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देविंदर शर्मा | devinder sharma | food security

बहस

 

भूखे देश का नंगा सच

देविंदर शर्मा


भूख आर्थिक विकास से कदमताल मिलाकर चल रही है. एक ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था औसतन 7 से 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, भूख की समस्या में भी इसी अनुपात में बढ़ोतरी हो रही है. यह नंगा सच राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की नवीनतम रिपोर्ट से सामने आया है. भूख और आर्थिक वृद्धि में बड़ा मजबूत सह-संबंध है. आर्थिक वृद्धि की गति जितनी अधिक होती है, उतने ही अधिक लोग रात को भूखे सोते हैं.

devinder sharma, poverty


यह समीकरण इस विचार को चुनौती देता है कि आर्थिक वृद्धि लोगों को गरीबी और भुखमरी से उबारती है. इस चिंताजनक रिपोर्ट से देश हिल जाना चाहिए था और वैश्विक आर्थिक समुदाय को सबक सीखने चाहिए थे, किंतु बड़े आराम से इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

 

एक ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान से बचाने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं तब जनता का पेट भरने में राष्ट्र-राज्य की विफलता का कलंक गहरा होता जा रहा है.

हमारे पूर्वजों ने कल्याणकारी राष्ट्र की जो परिकल्पना भारत के लिए की थी, वह साकार नहीं हो पाई. अब यह परिकल्पना केवल औद्योगिक घरानों के हितों को सुरक्षित रखने तक ही सीमित रह गई है.

आर्थिक नीतियों में गरीबों और भूखों का कोई स्थान नहीं है. पोषण पर एक पैनल बनाने के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है. शायद उनके लिए आर्थिक गिरावट से बड़ी कोई और चिंता नहीं है. अपने पूर्ववर्तियों की तरह शायद ही कोई ऐसा दिन होता हो जब वह उद्योगपतियों से मुलाकात न कर रहे हों.

 

अगर पूर्ववर्ती सरकारें व्यापार और उद्योग के विकास के प्रयासों का लेशमात्र हिस्सा भी भूख और कुपोषण से लड़ने में लगा देतीं तो भारत 88 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में शर्मनाक रूप से 66वें पायदान पर नहीं होता. भुखमरी के मामले में भारत अफ्रीका के गरीब राष्ट्रों से भी नीचे है.

यद्यपि अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार किए गए वैश्विक भूख सूचकांक में भारत में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है, जो कि विश्व में सर्वाधिक है, किंतु यह अनुमान भी काफी कम है. इससे पहले असंगठित उद्यम क्षेत्र से संबंधित राष्ट्रीय आयोग ने कहा था कि 83.7 करोड़ लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम कमाते हैं. निश्चित तौर पर 20 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो सकती. दूसरे शब्दों में देश की 77 प्रतिशत आबादी भुखमरी की शिकार है और किसी तरह खुद को जिंदा बचाए हुए है.

एनएसएसओ रिपोर्ट में इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि 1991 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के बाद से खाद्यान्न उपभोग में निरंतर गिरावट हो रही है. न ही अंडों, फल-सब्जियों और दूध की खपत में ही वृद्धि हो रही है. मतलब साफ है कि भुखमरी में निरंतर वृद्धि हो रही है और इसका दायरा अधिकाधिक व्यापक होता जा रहा है. अब तक यह धारणा प्रचलित थी कि खाने की आदतें बदलने के कारण लोग अधिक पौष्टिक खाद्य पदार्थो, जैसे फल, सब्जियों और दूध का उपभोग बढ़ा रहे हैं. यह अनुमान भी मिथ्या सिद्ध हो चुका है.

खाद्यान्न उपभोग कमोबेश शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में गिरता जा रहा है, किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी गिरावट अधिक तेज है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति माह प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपभोग 1993-94 में 13.4 किलोग्राम से घटकर 2006-07 में 11.7 किलोग्राम रह गया. 2004 से 2007 के बीच गिरावट अधिक रही.

इन तीन वर्षो के दौरान ही खाद्यान्न उपभोग 12.1 से घट कर 11.7 किलोग्राम रह गया. शहरी क्षेत्रों में खाद्यान्न खपत 1993-94 में 10.6 किलोग्राम से गिरकर 2006-07 में 9.6 किलोग्राम रह गई. मुख्यत: शाकाहार पर निर्भर समाज में खाद्यान्न ही पोषण का सबसे बड़ा एकल स्त्रोत है. इसलिए भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसका महत्व सुस्पष्ट है. वैसे यह भी असली तस्वीर नहीं है.

एनएसएसओ के सर्वेक्षण में 2007-08 का काल शामिल नहीं किया गया है. इस दौरान विश्व ने वैश्विक खाद्य पदार्थो की कीमत में अभूतपूर्व वृद्धि देखी. किसी भी सूरत में औसत घरेलू बजट में से भोजन की मद में खर्च होने वाली राशि का अनुपात बढ़ा है, किंतु इसके बावजूद पहले जितना भी भोजन नहीं मिल पा रहा है.

इसका तात्पर्य है कि जैसे-जैसे खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि होती है, गरीबों को पेट भरना मुश्किल हो जाता है. कीमतों में हालिया वृद्धि ने गरीबों के खाने पर लात ही मार दी है. 2007-08 में खाद्यान्न उपभोग और गिरने की आशंका है. सहज कल्पना की जा सकती है कि गरीबों और भूखों पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा?

सर्वविदित है कि भारत विपन्नता और नैराश्य के दलदल तेजी से धंस रहा है. इस यथार्थ की अनदेखी करके कि आर्थिक वृद्धि स्वत: मानव विकास में तब्दील नहीं होती, अब तक के तमाम प्रधानमंत्री कहते आए हैं कि बाजार में खुलेपन से विदेशी निवेश आकर्षित होता है, जिससे विकास में वृद्धि होती है.

यह दु:खद है कि भारत जैसे देश के लिए जरूरी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था की समझ के अभाव में हमारी आर्थिक नीतियां सकल घरेलू उत्पाद तक सिमट कर रह गई हैं. हम ऐसे रास्ते पर बढ़े चले जा रहे हैं जो जबरदस्त गरीबी और लाइलाज कुपोषण की ओर ले जाता है.

हमें गलत सिखाया गया था कि सकल घरेलू उत्पादन की परवाह करनी चाहिए, क्योंकि यह स्वत: गरीबी की परवाह करता है. हमें इसे उलट देना चाहिए.


क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि इस प्रकार के अति अमानवीय हालात की चिंता विकास संबंधी नीतियों में जरा भी नहीं झलकती. इसका मतलब है कि हमारे आर्थिक विकास के ढांचे में कुछ बुनियादी गड़बड़ियां हैं. भारत के 36 अरबपतियों की संपदा कुल सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई है.

बड़ी सफाई के साथ आंकड़ों में देश के 83.7 करोड़ लोगों की गरीबी और मलिनता छिपा ली जाती है. अगर हम वैश्विक भूख सूचकांक को भी स्वीकार करें तो देश के बीस करोड़ लोगों का चेहरा विकास के नक्शे में खो जाता है.

यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट में महबूब अल हक ने कहा था, ''हमें गलत सिखाया गया था कि सकल घरेलू उत्पादन की परवाह करनी चाहिए, क्योंकि यह स्वत: गरीबी की परवाह करता है. हमें इसे उलट देना चाहिए. हमें गरीबी की परवाह करनी चाहिए और यह स्वत: ही सकल घरेलू उत्पादन की परवाह करेगी.''

पाकिस्तान के वित मंत्री के रूप में उन्होंने छठे दशक में सकल घरेलू उत्पादन सात फीसदी तक बढ़ा दिया था. उन्होंने स्वीकार किया कि इससे उनकी आंखें खुल गई और उन्हें महसूस हुआ कि आर्थिक विकास मानव विकास नहीं है. क्या इसका कोई अल्पकालिक समाधान है?

हां, बिल्कुल है, अगर छत्तीसगढ़ के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने जो वायदे किए हैं उन्हें सरकारी एजेंडे में शामिल कर लिया जाए. कांग्रेस ने दो रुपये प्रति किलोग्राम की दर से चावल आपूर्ति करने का वायदा किया है. भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए 34 लाख गरीब परिवारों में से 12 लाख परिवारों को एक रुपये और शेष चिह्निंत गरीबों को दो रुपये प्रति किलो की दर से मुख्य खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी है. इस योजना को लागू करने में कितनी भी आर्थिक लागत बढ़े, इसे समग्र राष्ट्र में लागू किए जाने की जरूरत है. भूखे लोगों को तुरंत भोजन की जरूरत है, न कि आर्थिक विकास के माध्यम से गरीबी दूर करने के वायदों की.
 

21.11.2008, 14.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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भोला प्रसाद भगत (bholabhagat@hotmail.com) सत्यम कुटीर, काली ताजिया रोड,दिलावरपुर, मुंगेर-811201

 
 आपने भारत में सुरसा के मुख की तरह बढ़ती हुयी भुखमरी एवं गरीबी का जो जीवन्त चित्र खींचा है,वह हम भारतीयों के लिए कंलक है । सरकारी आँकङें और वादे एवं किए जा रहे उपाय वास्तविकता से बिल्कुल परे है ।
समस्या का स्थायी समाधान गरीबो के लिए केवल 2/- किलो अनाज बेच कर संभव नहीं।
इसके लिए मेरे समझ में निम्नलिखित राष्ट्रव्यापी कदम उठाने की अनिवार्य आवश्यकता है-
1. पश्चिम की अंधाधुंध नकल छोङ कर अपने पूर्वजों के उन्नत एवं वैज्ञानिक जैव कृषि प्रणाली एवं पशु पालन को अविलम्ब अपनाना होगा ।
2. समाजिक कुरीतियों एवं शोषण के खिलाफ कानून बनाकर उसका सही ढंग से अनुपालन सुनिश्चित करना होगा ।
3. व्याप्त भ्रष्टाचार को जङ मूल से मिटाना होगा ।
4. बापू के द्वारा बताए गए स्वदेशी गृह एवं लघु उद्योग को घर-घर में फैलाना होगा ।
5. संविधान में परिवर्तन/संशोधन कर दलगत राजनीति को तत्काल बंद करना होगा । जात-पात,लिंग,धर्म आदि के भेद-भाव किए बिना संसद या विधान सभाओं एवं स्थानीय नगरपालिकाओं / पंचायतों के लिए केवल वही भारतीय नागरिक प्रत्याशी हो पाएंगे जो चरित्रवान, सेवा के प्रति निष्ठावान और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ रहे हों । जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद भी यदि वे यदि कोई अनैतिक या समाज/देश विरोधी काम करते हों तो, तुरन्त उन्हे पदच्युत करने एवं दण्डित करने का कानूनी प्रावधान हो ।
6. न्यायपालिका भी स्वच्छ, मानवता के प्रति संवेदनशील,एवं द्रुत गति से सामान्य गरीबों के हित में न्याय दिला सके।
7. भारतीय महान संतों की योग और अध्यात्म का हर नागरिक तक पहुँच हो ।
8. प्राइवेट शिक्षा जो र्सिफ शोषण का जरिया एवं अमीरों के लिए रह गयी है, उसे समाप्त कर सम्पूर्ण देश में एक रूप उपयोगी एवं सकारात्मक केन्द्रीय सरकारी शिक्षा सभी बच्चो को राष्ट्रभाषा हिन्दी में भी सुलभ हो ।
9. सभी को रहने के लिए अपना घर और आजीविका के लिए रोजगार की व्यवस्था हो ।
10. समाज का शोषण कर रही/अंधविश्वास/नफरत/हिंसा फैला रही सभी प्रकार की संस्थाओं/कंपनियों आदि पर तुरन्त रोक लगे ।
यदि ऊपयुक्त दिशा में सरकार और समाज मिलकर निष्ठापूर्वक पहल करे तो वह दिन दूर नहीं कि हम महान भारत बना पाएंगे जहाँ कोई गरीब और पीड़ित नहीं होगा । बापू के सपनों का सच्चा रामराज्य होगा ।
 
   
 

प्रशांत कुमार दुबे (prashantd1977@gmail.com ) भोपाल

 
 देविंदर भाई, इस दशा पर दुष्यंत का एक शेर है,जो मोजूं है

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ |
आजकल दिल्ली मैं है, जेर-ओ-बहस एक मुद्दुआ ||
 
   

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