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एल एस हरदेनिया | L S Hardenia | Sadhvi pragya thakur

बहस

 

अगर हिंदू आतंकवाद कहना गलत है तो...

एल एस हरदेनिया


 

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी के बाद संघ परिवार एक हास्यापद स्थिति में आ गया. संघ परिवार की साध्वी के गिरफ्तार होने के बाद पहिले पूरी चुप्पी, फिर दबी जुबान से समर्थन और यकायक खुला जोरदार समर्थन. यहां तक कि कानूनी परंपराओं को तोड़कर मध्यप्रदेश के एक मंत्री क़ैलाश विजयवर्गीय ने एक आरोपी के घर जाकर घोषित कर दिया वह पूरी तरह से निर्दोष है. ज़ाहिर है, यदि कोई मंत्री एक आरोपी के संबंध में इस तरह की घोषणा करता है तो वह मंत्री पद की शपथ का उल्लंघन करता है.

sadhvi pragya thakur with bjp leaders

 

प्रारंभिक चुप्पी के बाद संघ परिवार का सार्वजनिक रूप से साध्वी के साथ खड़े होने के पीछे प्रतियोगी साम्प्रदायिकता है. साध्वी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद एक और साध्वी उमा भारती ने घोषणा कर दी कि वे प्रज्ञा की हर संभव सहायता करेंगी. उमा भारती ने यह घोषणा भी की कि वे अपनी पार्टी से उन्हें चुनाव लड़ाने के लिए तैयार हैं. फिर शिवसेना ने बयान दे डाला कि वह प्रज्ञा के साथ है.

 

इसी बीच अनेक तथाकथित हिन्दू संगठन साध्वी प्रज्ञा की सहायता के लिए सामने आ गए. प्रज्ञा ठाकुर के साथ खड़े होने और उनकी हर संभव सहायता की घोषणाओं से संघ परिवार का चिंतित होना स्वाभाविक था, इसलिए सर्वप्रथम उसने कैलाश विजयवर्गीय को आगे किया, फिर संघ परिवार से जुड़े अन्य संगठन सामने आए. प्रारंभ में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रज्ञा के संबंध में पूछे जानेवाले सवालों को टालते रहे. फिर दबी जुबान से उनका समर्थन करना प्रारंभ किया.


प्रारंभ में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता लाकृष्ण आडवाणी ने कहा कि मैं नहीं जानता यह साध्वी प्रज्ञा कौन है. ''टाईम्स ऑफ इंडिया'' से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ''यह स्पष्ट नजर आता है कि साध्वी ने कुछ मतभेदों के कारण संघ परिवार से संबंध विच्छेद कर लिया है.''


उन्होंने नाथूराम गोडसे, जिन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की थी; का जिक्र करते हुए कहा कि ''गोडसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबध्द रहे. परन्तु 1934 में उन्होंने संघ से नाता तोड़ लिया क्योंकि वे संघ के तौर-तरीकों से असहमत थे.'' यह संयोग की बात है कि आडवाणी ने यह स्वीकार किया कि गोडसे कभी तो संघ परिवार से संबध्द थे. पहिले तो संघ परिवार यह दावा करता था कि संघ का नाथूराम गोडसे से कुछ लेना-देना नहीं था. आडवाणी ने यह भी दावा किया कि संघ की हिंसा में आस्था नहीं है.

 

आडवाणी की इस बात पर कोई कैसे भरोसा कर सकता है क्योंकि वास्तव में संघ के राजनैतिक दर्शन से लेकर संघ के कार्यकर्ताओं की वेशभूषा तथा प्रशिक्षण तौर-तरीका तक - सभी उसके सदस्यों को हिंसा की ओर उसके झुकाव को दर्शाते हैं. जो पेन्ट व शर्ट स्वयंसेवक पहिनता है और वह लाठी चलाने का प्रशिक्षण लेता है, दशहरा और अन्य अवसरों पर जो शस्त्र पूजा करता है, जिसकी महिला शाखा तक अपने सदस्यों को शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण देती है वह कैसे यह दावा कर सकता है कि उसकी हिंसा में आस्था नहीं है.


