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जयशंकर प्रसाद काव्य काया | श्याम बिहारी श्यामल
उपन्यास अंश
काव्य काया
जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित प्रकाश्य उपन्यास का अंश
श्याम बिहारी श्यामल
जयशंकर प्रसाद ने झुके-झुके आहिस्ते हाथ बढ़ाया और सधी गति से एक चाल चल दी.
प्रतिद्वन्द्वी कृष्णदेव प्रसाद गौड़ ने दृष्टि उठाकर भौंहें उचकायी और सिर हिलाने
लगे. जवाब में प्रसाद मुस्कुराये और सीधा होते हुए बायें मुड़कर युवक की ओर देखा,
''...हां, बताइए बन्धु! कहां से, कैसे-कैसे आना हुआ ? ''
'' जी, मैं सीतापुर से आया हूं! लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. करना चाहता था किंतु
यह प्रबंध न हो सका इसलिए यहां आ गया... अब यहीं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में
प्रवेश लेना चाह रहा हूं.. ''
'' बैठिये... बैठिये... खड़े क्यों हैं ? क्या पत्थर की इस चौकी पर बैठने में कोई
दिक्कत होगी...''
'' ...ना-ना! ऐसा कतई नहीं... मैं तो इसकी यह नक्काशी और कलात्मकता को देख यों भी
गद्गद हूं... इस पर बैठकर तो मुझे आनन्द की ही उपलब्धि होगी... '' आंखें फैलाये
चौकी को निरखते हुए युवक आहिस्ते कुछ यों बैठने लगा गोया वह इस पर अपना भार न डालने
की कोई जुगत सोच रहा हो.
प्रसाद मुस्कुराये, '' बन्धु, यह पाषाण है... यह पृथ्वी की कोख से पाता है जन्म...
उसकी ममतामयी आत्मा सम्भव बनाती है इसके अस्तित्व को... अपनी करोड़ों वर्षों की
धधकती एकाग्रता और सदाप्रज्ज्वला संकल्प-अग्नि के गर्भ से ! ...तन-मन यदि सजग हों
तो इसका संस्पर्श-मात्र आपके ब्रह्माण्ड-मण्डल में कैसी उन्नत ऊर्जा और कितनी ठोस
दृढ़ता का संचार कर रहा होगा, चाहो तो इसे अनुभूत कर सकते हो! ...''
युवक जैसे चमत्कृत! लगा, जैसे ज्ञानेन्द्रियां पहली बार एक साथ बहुस्तरीय
अनुभव-उपलब्धियों की प्रवहमान धारा से सनसनाती हुई भरने लगी हों. जैसे, अचानक तेज
वर्षा से मानस-वसुन्धरा आप्यायित! आनन्द से आन्दोलित प्रवाहित धारा में थिरकती गेंद
की तरह. ...सचमुच पत्थर की चौकी पर बैठना विरल अनुभव से सम्पन्न करने लगा!
'' क्या है तुम्हारा शुभ नाम ? '' प्रसाद फिर बिसात पर झुक गये.
'' चंद्रप्रकाश सिंह ! ''
उन्होंने थोड़े चकित भाव से तीक्ष्ण दृष्टि उठायी. मुड़कर इस बार गौर से देखा, ''
क्या कुंवर चंद्रपकाश सिंह तुम्हीं हो ? ''
'' जी! '' युवक साश्चर्य पत्थर की नक्काशी को हथेलियों से सहलाता रहा.
प्रसाद ने मुस्कुराते हुए फिर बिसात पर ध्यान गड़ाया. कुछ पल सिर हिलाते रहे फिर
जवाबी चाल चल दी. गौड़ खिल उठे. यह देख वे सशंकित हो गये. सजग हो दूसरे ही पल
उन्होंने फिर सिर गोत लिया. निगाह गड़ाते हुए. मननशील मुखमण्डल पर अफसोस की झलक खिंच
गयी. मुंह से स्वमेव जीभ बाहर निकल आयी. उन्होंने जल्दी से अपनी चाल वापस कर ली. इस
पर गौड़ तिलमिला उठे. संयत किंतु तीखे स्वर में प्रतिरोध भी जताया. प्रसाद ने इसे
अमान्य करते हुए इनकार में सस्मित सिर हिलाया, '' आप तो केवल चाल सोच रहे हैं जबकि
मैं इस युवा आगन्तुक से बात भी कर रहा हूं... इसलिए गलती से चली हुई चाल को तो मैं
वापस ले ही लूंगा... ''
गौड़ तुनक गये, '' यह आपकी काव्य-सर्जना का मनमाना पृष्ठ नहीं है बाबूसाहब ...कि जब
चाहा पीछे लौटकर किसी भी पूर्वलिखित वाक्य को छू-छेड़ लिया... यह बिसात है! यहां बढ़ा
हुआ कदम पीछे नहीं लौटता! आपकी यह चाल-वापसी की चाल नहीं चलेगी! ...नो! नेवर! इट
कैन नेवर जस्टीफाई! ''
प्रसाद उसी तरह इनकारी मुद्रा में सिर हिलाते रहे, '' गौड़ जी, आप अपने मन में रंज
ला रहे हैं तो लाते रहें... यह शतरंज है इसमें ऐसे-ऐसे शत-शत; सौ-सौध्द रंज भी आप
मन में उगाते और बाहर उगलते रहें तब भी मैं आपके इस मन:रंज को मनोरंजन ही मानता
चलूंगा... ''
वाक्य पूरा होते-होते ही गौड़ के चेहरे का रंज भंग हो गया. वे ठठा कर हंसने लगे.
हंसते गए, हंसते गए. मुस्कुराते हुए प्रसाद कभी उन्हें तो कभी आगन्तुक को ताकते
रहे. गौड़ ने कहा, '' मान गया महाकवि! आप शतरंज को नहीं खेल रहे बल्कि शतरंज ही आपसे
अठखेल कर रहा है... यहां मैं आपसे दो कदम आगे और एक कदम पीछे की चालों का नया छंद
सीख रहा हूं... ''
प्रसाद फिर आगन्तुक की ओर उन्मुख हुए, '' ...युवा मित्र, हाल के दिनों में विभिन्न
पत्रिकाओं में मैंने तुम्हारी कई सशक्त कविताएं पढ़ी हैं... ''
चंद्रप्रकाश संकोच से भीग गया. प्रसाद ने आंखें मूंद ली. कुछ क्षण यों ही मननशील
रहे. आंखें खोली तो दृष्टि में विशिष्ट गाम्भीर्य-भाव मुखर हो उठा, ''...तुम्हारी
रचनाओं में जीवंतता है! बड़ी बात यह कि तुम अभी छात्र हो और अभी से ऐसे रसीले-गठीले
गीत रच रहे हो! यह तो बहुत अच्छी बात है! सच मानो, तुम्हारे कुछ गीत पढ़कर तो मन
तृप्त हो उठा... बहुत प्रमुखता से तुम्हारे गीत 'माधुरी' व 'सुधा' आदि में स्थान भी
पा रहे हैं... कुछ तो मुखपृष्ठ पर भी छपे हैं.. ''
चंद्रप्रकाश हिम-खण्ड की तरह पिघलता रहा. बिसात पर झुका हुआ गौड़ का एकाग्र मौन फिर
ललकारने लगा तो प्रसाद फिर जूझने लगे. मौन के पंख फैलते चले गए. दोनों सिर गोते
रहे. कुछ ही पल बाद दोनों ने ऐसा ठहाका फोड़ा कि मौन एक झटके से हवा हो गया. प्रसाद
का वजीर कट चुका था. हंसते हुए वे गौड़ की पीठ ठोंकने लगे, '' वाह भई! आपने तो मेरे
मंत्री को गिरा कर ही दम लिया... चलिए, राजा का हश्र अब तय हो गया इसलिए अब यहीं
विराम! ''
'' अरे नहीं... शतरंज में कभी भी चाल पलट जाती है... आप ऐन क्लाइमेक्स में ही ऐसा
कैसे कर सकते हैं...''
'' हां... वो तो हैं किंतु चलिये, हम यह मान लेते हैं कि आप ने दांव मार लिया!
