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भूख के साथ जिंदा है मध्यप्रदेश

मुद्दा

 

भूख के साथ जिंदा है मध्यप्रदेश

सचिन कुमार जैन

 

भारत के राज्यों में धन इफरात बढ़ रहा है, लेकिन भोजन की थाली खाली होती जा रही है. कम-से-कम अनाज की खपत की जो नई तस्वीर उभरकर आई है वह इस देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक मध्यप्रदेश में भयानक भुखमरी की ओर इशारा करती है. कई रिपोर्ट इस बारे में एकमत हैं कि भूख से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

भूख

 

विकास की गति इतनी तेज है कि उसकी रफ्तार में आम आदमी कहीं पीछे छूटता जा रहा है,मानो उसका कोई अस्तित्व ही न हो. विकास और गरीबी की स्वीकार्यता और बहिष्कार राजनीतिक अखाड़ों का नए लक्ष्य बन गए हैं लेकिन इन्हें लेकर फेंके जा रहे शब्दों की कोई समझ और दिशा नहीं है. इन्हीं संदर्भों में भारत सरकार द्वारा जारी की गई नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन यानी एनएसएसओ की रिपोर्ट में भारत में उपभोग की स्थिति को देखना बहुत प्रासंगिक होगा. इस रिपोर्ट में भोजन और जीवन के लिए आवश्यक सभी बुनियादी चीजों के उपभोग की स्थिति के तथ्य और आंकड़े रखे गये हैं.

यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह खाद्य पदार्थों के उपभोग में कमी आई है. तमाम विश्लेषणों से पता चलता है कि यह रिपोर्ट वास्तव में गरीबी उन्मूलन योजनाओं की असलियत का खुलासा करती है. और इनमें से ज्यादातर गरीबी उन्मूलन की ऐसी योजनाएं हैं, जिसमें कृषि को सुरक्षित रखे बगैर विकास की बात की जा रही है.

भारत के ग्रामीण इलाकों में भोजन के उपभोग का स्तर लगातार घट रहा है. 2005-06 में किसी परिवार का एक सदस्य औसतन 11.920 किलोग्राम भोजन का उपभोग करता था और उसके लिए परिवार 106.30 रुपए प्रतिमाह खर्च करता था. लेकिन 2006-07 में औसत भोजन का उपभोग घटकर मात्र 11.685 किलोग्राम प्रति व्यक्ति रह गया और उसके लिए खर्च की जाने वाली राशि बढ़कर 114.80 रुपए हो गई.

मध्यप्रदेश में उपभोग के आंकड़े इस राज्य में भी खाद्य सुरक्षा की भीषण कमी की ओर इशारा करते हैं. औसतन 2005-06 में मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में एक व्यक्ति प्रतिमाह 11.48 किलोग्राम भोजन की खपत करता था और उतना भोजन पाने के लिए 86.46 रुपए खर्च करता था. लेकिन अब प्रति व्यक्ति भोजन की खपत मात्र 9.718 किलोग्राम प्रतिमाह रह गई है. 6 करोड़ तीस लाख की आबादी वाले इस विशालकाय राज्य में खर्च का स्तर अभी भी वही 87.27 रुपए का है.इससे यह साफ साफ पता चलता है कि कैसे मुद्रा स्फीति का प्रभाव खाद्य खपत के बदलते हुए स्तर पर पड़ रहा है.यदि खाद्य और अन्य उत्पादों की खपत के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि केरल के ग्रामीण इलाकों में यह कुल खपत 505.52 रुपए और पंजाब में 511.25 रुपए है. (इसमें अनाज, दूध, मांस, सूखे मेवे और सब्जियां शामिल हैं.) जबकि मध्य प्रदेश में यह खपत मात्र 263.86 रुपए ही है. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि उनके कुल खर्चों का 80.5 प्रतिशत हिस्सा भोजन पर खर्च होता है.

इधर उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार ने सार्वजनिक वितरण आणाली में प्रति राशन कार्ड पर 35 किलोग्राम अनाज का कोटा घटाकर 20 किलोग्राम कर दिया है. इससे गरीब परिवारों की स्थिति और भी बदतर हो गई है.