गांधीजी की हिंसा में आस्था नही थी और उनकी आस्था इतनी गहरी थी कि वे आत्म रक्षा के लिए भी हिंसक साधनों का प्रयोग करने के विरोधी थे. इसके अतिरिक्त संघ से जुड़े संगठन भी हिंसा में आस्था रखते हैं. जैसे, बजरंग दल के कई साईन बोर्डों पर मैनें स्वयं ''सशस्त्र हिन्दू क्रांति की ओर.'' लिखा हुआ देखा है. इसके अतिरिक्त संघ अपनी शिक्षा के द्वारा अलपसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों और ईसाईयों के विरुध्द घृणा फैलाकर हिंसक वातावरण बनाता है. इसलिए यह दावा कि संघ परिवार हिंसा में भरोसा नहीं करता है, पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए.


साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी तथा हिन्दू संगठनों की गतिविधियों को लेकर मीडिया में हिन्दू आतंकवाद का उल्लेख किया जाने लगा. हिन्दू आतंकवादी की चर्चा से भाजपा व उसके सहयोगी संगठनों को आपत्ति होने लगी है. उनकी ओर से यह दावा किया जाने लगा कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता. अर्थात सिर्फ मुसलमान ही आतंकवादी होता है.


नरेन्द्र मोदी समेत संघ परिवार के अनेक नेता यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं परन्तु सभी आतंकवादी मुसलमान हैं. आतंकवादियों को जेहादी कहा जाता है, जो मुसलमानों को अच्छा नहीं लगता है.


अनेक मुस्लिम धार्मिक नेता बार-बार यह दावा करते हैं कि सच्चा मुसलमान, इस्लाम में ईमानदारी से आस्था रखने वाला मुसलमान आतंकवादी हो ही नहीं सकता. उनके इस दावे को संघ परिवार नकार देता है. अनेक लोगों की ओर से बार बार यह कहा जाता है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ना उचित नहीं है. हिन्दू आतंकवाद की चर्चा होनी लगी है तो संघ परिवार की ओर से यह भी कहा जाने लगा कि धर्म से आतंकवाद का कतई संबंध नहीं होता है.


यहां यह उल्लेख आवश्यक है कि भारतीय जनता पार्टी के रवैये में परिवर्तन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय में एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद हुआ. संघ के मुख्यालय में संपन्न इस बैठक में संघ के उच्च नेताओं के अतिरिक्त लालकृष्ण आडवाणी एवं राजनाथ सिंह भी उपस्थित थे.


बताया गया कि बैठक में यह तय हुआ कि हिन्दू आतंकवाद के आरोप का जोरदार ढ़ग से विरोध किया जाए. इस बैठक के बाद भाजपा के प्रवक्ता ने कहा कि प्रज्ञा ठाकुर और अन्य लोगों की गिरफ्तारी का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम आक्रोश को कम करना है. मुसलमान कांग्रेस की सरकार से नाराज हैं, इस नाराजगी को दूर करने के लिए निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा किया जा रहा है. इस खतरनाक खेल का पर्दाफाश करना आवश्यक है.


साध्वी और उनके साथ गिरफ्तार अन्य लोगों की सहायता के लिए अनेक हिन्दू संगठन सामने आए हैं. ये संगठन न सिर्फ उन्हें निर्दोष घोषित कर रहे हैं वरन् उनकी सहायता के लिए साधन भी एकत्रित कर रहे हैं. यदि इस तरह मुस्लिम जनता या संगठन किसी मुस्लिम आरोपी के लिए चंदा इकट्ठा करते और उसे निर्दोष घोषित करते तो संघ परिवार जमीन-आसमान एक कर देता. जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कुलपति ने अपने विश्वविद्यालय के अनेक गिरफ्तार छात्रों को कानूनी सहायता मुहैया कराने की घोषणा की तो संघ परिवार ने अत्यधिक सख्त भाषा में उनकी आलोचना की.


जब भी बम विस्फोट की घटना के बाद मुसलमानों की गिरफ्तारी हुई है किसी भी मुस्लिम संगठन ने उसे निर्दोष नहीं कहा है तथा न ही उसकी सहायता करने की घोषणा की. परन्तु यह दु:ख की बात है कि एक भी तथाकथित संगठन ने प्रज्ञा ठाकुर की गतिविधियों की निन्दा नहीं की गई. इसके अलावा देश के किसी भी धार्मिक नेता ने इस तरह की घटनाओं में साधु-संतों के शामिल होने की निंदा नहीं की है. जो साध्वी हो जाती हैं या संन्यास ले लेता है उसके मन में किसी निर्दोष की हत्या करने का विचार नहीं उठेगा. चाहे प्रज्ञा ठाकुर या कोई भी और साध्वी या संन्यासी हो उसका हिंसक गतिविधियों से जुड़ना साध्वी या संन्यासी शब्द पर धब्बा है.


यदि अनुसंधान के बाद प्रज्ञा ठाकुर निर्दोष सिध्द होती हैं तो उन्हें ससम्मान छोड़ देना चाहिए. हम जिस तरह निर्दोष मुसलमानों की गिरफ्तारी के विरोधी रहे हैं वैसे ही मात्र संदेह के आधार पर आतंकवादी होने के नाम पर निर्दोष हिन्दुओं की गिरफ्तारी के भी विरोधी हैं. आतंकवाद को समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि आतंकवाद की समस्या के बहाने ओछी राजनीति नहीं होनी चाहिए.

 

13.11.2008, 10.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशि
 

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

namish

 
 नक्सलवाद,माओवाद के संरक्षक साम्यवादियों का गांधी से क्या लेना देना?इस्लाम और साम्यवाद दो बातों में एक से हैं विस्तारवाद और खूँरेजी में।दूसरे देशों के पैसे पर बिके हुए लोग तमगे दे रहे हैं?सव्यसाची कौन थे?रुस की लड़्कियाँ दुनिया भर में वेश्यावृत्ति क्यों कर रहीं है?जो मोहतरमा हिन्दुओं को आतंकवादी बतानें पर वाह वाह कर रही हैं अपनें मुहल्ले के शोहदॊ और उनके कुकर्मों के बारे में क्या जानती हैं?हिन्दुस्तान में संघ बज्रंग दल है पाकिस्तान में कौन है?दुनिया भर में हर जगह मुसलमान क्यों लड़ रहा है और किससे?ये मानना ही पडेगा कि जब तक यज़ीद को अपनें से अलग नही करेंगे,हुसैन के साथ हुई ज्यादती से तौबा नहीं करेंगे तब तक इस्लाम में मानवता नहीं आ सकती और खूँरेजी बन्द हो नहीं सक्ती।  
   
 

Sugandhu Mishra Delhi

 
 यह दुखद है कि आतंकवादियों को धर्म के पलड़े पर तौला जा रहा है. ऐसा नहीं होना चाहिए. 
   
 

कौशल किशोर शुक्ला (kaushal.shukla@rediffmail.com) मुजफ्फरपुर

 
 महाराज जी, आपका लेख विस्तार से चर्चा को आमंत्रित करता है, क्योंकि हिन्दू धर्म और संस्कति में कट्टरता का स्थान उतना ऊपर नहीं है, जितना आपने दिखाने की कोशिश की है। व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म काफी उदार है और इसमें स्वीकार भाव अन्य धर्मों से कहीं अधिक है। खास कर इस्लाम से तो ज्यादा है ही। इस्लाम की मूल अवधारणा चाहे जो हो, पर धरातल पर यह आतंकी और आतंकवाद को ही जन्म देता जा रहा है और इस पर अंकुश लगाने के बजाय विचारों को उलझाने की कोशिशें ही हो रही हैं। आपका लेख उसी श्रृंखला की एक कड़ी है। वैसे किसी भी धर्म की ओर से आतंकवाद का फैलाया जाना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। देखने की जरूरत यह होती है कि क्रिया कौन है और प्रतिक्रिया कौन। क्योंकि हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया का होना बिल्कुल वैज्ञानिक है।
 
   
 

ravi singh (ravi.mcrpv@gmail.com) bhopal

 
 आप शायद हिंदू को नहीं समझ रहे हैं. एक बात और कि संघ सभी हिंदुओं का प्रतिनिधि नही है. 
   
 

Pravin Patel (reachppatel@yahoo.com) Bilaspur

 
 There in no doubt that the Hindu Fundametalists have been caught and one after another their faces are coming in front. These hindu fundamentalists are working over time to play political games by creating doubts in the minds of people by drawing their own conclusions on the investigation done by ATS.

Terrorists do not have any religion, be it Muslims or Hindus. There is no difference between the culprits and PRAGYA OR DAYANAND are no exceptions. They must be treated the way muslim terrorists are treated.
 
   
 

abhay nema (abhayn2000@yahoo.com) indore

 
 हिंदू है तो बढ़िया है....

