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रविवार : हिन्दी | Raviwar : Hindi | खतरे में हैं बोंडा बच्चे

उड़ीसा

 

खतरे में हैं बोंडा बच्चे

सारदा लहांगीर

मल्कानगिरि, उड़ीसा से

 

 

मल्कानगिरि जिले की बोंडा पहाड़ी में बसे अंद्रहाल गांव की बत्तीस वर्षीय सानिया किरसानी उस दिन को कभी नहीं भूल सकती हैं, जिस दिन उनके डेढ़ वर्षीय पुत्र सुकरा की मौत हुई थी.

बोंडा आदिवासी


यह सानिया के तीसरे बच्चे की मौत थी.

इससे पहले भी सानिया के दो बच्चे बुखार के कारण काल के गाल में समा गये थे. अपने तीन-तीन बच्चों को खोने वाली सानिया बेहद डूबे स्वर में कहती हैं- “मैं नहीं जानती कि उस दिन मेरे सुकरा को क्या हुआ. उसे 15 दिनों से बुखार था. हमने उसे घरेलू दवाइयां खिलाई पर वो बच नहीं पाया.”

गांव के बुधेई शिशा के अनुसार गांव में हर महीने एक या दो बच्चों की मौत हो जाती है. बकौल बुधेई “ मेरा तीन वर्षीय पोता भी पिछले महीने चल बसा. हमलोग उसकी मौत की असल वजह नहीं जानते, पर मेरे पोते को आठ दिनों तक बुखार था जिसके कारण वो कमज़ोर हो गया था. हम उसे परंपरागत इलाज करने वाले गुनिया के पास ले गए, पर वह बचाया नहीं जा सका”.

मुश्किल में बोंडा
उड़ीसा की बोंडा जनजाति इन दिनों मुश्किल में है.

 

1971 में इस जनजाति की जनसंख्या थी 5245. और आज इतने सालों बाद कुल आबादी 5665 है. पिछले कुछ सालों में इस जनजाति की संख्या जितनी तेजी से कम होती जा रही है, वह चिंता का विषय है. इन दिनों तो इस जनजाति पर बुखार और सांस की बीमारियों ने एक तरह से हमला बोल रखा है.

आदिवासी गांव अंद्रहाल का ही किस्सा लें. पिछले महीने जब गांव के कुछ बच्चे डायरिया, बुखार और तीव्र श्वास संक्रमण से बीमार पड़े तो किसी को कुछ समझ में नहीं आया. लेकिन देखते ही देखते गांव के अधिकतर बच्चों में यह बीमारी फैल गई और अकेले अंद्रहाल में 10 बच्चों की मौत हो गई. मरने वालों में आठ बच्चों की उम्र एक से छह साल के बीच थी.

गांव में अभी भी इस बीमारी से बच्चे जुझ रहे हैं. चिकित्सक मानते हैं कि गांव में ज्यादातर मौतों की वजह बुखार और श्वास तंत्र में तीक्ष्ण तकलीफ रही है. मल्कानगिरि के सीडीएमओ ने कहते हैं- “वयोवृद्ध गणेश मोहराना ही मरने वालों में से एकमात्र बालिग थे. ”

वे कहते हैं- “ अंद्रहाल गांव के बोंडा अपनी परंपराओं के अनुसार कई त्यौहार और पर्व मनाते हैं और इन त्यौहारों के समय वे किसी दवाई का सेवन नहीं करते हैं. ऐसे में जब ये बच्चे बुखार से ग्रस्त होते हैं तब उनके अभिभावक उन्हें परंपरागत दवाइयां ही देते हैं. ये उनकी मौतों का कारण हो सकता है. अगर ये उनके त्यौहारों का समय नहीं भी होता तो भी वह डॉक्टरों के पास नहीं जाते क्योंकि वो टोना टोटका में विश्वास रखते हैं.”

अपने बेटे को खोने वाले सुकरु मुदुली सीडीएमओ से सहमति दो दर्शाती हैं लेकिन उन्हें इस बात की भी शिकायत है कि गांव के इलाके में कभी कोई डाक्टर नज़र नहीं आते.

व्यवस्था की मौत

मुदुली कहती हैं- “हमारे रीति रिवाज हमें चैत्र पर्व और और दशहरे के समय दवाई या बाहरी कुछ भी खाने की अनुमति नहीं देते हैं. अगर हम ऐसा करते हैं तो हमारे भगवान हमें दंड देंगे और हमारी बिरादरी हमें बहिष्कृत कर देगी.”

