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घोषणापत्रों में अलग क्या है

जनमत

 

घोषणापत्रों में अलग क्या है !

योगेंद्र यादव

 

बड़ी पार्टियों के समानधर्मा होते ही बुनियादी मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे से गायब और बहस के दरवाजे बंद हो जाते हैं. मतदाता के विकल्प सिकुड़ जाते हैं. चुनाव होता है, लेकिन चुनने के लिए कुछ नहीं बचता.

सोनिया गांधी


पिछले हफ्ते कपिल सिब्बल ने भाजपा के घोषणापत्र पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि इसकी अनेक बातें कांग्रेस के घोषणापत्र की जेरॉक्स कॉपी हैं. वे यह बताना भूल गए कि खुद कांग्रेस घोषणापत्र की कौन-कौन सी बातें भाजपा की पुरानी मांगों की नकल हैं. उनकी यह छोटी सी टिप्पणी हमें समकालीन भारतीय राजनीति के एक बड़े सच से दो-चार होने को मजबूर करती है.

राजनीति का वह बुनियादी सच यह है कि आज मुख्यधारा के सभी दल वैचारिक रूप से एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े हैं. नई आर्थिक नीतियों पर भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक सहमति के साथ इस समानधर्मिता की बुनियाद पड़ी थी. धीरे-धीरे सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने खुले बाजार की अर्थव्यवस्था और भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को स्वीकार कर लिया. हकीकत यह है कि वाम मोर्चा की सरकारें भी इसमें शरीक हैं.

इस आम चुनाव में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का साझा वैचारिक धरातल एक नया आयाम ले रहा है. परमाणु संधि के मुद्दे पर हुई तकरार अब बीते कल की बात है. विदेश नीति के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्रों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है. राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस अब भाजपा के करीब खड़ी दिखती है.

कम से कम कागज पर आरक्षण के मुद्दे पर सभी राजनीतिक पार्टियों में कोई विवाद नहीं है. अब चुनावी लड़ाई का दायरा बिजली, सड़क और पानी जैसे विकास के छोटे-छोटे मुद्दों में सिमटकर रह गया है. इसकी शिनाख्त करने के बजाय मीडिया भी इस सवाल पर आंख मूंदे बैठा है. अपनी तमाम कमियों के बावजूद ये घोषणापत्र किसी भी अखबार के संपादकीय पन्नों से ज्यादा गंभीर दस्तावेज हैं.

मुख्यधारा के दलों के घोषणापत्रों में और कुछ भी कमी हो, संजीदगी का अभाव नहीं है. एक दशक के लंबे फासले के बाद भाजपा खुद अपना घोषणापत्र लेकर आई है, एनडीए का नहीं. मुद्दों और वादों की झड़ी के बीच कहीं शक होने लगता है कि भाजपा को इन्हें लागू करने की चिंता भी है या नहीं.

उधर कांग्रेस के घोषणापत्र में अगर आप गांधी परिवार के महिमामंडन को कुछ देर के लिए भूल जाएं तो यह दस्तावेज नफीस अंग्रेजी राजनीतिक वाकपटुता का बेहतरीन नमूना है. मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र विचारहीनता के इस दौर में राजनीतिक विचारधारा को स्थापित करने की गंभीर कोशिश है, बशर्ते आप वाम मोर्चे की सरकारों को नजरअंदाज कर दें.

बसपा ने बदस्तूर घोषणापत्र जारी नहीं किया, लेकिन इस बार मतदाताओं के नाम एक लंबी अपील जरूर जारी की है. अगर हम घोषणापत्रों पर ध्यान दें तो मुख्यधारा के बाहर दलों को जवाबदेही का आईना दिखाने वाले कई और प्रयास भी देख पाएंगे. लोक राजनीति मंच और जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने देश भर में चल रहे जनसंघर्षो का एजेंडा सामने रखा है.

गैर सरकारी संगठनों के गठबंधन ‘वादा न तोड़ो अभियान’ ने जनता का घोषणापत्र जारी किया है. आदि धर्म समाज ने महादलित घोषणापत्र पेश किया है. कई जनांदोलनों ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और सूचना के अधिकार को लेकर जनसुनवाई के जरिए राजनीतिक दलों को जवाबदेही के कठघरे में खड़ा किया, लेकिन ताबड़तोड़ चुनावी खबरों के बीच इनके लिए कोई वक्त नहीं है.


मीडिया अगर घोषणापत्रों के बारे में सजग होता तो देश के बुनियादी मुद्दों और योजनाओं पर एक सार्थक बहस की गुंजाइश थी. इन घोषणापत्रों में ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव आए हैं. हर पार्टी ने रोजगार गारंटी योजना के विस्तार का समर्थन किया है. माकपा और भाजपा दोनों ने यह कहा है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि का संसद द्वारा अनुमोदन अनिवार्य बना देना चाहिए. कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा के लिए कानून बनाने का वादा किया है. कांग्रेस और माकपा दोनों ने समान अवसर आयोग की स्थापना का समर्थन किया है. भाकपा ने निजी क्षेत्र में आरक्षण का प्रस्ताव रखा है. भाजपा ने स्विस बैंकों से काले धन को वापस लौटा लाने का वादा किया है. ये महज लोकलुभावन वादे नहीं हैं.

वरुण गांधी के जहरीले बयान और लालू यादव की अभद्र प्रतिक्रिया को टीवी स्क्रीन पर भरपूर जगह मिली. लेकिन इसके बीच हम अल्पसंख्यकों को लेकर भाजपा के रवैये में आए एक बारीक बदलाव को समझने से चूक गए. भाजपा का घोषणापत्र सच्चर समिति की इस बात को कबूल करता है कि देश के अधिकांश मुसलमान पिछड़ेपन का शिकार हैं. भाजपा नवगठित अल्पसंख्यक मंत्रालय को खत्म करने की बजाय इसे नई दिशा देना चाहती है. उर्दू को प्रोत्साहन देने की वकालत करती है, धर्म परिवर्तन पर पाबंदी लगाने की बजाय इस सवाल पर एक राष्ट्रीय बहस की वकालत करती है. यह भाजपा की मुस्लिम वोटरों तक पहुंचने की एक शुरुआत जरूर है.

बड़े नीतिगत सवालों पर देश की बड़ी पार्टियों का एक साझा धरातल काफी लोगों को खुशगवार लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए यह अच्छी खबर कतई नहीं है. उन पार्टियों के समानधर्मा होने के साथ ही कुछ बुनियादी मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे से गायब हो जाते हैं. किसानों की आत्महत्या तो मुद्दा बनती है, लेकिन किसानी के संकट पर चर्चा की जरूरत महसूस नहीं होती.

सामाजिक न्याय के पैरोकार मिल जाते हैं, लेकिन अति पिछड़े, पसमानदा मुसलमान और महादलितों के लिए न्याय के सवाल तक कोई पहुंचना नहीं चाहता. पुलिस सुधारों की चर्चा तो हो जाती है, लेकिन सलवा जुडू़म के जुल्म पर गहरा सन्नाटा छा जाता है. एक ही धरातल पर पहुंचते ही राजनीतिक बहस के दरवाजे बंद हो जाते हैं. मतदाता के पास विकल्प सिकुड़ जाते हैं. चुनाव तो होता है, लेकिन चुनने के लिए कुछ नहीं बचता.

 

10.04.2009, 09.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

tarun goyal (advocatetarungoyal@gmail.com) muzaffarnagar up

 
 All poltical parties are using the general public as a tool for the kursi only. There are no grass root issues in this election, all the campaign is in the state of upheria. No national cultural,defence and book policy has no place. This is shameful. 
   

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