इसलिए ...फिलहाल इतना ही रहने दें ...फिर बाद में खेलेंगे! मैं अब जरा अपने अतिथि
को ठीक से उपलब्ध हो लूं...'' प्रसाद ने दृढ़ता से कहा.
गौड़ मुस्कुराये, '' साधारण वजीर भला आपके किस काम का था ही? आपको तो भृत्य भी
चेखुरा जैसा हाजिरजवाब और क्रांतिकारी चाहिए... ऐसे में आपका मंत्री तो ऐरा-गैरा
चलेगा नहीं... हंस का मंत्री भला कौआ कैसे हो सकता है! आपको तो एकदम अनूठा-अनोखा
मंत्री ही चाहिए न... इसलिए इस अटकु-लटकु वजीर का शहीद हो जाना ही अच्छा रहा...''
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प्रसाद चंद्रप्रकाश की ओर मुड़े, ''...मित्र, सीधा परिचय तो आज हो रहा है किंतु एक
दिन तो तुम्हारे पिताजी तुम्हें खोजते हुए यहां आ चुके हैं... उनके हाथ में मेरे
नाम निराला जी का पत्र था... मैं तो उस समय हतप्रभ रह गया... जटिल समस्या यह
प्रस्तुत हुई कि तुमसे मेरी कोई सीधी भेंट थी नहीं और मुझी से वे तुम्हारे यहां से
गायब हो जाने के बारे में पूछ रहे थे... मेरे लिए चिंताजनक यह कि मुझे इस प्रश्न का
उत्तर एक परेशान पिता को देना था... मैंने बहुत सोच-समझकर सावधानीपूर्वक बात की और
उन्हें यह महसूस ही नहीं होने दिया कि मैं तुमसे अपरिचित हूं तथा यह भी समझा दिया
कि तुम कहीं किसी आयोजन में चले गए हो और दो-चार दिनों में ही लौटने वाले हो! खैर,
मेरी बातों ने उनकी बेचैनी को कम कर दिया, यह देख मैं बहुत संतुष्ट हुआ. बाद में वे
फिर दुबारा लौटे नहीं तो मैंने यही मान लिया कि तुम सकुशल लौट चुके होगे. वैसे मुझे
अब तो बताओ कि तुम अचानक यहां से चले कहां गए थे ? ''
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प्रसाद बीच में ही बोले, '' अरे, वहां की प्राकृतिक छटा की तो बात ही
अलग है... एक बार मैं भी उसमें जा फंसा था.. उस सुषमा ने मुझे भी अपने
में उलझा लिया था... ''
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चंद्रप्रकाश थोड़ा सकपकाया. वह स्वयं को संभालने लगा, ''...जी, दरअसल, मैं एक साथी
के यहां चला गया था मीरजापुर... वहां बहुत मनमोहक प्राकृतिक छटा मिली...
जीते-जागते-से सांस लेते जंगल-पहाड़ और गलीचेदार-गुलगुली सप्राण हरियाली... ऊपर
लहराता नीला निस्सीम मस्त-मगन फेनिल गगन... मन तो जैसे वन में रम-सा ही गया था...
नेत्रों से जैसे शीतल तृप्ति का एक सम्पूर्ण निनादित झरना ही हृदय-प्रदेश में
झर्-झर् झर्-झर् उतरता रहा... वहां से हिलने-हटने की इच्छा ही नहीं हो रही थी...''
प्रसाद बीच में ही बोले, '' अरे, वहां की प्राकृतिक छटा की तो बात ही अलग है... एक
बार मैं भी उसमें जा फंसा था.. उस सुषमा ने मुझे भी अपने में उलझा लिया था... ''
'' अच्छा! आपको वहां की प्राकृतिक सुषमा ने उलझा लिया था! क्या तात्पर्य ? ''
'' अब इस पर फिर कभी बातें होंगी! फिलहाल तो तुम्हारी इसी बात को मैं मजबूत कर रहा
हूं कि वहां की प्रकृति किसी को भी बेसुध बना सकती है... ''
'' हां, तो ऐसे में मैं भी भला और क्या करता! विभोर होकर वहीं कई दिनों तक जमा
रहा... इधर पिताजी यहां बनारस आ गए और मुझे नहीं पाया तो घबराकर सीधे इलाहाबाद लौट
गए... मुझे खोजते हुए ही वे श्रध्देय निराला जी के पास जा पहुंचे... जब निराला जी
को पता चला कि मैं लापता हूं तो उन्होंने मन ही मन यह अंदाजा लगा लिया कि अपनी
प्रवृति के अनुसार मैं काशी में अब तक आप से अवश्य परिचित हो चुका होऊंगा, इसलिए
उन्होंने आपके नाम एक पत्र लिखकर उन्हें फिर बनारस वापस कर दिया... खैर, दूसरी बार
जब पिताजी आए और आपसे मिलकर लौट रहे थे ऐन उसी समय रास्ते में ही मेरी उनसे भेंट हो
गयी थी... मैं मीरजापुर से लौट ही रहा था... उनकी हालत देख मुझे अपनी भूल का गहरा
अनुभव हुआ! ...''
प्रसाद बहुत ध्यान से सुनते रहे. चन्द्रप्रकाश ने आगे बताया, ''...यहीं चेतगंज में
मेरे कुटुम्बियों का घर है... वहीं मैं ठहरा हुआ हूं... मुझे मीरजापुर जाने से पहले
इसकी पूरी सूचना अपने कुटुम्बियों को अवश्य दे देनी चाहिए थी... मुझसे यही भूल हुई
कि मैंने उन लोगों को भी कुछ नहीं बताया और अचानक मित्र के साथ मीरजापुर चला
गया...! ...आपको इसमें जो अनावश्यक चिन्ता-परेशानी उठानी पड़ी इसके लिए मैं क्षमा
चाहता हूं..'' कहते हुए उसने दोनों हाथ जोड़ लिए.
प्रसाद मुस्कुराए, '' ...चलो, ठीक है! तुम लापता नहीं हुए और सकुशल लौट आए इसके लिए
तुम्हें ही मेरी बधाई! ...तो, तुम निराला जी के निकट कैसे पहुंचे ? ''
'' इलाहाबाद में इसी तरह उनसे भी मिलने पहुंचा था... उनके हाथ में 'सुधा' का नया
अंक था और उस समय संयोगवश वे मेरा ही गीत पढ़ रहे थे... मैंने पहुंचकर अभिवादन करते
हुए जब अपना नाम बताया तो वे प्रफुल्लित हो आवेग से भर उठे... मुझे गले से लगा लिया
और मुक्तकंठ आशीष देने लगे... बताने लगे कि वे मेरी कई रचनाएं पढ़ चुके हैं और हर
रचना-पाठ के समय उनके मन में मुझे देखने की इच्छा जागती रही... अभी भी वे ऐसा ही
कुछ महसूस कर रहे थे कि ऐन इसी क्षण मैं उपस्थित हो गया... '' चंद्रप्रकाश की वाणी
पर प्रसन्नता की चिकनाई चमक रही थी.
प्रसाद मुस्कुराते रहे. चन्द्रप्रकाश ने आगे बताया, '' ...मैं निराला जी से नियमित
मिलने लगा... उन्होंने मुझे अपनी कई ताजा रचनाओं का प्रथम श्रोता बनाया और एक दिन
अचानक मुझे बिना कुछ पूर्व सूचना दिए कविवर सुमित्रानन्दन पन्त के यहां लेकर पहुंच
गए! ...पन्त चुप-चुप सुनते रहे और निराला जी उन्हें मेरे बारे में ढेरों बातें
बढ़ा-चढ़ाकर बताते रहे... बाद में मैं पन्त जी से भी मिलने पहुंचने लगा ! ...ले-देकर
अब तक मैं आपसे ही न मिल सका था और इसके चलते लंबे समय से भीतर-भीतर स्वयं को
छूंछा-सा महसूस करता रहा हूं... यह तो अच्छा ही हुआ कि लखनऊ विश्वविद्यालय में मेरा
प्रवेश नहीं हो सका और मुझे काशी आने का बहाना मिला... इस तरह आज आपके दर्शन का भी
अविस्मरणीय लाभ अर्जित कर पा रहा हूं... ''
चेखुरा आया और सामने जलपान रखकर चला गया. तस्तरी में मकदल और ताजा तली निमकी.
सोंधाई और मिठास हवा पर तैरने लगीं. प्रसाद ने विनम्रता से तश्तरी की ओर संकेत
किया. चंद्रप्रकाश ने ग्रहण करना शुरू कर दिया.
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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में नामांकन हो गया तो चंद्रप्रकाश ने किराए का एक मकान
ले लिया. दुर्गाकुण्ड से आगे नवाबगंज के मार्ग पर. एक दिन सुबह-सुबह गंगा- स्नान के
लिए ज्योंही दरवाजे से बाहर कदम बढ़ाया, सामने से निराला जी आते दिख गए. चंद्रप्रकाश
सुखद आश्चर्य से भर गया. अपनी ही आंखों पर सहज विश्वास नहीं कि जो कुछ दिखाई पड़ रहा
है वह सोलह आने सच भी हो सकता है! कंधे से लटकता हिलता झोला और तीव्र भंवर की तरह
लपकती आती गतिमान कद्दावर काया. भीतर तक उतरने वाली दृष्टि फैलाये समीप आती बलती
हुई आंखें और हवा से खेलते मुक्तछंद व्यंजित आरोह-अवरोह से भरे दाढ़ी-बाल.
निराला समीप आए. वह अचकचाया-सा मटर-मटर ताकता रहा. उन्होंने हाथ उठाया और उसके सिर
के ऊपर ले जाकर थपकी देने लगे, ''... जो तुम देख रहे हो, यह सच है बेटे! यह मेरा
प्रेत नहीं, तुम्हारे सामने यह स्वयं मैं ही साकार खड़ा हूं... अब चलो, ग्रहण करो...
लो, तुम्हें आशीर्वाद दे रहा हूं ... ''
चंद्रप्रकाश गतिपूर्वक चरणों पर झुक गए. निराला की वाणी मधु बन गयी, ''..चलो हुआ!
मैंने तुम्हें वाग्विरलता और वाग्प्रखरता का आज एक नया आशीर्वाद दिया... ''
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चंद्रप्रकाश ने उनका झोला थाम लिया. उन्हें साथ लिये भीतर चल पड़ा. बरामदे के बाद
पहला कमरा लांघते दोनों बगल के दूसरे कमरे में पहुंच गए. निराला ने अलग कमरे का
प्रबंध होता देख उसके कंधे पर हाथ रखा, ''...यह किसका कमरा है भला ? ''
'' यह पूज्य पिताश्री के लिए है... असल में वे काशी आने का कोई बहाना नहीं चूकते
न... कभी एकादशी, कभी पूर्णिमा तो कभी कोई भी छोटा-बड़ा पर्व-त्योहार... वे विश्वनाथ
दरबार में यहां पहुंचते ही रहते हैं... इसीलिए यह पूरा मकान ही ले रखा है..''
'' अरे बच्चू, मैं तुम्हारे पास इसलिए भी आया हूं कि तुमसे कुछ नियमित विमर्श होता
रहे... यह अलग कमरा और शिष्ट-विशिष्ट सुविधा के लिए नहीं आया... ''
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निराला की आंखें जैसे भीतर तक देख रही हों. दूसरे ही पल उनके चेहरे पर
एक निर्मल आभा तैर गयी. निराला ने दृष्टि
फेंकी, गंगा लहरा रही थी.
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'' महाकवि, कोई हर्ज नहीं! मैं तो आपकी सेवा में अहर्निश उपलब्ध हूं ही... ''
'' दरअसल, 'गीतिका' और 'निरुपमा' के फर्मे भी चेक करने हैं... अंतिम दौर के
जोड़-घटाव भी तो करने हैं '' निराला मुस्कुराये.
थोड़ी ही देर में दोनों गंगास्नान के लिए निकल गए.
रास्ते में निराला ने पिछले दिनों के बनारस-प्रवास की चर्चा छेड़ दी. वे पिछली बार
पास ही नवाबगंज में वाचस्पति पाठक के यहां ठहरे थे. बताने लगे, '' ...रायकृष्ण दास
के यहां ठहरने पर सुविधाएं तो खूब मिलती हैं किंतु एक बड़ी असुविधा भी पेश होती
है... उनमें मित्र की कोई छवि ही नहीं उभरती! ...बार-बार मुझे वे बाबूसाहब अर्थात्
प्रसाद जी के ही अंतरंग दिखाई पड़ते हैं, इस नाते उनके प्रति संकोच-लिहाज जैसे भाव
ही जेहन में उभरते रहते हैं... ''
चंद्रप्रकाश हां-हूं करते चल रहे थे. निराला बोलते जा रहे थे,''...पिछली बार
वाचस्पति पाठक के यहां रूका था... उनके साथ एक अलग समस्या है... उन्हें भारती
भण्डार की व्यवस्था संभालते हुए कुछ अधिक ही ज्ञान-लाभ हो चुका है...जब देखो तब
लेखकों की इंटरनल पॉलिटिक्स बतियाने लगते हैं... कभी मैथिलीशरण और बाबूसाहब में मेल
कराने की बात लेकर बैठ जाते हैं तो कभी दुलारेलाल भार्गव की प्रकाशन-रणनीति की काट
खोजने लगते हैं... ''
इस पर चंद्रप्रकाश ठठा पड़ा. बोलते हुए तेज डग भर रहे निराला सड़क के दोनों ओर ध्यान
से ताकते भी चल रहे थे. कुछ इस तरह जैसे साथ-साथ चल रहे घर-मकान, पेड़-पौधे,
जमीन-हवा... सबसे वे मन ही मन समानान्तर मानसिक संवाद जोड़ते चल रहे हों. वे
मुस्कुराते हुए आगे बोले, '' दिक्कत यह कि आज के समय में हर कोई अपनी ही अदा और
अंदाज में सबको घसीट लेना चाहता है... ''
चंद्रप्रकाश ने चलते हुए गति थोड़ी धीमी की और उनकी ओर गौर से देखा. वे भी धीमे हो
चुके थे, '' ...भई, ऐसी बातों से मन भिन्ना कर रह जाता है... ''
निराला की आंखें जैसे भीतर तक देख रही हों. चंद्रप्रकाश ने सिर को स्वीकार में
हिलाया. दूसरे ही पल उनके चेहरे पर एक निर्मल आभा तैर गयी, उन्होंने सामने की ओर
संकेत किया. निराला ने दृष्टि फेंकी, गंगा लहरा रही थी.
वे घाट के पास आ चुके थे. निराला की भाव-मुद्रा तुरन्त तनाव-मुक्त. अब यह तरंगायित
हो उठी, '' चंद्रप्रकाश! देखो न, काशी में यहां गंगा की छटा कुछ खास ललकारने वाली
लग रही है... यह चांद जैसी कोण-कटान और तीव्र आंदोलित धारा की उग्र
श्यामा-मुद्रा... ''
चंद्रप्रकाश कई सप्ताह से लगातार ऐन यहीं इसी घाट पर पहुंचकर स्नान करता रहा है
किंतु आज निराला की टिप्पणी के आलोक में सचमुच गंगा का यह रूप एकदम अनदेखा और
सर्वथा नया-नया-सा लगने लगा. वह मन ही मन मनन-विश्लेषण में डूबा रहा. कपड़े कम करने
के बाद निराला घाट से नीचे उतरे. छाती भर पानी में पहुंचकर उत्साह व आवेग से भर
उठे, '' बच्चू, उस पार रामनगर है... वह देखो, वहां उधर काशी-नरेश का किला दिख रहा
है... कहो तो, मैं तैरकर उस पार चला जाऊं... मुश्किल से एक-डेढ़ घंटे में लौट भी
आऊंगा... ''
निराला की आवाज जल पर फैले गाज-फेन और खेलते भंवर से टकराकर घिरनी की तरह नाचती हुई
पहुंची. चंद्रप्रकाश का मन चक्करघिन्नी बनकर बेचैन हो उठा. वह घबराहट से भर उठा.
लगभग चिल्लाकर हांक लगायी, '' ना बाबा ना! एकदम नहीं! मैं आपसे यह विचार तत्काल
त्यागने की करवध्द प्रार्थना कर रहा हूं... आप ऐसी बात अब अगर दुबारा महज उच्चरित
भी करेंगे तो मैं अब स्नान तक नहीं करूंगा... यहां आना भी आज के बाद सदा-सदा के लिए
बंद कर दूंगा... ''
निराला ने चुपचाप डुबकी लगायी- छपाक्! घंटाध्वनि-सी घाट की तीक्ष्ण कनकनी हवा खुले
शरीर के रोम-रोम को झंकृत कर रही थी. चंद्रप्रकाश सिहरता रहा. उसने ससंशय दृष्टि
गड़ाये रखी. कुछ ही पल बाद निराला ने जल में यथास्थान सिर ऊपर निकाला तो जान में जान
आयी. बालों को झटकारते-झाड़ते हुए निराला तेज स्वर में बोले, '' ...चलो, हो गया!
तुम्हारी ही बात मान ली, नहीं जाऊंगा उस पार! तुम भी तो मेरे एक और गार्जियन हो गए
हो यार... लगता है काशी मेरी गार्जियन-भूमि ही होकर रह गयी है... जो अग्रज हैं सो
तो कदम-कदम पर लठ लिए आगे खड़े ही दिखते हैं, जो अनुज गण हैं वे भी पीछे नहीं ...
उधर एक विनोदशंकर व्यास है जिसे मेरे खान-पान पर लगाम कसने के अलावा दूसरा कोई काम
नहीं सूझता... इसी कारण मानमंदिर के उसके घर में ठहरना मैंने छोड़ा और इधर एक तुम हो
जो मेरे गंगा में तैरने तक को बैन कर रहे हो... मन को विचरण के लिए खुला छोड़ने की
राह में यहां बाबूसाहब और रायसाहब तो ऐलानिया रोड़े हैं ही... अग्रजों को प्राप्त
अधिकार तो प्रकृतिप्रदत है लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा कि अनुज गण भला किस हक से
लगाम कस रहे हैं... ''
पानी से निकल निराला ऊपर आए. अंगोछे से देह पोंछने के बाद वे वस्त्र बदलने लगे.
चंद्रप्रकाश आहिस्ता बढ़ा और पानी में उतर गया. वह घाट के समीप ही ठेहुने भर पानी
में रूका और हाथों से जल उछालकर अपनी देह भिंगोने-धोने लगा. निराला की दृष्टि जा
पड़ी. उसे कम पानी में नहाता देख पहले तो वे चौंके फिर गरज पड़े, '' यार,
चंद्रप्रकाश! इतने भी कायर न बनो... लानत है, ठाकुर होकर इस तरह काग-स्नान कर रहे
हो! छि: छि:! वेरी सैड! ''
चंद्रप्रकाश एक साथ संकोच व अपराध-बोध से भर उठा. झेंपते हुए सप्रयास मुस्कुराया
जिसे देख निराला ने प्रतिवादी आवेग छलकाया, '' ...यार, यह ठीक नहीं है!... सिंह हो,
कम से कम शेर का प्राथमिक गुण तो न भूल जाओ... छाती भर पानी में तो आगे बढ़ ही जाओ!
''
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चंद्रप्रकाश ने किसी दक्ष तैराक की तरह सधी हुई छलांग लगा दी. छपाक् की तेज आवाज
हुई. हवा में पल्टा खाकर वह जल के तल पर गिरा और तैरने लगा. ठीक समुद्री मछली की
तरह. निराला ने ताली पीटी, '' हां! वेरी गुड! नाइस!! वाह... वाह ! तभी तो मैं कहूं
कि मेरी पसंद आखिर गलत कैसे निकल सकती है... मेरा पसंदीदा युवा कवि भला इतना
भय-भिंचित कैसे हो सकता है... ''
जल पर कुछ ही पैंतरे दिखाने के बाद चंद्रप्रकाश तैरता हुआ घाट की ओर लौट आया.
जल्दी-जल्दी देह-हाथ रगड़ने और नहाने लगा. कुछ ही देर में वह भी ऊपर आ गया. निराला
गद्गद्. परम प्रसन्न नेत्रों में परिपाक प्रशंसा. वाणी में ओज के अग्नि- कण तैरने
लगे, '' ...मर-मर कर जीने वाला व्यक्ति जीवन की मर्यादा को कभी गर्वीली ऊंचाइयां
नहीं दे सकता! ...जो मृत्यु को मुंह नहीं चिढ़ा सकता उसकी जिन्दगी का मूल स्वर तो
गिड़गिड़ाहट ही हो सकती है, इससे अलग कुछ और नहीं! ...और गिड़गिड़ाहट... हुंह! यह
संघर्ष-विमुख बनाने के अलावा और भला कर ही क्या सकती है! ...और संघर्ष-विमुखता तो
लिजलिजी समझौता-परस्ती ही सिखायेगी न! ''
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काशी में रहूं और एक-दो दिन पर
भी बाबूसाहब से न मिलूं, ऐसा कैसे हो सकता है... निराला ने तख्ती हटाकर
नीचे रखी और पास के कागज-पत्तर समेटने लगे.
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साथ-साथ लौट रहे चंद्रप्रकाश ने कृतज्ञता व्यक्त की, '' महाकवि, आज आपने मुझे यह
बोध करा दिया कि आपके जिन हाव-भावों को लोग अक्सर त्वरित क्षणिक आवेग समझ लेते हैं,
वे वस्तुत: न आकस्मिक भावोच्छवास हैं न कोई अनजानी भूल-गलती... बल्कि ये तो आपकी
सुविचारित कार्रवाइयां हैं और जीवन-संघर्ष की दुर्लभ रणनीतियां भी... ''
निराला ने चलते-चलते पीठ ठोंकी, ''...अब सविस्तार व्याख्या-विश्लेषण के
अंधे-बंधे-धंधे में न जुट जाओ! नंददुलारे वाजपेयी को बेरोजगार बना देना चाहते हो
क्या! तुम आलोचक-समालोचक न बनो, दिमाग ठंडा रखो ...आदमी की तरह साथ चलो... ''
चंद्रप्रकाश झेंप गया. निराला ने ठहाका लगाया. काशी का आकाश अक्षर शब्द-शक्तियों की
विद्युत तरंग और प्रवहमान काव्य की अनन्त अंतराओं से रंजित हो उठा.
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उस दिन विश्वविद्यालय से चंद्रप्रकाश कुछ जल्दी लौटा. निराला अपने कमरे में चौकी पर
पाल्थी जमाये जमे थे. अपने उठे हुए मुड़े ठेहुने को मेज की तरह इस्तेमाल करते तख्ती
रखे, सिर गड़ाये प्रूफ देखने में तल्लीन. इसके बावजूद जरा-सी आहट पर सिर उठाकर देखा.
मुस्कुराये, '' क्या बात है युवा मित्र, बहुत पहले चले आए ? कहीं किसी से कोई
टंटा-वंटा तो नहीं कर आये हो ? ''
'' नहीं...नहीं ! कल आप ही ने तो बताया था कि आप आज शाम गोवर्ध्दनसराय की ओर
निकलेंगे ... ''
'' हां... हां! यार, काशी में रहूं और एक-दो दिन पर भी बाबूसाहब से न मिलूं, ऐसा
कैसे हो सकता है... मन हो तो चले चलो तुम भी... '' उन्होंने तख्ती हटाकर नीचे रखी
और पास के कागज-पत्तर समेटने लगे. चश्मा उतारा और चौकी से नीचे आ गए.
'' हां...हां ! मैं भी चलूंगा ! इसीलिए तो विश्वविद्यालय से सरपट भागता हुआ आ रहा
हूं... रास्ते में कहीं जरा-भी नहीं ठहरा, सीधे यहीं आकर रूका हूं...देखिये न, एकदम
पसीने-पसीने हो गया हूं...'' चंद्रप्रकाश कुर्सी पर थसक कर बैठा था. कुछ यों जैसे
वह चुहचुहायी थकान को विसर्जित करने और नये प्रस्थान के लिए ऊर्जा संचय में जुट गया
हो.
निराला ने दृष्टि उठायी. सिर से गर्दन तक चमकती बूंदें देख होंठ उचकाकर मुस्कुराए.
चंद्रप्रकाश की आवाज में सांगीतिक कोमलता थी, '' ...मुझे तो प्रसाद जी के निकट
बैठने पर अद्भुत अनुभूति होती है... उन्हें देखना, उनकी दृष्टि का साक्षात्
संस्पर्श पाना और उनकी वाणी को सुनना सचमुच गहन तृप्ति का अनुभव देते हैं ! ...हवा
पर जब उनकी वाग्मिता सन्निकट तैरती है तो लगता है जैसे बिल्कुल पास ही ज्ञान और
अनुभूति की महागंगा प्रवाहित हो रही है... ''
निराला ने बहुत गंभीरता के साथ आंखें फैलायी, '' ...ठीक कहते हो! बाबूसाहब वस्तुत:
एक विशिष्ट उपस्थिति हैं... उनका मन हमेशा किसी न किसी बीहड़-बियाबान को रौंदता बढ़ता
रहता है... मस्तिष्क हर क्षण किसी न किसी उत्खनन में उद्यमरत... मैं तो स्वयं
उन्हें निकट से देखने के बाद लगातार अभिभूत होता रहता हूं... उनका गाम्भीर्य
मनन-मंथन के लिए उकसाता है, उनकी मुस्कान प्रेम के मंत्र फूंकती है... उनका अध्ययन
पलक झपकते युग-युगांतरों की यात्रा करा देता है... ''
चंद्रप्रकाश चकित भाव से सुनता रहा. वे रूके तो उसने जिज्ञासा का घना जाल फैलाया,
'' महाकवि, स्वयं आप भी उनसे इतने प्रभावित हैं ? ''
'' हां, क्यों नहीं ? क्या तुम मुझे इतना भी समझदार और विवेकी नहीं मानते! ''
'' नहीं ! नहीं!! मेरा तात्पर्य तो सिर्फ यही कि आखिर आप स्वयं महाकवि हैं... ''
'' ...लेकिन अंतत: महाकवि प्रसाद का ही तो अनुज हूं... ''
दोनों बाहर आ गए. कदम बढ़ते चले गए.
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बाबूसाहब के पास दोनों जमे थे. निराला ने बहुत संयत स्वर में अपनी बात शुरू की थी,
'' ...मेरा तो कभी अपनी किसी रचना से मन ही नहीं भर पाता... हमेशा हर रचना अधूरी
लगती है... 'गीतिका' और 'निरुपमा' के फर्मे देख रहा था... दोनों की लगभग हर पंक्ति
में कुछ न कुछ कलम लग ही गयी... इसीलिए भारती भण्डार वाले मुझसे मुंह फुलाये रहते
हैं... तीसरी बार प्रूफ देख रहा हूं तब भी कट-कूट उसी तरह जारी है जैसे पहले प्रूफ
के समय हुई थी...''
'' अधूरेपन का यही गहरा बोध तो प्रत्येक आगामी रचना की भूमि गढ़ता है! ..हर कला का
जन्म अधूरेपन की ऐसी ही पूर्ववर्ती दग्ध अनुभूति से होता है... मुझे तो यही लगता है
कि अतृप्तियां और अपूर्णताएं ही गति उत्पन्न करती हैं जबकि संतृप्ति और पूर्णता गति
की सांस तोड़ देती हैं... पूर्णता सम्भवत: मोक्ष जैसी ही कोई दशा है... अब यही संयोग
देख लीजिये न, जीवन जब पूर्ण हो जाता है तो यही दशा मृत्यु कहलाती है... '' बोलते
हुए प्रसाद की मुद्रा गुरु-गंभीर बनी रही. सभी चुप. कुछ ही देर बाद वे आगे बोले, ''
...लेकिन बहुत अधिक प्रूफ-युध्द नहीं चलाइयेगा... भारती भण्डार चाहे भले रायकृष्ण
दास का संस्थान हो, प्रकाशन का प्रबंधन एक-एक पैसा दांत से पकड़ता है... वाचस्पति
पाठक अभी लिहाज कर रहे होंगे, लेकिन बाद में कभी भी वे अपना रंग दिखा सकते हैं...
तब अप्रिय स्थिति बन जायेगी.. ''
निराला की वाणी में ताप उतर आया, '' ...अब उनकी बचत के लिए अपनी रचना के कील-कांटे
तो ढीली नहीं ही छोड़ दूंगा... इसमें ज्यादा मुसीबत महसूस हुई तो अपनी पांडुलिपियां
वापस ले लूंगा... यों भी भारती भण्डार के प्रति हमारा झुकाव सिर्फ आपके कारण है,
दूसरी कोई वजह नहीं... जब कभी इस प्रकाशन का नाम आता है तो जेहन में एक ही बात आती
है कि इसे आखिर आप जैसे हमारे अग्रज ने शुरू करवाया है... अन्यथा अब तो कई प्रकाशक
हैं जो एक-एक पाण्डुलिपि के लिए कई-कई परिक्रमा करने के लिए तैयार बैठे हैं... आखिर
दुलारेलाल भार्गव को गंगा-पुस्तक-माला के लिए स्वयं प्रेमचन्द ने भी अपनी
पाण्डुलिपि दे ही दी है... ''
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प्रसाद मीठा मौन ओढ़े बैठे रहे. निराला की वाणी-विदग्धता गूंजती रही, ''...प्रकाशन
की एक सहज दुनिया गढ़ना अभी बाकी है... हिन्दी संसार में यह कमी अब तीक्ष्ण्ता से
महसूस की जा रही है... इसमें आपकी ओर से कुछ और पहल होनी चाहिए... रायसाहब से भारती
भण्डार शुरू कराकर आपने इस दिशा में बड़ी भूमिका निभायी है किंतु वे भी अंतत:
व्यवसायी नहीं हैं... कहां उनका चांदनी जैसा शीतल कला-प्रेम और कहां प्रकाशन
व्यवसाय का यह शुष्क-खुश्क प्रतप्त प्रक्षेत्र... ऐसे में बात भला कैसे बन सकती है!
इसलिए व्यवस्थापन वाले जो-जो खेल चाह रहे हैं वह सब आराम से चला ही ले रहे हैं...
''
चेखुरा ने आकर कुछ लोगों के आने की सूचना दी. प्रसाद कुछ कहते इससे पहले निराला उठे
और जिज्ञासा छलकाते गेट की ओर लपक गए. थोड़ी ही देर में वे बालकृष्ण शर्मा नवीन,
केशव प्रसाद मिश्र, विनोदशंकर व्यास और रायकृष्ण दास को साथ लिए-दिए हंसते-बतियाते
लौटे.
नवीन लपककर प्रसाद से गले मिल गए. सबने स्थान ग्रहण किया. सभी चेहरों पर मुस्कान के
कतरे. प्रसाद ने व्यास की ओर देखकर उलाहना दी, '' क्यों, भई! आप साथ में थे तब भी
आने के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ गयी! ''
|
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प्रसाद की आंखों में बिजली जैसी
चमक आ गयी- देखिये मित्र, मेरा मानना है कि पुरखों के सुख-दु:ख हमारे
अंतर्मन को ज्यादा गतिपूर्वक रौंदते हैं...
