इतिहास होता है. इतिहास तो शासकों और
सत्तासीनों का होता है. इतिहास तो बलवानों का होता है, शोषितों और पीड़ितों का नहीं
होता है. पता नहीं वह युवक मेरे इस तर्क से कितना सहमत हुआ परंतु उसकी दुविधा और
द्वंद्व का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है. दरअसल यह जिज्ञासा गिहार समुदाय के
एक युवक ही नहीं, अपितु हाशिए पर पड़े और मुख्य धारा से दूर रहे ऐसे समुदायों व
समाजों द्वारा अपने इतिहास की खोज, अस्मिता और उससे उपजी चेतना व द्वंद्व का
परिचायक है.
वास्तव में अपने इतिहास को जानने की लालसा और अपनी अस्मिता के प्रति यह चेतना
अनायास नहीं है. इसके पीछे आजादी पूर्व अर्थात 1871 में किंगजेम्स स्टीफन की अगुवाई
में बने वे अमानवीय क्रूर अपराधी जनजाति अधिनियम से लेकर देश के आजाद होने तक बने
कानून हैं, जिनके चलते तथाकथित ऐसे अपराधी जनजातियों को उनके मूलभूत अधिकारों से
वंचित रखा गया है. इन कानूनों और अधिनियिमों की आड़ में इन समुदायों को स्वतंत्र
भारत में आज भी प्रताड़ित और उनका शोषण किया जा रहा है.
इन अधिनियमों की इसी अमानवीयता के मद्देनजर देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित
जवाहरलाल नेहरू ने 1936 में कहा था-“अपराधी जनजाति कानून के विध्वंसकारी प्रावधान
को लेकर मैं चिंतित हूं. यह नागरिक स्वतंत्रता का निषेध करता है. इसकी कार्यप्रणाली
पर व्यापक रूप से विचार किया जाना चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि इसे संविधान से
हटाया जाए. किसी भी जनजाति को ‘अपराधी’ करार नहीं दिया जा सकता. यह सिद्धांत, न्याय
और अपराधियों से निपटने के किसी भी सिद्धांत से मेल नहीं खाता.”
बेशक आज ये अधिनियम और कानून सरकारी दस्तावेजों में समाप्त हो गए हैं परंतु उस
मानसिकता का क्या होगा, जो इन्हें आज भी अपराधी मानने पर आमादा है. मुख्यधारा में
शामिल होने से रोकती जा रही है. ऐसे में यदि ऐसे समुदाय का एक शिक्षित युवक अपनी
जातीय अस्मिता और इतिहास को लेकर इतना उद्वेलित तथा बेचैन है, तो इसमें बुरा क्या
है. उपन्यास की पात्र रूक्मिणी यदि उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल कर राजनीति के शिखर
पर पहुंचती है, जो हथियार शुचितावादियों के लिए कवच का काम करते है, तब इसमें
नैतिकता और शुचिता का प्रश्न कितना तर्क संगत है. 'रेत' अगर अस्मितावादी सवालों से
दो-चार होता हुआ संवाद का माध्यम बनता है, तो यही इसकी अर्थवत्ता और सार्थकता है.
25.06.2009, 01.20 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित