कनक तिवारी | बस्तर में नक्सली हिंसा | Kanak Tiwari
बहस
बस्तर में नक्सली
हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-दो
कनक तिवारी
बस्तर में नक्सली
हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-एक
सलवा जुड़ूम नाम का यंत्र कांग्रेस भाजपा युति की औरस संतान के रूप में परिचित और
प्रचारित किया गया. यह भारतीय राजनीति का अजूबा त्रिशंकु है जिसका कोई सानी नहीं
है. इसे महात्मा गांधी की तर्ज पर शांति मार्च का नाम दिया गया. गांधी की अहिंसा
अभय पर आधारित थी. नक्सलवादियों और पुलिस के दोहरे तंत्र से भयभीत आदिवासी शांति
मार्च के पथिक नहीं हैं. वे खुद की शव यात्रा में शामिल मातमी हैं.
आज
महानगरों तक की यह हालत है कि यदि कोई चोर, डाकू या हत्यारा घुस आए तो तथाकथित
सिविल सोसाइटी के झंडाबरदार पड़ोसी तक की मदद को नहीं आते. सामाजिक करुणा और सरोकार
का लोप होता जा रहा है. ऐसे में शिक्षा, आर्थिक खुशहाली और संचारतंत्र से सर्वथा
अछूते बस्तर के आदिवासी शांति मार्च जैसे गांधीवादी हथियार का इस्तेमाल करने के
लायक प्रबुध्द और संकल्पित हो गए हैं-ऐसा कौन मानेगा? पुलिस की दहशत और राज्यतंत्र
के अदृश्य डंडे की मार से कोई छ: सौ गांव एक लक्ष्यहीन हुजूम में बदलने के लिए खाली
कराए गए हैं.
उनकी
पीठ पर पुलिस की बंदूक की सरपरस्ती है जिसे नक्सलवादियों को निशाना नहीं बनाने की
महारत हासिल है. पुलिस के कई आला अधिकारी देखने मात्र से सरे आम शराबखोर,
पस्तहिम्मत और तिकड़मी नज़र आते हैं. वे एक किलोमीटर तक दौड़ नहीं पाते. वर्जिश तो करते
ही नहीं. बड़े अधिकारियों और राजनेताओं की चाटुकारिता से उन्हें फुर्सत ही कहां होती
है. अंग्रेजी बुध्दिराज की भारतीय पुलिस ठेले, खोमचे और रिक्शे वालों सहित वाहनों
से चौथ वसूलने की विशेषज्ञ हो गई है. उसे कारखानों और दूकानों से समय समय पर सीधा
मिलता रहता है जो पूजा पाठ कराने वाले ब्राम्हणों को मिलता रहा है.
श्रेष्ठ नौकरशाही टी शर्ट, जींस, व्हिस्की, क्लब, अंग्रेजी और हवाई उड़ानों में
अधिकतर व्यस्त है. वह कंप्यूटर और इंटरनेट पर मैदानी समस्याओं का हल ढूंढ़ती है. वह
अधकचरी पढ़ाई से युक्त राजनेताओं को राजदर्शन की घुट्टी पिलाती रहती है. एक जमाना था
जब श्रेष्ठ नौकरशाही और भ्रष्टाचार एक दूसरे के दुश्मन थे. भ्रष्टाचार जहां का तहां
है. नौकरशाही ने उससे दोस्ती कर ली है. राजनेताओं की तो कौम ही अपने पूर्वजों के
वंश से बेदखल हो गई है. वे पांच वर्ष में तीस वर्ष की उपलब्धि हासिल करना चाहते
हैं. राजीव गांधी ने अपनी पार्टी में सत्ता के कुछ दलाल देखे होंगे. यदि वे आज होते
तो सत्ता के दलालों ने उनकी ही पार्टी में उनकी मुश्किलें बढ़ा दी होतीं.
बस्तर में व्याप्त नक्सलवाद बहुप्रदेशीय है. उसे महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा
के रास्ते मदद मिलती है. बिहार और बंगाल में भी नक्सलवाद है लेकिन इन प्रदेशों में
सलवा जुड़ूम नहीं है. यह अनोखा कथित जनअभियान स्पंदनहीन आदिवासियों का कारवां है जो
बताए गए रास्ते पर चलते रहने अभिशप्त हैं. मुक्तिबोध ने अपनी अमर कविता 'अंधेरे
में' में ऐसी ही भयावहता की कल्पना की थी. विनोद कुमार शुक्ल ने आदिवासियों की
कातरता का ठंडा, तीखा लेकिन मार्मिक बयान किया है.
यह
जगजाहिर है कि दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के कई नेता बस्तर में एक बड़ी संपत्ति
के मालिक हैं. उनकी दिन दूनी रात चौगनी तरक्की हुई है. आदिवासी जनसंख्या को वे अपना
गुलाम या पिट्ठू समझते हैं, अपना भाई या साथी नहीं. आदिवासी अफसर बड़ी नौकरी में आने
के बाद केवल अफसर रह जाते हैं, आदिवासी नहीं. वे अज्ञेय के सांप तक से नहीं सीखते.
सांप तक केंचुल से मोहब्बत नहीं करता. वह अपना चरित्र बचाए रखने के लिए केंचुल को
छोड़ देता है. नव धनाढय आदिवासी अफसरों और राजनेताओं की जमात को छत्तीसगढ़ में कौन नहीं
पहचानता. उद्योगपतियों और व्यापारियों ने राजनेताओं को हिस्सा देने के बदले एक धमक
के साथ खुद सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया है. छत्तीसगढ़ की सरकार उद्योगपतियों के
इशारों पर नहीं चल रही है, बल्कि उसे उद्योगपति सीधे सीधे चला रहे हैं.
भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था में ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य त्रिगुट की राजकीय
भूमिका की कोई संयुक्त परिकल्पना नहीं रही है. लेकिन अब तो छत्तीसगढ़ में वह भी हो
रहा है. उसमें कथित शूद्र वर्ग के नेताओं की मिली भगत भी है. यह कैसे माना जा सकता
है कि ग्रामीण आदिवासियों में हिंसा को लेकर अभय व्याप्त है. बंदूक की गोली के सामने
तो गांधी के अपवाद को छोड़कर कोई माई का लाल सीना नहीं ठोंक पाया. यदि ऐसा है तो जेड
प्लस श्रेणी की सुविधा लिए मंत्री, सांसद और विधायक क्यों इठलाते फिरते हैं. ऐसी
सुरक्षा व्यवस्था कमोबेश अफसरों, फिल्म अभिनेताओं और क्रिकेटरों को भी क्यों मुहैया
कराई जाती है.
पुलिस के दमन के साए में आदिवासी अपने ही उन भाइयों को समझाइश या चुनौती देने के
काम पर लगाए जाते हैं जिन्हें नक्सलवादी या उनका बंधक कहा जाता है. यह तो शेर के
शिकार के लिए बकरे को बांधने जैसा हुआ. हांका होगा. शिकार होगा. या तो शेर मरेगा या
वह बकरे को खा लेगा. दोनों सूरतों में पशु हारेगा और मनुष्य का पशुत्व जीतेगा.
कांग्रेस की हालत तो अजीब है. उसकी कोई राजनीतिक नीयत स्पष्ट नहीं है. प्रतिपक्ष के
नेता को भाजपा सरकार के सहयोग से नक्सलवादियों के विरुध्द मसीहा बनाया जा रहा है.
एक पूर्व कम्युनिस्ट से कांग्रेस पार्टी भाजपा के शासकीय सहयोग से अपना भविष्य लिख
रही है. महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी वर्षों पूर्व
नक्सलवादियों के विरुध्द जनजागरण अभियान चलाया था लेकिन वह टांय टांय फिस्स हो गया
था. अन्य आदिवासी नेताओं के साथ महेन्द्र कर्मा पर भी मालिक मकबूजा की अवैध वृक्ष
कटाई को लेकर लाखों रुपये डकारने की लोकायुक्त रिपोर्ट है.
इस
सिलसिले में सी.बी.आई. ने भी मामला पंजीबध्द किया है. देश की यह महत्वपूर्ण जांच
एजेंसी लेकिन इस मामले को लेकर खुद कटघरे में है. कांग्रेस के विधायकों का बहुमत
सलवा जुड़ूम के पक्ष में नहीं है-ऐसी राजनीतिक गलियारों में चर्चा है. पार्टी
हाईकमान और केन्द्र सरकार दीखने में अलग अलग लेकिन आचरण में एक हैं. पूर्व
मुख्यमंत्री अजीत जोगी का खेमा अलबत्ता सलवा जुड़ूम का विरोध करने के कारण सुर्खियों
में है. यही हाल फिलहाल पूर्व कांग्रेसी मंत्री अरविंद नेताम का भी है.
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बस्तर में अघटित घटित हो रहा है. मुख्यमंत्री रमन सिंह का दो टूक कहना है कि जो
आदिवासी सलवा जुड़ूम के शिविर में हैं, वे हमारे साथ हैं और जो आदिवासी जंगलों में
हैं, वे नक्सलियों के साथ हैं. यक्ष प्रश्न यह है कि जो आदिवासी अपने घरों में रहना
चाहते हैं वे किसके साथ हैं? प्रतिप्रश्न यह भी है कि जो अपने घरों में रह रहे हैं
क्या वे आदिवासी हैं अथवा केवल गैर आदिवासी ही अपने घरों में रह पाने का अधिकार
रखते हैं? पूरक प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के रहते हुए
जिसमें स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार गारंटीशुदा है कोई भी निर्वाचित सरकार उसे
अपने किसी अभियान में शामिल करने का दबाव बनाकर अपने घर और परिवेश से बेदखल कर सकती
है?
ऐर्राबोर जैसे सलवा जुड़ूम के शिविर पर नक्सली हमला स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी घृणित
हिंसात्मक घटनाओं में एक है. लेकिन क्या इसकी जिम्मेदारी और दोष केवल नक्सलियों के
माथे पर लीप देना चाहिए? जो सरकार ऐसे शिविरों में लगभग बंधक बनाए गए आजाद देश के
नागरिकों की जीवन रक्षा नहीं कर सकती क्या उसे संविधान का उल्लंघन करने का दोषी
करार नहीं दिया जाना चाहिए? सलवा जुड़ूम एक बहता हुआ नासूर है जिससे किसी घाव को
सुखाने की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए. ऐसे खतरनाक राजनीतिक प्रयोग विश्व के किसी भी
लोकतंत्र में नहीं हो रहे हैं- अमेरिका में भी नहीं और उसके विपरीत फिलिस्तीन
संघर्ष में भी नहीं.
नक्सलवादियों के लिए मीडिया ने 'माओवादी' शब्द गढ़ा है. इस शब्द के अनेक फलितार्थ
हैं. फिर भी यदि हिंसा और गुरिल्ला युध्द के जरिए राजनीतिक सत्ता हथियाने की कोशिश
नक्सलवादियों द्वारा की जाती है तो उसका राजनीतिक समाधान संभव और वांछनीय है.
केन्द्रीय गृह मंत्री जब यह फरमाते हैं कि जब तक माओवादी हथियार नहीं फेंक देते उनसे
बातचीत संभव नहीं है. तब माओवादियों की वकालत किए बिना यह प्रतिप्रश्न पूछा जा सकता
है कि यदि सरकारें भ्रष्टाचार करना छोड़ दें तब ही माओवादी उनसे बात करना चाहें तब
इसका क्या उत्तर होगा. हथियार तो हाथ में हैं. वे सरकारों द्वारा काटे भी जाते हैं.
भ्रष्टाचार तो लेकिन तंत्र में है. जेहन में है. नीयत में है. उसे कैसे अलग किया
जाए.
यह
दावा करना कि जो जंगल में है फकत माओवादी है-जंगल और इस तरह वन संस्कृति के
अस्तित्व को नकारना है. जो जल, जंगल और जमीन के साथ है वही तो आदिवासी है. आदिवासियों
की जमीनें छीनी जा रही हैं. हरसूद नाम का शहर पाताल लोक का हिस्सा बन गया. उसे
भूगोल के नक्शे से मिटाया गया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक ने विस्थापित आदिवासियों की
बसाहट को सरदार सरोवर बांध के निर्माण की पूर्व शर्त नहीं माना. गंगा सूख रही है.
टिहरी गढ़वाल विनाश के कगार पर है. लेकिन विस्थापित वनवासियों से कानून का सरोकार
रस्मअदायगी की तरह है.
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नक्सलवाद के कहर के बावजूद उसके जवाब में
बुनियादी सुविधाओं का अब भी अभाव है. राज्य के निजी क्षेत्र के अधिकांश बड़े बड़े
कारखाने उन भूमियों पर काबिज हैं जिन्हें या तो खरीदा नहीं जा सकता अथवा उनका
नियमों के अनुसार व्यपवर्तन नहीं कराया गया है. |
कोई सरकारी अफसर या कर्मचारी बस्तर नहीं जाना चाहता. उसके लिए वह काले पानी की सजा
के बराबर है. राज्य सरकार के आंकड़ों में बस्तर के स्कूलों, अस्पतालों और अन्य जनसेवी
माध्यमों की न्यूनता साफ साफ दिखाई देती है. नक्सलवाद के कहर के बावजूद उसके जवाब
में बुनियादी सुविधाओं का अब भी अभाव है. राज्य के निजी क्षेत्र के अधिकांश बड़े बड़े
कारखाने उन भूमियों पर काबिज हैं जिन्हें या तो खरीदा नहीं जा सकता अथवा उनका नियमों
के अनुसार व्यपवर्तन नहीं कराया गया है. सरकार है कि खामोश है. राज्य के आर्थिक
स्त्रोतों पर कुछ बाहरी लोगों का खुले आम कब्जा है. लेकिन आदिवासियों के लिए
पर्याप्त नौकरियों की गारंटी तक नहीं है. बस्तर का अप्रतिम लौह अयस्क औने पौने देशी
विदेशी व्यापारियों को बेचा जा रहा है. वहां नए कारखाने लगाए जा रहे हैं लेकिन
स्थानीय लोगों को पर्याप्त रोजगार मिलने की कोई गारंटी या संभावना नहीं है.
मगरमच्छ के आंसुओं को मानसून नहीं कहा जाता. नक्सलवाद इसके बावजूद अनेक आर्थिक
कुतर्क भी कर रहा है. वह तेंदूपत्ता तोड़ने वाले आदिवासी मजदूरों की सहकारी समितियों
का विरोधी है क्योंकि वह तेंदूपत्ता व्यापारियों से मजदूरों के लिए ज्यादा
पारिश्रमिक दिलाने के दावों से संतुष्ट है. वह स्कूलों के भवन डेटोनेटर लगाकर उड़ा
रहा है क्योंकि इन भवनों में उसके अनुसार पुलिस और अर्धसैनिक बल के सिपाही ठहराए
जाते हैं. उस पर आदिवासियों के अपहरण, डकैती और हत्या के आरोप भी दर्ज हैं.
नक्सलवाद को यह अधिकार नहीं है कि वह एक संविधानसम्मत राज्य परिकल्पना को वहशी हिंसा
के दम पर तहस नहस करने का दंभ पाले. उसे अधुनातन देशी विदेशी हथियार भी अज्ञात
स्त्रोतों से मिलते हैं. वह श्रीलंका से लेकर नेपाल तक हमसफर विचारधारा का सुरक्षित
गलियारा भी बनाना चाहता है ताकि भारत को खंडित किया जा सके. तस्वीर के इस पहलू से
चिंतित होना लाजिमी है. लेकिन तस्वीर का यह पहलू माता पिता की दूसरी संतान है. पहली
संतान यदि निकम्मी, गाल बजाने वाली और गैर जिम्मेदार होगी तो दूसरी संतान यदि घर
तोड़ू, उच्छृंखल और कानून विरोधी हो जाए तो तस्वीर के दोनों पहलुओं को साथ साथ बदलने
की जरूरत है.
हमारी कानून बनाने वाली भारत सरकार इन दोनों बिगड़ैल बच्चों की मां है. उसने 1996
में पंचायती राज को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू करने का कानून बनाया लेकिन उसे
इरादतन लागू नहीं किया जा सका. आदिवासी नागर संस्कृति के वंशज नहीं हैं. वे एक साथ
दब्बू, विनयशील और स्वाभिमानी होते हैं. प्रदेश सरकार की बस्तर वेबसाइट के अनुसार
गोंड़ जाति को अधिक संतानोत्पत्ति करने वाला, भाई तथा बहन में शादी करने वाला और
मुड़ियाओं को दवा के बदले महुआ की शराब पीने वाला चित्रित किया गया है. अबूझमाड़ियों
को सफाई की आदतों के विरुध्द बताया गया है और कुल मिलाकर उनकी ऐसी तस्वीर पेश की गई
है जो ऐतिहासिक दृष्टि से सही भले हो अपनी समकालीनता में भयावह लगती है.
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सवाल यह है कि इस गहरे सामासिक बोध को लेकर क्या केवल सरकारी सोच पर निर्भर रहा जाए.
भारत के संविधान रचने से लेकर उसकी अनुसूचियों में आदिवासियों की रक्षा और अधिकारों
को लेकर केन्द्र सरकार ने समय समय पर महत्वपूर्ण आयोगों और समितियों का गठन किया
है. क्या प्रदेश की सरकार ने सलवा जुड़ूम अभियान शुरू करने के पहले देश के शीर्ष
आदिवासी बुध्दिजीवियों और विख्यात समाजशास्त्रियों से मशविरा करने की कोई जरूरत
महसूस की है? क्या रमन सिंह और महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ के राजनीतिक आकाश के दो
नक्षत्र हैं जो 36 गढ़ को 63 गढ़ बनाने की कला के पारंगत कलाकार हैं?
दोनों की शिक्षा, संस्कार, ट्रेनिंग और अनुभव उन्हें सक्रिय राजनीति में संयोगों के
कारण अपनी भूमिका से लैस किए हुए हैं. उन्हें छत्तीसगढ़ का दार्शनिक, प्रवक्ता या
भविष्य निर्माता समझने की भूल इतिहास नहीं करना चाहेगा. सत्ता में आना या जाना एक
पंचवर्षीय राजनीतिक प्रक्रिया का फलितार्थ है लेकिन 'हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी
पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा' जैसे नेता वे नहीं हैं.
सरकारें संविधान प्रदत्त अधिकारों के तहत आचरण करने के लिए अपने विवेक पर निर्भर
हैं. एक खतरनाक राजनीतिक सामाजिक प्रयोग जो बस्तर के लिए एक तरह का डयासपोरा (जिसमें
यहूदियों को अपना देश सदियों के लिए छोड़ना पड़ा था) रच रहा है, आदिवासी विहीन बस्तर
राज्य की परिकल्पना सार्थक कर रहा है. यह तो गंगा को नहरों में तब्दील करने जैसा
कुचक्र है. यह तो बिना डेनमार्क का राजकुमार हुए हैमलेट को चरितार्थ करने की कोशिश
है. ऐसे दुष्कर्म के लिए संविधान इजाजत नहीं देता. उच्च न्यायालय में दायर की गई एक
जनहित याचिका में यह भी सुझाया गया है कि सलवा जुड़ूम के प्रकोप के कारण जो गांव और
भूमियां आदिवासियों से रिक्त हो रहे हैं उन्हें निजी क्षेत्र में लगने वाले लोहे के
कारखानों को सौंप देना चाहिए. क्या सरकार, विपक्ष के नेता, सलवा जुड़ूम और निजी
क्षेत्र के कारखाने एक साथ हैं?
पूर्ववर्ती सरकारें भी साफ पाक नहीं रही हैं. यदि रहतीं तो मौजूदा सरकार को इतनी
मुश्किलें और अपयश झेलने की नियति नहीं होती. बस्तर में लोकसभा, विधानसभा और अन्य
संस्थाओं के चुनावों के परिणाम राजनीतिक तिकड़मों के चलते लगभग पूर्व घोषित होते आए
हैं. बस्तर के आदिवासी मतदाताओं के थोक बंद वोट बिहार से अलग शैली में निर्वाचन
केन्द्रों में छापे जाते रहे हैं. इस राजनीतिक तिकड़म के बाद अब सामाजिक, आर्थिक
तिकड़म के दौर में देश आ गया है.
बस्तर का आर्थिक विकास करने के नाम पर उसके सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन को नेस्तनाबूद
करने के कुचक्र में वैश्वीकरण का हाथ क्यों नहीं हो सकता. छत्तीसगढ़ के सीमेंट
उद्योग को वैश्विक संस्थाओं ने हथिया ही लिया है. अब उनकी नजर इस्पात उद्योग पर है.
देश के निजी कारखाने कब तक उनका तेवर झेल पाएंगे. छत्तीसगढ़ वह चारागाह है जहां देशी
गायों के रेवड़ में विदेशी सांड़ कभी न कभी मुंह जरूर मारेंगे. मुहूर्त भी विदेशी
सांड़ ही तय करेंगे. उन्हें अलबत्ता पृष्ठभूमि में देशी गायों की जरूरत कुलबुलाती
रहती है.