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व्यास झेंप गए. सभी मुस्कुराने लगे. नवीन ने विनम्रता से कहा, '' ...भाई साहब, मैं
आपके पास एक स्वार्थ से आया हूं... ''
'' आप नि:संकोच आदेश तो करें... ''
'' मेरी यह प्रार्थना है कि अब आप इतिहास की खाई से बाहर निकलिए... अब तक बहुत
उत्खनन हो चुका... अब आपको सीधे-सीधे अपने युग और समकालीन जन से संवाद बनाना
चाहिए... यह देश अब स्वतंत्रता के लिए कसमसा रहा है... इसे अब आप जैसे चिन्तकों का
प्रत्यक्ष नेतृत्व चाहिए... ''
'' क्या करें, कैसे इतिहास की खाई से बाहर निकल आयें... इसी में तो हमारा प्राचीन
गौरवशाली अतीत धंसा पड़ा हुआ है... जिससे हमारा आज का समाज अनभिज्ञ है और गुलामी की
मार से बेहाल सिर झुकाये कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह फंसा गोल-गोल घूम रहा
है... विदेशी हमलावरों ने यहां के एक-एक जन में कुंठा व हीनता के भाव ठसाठस भर दिये
हैं ! इस कुंठा व हीनता के भाव को आखिर हमें ही तो मिटाना है... यह काम आखिर हम
अपने इसी प्राचीन गर्वोन्नत इतिहास के माध्यम से ही तो पूरा कर सकते हैं ! बेशक इसी
के माध्यम से हम अपने हतगौरव समाज में आत्मगौरव और स्वाभिमान की आग्नेय भावनाएं भर
सकेंगे... इसी से अंतत: हमारे समाज में जुझारुपन भर सकेगा ! '' प्रसाद ने बोलते हुए
सब पर एक-एक दृष्टि डाली.
निराला 'माधुरी' के पन्ने पलटने में मशगूल. उन्हें जैसे यहां चल रही बातें जरा भी
नहीं छू पा रही हों. चेखुरा ने आकर परात को तख्त पर रखा. वातावरण पर ताजा मकदल और
गर्म हलवे की नवजात सुगंध तैरने लगी. प्रसाद के विनम्र आग्रह-संकेत पर एक-एककर सबके
हाथ बढ़ने लगे.
मुंह चलाते हुए नवीन विनम्रता से मुस्कुराये, '' आप कृपया अन्यथा न लें... मैंने
अपने विचार इसीलिए आपको खोलकर बताये कि आप इस सवाल पर कम से कम एक बार अवश्य
सोचें... ''
प्रसाद की आंखों में बिजली जैसी चमक आ गयी, '' ...देखिये मित्र, मेरा मानना है कि
पुरखों के सुख-दु:ख हमारे अंतर्मन को ज्यादा गतिपूर्वक रौंदते हैं... पूर्वजों के
बारे में सोचते हुए व्यक्ति की संवेदनशीलता ज्यादा प्रखर हो जाती है ...ऐसे में वह
कभी भी कहीं भी कोई बड़ा कदम उठा सकता है... इसीलिए मैं इतिहास के ऐसे ही प्रसंग
उठाने का समर्थक हूं जो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को एक झटके में जगा-झिंझोड़ दे और
इससे अवगत होकर बच्चा-बच्चा अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने को उठ खड़ा हो. अब
यह काम एक और तरीके से हो सकता है कि इसे लेकर नारेबाजी जैसी चीजें लिखी जायें...
बेशक इसे कम से कम मैं तो साहित्य नहीं ही मान सकता... ''
इसी दौरान पान का एक सुगंधित दौर पूरा हुआ. सभी चुप. प्रसाद उठे, '' मैं जरा भीतर
से आता हूं... अब बाहर की ओर निकला जायेगा न ? ''
व्यास बोले, '' असल में आज की हमारी शाम रायसाहब के नाम है... हमलोग इसी निमित्ता
आपको लेने आए हैं... दरअसल, यहां चल रही उपयोगी चर्चाओं ने अब तक असली बात ही नहीं
होने दी... ''
प्रसाद मुस्कुराये. दास ने तुरंत संशोधन किया, '' ...मेरे नाम नहीं, हम सब लोगों की
ओर से नवीन जी के नाम! यही तो हमारे अतिथि हैं... असल में आज इनकी पसंद के कुछ
विशिष्ट व्यंजन बने हैं... घर से मुझे आदेश हुआ कि इस अवसर पर मैं अपने सखा यानी
तुम्हें और इलाहाबाद से पधारे पंडित निराला को अवश्य आमंत्रित कर लूं... बस इसी के
आलोक में यहां आना हो गया... यह सुखद संयोग ही है कि निराला जी यहीं मिल गए अन्यथा
मुझे दुर्गाकुण्ड की ओर जाना ही पड़ता... ''
प्रसाद प्रसन्नचित भीतर चले गए. निराला ने अचानक सिर उठाया. एक भरपूर शीतल दृष्टि
दास पर डाली. सभी चुप. उन्होंने नवीन की ओर ताका, वे सजग हो गए. दूसरे ही पल निराला
की वाणी में ताप आ गया, '' मुझे एक बात नहीं समझ में आ रही कि आखिर कोई यह कैसे और
क्यों अपेक्षा पालने लगता है कि सारे लेखक एक जैसी दृष्टि से भर जायें और समान
सृष्टि करने लगें! भई, जिसकी जो अन्तर्प्रेरणा होगी, जैसी वैचारिक संरचना रहेगी, वह
वैसा ही सृजन तो करेगा ! क्या सभी रचनाकार एक जैसे ताल-सुर में लिखने लगेंगे तो यह
कोई अच्छी और स्वाभाविक बात मानी जा सकती है? मैं पूछता हूं कि बाग में फूल की एक
ही प्रजाति का बेहिसाब लदा-पसरा होना अच्छा है या बहुविध-बहुरंग और बहुसुगंध
पुष्पों की रंग-बिरंगी क्यारियों की उपलब्धता ? मैं तो कहूंगा कि साहित्य क्षेत्र
के अंधे-बहुधंधे उपदेशकों की ऐसी बेसिर-पैर की बातों की कोई परवाह नहीं की जानी
चाहिए... कम से कम रचनाकारों को तो ऐसे जीवों से पूरी तरह सतर्क ही रहना चाहिए...
उनकी ओर जरा भी ध्यान नहीं देना चाहिए... ''
सबके चेहरों पर जैसे ताप के कण रेंगने लगे. तभी प्रसाद आ गए. वे बाहर निकलने की
तैयारी के साथ निकले थे. धोती-कुर्ता, कंधे पर हल्के कत्थई रंग की मुलायम चादर.
सबको मौन देख उन्होंने धीरे से मुस्कुराकर पूछा, '' ... मेरे न रहने के दौरान अभी
कोई और चर्चा हो गयी क्या! ''
सभी चुप. निराला ससंकोच मुस्कुराए. प्रसाद बोले, ''...लगता है पंडितजी ने कोई
धोबियापाट दे मारा है... ''
सभी हंस पड़े. निराला उठकर बाहर आ गए. पीछे-पीछे सभी चल पड़े. रास्ते में प्रसाद और
दास के पीछे-पीछे सभी चलने लगे.
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रायकृष्ण दास के यहां मंडली जमी. नवीन की पसंदीदा खिचड़ी सबको परोसी गयी. साथ में
आलू का छौंकदार चोखा और कटोरियों में ताजा दही. एक बड़े कटोरे में गरम घी भी आ गया.
हवा पर घी की सोंधाई सबसे तेज फैलने लगी. निराला ने प्रसन्नता से सिर हिलाया, ''
...दही और घी साथ-साथ चलाना होगा क्या ? ''
'' अगर किसी को रूचे तो ग्रहण कर ले, इसमें मेजबान की ओर से भला क्यों कोई मनाही हो
सकती है... '' प्रसाद ने धीरे-धीरे कहा. सभी हल्के-हल्के हंसने लगे.
दास अभी भीतर ही थे. मन ही मन सभी उनके आने का इंतजार करने लगे. तभी नौकर ने आकर
मैथिलीशरण गुप्त के आने की सूचना दी. सबने इस सुखद संयोग पर हर्षध्वनि की. इधर दास
भीतर से निकले और सामने से गुप्त ने प्रवेश किया. दास सुखद आश्चर्य से भरकर पुलकित
हो उठे. लपककर उनका स्वागत किया. गुप्त दूसरे ही पल प्रसाद के सामने आ गए. वे भी उठ
खड़े हुए. दोनों गले मिले. निराला ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े, '' आइये, कविवर !
