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चुनाव में युवा वोटर की गूंज

जनमत

 

चुनाव में युवा वोटर की गूंज

योगेंद्र यादव


हाथ में डंबल उठाए लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीर को आप भूले नहीं होंगे. युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश में जुटे आडवाणी की यह तस्वीर युवा वोटर की बहस को विस्तार देती है. यहीं एक बड़ा सवाल हमें मथने लगता है. क्या सचमुच इस देश में ऐसा नौजवान या युवा वोटर मौजूद है, जो अपने दम पर राजनीति और चुनावों की दिशा तय कर सके?

लोकसभा चुनाव 2009

आज टीवी स्क्रीन से लेकर अखबार के पन्नों पर पसरते चुनाव के बीच युवा एक राजनीतिक ताकत की शक्ल में पेश किया जा रहा है. टेलीविजन के कैमरे देश के कॉल सेंटरों, शॉपिंग मॉल और यूनिवर्सिटी कैंपस में इसी युवा वोटर को टटोल रहे हैं. कल तक छात्रों को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने वाले आज युवा राजनीति के महिमामंडन में जुटे हैं.

चाहे राहुल गांधी हों या सुप्रिया सुले अथवा स्टालिन, राजनीतिक खानदान के इन युवा वारिसों को नई पीढ़ी के नेताओं के चेहरे की तरह पेश किया जा रहा है. नतीजा यह है कि युवा वोटर की गूंज के बीच महानगरों के अभिजात्य वर्ग के बाहर गांव-देहात की नौजवान जिंदगियों की तकलीफें और दर्द गुम होते जा रहे हैं. ऐसे में हम पूरी संजीदगी से यह देखें कि क्या हमारे देश में युवा वोटर नाम की कोई चीज है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे देश में भारी संख्या में ऐसे वोटर हैं, जो उम्र के लिहाज से युवा हैं. युवा वोटर की बात के पीछे मान्यता है कि युवाओं की इस तादाद ने राजनीति में उनकी भूमिका को नया विस्तार दिया है. इन युवाओं की अपनी एक राजनीतिक प्रतिबद्धता, एक सोच और वोट देने को लेकर एक अलहदा दृष्टिकोण है. इस मान्यता के चलते युवा वर्ग द्वारा मौजूदा राजनीति की दिशा बदलने का आभास मिलता है. युवाओं को लेकर गढ़ी गई सोच को हम सीएसडीएस के नेशनल इलेक्शन स्टडीज के शोध में सामने आए आंकड़ों की कसौटी पर कसते हैं.

इन आंकड़ों से गुजरते हुए युवाओं को लेकर गढ़े मिथक दरकना शुरू हो जाते हैं. युवा वर्ग की राजनीतिक सोच, मिजाज और व्यवहार देश के बाकी वोटरों से अलग नहीं है. नेशनल इलेक्शन स्टडीज से यह साफ हो जाता है. यदि 25 साल से कम उम्र के 39 फीसदी वोटर राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, तो बाकी वोटरों में भी 38 फीसदी की यही सोच है.

युवा वर्ग अपने वोट का इस्तेमाल करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखता. पिछले चार लोकसभा चुनावों में युवाओं ने देश के औसत मतदान से दो से चार फीसदी कम ही वोट डाले. युवाओं के मतदान का आंकड़ा भी पूरे देश में एक-सा नहीं रहा. शहर में 50 फीसदी युवाओं ने वोट डाले तो गांवों में यह आंकडा 56 फीसदी था. ये आंकड़े साबित करते हैं कि उम्र का पहलू वोट देने में सबसे महत्वपूर्ण कारक नहीं है.

अगर यह पूछें कि युवा अपना वोट किस पार्टी को देते हैं, तो हम पाते हैं कि युवाओं का किसी एक पार्टी की ओर रुझान नहीं है. पिछले चार चुनावों में युवाओं का वोट हर बड़ी राजनीतिक पार्टी में करीब-करीब उसी अनुपात में बंट गया, जिस अनुपात में पार्टी के कुल वोट. युवाओं ने कांग्रेस को उसके औसत से कुछ कम वोट डाला, महज एक फीसदी कम. भाजपा ने अपने औसत वोट शेयर से एक या दो फीसदी ज्यादा वोट युवाओं से हासिल किए.

1996 और 1998 के चुनाव में युवा वर्ग ने बसपा को ज्यादा पसंद किया, लेकिन 2004 में ये अंतर खत्म हो गया. वाम दलों को औसत वोटों के मुकाबले युवाओं के कम वोट मिले. राज्यों के आईने में देखें तो तस्वीर कुछ पेचीदा होती है. नए क्षेत्रीय दलों को युवा वर्ग का अधिक समर्थन मिला है, लेकिन कुल मिलाकर युवा वोटर के रुझान की मूल तस्वीर नहीं बदलती.

नया दौर है, नई उमंगे, अब है नई जवानी, जैसे क्रांतिकारी गीतों से पैदा हुआ मुहावरा एक और मिथक पैदा करता है कि युवा बदलाव चाहता है, लेकिन सच यह है कि युवाओं की सोच देश के बाकी वोटरों से बुनियादी रूप से अलग नहीं है. युवा अपने युग की छाप लिए ही अपनी जिंदगी से रूबरू होता है. इसी नजरिए को करीब से टटोलने की कोशिश में सीएसडीएस ने भारतीय युवाओं की सोच पर एक विशेष अध्ययन किया.

