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कनक तिवारी | बस्तर में नक्सली हिंसा | Kanak Tiwari

बहस

 

बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-दो

कनक तिवारी


 

बस्तर में नक्सली हिंसा, सलवा जुड़ूम और गांधी की दुर्दशा-एक

सलवा जुड़ूम नाम का यंत्र कांग्रेस भाजपा युति की औरस संतान के रूप में परिचित और प्रचारित किया गया. यह भारतीय राजनीति का अजूबा त्रिशंकु है जिसका कोई सानी नहीं है. इसे महात्मा गांधी की तर्ज पर शांति मार्च का नाम दिया गया. गांधी की अहिंसा अभय पर आधारित थी. नक्सलवादियों और पुलिस के दोहरे तंत्र से भयभीत आदिवासी शांति मार्च के पथिक नहीं हैं. वे खुद की शव यात्रा में शामिल मातमी हैं.

bastar

 

आज महानगरों तक की यह हालत है कि यदि कोई चोर, डाकू या हत्यारा घुस आए तो तथाकथित सिविल सोसाइटी के झंडाबरदार पड़ोसी तक की मदद को नहीं आते. सामाजिक करुणा और सरोकार का लोप होता जा रहा है. ऐसे में शिक्षा, आर्थिक खुशहाली और संचारतंत्र से सर्वथा अछूते बस्तर के आदिवासी शांति मार्च जैसे गांधीवादी हथियार का इस्तेमाल करने के लायक प्रबुध्द और संकल्पित हो गए हैं-ऐसा कौन मानेगा? पुलिस की दहशत और राज्यतंत्र के अदृश्य डंडे की मार से कोई छ: सौ गांव एक लक्ष्यहीन हुजूम में बदलने के लिए खाली कराए गए हैं.

 

उनकी पीठ पर पुलिस की बंदूक की सरपरस्ती है जिसे नक्सलवादियों को निशाना नहीं बनाने की महारत हासिल है. पुलिस के कई आला अधिकारी देखने मात्र से सरे आम शराबखोर, पस्तहिम्मत और तिकड़मी नज़र आते हैं. वे एक किलोमीटर तक दौड़ नहीं पाते. वर्जिश तो करते ही नहीं. बड़े अधिकारियों और राजनेताओं की चाटुकारिता से उन्हें फुर्सत ही कहां होती है. अंग्रेजी बुध्दिराज की भारतीय पुलिस ठेले, खोमचे और रिक्शे वालों सहित वाहनों से चौथ वसूलने की विशेषज्ञ हो गई है. उसे कारखानों और दूकानों से समय समय पर सीधा मिलता रहता है जो पूजा पाठ कराने वाले ब्राम्हणों को मिलता रहा है.

 

श्रेष्ठ नौकरशाही टी शर्ट, जींस, व्हिस्की, क्लब, अंग्रेजी और हवाई उड़ानों में अधिकतर व्यस्त है. वह कंप्यूटर और इंटरनेट पर मैदानी समस्याओं का हल ढूंढ़ती है. वह अधकचरी पढ़ाई से युक्त राजनेताओं को राजदर्शन की घुट्टी पिलाती रहती है. एक जमाना था जब श्रेष्ठ नौकरशाही और भ्रष्टाचार एक दूसरे के दुश्मन थे. भ्रष्टाचार जहां का तहां है. नौकरशाही ने उससे दोस्ती कर ली है. राजनेताओं की तो कौम ही अपने पूर्वजों के वंश से बेदखल हो गई है. वे पांच वर्ष में तीस वर्ष की उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं. राजीव गांधी ने अपनी पार्टी में सत्ता के कुछ दलाल देखे होंगे. यदि वे आज होते तो सत्ता के दलालों ने उनकी ही पार्टी में उनकी मुश्किलें बढ़ा दी होतीं.

बस्तर में व्याप्त नक्सलवाद बहुप्रदेशीय है. उसे महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा के रास्ते मदद मिलती है. बिहार और बंगाल में भी नक्सलवाद है लेकिन इन प्रदेशों में सलवा जुड़ूम नहीं है. यह अनोखा कथित जनअभियान स्पंदनहीन आदिवासियों का कारवां है जो बताए गए रास्ते पर चलते रहने अभिशप्त हैं. मुक्तिबोध ने अपनी अमर कविता 'अंधेरे में' में ऐसी ही भयावहता की कल्पना की थी. विनोद कुमार शुक्ल ने आदिवासियों की कातरता का ठंडा, तीखा लेकिन मार्मिक बयान किया है.