स्वागत है! बहुत सही समय आपने यहां चरण रखे, आज के व्यंजन के असली प्रतीक-पुरुष तो
आप ही हैं... ''
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प्रसाद ने बाहर निकलकर आकाश की
ओर ताका, '' ...ये बादल तो मूलत: मूर्ख प्रजाति के लग रहे हैं, बीच-बीच
में छींटे मारकर परेशान भर करते रहेंगे.
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सभी हंसने लगे. गुप्त ने झुककर थालियों पर दृष्टि दौड़ायी, ''... वाह, सचमुच मैं सही
समय आ गया हूं... थालियां तो तैयार हैं... कोई विशेष व्यंजन है क्या भई ? ''
'' ...हां, ढेर सारी अच्छी-बुरी चीजें मिलाकर घोलमट्ठा की हुई खिचड़ी ! '' निराला ने
शब्द-शब्द को सहलाकर कहा. सभी हंसने लगे.
गुप्त ने दोनों हाथ जोड़ लिए, ''...मेरे तो कम, यहां की बहुरंगी उपस्थिति का यह
ज्यादा प्रतीक-व्यंजन है... कैसा अच्छा लग रहा है... कवि भी, नाटककार भी,
उपन्यासकार भी और साथ में प्रकाशक और कला-उध्दारक भी... सभी तो यहां एक साथ विराजे
हुए हैं... एकदम खिचड़ी समाज ! ''
दास ने साग्रह हाथ पकड़कर गुप्त को कुर्सी पर बिठाया. नौकर ने लाकर पहले पानी का भरा
गिलास रखा, फिर कुछ क्षण बाद थाली.
सभी कुछ न कुछ टीका-टिप्पणी करते रहे. भोजन के बाद पान का दौर थमा तो गुप्त बोले,
'' ...जयशंकर, इस बार मैं तीन दिनों के लिए ही काशी आया हूं... कल बाबा का दर्शन
करूंगा और इच्छा है कि शाम में तुम्हारे यहां भाभीश्री के हाथ की कचौड़ियों का
प्रसाद ग्रहण कर सकूं... ''
प्रसाद ने छूटते ही कहा, '' केवल कचौड़ियां ही क्यों, कल आप सभी लोगों का मेरे यहां
सर्वांग-पूर्णांक भोजन होगा... ''
सभी प्रसन्न. निराला बोले, '' ...चलिए! मैंने भी काफी समय से भाभीश्री के हाथ की
कचौड़ियों की चर्चा सुन रखी थी... अब इसका स्वाद भी ले ही लूंगा... ''
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आसमान में मेघों का खेल तो मनोरंजक था किंतु उमस ने हालत खराब कर रखी थी. प्रसाद ने
बाहर निकलकर आकाश की ओर ताका, '' ...ये बादल तो मूलत: मूर्ख प्रजाति के लग रहे हैं,
बीच-बीच में छींटे मारकर परेशान भर करते रहेंगे... गर्मी और उमस का तो वे बाल बांका
भी नहीं कर पा रहे...'' सबके चेहरों पर दूब-सी पतली- छरहरी हरी-नुकीली हंसी हिली.
प्रसाद आगे बोले, ''...इस गुमसुम मौसम में बैककखाने के भीतर बैठना तो कष्टकारी
होगा... इसलिए जब तक संभव हो बाहर ही बैठकी जमनी चाहिए... ''
सामने खड़ा चेखुरा मुस्कुराया, '' ...हां! उहे होई कि पानी पड़े लगी तऽ सबके उठ-पठ के
भागे के पड़ीऽ... ''
प्रसाद ने सन्तु को नरियरी बाजार भेजकर आज शाम दुकान पर अपने न आ पाने की सूचना
भिजवा दी. चबूतरे पर पत्थर के कलात्मक आसनों पर आस्तरण बिछने लगे. झुटपुटा होते ही
सबसे पहले निराला के साथ आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, वाचस्पति पाठक और कुंवर
चंद्रप्रकाश सिंह पहुंचे. कुछ ही क्षणों बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य केशव
प्रसाद मिश्र, डा. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा और विनोदशंकर व्यास. निराला ने ज्यों ही
नाम लेकर चर्चा की, उसी क्षण आ गये मैथिलीशरण गुप्त और रायकृष्ण दास. साथ में
चिरगांव से आये मुंशी अजमेरी भी. कृष्णदेव प्रसाद गौड़ और मोहनलाल रस्तोगी भी सूंघते
हुए आ पहुंचे.
प्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा, '' मुझे लगता है यहां उपस्थित समाज में मेरे मित्र
रस्तोगी जी ही ऐसे इकलौते व्यक्ति हैं जो विजातीय यानी अलेखक हैं, केवल इन्हीं का
परिचय देना आवश्यक है... शेष तो प्राय: सभी सबसे अवगत ही हैं...''
गौड़ आहिस्ते टुभके, '' ...परिचय तो आपमें से कई के भी नये सिरे से जारी किये जा
सकते हैं... ''
प्रसाद ने उन्हें संकेत में रोकते हुए कहा, '' ...आपलोगों में जिन्हें गौड़ जी का
सीधा परिचय न हो, वे भी इनके ताजा अंदाज से यह समझ गये होंगे कि... यही जनाब हैं
प्रसिध्द व्यंग्यकार कृष्णदेव प्रसाद गौड़ उर्फ बेढब बनारसी ... ''
निराला ने गंभीरता से जिज्ञासी की, '' ...उर्फ बेढब बनारसी या उफ्फ बेढब! ''
ठहाका बेकाबू. सभी लोटपोट, केवल गौड़ मटर-मटर ताकते रहे. ठहाका ठहरा तो उन्होंने
निराला की ओर देखते हुए भौंहें उचकायी और धीरे से बाण चलाया, '' काशी में बाबा शंकर
के सामने आसन मिल जाने पर आज नन्दी के जलवे ही कुछ और हैं...''
ठहाके ने फिर तटबंध तोड़ डाले. निराला ने हंसते हुए सिर हिलाया, '' ...क्यों नहीं!
क्यों नहीं!! तमाम बेढब-ढबाढब भूत-प्रेत गण तो आखिर अपनी ही जमात के हुए न...