केरल के लोग 83.69 रुपए अंडा, मछली और मांस पर खर्च करते हैं, जबकि मध्य मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति इन सब पर मात्र 7.44 रुपए ही खर्च करता है. पंजाब में बेशक अनाज पर कम खर्च (91.860 रुपए) खर्च करता है, लेकिन खाद्य पदार्थों पर उनका कुल खर्च 511.25 रुपए प्रति व्यक्ति प्रतिमाह है और इसके साथ ही वे 167.24 रुपए (खाद्य पदार्थ पर होने वाले कुल खर्च का 32.71 प्रतिशत) सिर्फ दूध और उससे बने उत्पादों पर खर्च करते हैं, जबकि मध्यप्रदेश में एक व्यक्ति इन चीजों पर मात्र 44.75 रुपए ही खर्च करता है.

क्षेत्रीय स्वास्थ्य शोध केंद्र, जबलपुर के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश की सहरिया आदिवासी जनजाति के 93 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.


हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में उनकी कुल खाद्य खपत का एक बड़ा हिस्सा (41.46 प्रतिशत और 27.27 प्रतिशत) दूध और उससे जुड़े उत्पादों पर खर्च करते हैं. मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति खर्च का आंकड़ा देश का न्यूनतम खर्च है, जहां प्रतिमाह सिर्फ 514.93 रुपए खर्च होते हैं, जबकि केरल में 1250.35, पंजाब में 1198.93 और हिमाचल प्रदेश में 1117.49 रुपए प्रतिमाह खर्च का आंकड़ा है. इन सभी राज्यों के आंकड़े मध्य मध्य प्रदेश के दुगुने से भी ज्यादा हैं.

अक्तूबर, 2008 में जारी किए गए नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार प्रतिमाह अनाज की खपत के मामले में मध्यप्रदेश (9.72 किलो अनाज का प्रतिमाह उपभोग) केरल (9.37 किलो) और पंजाब (9.63 किलो) के बाद तीसरे स्थान पर है. लेकिन इन आकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि केरल और पंजाब की स्थिति मध्यप्रदेश से बुरी है. पंजाब (511 रुपए प्रतिमाह उपभोग) देश के सर्वाधिक खाद्य की खपत करने वाले राज्यों में से है और उसके बाद केरल (506 रुपए) का स्थान है, जबकि मध्यप्रदेश (कुल 263 रुपए) में प्रति व्यक्ति खाद्य पदार्थों पर होने वाला खर्च देश में सबसे कम है. दूसरी ओर समुद्र तट पर बसा होने के कारण केरल में मछली और फल भी खाये जाते हैं और पंजाब में दूध और उससे बने उत्पादों की भारी मात्रा में खपत होती है, जो वहां की पोषण संबधी जरूरतों को पूरा कर देता है. यही कारण है कि उनके यहां अनाज की खपत मध्यप्रदेश से कम है.

मध्यप्रदेश न तो समुद्र तटीय राज्य है और न ही मांसाहारी है, यह तो अनाज पर निर्भर समाज है. केरल और पंजाब बहुत समृद्ध और विकसित राज्यों में से है और अध्ययन यह बताते हैं कि लोगों के खाद्य पदार्थों और उसके तरीके पर समृद्धि का भी काफी प्रभाव पड़ता है. डिब्बाबंद भोजन उनके खाद्य पदार्थों में प्रमुख होता है, खासकर पंजाब और बड़े महानगरों में. जहां तक मध्यप्रदेश का सवाल है तो वहां पर लोगों की खरीद क्षमता इतनी नहीं है कि अनाज से इतर खाद्य पदार्थों पर पैसे खर्च कर सकें, इसलिए उन्हें अपने भोजन के लिए मुख्यत: अनाज पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

यहां यह भी बहुत गंभीर और ध्यान देने योग्य बात है कि पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश में अनाज का उत्पादन भी बहुत तेजी के साथ घटा है. इन सारी स्थितियों के मद्देनजर मध्य प्रदेश की स्त्रियो में बढ़ते कुपोषण और उनके शरीर में खून की कमी के आंकड़ों से इनकार नहीं किया जा सकता है. क्षेत्रीय स्वास्थ्य शोध केंद्र, जबलपुर के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश की सहरिया आदिवासी जनजाति के 93 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. यह आंकड़े राज्य के अधिकृत विभागों द्वारा ही तैयार किए गए हैं.