 

यह जगजाहिर है कि दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के कई नेता बस्तर में एक बड़ी संपत्ति के मालिक हैं. उनकी दिन दूनी रात चौगनी तरक्की हुई है. आदिवासी जनसंख्या को वे अपना गुलाम या पिट्ठू समझते हैं, अपना भाई या साथी नहीं. आदिवासी अफसर बड़ी नौकरी में आने के बाद केवल अफसर रह जाते हैं, आदिवासी नहीं. वे अज्ञेय के सांप तक से नहीं सीखते. सांप तक केंचुल से मोहब्बत नहीं करता. वह अपना चरित्र बचाए रखने के लिए केंचुल को छोड़ देता है. नव धनाढय आदिवासी अफसरों और राजनेताओं की जमात को छत्तीसगढ़ में कौन नहीं पहचानता. उद्योगपतियों और व्यापारियों ने राजनेताओं को हिस्सा देने के बदले एक धमक के साथ खुद सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया है. छत्तीसगढ़ की सरकार उद्योगपतियों के इशारों पर नहीं चल रही है, बल्कि उसे उद्योगपति सीधे सीधे चला रहे हैं.

 

भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था में ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य त्रिगुट की राजकीय भूमिका की कोई संयुक्त परिकल्पना नहीं रही है. लेकिन अब तो छत्तीसगढ़ में वह भी हो रहा है. उसमें कथित शूद्र वर्ग के नेताओं की मिली भगत भी है. यह कैसे माना जा सकता है कि ग्रामीण आदिवासियों में हिंसा को लेकर अभय व्याप्त है. बंदूक की गोली के सामने तो गांधी के अपवाद को छोड़कर कोई माई का लाल सीना नहीं ठोंक पाया. यदि ऐसा है तो जेड प्लस श्रेणी की सुविधा लिए मंत्री, सांसद और विधायक क्यों इठलाते फिरते हैं. ऐसी सुरक्षा व्यवस्था कमोबेश अफसरों, फिल्म अभिनेताओं और क्रिकेटरों को भी क्यों मुहैया कराई जाती है.

 

पुलिस के दमन के साए में आदिवासी अपने ही उन भाइयों को समझाइश या चुनौती देने के काम पर लगाए जाते हैं जिन्हें नक्सलवादी या उनका बंधक कहा जाता है. यह तो शेर के शिकार के लिए बकरे को बांधने जैसा हुआ. हांका होगा. शिकार होगा. या तो शेर मरेगा या वह बकरे को खा लेगा. दोनों सूरतों में पशु हारेगा और मनुष्य का पशुत्व जीतेगा.

कांग्रेस की हालत तो अजीब है. उसकी कोई राजनीतिक नीयत स्पष्ट नहीं है. प्रतिपक्ष के नेता को भाजपा सरकार के सहयोग से नक्सलवादियों के विरुध्द मसीहा बनाया जा रहा है. एक पूर्व कम्युनिस्ट से कांग्रेस पार्टी भाजपा के शासकीय सहयोग से अपना भविष्य लिख रही है. महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी वर्षों पूर्व नक्सलवादियों के विरुध्द जनजागरण अभियान चलाया था लेकिन वह टांय टांय फिस्स हो गया था. अन्य आदिवासी नेताओं के साथ महेन्द्र कर्मा पर भी मालिक मकबूजा की अवैध वृक्ष कटाई को लेकर लाखों रुपये डकारने की लोकायुक्त रिपोर्ट है.

 

इस सिलसिले में सी.बी.आई. ने भी मामला पंजीबध्द किया है. देश की यह महत्वपूर्ण जांच एजेंसी लेकिन इस मामले को लेकर खुद कटघरे में है. कांग्रेस के विधायकों का बहुमत सलवा जुड़ूम के पक्ष में नहीं है-ऐसी राजनीतिक गलियारों में चर्चा है. पार्टी हाईकमान और केन्द्र सरकार दीखने में अलग अलग लेकिन आचरण में एक हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का खेमा अलबत्ता सलवा जुड़ूम का विरोध करने के कारण सुर्खियों में है. यही हाल फिलहाल पूर्व कांग्रेसी मंत्री अरविंद नेताम का भी है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) ्कुवैत

 
 आपके एक एक शब्द अंतर तक जाते है !! मगर जो समझदार है वो कुछ कर नही सकते और जो कुछ कर रहे है या कर सकते है उनकी समझदारी पर ही सवाल खडे है ? 
   
 

Vishwa Mohan tiwari (onevishwa@gmail.com) Noida

 
 The picture that kanak tiwari is painting, by and large, corresponds to reality.. But he does not clearly bring out the difference in the actions or policies between BJP and Congress. Has Salawa judum got no good points? Is a solution possible? 
   
 

वृजनंदन चौबे (vrijnandanchaube@gmail.com) दिल्ली

 
 धन्यवाद, तिवारी जी ऐसे ज्वलन्त मुद्दों से हमेसा हमारा परिचय कराते रहें .आगे भी मैं आपसे ऐसी अपेक्षा रखता हूँ. 
   

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