1947 में देश के विभाजन की त्रासदी के बाद भी लोगों में हिंदू-मुस्लिम की भावना जम कर पैठ जमाए हुई थी। स्टेशनों पर अपनी चाय की बिक्री बढ़ाने के लिए कुछ चाय वालों ने हिंदू चाय-हिंदू चाय बेचना शुरू कर दिया। मुसाफिरों को लगता कि हिंदू चाय किसी हिंदू द्वारा बनाई गई है और वे हिंदू चाय पीने लगे। मुसलमान मुसाफिरों ने देखा कि जब हिंदू मुसाफिर हिंदू चाय पी रहें हैं तो वे भी क्यों न मुस्लिम चाय पिएँ। तो प्लेटफार्म पर मुस्लिम चाय भी बिकने लगी। हिंदू,हिंदू चाय पीते और मुस्लिम,मुसलमान चाय।

हिंदू डॉन-मुस्लिम डॉन

इस घटना के सालों बाद मुंबई में 1993 में सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए। पता चला कि दाउद इब्राहिम मुंबई छोड़कर भाग गया और उसकी जगह मुंबई में नया डान छोटा राजन आ गया। कुछ लोग इस बात से बड़े खुश थे कि हिंदू डान है मुस्लिम गुंडों और माफिया को चुन-चुन कर मार रहा है। छोटा राजन ने दाउद को मारने की शपथ ली हुई थी और देश के बाहर जब इनकी गैंगों की मुठभेड़ होती तो देश के कट्टर हिंदू यह सोचकर खुश हुए हिंदू डाँन मुस्लिम डान दाउद इब्राहिम के गुरगों का सफाया कर रहा है। उनको लगता कि यह राष्ट्रवादी डान है और देश से प्यारकता है. डान भले ही खराब होते हैं पर हिंदू है तो बढ़िया है?

हिंदू केले-मुस्लिम केले

इस घटना के बाद 2002 में,मैं औरंगाबाद में था। एक केलेवाले से मैं केले खरीदने के लिए केले छाँटने लगा। केले वाला बोला साहब छांटों मत ये हिंदू केले हैं, मैने चौंककर कहा हिंदू केले से क्या मतलब। वह बोला साहब मुसलमान केले वाले आपको सड़े केले दे सकते हैं, मैं एसा नहीं कर सकता आप बिना हिचक हिंदू केले लेंलें। मैं उससे नाराज हो गया और बोला तुम जानते हो मैं मुसलमान हूँ, नहीं लेना तुमसे केले। केले में भी हिंदू- मुसलमान। इस पर केले वाला शर्मिंदा हो गया बोला माफ करना साहब मालूम नहीं था। सब तरफ हिंदू का माहौल चल रहा है न,मुझको तो केले बेचना है हिंदू के नाम से ज्यादा बिक जाते है।

हिंदू आतंकवाद- मुस्लिम आतंकवाद

2007-08 में सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए।? यह सामान्य धारणा बनने लगी कि ये मुस्लिम आतंकवाद है। एक ही कौम को बम धमाकों का कसूरवार ठहराया जाने लगा। 2008 में एक साध्वी बम विस्फोट के मामले में गिरफ़्तार हुई। एक सेना का कर्नल भी बम विस्फोटों के मामले में आरोपी बना। विस्फोट के तार हिंदू कट्टरपंथियों से जुड़ने लगे तो कहा जाने लगा कि भई हिंदू आतंकवाद है, मुसलमान आतंकवाद के जवाब में आया है। बम विस्फोट पहले भी हुए लोग इनमे मारे गए निर्दोषों की मौंतों पर अफसोस करते थे। पर अब हवा बदल गई। पूछने वाले सवाल करने लगे हैं जो सिलसिलेवार विस्फोट हुए उसमें हिंदू बम थे कि मुस्लिम बम । हिंदू आतंकवाद को रिटेलिएशन बताया जाने लगा। कहा जाने लगा कि मुस्लिम आतंकवाद के विरोध में है। आतंकवाद का धर्म से
कोई संबंध नहीं है। मीडिया बोल रहा है हिंदू आतंकवाद है। हिंदूवादी पर्टियाँ साध्वी के समर्थन में है। कुछ लोग दबी जुबान से कह रहे हैं। चलो आतंकवाद हिंदु है तो ठीक है यह तो जवाब है। तो जो माहौल है उस से एसा लग रहा है कि वह दिन दूर नहीं जब लोग बम धमाकों पर अफसोस इस हिसाब से व्यक्त करें कि हिंदू बम था कि मुस्लिम बम।
 
   
 

sabir khan mewat haryana

 
 आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता. यह बात समझने की जरुरत है.  
   
 

Safia Akhtar (safia_8akhtar@yahoo.co.in) Bhopal M.P

 
 हिंदू आतंकवाद की हकिकत सामने आने के बाद अपने को बेदाग बताने की कोशिश जारी है. कभी आपने सोचा है कि हर मामले को मुस्लिम आतंकवाद बता कर कितना सताया गया है... जो भी दोषी हो, उसे तो इसकी सजा मिलनी ही चाहिए. 
   