सलवा जुड़ूम एक दुधारी राजनीतिक तलवार है. वह आदिवासी की देह और आत्मा को दो तरह से
दो बार और दो प्रयोजनों के लिए मारती है. अंग्रेज ने हिन्दू और मुसलमान कौमों को
अलग कर उन पर राज किया था. उससे कहीं आगे बढ़कर सलवा जुड़ूम वह वायरस है जो आदिवासियों
को दो खेमों में खड़ा करता है. एक वह जो पुलिस और सरकार के भय से उत्साहित दिखाया
जाकर शांति पाठ और हथियारों से नक्सलवाद समर्थकों को ललकारता है तो दूसरा वह जो
नक्सलवाद की खाल ओढ़कर स्त्रियों और बच्चों के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी ही संस्कृति
के मानस पुत्रों का निर्मम वध करना चाहता है. भिखारियों की तरह बदहाली में रह रहे
कुपोषण, चिकित्सकीय असुविधा और जीवन यापन की मानवीय गरिमा से च्युत और नक्सलवादी
संगठनों के बंधक बने असमर्थ लाचार और मूक आदिवासी भाई और बहन इक्कीसवीं सदी की
इंसानी सभ्यता के कैसे हस्ताक्षर हैं?
एक
भयानक हादसा महीनों से घटित हो रहा है और न जाने सभ्यता का यह नासूर कब तक अपना
विध्वंस जारी रखेगा. लोकतंत्र का अंकुश लोकमत में ही होता है. यह दुर्भाग्य है कि
भारतीय लोकतंत्र अपनी कथित परिपक्वता की डींगें मारने के बावजूद जब जब चारों खाने
चित्त गिरता है, उसे लोकमत की बैसाखी नहीं मिलती. दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत होने
के बावजूद हिन्दुस्तान आज भी छत्तीसगढ़ और बस्तर में कबाइली परंपराओं का पक्षधर ही
तो सिध्द हो रहा है. कुछ शहरी नागरिकों को आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए
भारत सरकार के मंत्री आतंकवादियों को छोड़ते हैं. एक राजनेता की बेटी को बचाने के
लिए ऐसे ही समझौते किए जाते हैं. लेकिन बस्तर के नामालूम आदिवासी कौन सी मानव इकाइयां
हैं जिनको जिंदा रखने की गारंटी सरकारों के हाथों में वसीयत की तरह संविधान सौंपता
तो है लेकिन सरकारें संविधान को ही किसी बीमार बूढ़ी धार्मिक इमारत की तरह गिरा देती
हैं.
तब
उस संविधान से उन व्यक्तियों की सुरक्षा और जिंदगी की कैसे उम्मीद की जा सकती है
जिन्हें महात्मा गांधी ने समाज का अंतिम व्यक्ति कहा था. क्या रमन सरकार के हाथों
में वह ताबीज है जिसे टटोलकर बार बार यह देखा जाए कि उसके हर निर्णय के पीछे समाज
के अंतिम व्यक्ति को कोई खतरा तो नहीं है. अथवा सरकारें बीत गए युग के सामंतवादी
वैभव में मशगूल हैं जहां किसी क्षत्रिय शासक के दरबार में बस्तर का मशहूर
करमा-नृत्य मनोरंजन के नाम पर जबरिया कराया जा रहा हो.
उपरोक्त दावों और प्रतिदावों के बीच तटस्थ, वस्तुपरक और सापेक्ष दृष्टि रखने वाले
व्यक्तियों और समाज समूहों का उत्तरदायित्व घनीभूत हो जाता है जो इस पूरे प्रकरण
में न केवल निष्पक्ष राय रखते हैं बल्कि उन्हें यह कचोटता भी है कि जब हमारे आदिवासी
भाई और बहन नक्सलवादी तथा पुलिस और सलवा जुडूम की संयुक्त सरकारी हिंसा के बीच फंस
गए हैं तब उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सबको सामने क्यों नहीं आना चाहिए.
गांधी-समाज एक ऐसा ही जीवित वर्ग है जो इस पूरी समस्या से बाखबर होने के कारण बेखबर
नहीं रह सकता.
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सवाल यह है कि गांधी-दृष्टि से इस पूरे मसले को किस तरह खंगाला जाए. यह भी सच है कि
बापू को भारत की अन्य समस्याओं तथा जातियों एवं वर्गों के मुकाबले आदिवासी क्षेत्रों
में काम करने का अवसर और समय इतिहास ने नहीं दिया. ठक्कर बापा जैसे विश्वस्त
सहयोगियों के आधार पर बापू ने आदिवासी भाइयों और बहनों की भी व्यापक चिंता जरूर की
थी. उनकी ये चिंताएं संपूर्ण गांधी साहित्य में बिखरी पड़ी हैं. ये चिंताएं यद्यपि
बापू ने अपने समय में की थीं, फिर भी इनमें ऐसे बीजाणु छिपे हुए हैं जिनसे इनकी
अनदेखी नहीं की जा सकती.
बापू ने कहा था कि अनुसूचित जातियों (तब हरिजनों) की तरह आदिवासियों पर भी तथाकथित
सभ्य समाज ने बहुत अधिक जुल्मो सितम ढाए हैं. यह गांधी का कहना था कि अपने 18
सूत्रीय रचनात्मक कार्यक्रम में उन्होंने आदिवासियों की सेवा को 16 वें क्रमांक पर
रखा है जिसका उन्हें पश्चाताप है. किसी भी कीमत पर आदिवासी भाइयों और बहनों की सेवा
के काम में कोताही नहीं की जा सकती. इस उपेक्षा को हिंदू धर्म की जाति प्रथा से
जोड़ते हुए गांधी ने आगाह किया था कि अवर्ण और सवर्ण के चक्कर में यदि आदिवासियों के
साथ ज्यादती की जाएगी तो वह लोकतंत्र का निषेध होगा. यह चेतावनी भी गांधी ने दी थी
कि यदि उन वर्गों का लगातार शोषण जारी रखा जाएगा तो उसका यही मतलब होगा कि हम नहीं
चाहते कि भारत जीवित रहे. बल्कि हम उसे नष्ट कर देना चाहते हैं.