मुदुली दुख और आक्रोश से कहती हैं- “ अपनी बिरादरी के विरोध के बावजूद मैं अपने बच्चे को बचाना चाहती थी. मैं नहीं जानती थी कि मैं अपने बच्चे को लेकर कहां जाउं. इससे पहले कोई डॉक्टर या अधिकारी अब तक इस गांव में नहीं आया. अपने बच्चों की मौत के बाद ही अपने गांव में हम इन डाक्टर बाबुओं के मुंह देख पा रहे हैं.”

बोंडा उड़ीसा की प्राचीन जनजातियों में से एक हैं, जो लगभग असाध्य चोटियों पर रहती हैं जो कि मल्कानगिरि जिले की मुदुली पाड़ी और अंद्रहाल पंचायत के 130 किलोमीटर भाग में फैली हुई है. इस जिले के 32 गावों में बोंडा जनजातियां रहती हैं. उनके पहनावे और रहन सहन को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि वे अभी भी विकास से कोसों दूर हैं.

इस इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल ये है कि अंद्रहाल से 13 किलोमीटर दूर मुदुलीपाड़ा में एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और दवाखाना है. ज़ाहिर है, इस इलाके के सभी 32 गांव इसी स्वास्थ्य केंद्र के भरोसे हैं. लेकिन पिछले कई सालों से इस स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सक का पद खाली है और बोंडा आदिवासी भगवान भरोसे हैं.

बोंडा पहाड़ के मंगू शिशा की पत्नी और बच्चे का प्रसव के दौरान निधन हो गया था. गर्भावस्था के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी को किसी भी डॉक्टर को नहीं दिखाया और न ही किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ले गए. मंगू कहते हैं- “जब मेरी पत्नी की स्थिति गंभीर हो गई तो हम असहाय हो गए. क्योंकि मुदुलीपाड़ा का स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हमारी बसावट से 30 किलोमीटर दूर है. हमारे पास परिवहन के साधन नहीं हैं और हम सामान्यत: जरूरत पड़ने पर मुदुलीपाड़ा तक पैदल चले जाते हैं पर उस समय मेरी बीवी की अति गंभीर हालत के कारण उसे पैदल ले जाना संभव न हो सका और उसकी मौत हो गई.”

मल्कानगिरी जिले में डॉक्टरों के 53 पद रिक्त हैं. अंद्रहाल गांव में एक एएनएम हैं. उनकी जिम्मेदारी बोंडाओं के पास बार-बार जाकर उन्हें डायरिया, बुखार और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए दवाइयां बांटने की है. लेकिन वे भी खैरापुट में रहती हैं जो अंद्रहाल से 25 किलोमीटर दूर है.

वे कहती हैं- “बोंड़ा लोगों का व्यवहार कभी-कभी काफी आक्रमक होता है और वो अपनी छोटी सी दुनिया में अकेले रहना पसंद करते हैं इसलिए उन लोगों के साथ रहना काफी जोखिमपूर्ण होता है.”
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

पुरुषोत्तम नई दिल्ली

 
 यह शर्मनाक है कि बोंडा आदिवासियों को लेकर सरकार चुप है. एक तरफ तो हम चांद पर पहुंचने की बात करते हैं, दूसरी ओर लोगों के लिए रोटी तक का जुगाड़ नहीं हो पा रहा है. अगर ऐसे में ये आदिवासी नक्सलियों का दामन थामते हों तो इसमें गलत क्या है ? 
   
 

Amarendra Kishore (amarendra.kishore@gmail.com) Kalahandi

 
 लोकतंत्र का ये सच काश जनता के नुमाइंदे समझ पाते. 
   
 

sananda Mitra Goa

 
 देश की पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गई है शारदा जी. ऐसे में बोंडा आदिवासियों की आवाज़ कोई क्यों सुने...लाखों-करोड़ों रुपए अपने बच्चों के जन्मदिन में फूंकने वाले उड़ीसा सरकार के मंत्रियों को इतनी शर्म भी नहीं आती कि इन आदिवासी लोगों को दवा देने के बारे में भी सोचें.इतिहास इन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा. 
   

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