 

satyam shrivastava (satyam_shrivastava@rediffmail.com) chhatarpur m.p.

 
 आपने बिल्कुल ठीक लिखा है.  
   
 

Vandana Bahrain

 
 जो दोषी है उसे सज़ा मिलनी चाहिए और यह सभी धर्म के लोगों पर लागू होना चाहिए. 
   
 

shahroz (shahroz_wr@yahoo.com)

 
 तल्ख है भाई. तल्ख है और सच ऐसा होता भी है !!
और हां ध्यान दीजिए, जामिया के वीसी पी.आर.मुशीरुलहसन ने सिर्फ एक स्टूडेंट की पैरवी की बात कही है, अनेकों नहीं. और हां शब्द अनेक होता है, एक का बहुवचन.
 
   
 

sanjeet (singh30.skumar@gmail.com) delhi

 
 हिंदू आतंकवाद पर जनादेश में भी एक रिपोर्ट देखी, वह भी बेहतर है. देखें. 
   
 

KUMAR GAURAV (gauravgiridih@yahoo.co.in) GIRIDIH

 
 हिंदू आतंकवाद शब्द ही गलत है. ये आप जैसे सेकुलरों के दिमाग की उपज है और कुछ नहीं. एक हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता. चुनाव के समय मुसलमानों को खुश करने के लिए इस शब्द का इजाद किया गया है.
पहले तो आपको अपने ऊपर शर्म आनी चाहिए कि आप ‘ हिंदू आतंकवादी ’ और मुस्लिम आतंकवादी को एक ही तराजु में तौल रहे हैं.
आज अगर भारत बरबाद हो रहा है तो इसमें सबसे बड़ी गलती आप जैसे सेकुलर समझने वालों के कारण ही. आक थू...
 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) raipur

 
 आतंकवाद हिंदू या मुस्लिम नहीं होता. ये सिर्फ सोच का फर्क है. यह सब कुछ वोट के लिए होता है. आप जैसे लिखने वालों के कारण ही आज स्वतंत्र सोच बची हुई है. मैं आपको बधाई प्रेषित करता हूं.  
   
 

Imran (Imranjalandhari@gmail.com) Punjab

 
 बिलकुल सही लिखा आपने, ये सब सिर्फ और सिर्फ राजनीति है और कुछ नहीं. अगर प्रज्ञा चुनाव में जीतती हैं तो आप भविष्य सोच सकते हैं. 
   
 

वृजनंदन चौबे (vrijnandanchaube@gmail.com) दिल्ली

 
 बिल्कुल सही लिखा है आपने कि आतंकवाद को समाप्त करने के लिए जरूरी है कि आतंकवाद की समस्या के बहाने ओछी राजनीति नहीं होनी चाहिए... मैं आपसे आगे भी अपेक्षा करता हूं कि इस तरह के लेखन से हमें अभिभूत कराते रहेंगे... धन्यवाद 
   
 

आदर्श राठौर नई दिल्ली

 
 आतंक के खिलाफ़ संतुलित कार्रवाई होनी चाहिए 
   
 

roushan (roushan001@gmail.com) lucknow

 
 आपसे सहमत हूं कि हमें हिंदू-मुसलमान के नज़रिये से देखने के बजाय इसे आतंकवाद के तौर पर देखना चाहिए. अभी कल तक लोगों को दिल्ली पुलिस पर पूरा भरोसा था आज उन्हें एटीएस साजिश करती हुई लग रही है. न्याय की पूरी प्रक्रिया का पालन किए हुए किसी को भी दोषी नहीं कहना चाहिए. चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान. एक बात और कि ये बात तो अटल बिहारी वाजपेयी भी कहते रहे हैं कि सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान हैं. ऐसा कहते हुए या तो वो इतिहास की को अनदेखा करते हैं या फिर उन्हें इतिहास का ज्ञान नहीं है. 
   
 

Mukesh ()

 
 जो भी आपने लिखा है, मैं उससे सहमत नहीं हूं क्योंकि आपने पूरी तरह से संघ को गलत कहा है, जबकि हिंदू कितना कट्टर हो सकता है ये हाल के कुछ वर्षों में सामने आया है, जबकि मुस्लिम की कट्टरता शुरु से ही दुनिया जानती है. मैं ये कहता हूं कि आखिर कब तक हिंदू अहिंसक होने की गलती भुगतते रहेंगे ? 
   

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