गांधी जी ने दलितों और आदिवासियों के लिए शिक्षण कार्यक्रम चलाने और उनका जीवन स्तर
सुधारने के लिए कई साग्रह और सार्थक समझाइशें दीं. यह गांधी थे जिन्होंने इन वर्गों
को बिना किसी भेदभाव के मतदाता सूची में शामिल करने का आग्रह किया. वे आदिवासियों
की दशा को लेकर पूरे जीवन चिंतित रहे. उन्होंने यहां तक कहा कि यदि इन वर्गों की
आर्थिक सामाजिक हालत को सुधारा नहीं गया तो यह समझा जाएगा कि हिंदुत्व को आत्महत्या
करनी है.
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गांधी ने कहा था कि अंग्रेजी पध्दति की संसद
एक वेश्या है जो प्रधानमंत्री के इशारे पर नाचती है. गांधी ने कहा था कि अंग्रेजी
पध्दति की नौकरशाही और न्यायपालिका भारत के किसी काम की नहीं है. |
गांधी जी ने यह तर्क भी रखा था कि आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों का काम हालांकि
संतोषप्रद और अच्छा रहा है फिर भी उन्हें शक है कि उनका मूल मकसद सेवा करने के साथ
साथ धर्म परिवर्तन कराना भी रहा है जिससे आदिवासी न केवल धर्मांतरित हो जाएं परंतु
वे अभारतीय भी हो जाएं. इसलिए महात्मा ने यह साफ किया था कि छुआछूत की भावना को
मिटाने के साथ साथ आदिवासी-उन्नयन, महिला अधिकारों का सशक्तिकरण तथा गरीब और अमीर
के बीच की खाई को पाटने का काम सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए.
अहिंसा के इस पुजारी ने सामाजिक विग्रहों के चलते इन समस्याओं को सुलझाने के लिए एक
कालजयी चेतावनी भी बिखेरी थी. गांधी से पूछा गया था कि अहिंसा को व्यावहारिक और
प्रगतिशील बनाने के लिए क्या लोग एक दूसरे को गिरफ्तार कर सकते हैं. पलायन कर सकते
हैं. भूमिगत हो सकते हैं और बिना किसी को मारे पीटे या हत्या किए दूसरों की
संपत्तियां नष्ट कर सकते हैं. तब इस सवाल को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने गांधी
से ''अहिंसा की विवेकपूर्ण स्वीकृति'' के तहत राय मांगी थी.
गांधी जी ने सपाट उत्तर दिया कि यदि अहिंसा के सभी अनिवार्य और अंतर्निर्भर पक्षों
को भुला दिया गया तो अहिंसा अहिंसा ही नहीं रह जाएगी. उसमें से सत्य ही निकल जाएगा
और हम कभी भी स्वराज हासिल नहीं कर सकेंगे. उन्होंने कहा था कि यदि दूसरों की
संपत्ति को नष्ट करना, शासकीय कर्मियों का बहिष्कार करना और भूमिगत हो जाना आदि
कृत्यों को वैधता दी जाएगी तो न तो हम भारत के करोड़ों लोगों को जगा सकते हैं और न
ही इन्हें अभय का प्रशिक्षण दे सकते हैं. गांधी ने यह भी कहा था कि 1935 का
गर्वनमेंट ऑफ इंडिया एक्ट वह पहला खलनायक दस्तावेज है जिसमें आदिवासी इलाकों को 'पृथक
क्षेत्र' घोषित कर और उनका नियंत्रण जिला प्रशासन के जरिए राज्यपालों को सौंपकर एक
त्रासद मजाक किया गया है.
इस
वजह से आदिवासी राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा से कट गए हैं. उन्हें अलग अलग खांचों
में जकड़ दिया गया है और अनावश्यक रूप से राज्य शक्ति ने उन्हें आदिवासी का दर्जा
दिया है. गांधी ने कहा था कि जो हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का अनिवार्य अंग हैं,
उन्हें सामाजिक जीवन की मुख्यधारा से अलग करना राष्ट्रीय शर्म की बात है. बापू के
अनुसार इस समस्या का हल केवल रचनात्मक कार्यों को हाथ में लेकर ही किया जा सकता है.
ऐसा रचनात्मक कार्य करने से कोई किसी को नहीं रोक सकता. ऐसे रचनात्मक कार्य करने
में यदि जेल भी जाना पड़े तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए. गांधी ने कहा था कि ऐसा सब
कुछ उन्होंने चम्पारण सत्याग्रह के दौरान किया ही था.
'हिंद स्वराज' में गांधी ने कहा था कि अंग्रेजी पध्दति की संसद एक वेश्या है जो
प्रधानमंत्री के इशारे पर नाचती है. गांधी ने कहा था कि अंग्रेजी पध्दति की
नौकरशाही और न्यायपालिका भारत के किसी काम की नहीं है. उन्होंने आजादी के बाद
राजनेताओं के लिए त्याग के मानक आदर्श भी गढ़े थे. लेकिन गांधी क्या इस बात को नहीं
जानते थे कि सत्ता लोलुपता भारतीयों का भी एक लक्षण है. क्या हमारा पूरा इतिहास
इसकी भी बानगी नहीं है? ऐसे में वही होना था जो हो रहा है. तथाकथित लोकतंत्रीय
विचारधारा की बुनियाद के नीचे और उसके बरक्स एक हिंसक विचार लगातार कायम है कि
राजनीतिक प्रशासनिक अन्याय का बदला हिंसा बल्कि समूहगत हिंसा के जरिए ही लिया जा
सकता है.