उन्हें देखकर तो सामुदायिक उत्साह जाग ही जायेगा... ''
चेखुरा ने एक-एककर कई हुक्के लाकर रखे जिसे लोग ललक के साथ थामते चले गए. गुप्त,
दास, नवीन और निराला चकित-हुलसित भाव से हुक्के गुड़गुड़ाने लगे. नीम रोशनी में कश पर
कश... हर कश पर चिलम के ऊपर अंगारे धधक उठते और दमकते हुए लौ उगलने लगते. धुएं से
विशेष सुगंध उठने और आसपास फैलने लगी. इसका अहसास होते ही निराला ने मुग्ध भाव से
सिर हिलाया और नवीन को कुछ बोलने का संकेत दिया. नवीन मुस्कुराये, ''...गले में
विशेष आनन्द का स्पर्श दे रहे हैं ये धुंए... बाबूसाहब ने सम्भवत: इसमें भी कोई
काव्यात्मक खेल किया है... ''
गुप्त ने हुक्के की कलात्मक संरचना को लक्ष्य कर सिर हिलाया. उन्होंने मुंह से एक
भरपूर धूम्र-धार खींची और आंखें मूंदकर आनन्दपूर्वक विसर्जित करने लगे, '' काशी में
ही मिट्टी के ऐसे कलात्मक हुक्के बनते हैं... यह इसकी नीचे की लम्बोतरी नारियली
गोलाई, इसी से जुड़कर ऊपर जाने वाली यह डण्ठली लम्बाई और शिखर पर चिलम की यह आभूषणों
जैसी कटावदार कढ़ाई... सब सचमुच विरल हैं... ''
रस्तोगी चुप न रह सके, '' ...और जनाब, उस पर तुर्रा यह कि नीचे की इस लम्बोतरी
गोलाई से लेकर ऊपर उठता पाइपनुमा यह डण्ठल और शिखर के चिलम तक का यह पूरा हुक्का
खुद में एकदम सिंगल पीस है... बिना जोड़ का... ''
गौड़ ने अपनी ओर से जोड़ा, '' ...एकदम बिना जोड़ का... यानी बेजोड़! ''
दास बोले, '' ...अंगारे तो अलग से रखे गए हैं न ! ''
गौड़ बोले, ''...हां, असल में ये जलने-धुंआने वाली चीजें हैं, आपके विभाग के तहत आने
वाली... यह जिससे जुड़ेंगी उसका कलेजा पहले तो भरपूर धुंधु
आयेगा फिर सदा के लिए जुड़ा जायेगा... ''
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सभी ठठा गए. नवीन ने माहौल पर बारीक नजर रखते हुए दृढ़ता से बारी-बारी से सब पर
दृष्टि दौड़ायी, '' ...सबसे विरल है इस धुंए की सुगंध ! ... ''
निराला आंखें मूंदे सिर हिला-हिलाकर भूरे धुंए उगलने लगे, ''...एकदम प्रसाद गुण से
भरे हुए हैं ये धुंए भी... ''
व्यास बोले, '' निराला जी, आप ठीक कह रहे हैं... बाबूसाहब ने आज सुबह कारखाने में
चौकी पर आसन जमाकर अपने हाथों इसका तम्बाकु ठीक वैसे ही खूब सधे ढंग से रचा है जैसे
वे पंक्तियां और छंद तराशते हैं... इस तम्बाकु और इसके धुंए का प्रसाद गुण से लबालब
होना बिल्कुल ही स्वाभाविक है... ''
बतकही और कहकहों के दौर पर दौर निकलते-चलते रहे. किसी को पता भी न चला, इस दौरान
आकाश में काफी उधम मच चुका था. अग्नि-कौंधों के साथ तड़कती बिजली तक का किसी को खयाल
नहीं. अचानक जब बड़ी-बड़ी बून्दें तेज-तेज तड़तड़ाने लगीं तो सभी खड़बड़ाकर गिरते-पड़ते
भागने लगे. हुक्के जहां के तहां, लोग बैठकखाने में. देखते ही देखते सभी गोष्ठी की
मुद्रा में. सजग-सावधान और अपने 'असलहों' से लैस. प्रसाद के कहने पर निराला ने बिना
ना-नुकुर 'तुलसीदास' के छंद तुरंत शुरू कर दिये.
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प्रसाद बोले, '' किसी शायर ने
बेटे को लक्ष्य कर कहा है कि काफिर मरने के बाद भी अपने पितरों को
जलदान करते हैं, लेकिन तू मुझे जीते जी ही प्यासा रख रहा है! ''
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समय
तुलसी के पास खिंचा जा पहुंचा. वायु का समग्र विस्तार जैसे काव्य काया में तब्दील
हो गया हो! कानों में निराला के छंद टपक रहे थे और आत्मा के मुख पर दोहे-चौपाइयों
की सोंधी रुनझुन मधु-बूंदों-सी टप्-टप् पड़ने लगी. लगने लगा जैसे सचमुच यहीं कहीं
आसपास आकर बैठ गये हैं स्वयं गोस्वामी तुलसीदास! साक्षात्, सदेह. माहौल गमगमा उठा.
सभी एकाग्र और अभिभूत. निराला ने लगे हाथ अजमेरी और नवीन की ओर भौंहें उचका दी.
बारी-बारी से दोनों ने कविताएं सुनायीं. उन्होंने कुंवर चंद्रप्रकाश सिंह की पीठ पर
थपकी दी तो वह भी एक गीत लेकर खड़ा हो गया.
अंत
में प्रसाद ने मंद-मृदु गले से 'कामायनी' के छंद शुरू किये. ...विनाश की कोख चीरकर
निकलता हुआ महासृजन... आदिपुरुष मनु का महानिर्माण-द्वन्द्व... श्रध्दा और इड़ा से
फूट रहे प्रेम और स्पध्र्दा के लाल-नीले धार-स्रोत...-सृष्टि के आदि -दृश्य का
सम्पूर्ण आदिपरिदृश्य सबकी आंखों के आगे लहराने लगा. सभी चमत्कृत्!
प्रसाद ने वाणी को विराम दिया तब भी पूरा वातावरण देर तक गूंजता रहा. हवा पर तैरते
भाव-बिम्ब धीरे-धीरे हल्के हुए.
भोजन का बुलावा आ गया था. भीतर सभी लम्बी बिछी सफेद चादर पर पंक्तिबध्द हुए. प्रसाद
भी गुप्त और दास के बीच बैठे. निराला ने नवीन और व्यास को अपने पास बिठाया.
भाभीश्री के हाथ की बनी कचौड़ियों और दही-बाड़े ने धूम मचाकर रख दी. स्वाद प्रशंसा
बनकर हवा में उतरने लगा. किशोर रत्नशंकर सोत्साह थालियों में घूम-घूमकर कचौड़ियां
डालता रहा. निराला ने पानी मांगा तो वह भरा जल-पात्र लेकर दौड़ा.
प्रसाद पंक्ति में पहले थे, उन्होंने अपना खाली गिलास ऊपर किया. रत्नशंकर की दृष्टि
इस पर नहीं जा सकी. तभी दास ने हांक लगा दी. वह फिर पिता के खाली गिलास को देख न
सका. निराला ने फिर बुला लिया. वह फिर पीछे लौट गया तो प्रसाद बोले, '' एक किसी
शायर के पर्सियन शेर का बिम्ब मुझे याद आ रहा है जिसमें उसने अपने काबिल बेटे को
लक्ष्य कर कहा है कि काफिर मरने के बाद भी अपने पितरों को जलदान करते हैं, लेकिन तू
मुझे जीते जी ही प्यासा रख रहा है! ''
सभी हंसने लगे. रत्नशंकर झेंप गया. वह तेज गति से पास आया और गिलास में पानी डालने
लगा. प्रसाद उसे देख-देख मुस्कुरा रहे थे. वह पिता से नजर नहीं मिला पा रहा था.
निराला ने संकेत से उसे बुलाया और एक और दहीबड़ा लाने को कहा. लखरानी देवी अब तक दूर
से ही सब देख रही थीं. वह स्वयं पंक्ति के पास आ गयीं. उनके हाथ में दहीबड़ा से भरी
थाली थी. उन्होंने निराला की थाली में एक-एककर दो दहीबड़े डाल दिए. वे कुछ न बोले,
सिर झुकाए खाते रहे. उन्होंने एक-एककर दो और डाले. निराला बिना कुछ बोले एक-एक कर
दहीबाड़े खा गए. लखरानी ने फिर एक दही बड़ा डाला और अपेक्षा की कि वे सहमति या असहमति
का कोई तो शब्द निकालें! निराला ने अब भी सिर नहीं उठाया तो वह बोलीं, '' पंडित जी,
मुझे आपको खिलाने में लग तो अच्छा रहा है किंतु आपकी चुप्पी से... ''
निराला ने सिर उठाया, '' ...जिह्वा तो तृप्त हो गयी है, उदर में भी स्थान नहीं बचा
किंतु हृदय-मन अभी संतृप्त नहीं हुए हैं... यह संतृप्ति दहीबड़े से होगी भी नहीं, यह
आपके आशीर्वाद से होगी... जब तक आपका मन न भर जाये और आपके मुख से आशीर्वाद के शब्द
न निकलने लगें तब तक मैं ... ''
वह थाली को वहीं रख विभोर होकर खड़ी हो गयीं, '' ...जयशंकर तऽ हमार देवरो हउवन अउर
बेटो हउवन... तूहूं येह से कम नइखा... जाऽ तूं सिध्दपुरुष होखा... इहे आशीर्वाद हम
देत हईं... ''
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आकाश शांत हुआ तो तारे भर गए. चांद निकलकर नाचने लगा. बैठकखाने से निकलकर सभी
चबूतरे पर लौट आये. चेखुरा चिलमों पर ताजे अंगारे रख रहा था. सभी अपने हुक्के
पहचानने में ठिठके रहे. निराला ने उमगते अंगारों का एक हुक्का पकड़कर मुंह लगा दिया
और एक भरपूर धूम्र-धार खींची. वही स |