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपी आरआई) की अभी हाल की एक रिपोर्ट और भी ज्यादा चौंकाने वाली है. उसने मध्यप्रदेश को इथियोपिया और चाड की श्रेणी में रखा है.

दुर्भाग्य से मध्यप्रदेश में बच्चों में कुपोषण (60 प्रतिशत) और शिशु मृत्यु दर (एक हजार जीवित जन्म लिए बच्चों में से 72 बच्चों की मृत्यु हो जाती है) पूरे भारत में सबसे ज्यादा है. और इससे भी बढ़कर मध्यप्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस राज्य में 66 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि वे इस राज्य में भूख के साथ जी रहे हैं. ऐसे में मध्यप्रदेश में अनाज उत्पादन में और खाद्य अनाज की इतनी कम होती खपत एक बहुत गंभीर सवाल है.

20.05.2009, 09.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Kanwaarpal (9650547188) (kpsbharti@yahoo.co.in) Loni Ghaziabad

 
 सचिन कुमार जी यह स्थिति केवल म.प्र की है नहीं है. सैन गुप्ता (अर्थशास्त्री) की रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत की 70% जनता केवल 20 रुपए प्रति दिन पर गुजारा कर रही है. अधिकांश जनता को साम्राज्यवादी पॉलिसी ने भूखे मरने पर मजबूर कर दया है. आज भारत में केवल 15% लोगों को ध्यान में रखकर पॉलिसी बनाई जाती है.

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार चाहे जिस क्षेत्र में देखें. आज जरूरत है समाज को समझने की और समझकर समाज को बदले की. इसके लिए हमें भगत सिंह की कही बातों को ध्यान में रखना होगा और समाज को बदल देने वाले विचार की तलवार की धार को तेज करना होगा. समस्या का विश्लेषण करने से काम चलने वाला नहीं है. इनको खत्म करने का मजबूती के साथ निर्णय करना होगा.
 
   
 

yogesh pandey (yogeshbpandey@gmail.com) bhopal

 
 सचिन जी, इस विषय में आपका समर्पण इस लेख में दिखता है, आपकी चिंता झलकती है. 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad

 
 इससे एक बात साफ हो जाती है की अभी भी भारत के सामाजिक अर्थ-शास्त्र को लेकर जो चिंता देश को होनी चाहिए वह लगभग नहीं हो रही है. इंदिरा जी के ज़माने में भी यह सवाल था पर उसको बड़ी आसानी से टाल गयी थी - भूख के बजाय उन्होंने मानदंड तेर्लिन की शर्ट घड़ियाँ और सायकिल होना बना दिया था.पर भूख वहीँ है सायकिल की जगह सेकंड हैण्ड की कारों व कारों ने लिया है .
यदि ईमानदारी से सोनिया गाँधी जैसा राहुल के लिए चिंतित है जो सहज भी है काश अंतिम राहुलो की चिंता करे तो वह गाँधी को रिप्लेस कर सकती है पर वह हिम्मत यह दिखा पायेगी संदेह है.गरीबों की इन्हे जरुरत है-नहीं तो इन्हे वोट कौन करेगा . देशी नेता तो कितने महान है अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता , जाति ,धरम ,उंच , नीच फिर गुंडे अपराधी यह सब और इनको यह सब बनाने वाले बुद्धिजीवी तो यहाँ कमाल के है.क्या सोचते है क्या इनको बुद्धि मिली है वही लालू जबतक रेलमंत्री थे लोग गुरगान करते थकते नहीं थे पर जब नयी सरकार आयी तो महान कांग्रेसी दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके मनमोहन के खिलाफ भी यही कांग्रेसी वही सब कुछ करते परन्तु अभी राहुल ट्रेंड नहीं हुए है - तो सोनिया जी मानवीय मूल्यों का ड्रामा और साजिश इस देश में सदियों से लम्बे समय तक नहीं चलती .
 
   

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