नक्सलवाद देश के सबसे पिटे हुए अवाम की निराशा का फायदा यदि उठाता है तो उसे अकेले
दोष कैसे दिया जा सकता है. पहले उसकी यह प्राथमिकता थी कि वह सर्वहारा के लिए इस
देश का निर्माण करे लेकिन वह सब कुछ हो उसकी ही शर्तों पर. अब वह प्रकारांतर से देश
के बदले अपना निर्माण करने में मशगूल है लेकिन सर्वहारा को वही अदना भूमिका देने का
पक्षधर है. उसे नेपाल की तरह सत्ता पर पहुंचना है और अपने अलग अलग प्रादेशिक बंधुओं
से जंगलों के कॉरीडोर से गुजरकर गलबहियां करनी हैं और उसे ही इतिहास पथ बताना है.
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'नागरिक समाज' जैसा संबोधन एक अव्यक्त, लिजलिजा और अस्पष्ट कथन है. पढ़ा लिखा,
सुविधाभोगी, क्रांति से तटस्थ लेकिन इसके बावजूद भविष्य के प्रति आशा लिए हुए एक
समाज शहरों में जी रहा है. उसके परिवार में कोई न कोई बेरोजगार जरूर है लेकिन वह एक
न एक सदस्य को विदेशों में नौकरी करने भेजकर पूरे शहर में ऐंठना भी चाहता है. वह
टेलीविजन को सबसे बड़ा संस्कृति उन्नायक समझता है. वह दीवानखानों में गप्प मारने को
चिंतन करना समझता है. उससे जुड़ी हुई अफसरशाही गरीब, लाचार और मुफलिस को अपनी समझ,
संगति और प्रयोजन के लिए लायक नहीं समझती. उसके जेहन में है कि वाकई अंग्रेज ने
क्या गलत किया था, यदि वह इन्हें कोड़े मारता था.
इसके बावजूद इस नये नागरिक समाज में कुछ आदर्शवादी तत्व भी हैं जो अपवाद की तरह
भविष्य के किसी नियम को सिध्द करना चाहते हैं. ये उन स्वैच्छिक संगठनों से अलग हैं
जो देश विदेश से धन कबाड़ते हैं और समाजसेवा का शोशा पिकनिक की मुद्रा में छोड़ते
हैं. वे उन राष्ट्रवादियों से भी अलग हैं जो सरकारी अफसरों के गुण गायन करते घूमते
हैं ताकि उन्हें पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकित किया जा सके. वे खुली सार्वजनिक
बहसों से बचना चाहते हैं लेकिन प्रायोजित सम्मेलनों में डींगें मारते थकते नहीं
हैं.
इसमें फिर कोई शक नहीं कि वैश्वीकरण के दौर में बस्तर में बड़ी निजी कंपनियों द्वारा
लूट का साम्राज्य कायम किया जा रहा है और आदिवासी के हलक में षासन का भय ठूंसा जा
रहा है. इन विपरीत परिस्थितियों से जनसमर्थन जुटाकर लड़ना नक्सलवाद के मूल
उद्देश्यों, आग्रहों और संकल्पों में रहा है. लूट तो बड़े और मझोले व्यापारी तथा बड़े
सरकारी अफसर और राजनेता कर रहे हैं लेकिन तथाकथित सजा ए मौत उन गरीब आदिवासी बेटों
को नक्सलवादी दे रहे हैं जो पेट की रोटी के वास्ते पुलिस में भरती हो रहे हैं.
बच्चे, स्त्रियां और बूढ़े बुजुर्ग भी नक्सलवादी हिट लिस्ट में बढ़ते जा रहे हैं.
वह
तथाकथित जनआंदोलन या वैचारिक अज्ञान यदि मासूम लोगों की हत्या करता है तो वह वर्ग
चरित्र के समाज से लड़ने वाला अपना चरित्र खो देता है. बस्तर और सरगुजा में यही हो
रहा है. आदिवासी अधिकारों की लड़ाइयां अब भी कई वामपंथी और गांधीवादी संगठन लड़ रहे
हैं. भले ही सरकार के आरोपों के अनुसार उनकी पीठ पर नक्सलवादियों का हाथ कहा जाए.
इस देश में स्वैच्छिक संगठनों और मानव अधिकार के रक्षकों ने अपनी प्रतिष्ठा में
बहुत बट्टा लगाया है. ऐसे बहुत से संगठन साम्राज्यवादियों के कुचक्र के कारण फलफूल
रहे हैं जिनकी निंदा ठीक ही धुर वामपंथियों ने की है.