इस शोध में यह पहलू खुलकर सामने आया कि आज का युवा न तो भारतीय परंपरा का गुलाम है, न पश्चिमी आधुनिकता का. दरअसल भारत में वर्ग, जाति, क्षेत्र और लिंग की तुलना में उम्र का पहलू वोट पर कहीं कम असर डालता है. इस बिन्दु पर भारत यूरोप के देशों से बिलकुल अलग दिखाई देता है. पश्चिम में राजनीति जातियों के बजाय पीढ़ियों के संघर्ष के इर्द-गिर्द खड़ी होती है. ग्रीन पार्टी जैसे कई नए राजनीतिक दल युवा वोट के सहारे ही खड़े हुए. यही बात आप ओबामा की जीत के बारे में भी कह सकते हैं. पीढ़ियों की टकराहट हमारी राजनीति का सच नहीं है.

युवा दौर हो या न हो, युवा उपभोक्ता जरूर है, जिसे हर कंपनी पकड़ना चाहती है. उपभोक्ता की इस कमजोरी को भुनाने के लिए हर टीवी चैनल लालायित है.

दिक्कत युवाओं की नहीं, हमारी मान्यताओं की है. असल में युवा किसी देश, काल की छाया में ही खड़ा होता है. युवा पर कोई बोझ नहीं है, लिहाजा वह अपनी जिंदगी को अपने विश्वास और मान्यता के मुताबिक ढाल सकता है. इसी वजह से युवा हमें नई मौलिक सोच और बदलाव की उम्मीद जगाता दिखाई देता है. लेकिन जरूरी नहीं कि हर देश, काल में युवा परिवर्तन का वाहक बने.

युवा एक अलग किस्म के वोटर में तभी तब्दील हो सकता है, जब युवा और छात्र राजनीति की परंपरा के बीच उसे खुद को गढ़ने का मौका मिले. युवा एक मौलिक सोच अपना सकता है, बशर्ते यूनिवर्सिटी के कैंपस के अंदर और बाहर एक मजबूत राजनीतिक बयार बह रही हो. युवा अपने आप में बदलाव का वाहक कतई नहीं है.

अगर ऐसा है तो इस चुनाव में युवा वोटर की इतनी गूंज क्यों सुनाई दे रही है? मुझे लगता है कि कहीं न कही यह खेल मीडिया के बाजार से जुड़ा है. युवा दौर हो या न हो, युवा उपभोक्ता जरूर है, जिसे हर कंपनी पकड़ना चाहती है. उपभोक्ता की इस कमजोरी को भुनाने के लिए हर टीवी चैनल लालायित है. वह जानता है कि युवा ही उसका सबसे बड़ा संभावित उपभोक्ता है.

वह इसी को लक्ष्य बनाकर अपने कार्यक्रम भी गढ़ता है. अगर चुनाव हैं, तो अपने कार्यक्रम की विषयवस्तु भी इसी के इर्द-गिर्द रखता है. साफ है कि यहां युवा और उसकी राजनीति से किसी को मतलब नहीं है. बाजार इस युवा को अपनी गर्ज के मुताबिक गढ़ रहा है. अगर हमें गांव-देहात और झुग्गी-झोपड़ी के बहुसंख्यक युवा के दुख-दर्द से जुड़ना है और नई पीढ़ी की क्रांतिकारी संभावनाओं को टटोलना है तो टीवी चैनलों के युवा वोटरों और युवा नेताओं से बचकर रहना होगा.


06.04.2009, 16.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Abhishek Singh (zzzabhishek45@yahoo.com) Bhandup Mumbai

 
 सर, इन्होने सही कहा है हमें किसी एक को चुनने अथवा नकारने दोनों अधिकार optional रूप से अवश्य मिलने चाहिए. मतदाताओ को मत डालने के लिए कम से कम दो दिन का समय जरूर मिलना चाहिए क्योकि भारत जनसँख्या के हिसाब से बहुत बड़ा देश है, अगर किसी कारणवश कोई वोट डालने नहीं जा पाता है तो उसे दोबारा मौका मिलेगा तथा लंबी कतारों से मुक्ति मिलेगी. धन्यवाद 
   
 

akash (akash13007@yahoo.co.uk) hisar

 
 Youth have to come in politics. Nothing can be achieved by condemnation. 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 कांग्रेस या भाजपा में से किसी को भी चुने बात नही बदलेगी !! एक चोर तो दुसरा बईमान है इसलिये चाहे कोई भी जीते हारेगा लोकतंत्र ही ॥

मगर इस देश के युवक दोनो को खारिज करने का अधिकार नही मांगते ,हमे मतदान मे दोनो या कहे कि सारे प्रत्याशियो को भी खारिज करने का अधिकार होना चाहिये तभी ये गुण्डे और कातिलो के दिल्ली तक के सफ़र पर विराम लगेगा !!

मगर ऐसी मांग युवा समुदाय कहां करता है. वह तो नारे के बैनर पोस्टर लगाने मे और जिन्दाबाद मुर्दाबाद करने मे मशरुफ़ है !!
 
   
 

Vishnu Tiwari (vishnutiwari@gmail.com) Lucknow

 
 आपने युवा वोटर की बात की. अच्छा लगा, किंतु आप का संदेह और नेशनल इलेक्शन स्टडीज की जिस स्टडी की बात आपने की है वह 2004 के इलेक्शन की है, अब हालात बदल गए हैं, आपने मुंबई की घटना को देखा है उसमें युवाओं ने जिस तरह से देशभक्ति का जज्बा दिखाया उसके आधार पर मेरी यह मान्यता है कि इन चुनावों में देश का युवा मतदाता परिवर्तन का वाहक अवश्य बनेगा. हमको आपको अब हताश होने की जरूरत नहीं है. 
   

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