कोई
नहीं बताता कि इन संगठनों के पास पसीना बहाए बिना अकूत धन कहां से आता है और वह किस
तरह खर्च होता है. ऑडिट और इन्कम टैक्स विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठे होते हैं. जो
सरकारें ऐसे संगठनों की आलोचना करती हैं वे खुद इन्हें धन आवंटित क्यों करती हैं और
इनके धन श्रोतों की जांच क्यों नहीं करतीं. सरकारों का यह दोहरा आचरण उन्हें जनता
के न्यायालय के कटघरे में खड़ा करता है. मानव अधिकार संगठन उतनी ही मुस्तैदी से
निर्दोष लोगों के मारे जाने पर विरोध क्यों नहीं करते. केन्द्र और राज्य सरकारों के
बड़े अफसर छत्ताीस का आंकड़ा बिठाकर उन तत्वों की मदद क्यों करते हैं जिनसे छत्तीसगढ़
सहित अन्य राज्यों की राजनीतिक समस्याओं के हल तलाशने में असफलताएं हाथ लगती हैं.
सरकारें जनता के अधिकारों की कटौती करने वाले कानून तो बनाती हैं लेकिन उन पर
शिकंजा क्यों नहीं कस पातीं जिनकी गर्दनों को नापने के लिए ये कानून बनाए गए हैं और
उनका खमियाजा साधारण जनता भुगत रही है.
देश की तरह छत्तीसगढ़ भी एक जन चौपाल है. ऐसे युवकों और बुजुर्गों की कमी नहीं है
जिनमें अपनी धरती के लिए संस्कार और कसक अब भी बाकी है. किसी एक पक्ष का समर्थन
करने के बदले यदि न्याय, नैतिकता और समानता के लिहाज से एक सार्थक संवाद किया जाए
तो हर समस्या का हल निकाला जा सकता है. इराक, वियतनाम, बियाफ्रा, हिटलर, नामीबिया,
अफगानिस्तान, हिरोशिमा जैसे यादघर हैं जिनसे मनुष्य की समस्याओं का हल कहां निकला
है. हिंसा का जहर यदि इसी तरह छत्तीसगढ़ में घुलता जाएगा तो हम अपनी उस संस्कृति से
वंचित हो जाएंगे जो दुनिया के लिएर् ईष्या, जिज्ञासा और उपलब्धि का विषय रही है.
सब
कुछ सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि सरकारें सब कुछ नहीं होतीं. एक सभ्य
नागरिक समाज के अपने स्वनिर्मित कर्तव्य भी होते हैं. आज छत्तीसगढ़ का जनजीवन एक
मांग कर रहा है कि उसे उन सभ्य मूल्यों से लीपा जाए जो उसका नैसर्गिक, संवैधानिक और
राजनीतिक अधिकार है. छत्तीसगढ़ ने ऐसे मूल्यों के बहुत से मनीषी देश के इतिहास को
दिए हैं. हम नामालूम, गुमनाम इकाइयां ही सही लेकिन अपने अनगिनत शलाका पुरुषों के
काबिल वंशज क्यों नहीं बनना चाहेंगे?
मानव अधिकार सबके लिए बराबर हैं. किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या एक दांडिक अपराध
है. शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन करना एक लोकतंत्र समर्थित प्रक्रिया है. आदिवासी
भाई बहनों को अपने घर और परिवेश में रहने का हक है. उनकी संस्कृति को नष्ट करना
उनकी हत्या करने के बराबर अपराध है. वैश्वीकरण तो भारत जैसे देश के लिए कैंसर से कम
नहीं है लेकिन सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद नक्सलवादी हिंसा का समर्थन करना
भारत के संविधान के प्रति अविश्वास करना होगा. संविधान में विरोध करने की अकूत
संभावनाएं हैं.
जनमत ही लोकतंत्र का असली तत्व है. उसे डरा धमका कर या फुसला बहकाकर या उसके अंदर
व्यवस्था के दलाल छोड़कर बस्तर और सरगुजा समेत भारत के आदिवासी इलाकों का भला नहीं
होने वाला है. आंध्रप्रदेश अपनी बीमारी छत्तीसगढ़ में भेज दे. छत्तीसगढ़ उसे
महाराष्ट्र या ओड़िसा भेज दे. ओड़िसा उसे झारखंड, बंगाल और बिहार में स्थानांतरित कर
दे. उससे क्या होगा. यही तो भारत के सबसे गरीब राज्य हैं. जिन राज्यों में गुजरात,
राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और तमिलनाडु जैसी बेहतर हालत है वहां जंगल कम होने से
नक्सलवाद भी नहीं के बराबर है. वन संपदा की ताकत पर्यावरण की दृष्टि से भविष्य की
ताकत है. यदि इन कम विकसित राज्यों में नक्सलवाद जैसी समस्या का हल निकल आए तो ये
राज्य भविष्य की समृध्दि के राज्य होंगे.
शेष अगले सप्ताह
10.11.2008,
20.50 (GMT+05:30)
पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | दीपक (deepakrajim@gmail.com) ्कुवैत | |
| | आपके एक एक शब्द अंतर तक जाते है !! मगर जो समझदार है वो कुछ कर नही सकते और जो कुछ कर रहे है या कर सकते है उनकी समझदारी पर ही सवाल खडे है ? | |
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| | Vishwa Mohan tiwari (onevishwa@gmail.com) Noida | |
| | The picture that kanak tiwari is painting, by and large, corresponds to reality.. But he does not clearly bring out the difference in the actions or policies between BJP and Congress. Has Salawa judum got no good points? Is a solution possible? | |
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| | वृजनंदन चौबे (vrijnandanchaube@gmail.com) दिल्ली | |
| | धन्यवाद, तिवारी जी ऐसे ज्वलन्त मुद्दों से हमेसा हमारा परिचय कराते रहें .आगे भी मैं आपसे ऐसी अपेक्षा रखता हूँ. | |
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