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तेज तूं- चित्रकार हकू शाह से बातचीत
तेज तूं
सुप्रसिद्ध चित्रकार हकु शाह से
पीयूष दईया की बातचीत
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जनवरी से जून, दो हज़ार सात के दरमियान पीयूष दईया द्वारा सुप्रसिद्ध
चित्रकार हकु शाह के साथ उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पर एकाग्र लगभग
सत्तर घंटों का वार्तालाप संपन्न हुआ था. उन्हीं वार्ता-रुपों से एक
पुस्तक बनी- मानुष. यहां पेश है उसका एक अंश
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अहमदाबाद में हिन्दू मुस्लिम दंगे शुरू हो गये थे. और गोधरा-कांड के दिनों में मेरा
बेटा पार्थिव भी यही अहमदाबाद में था. जब हम दंगाग्रस्त इलाक़ों की ओर गये तो हमने
मकानों को जलते और चारों ओर धुआं उठते देखा. माहौल बहुत तनावग्रस्त था. वह सब एक
भयानक दु:स्वप्न था जिसकी वेदना अभी तक मेरे मन में है. यह एक ऐसा जख्म है जिस पर
वार्ता करना भी मेरे लिए बहुत कठिन है. अपने अन्दर के पायो तक में स्वयं को विचलित
महसूस करता हूं - ऐसा सुना था कि एक गर्भवती स्त्री के पेट से बच्चा निकाल कर मार
दिया था यह अकल्पनीय है. हृदयविदारक है. क्यों नहीं सभी सम्प्रदायों के लोग आपस में
मिल बैठ कर आनन्द से रहते, एक दूसरे के यहां खाना-पीना करते, मेलजोल रखते.
कई महीनों तक यह सिलसिला चला था. मैं बहुत अशान्त था और
मेरे मन में बारबार यह आ रहा था कि मैं क्या कर सकता हूं कि क्या करूं. धर्म के
नाम पर कलाकार के नाते सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का तो यह बहुत अच्छा अवसर
था लेकिन मैं चुप रहा. इस तरह की पब्लिसिटी के खयाल मात्र से मुझे मितली आती
है. फिरकापरस्त पैंतरेबाजी के बजाय इस गम्भीर मुद्दे को मैंने अपने चित्र-कर्म
से जोड़ा और बतौर नागरिक यह अपना स्वधर्म समझा कि मैं साम्प्रदायिक तत्वों के
प्रतिरोध में खड़ा होऊं, सीधी व सक्रिय हिस्सेदारी करूं.
कई सालों से मेरे मन में हिन्दू मुस्लिम की बात, झगड़े की, प्रेम की, धर्म की आती
रहती है. लेकिन मानव में छिपी हिंसा व क्रोध का मुझे ज्यादा पता नहीं है. शायद
मैं अभागा रहा हूं कि इसका अनुभव नहीं कर सका हूं. अपने जीवन में सारे समय मैं
प्रेम, अपनापन व सद्भाव के बारे में ही सोचता रहा हूं. यह सच है - पता नहीं क्यों
- कि मेरे चित्र-संसार में जीवन के निषेधात्मक पहलू ज्यदा नहीं आते जबकि यूं
मेरा जीवन सामाजिक व मानवीय सरोकारों से एकमेक है. मुझे लगता है कि मनुष्य का
मनुष्यत्व धर्म से भी ऊपर है. धर्म मानव को मानव बनाये रहने में साधन मात्र है,
साध्य नहीं. धर्म के नाम पर हमने जितनी हिंसा की है वह पशु से भी बदतर है
क्योंकि पशु को तो धर्म का साधन मिला नहीं है.
तब मेरा कलाकार मन लगातार विकल रहा और “हमन है इश्क” (2002) का बीज मेरे मन में
अंकुरित हुआ. मेरी इस चित्र-प्रदर्शनी को हिंसक शक्तियों के विरूद्ध मेरे सविनय
प्रतिरोध की तरह भी लिया जाना चाहिए. ऐसे भी आप देखें कि बहुत बार जब कोई
व्यक्ति मुझसे बात करता है तो मैं बोलता हूं कि क्या आप वह सुन रहे हैं जो मैं
बोल रहा हूं तो वह कहता है - “हां”. जबकि वह सिर्फ अपने बारे में बात कर रहा
होता है-सिर्फ अपनी समस्याओं के बारे में. हम आपस में एक दूसरे को सुनते तक नहीं.
लोग कहते हैं कि हां सुन रहे हैं पर वे सुनते नहीं. दोनों के बीच में संवाद जैसा
होता ही नहीं.
हम बात करते हैं प्रकृति की और मसरूफ़/डूबे रहते हैं दूसरी चीज़ों में. हिंसा और
क्रूरता की समस्याएं मेरे मन में आती हैं - करुणा का मथामण भी बहुत होता है कि
मनुष्य ऐसा क्यों करता है, क्या करता है. इस सब का असर मेरे मन में बराबर बना
रहता है लेकिन चित्रफलक पर जो होता है वह इससे भिन्न है.
अन्तत: ध्येय समान है कि दुखी हो या सुखी हो लेकिन मेरे चित्रों को देखकर
देखनेवाला स्वयं को बेहतर महसूस करे.
मैं अमेरिका में न्यूयॉर्क में था जब मैंने टैक्सी ड्राइवर से कहा कि मैं वहां
हारलेम जाना चाहता हूं. वह बोला-रात में दस बजे उधर कोई नहीं जा सकता. मेरा
जवाब था- क्या आपको आदमी में आस्था/भरोसा नहीं. वह बोला-क्या आप भारतीय है मैंने
कहा- “हां” तब वह मुझे ले गया और वहां जिनसे मुझे मिलना था वह एक अश्वेत लडका
था जिसने एक गोरी लड़की के साथ शादी की थी. वे कवि थे. उन्होंने दरवाज़ा खोला और
वह ड्राइवर तब तक इंतज़ार करता रहा जब तक कि मैं अंदर नहीं चला गया. यह बहुत
सुंदर था.
तो मेरा कहना यह है कि सिर्फ़ हिंसा ही नहीं है, इस तरह के लोग भी है.
गांधी पर एकाग्र चित्र-श्रृंखला “नूर गांधी का मेरी नज़र में” के अपने पडाव के
बाद जब “हमन है इश्क” का बीज मुझ में पनप रहा था तो मुझे लगा कि कला की पावन/हॉलिस्टिक
दृष्टि में फिर से जाना चाहिए. आप देखें कि भारत की सामासिक संस्कृति व
बहुलतावादी परम्पराओं में कितनी गहरी रचनात्मकताएं छिपी हैं जिन्हें हमने अभी
तक ठीक तरह से पहचाना नहीं है. दूसरी एक बात मेरे मन में कला के विचार से जुड़ी
हुई है. वह यह है कि कला के प्रति हमारा रूझान बहुत एकतरफ़ा है. इस मायने में आप
देखे कि हमारी परम्परा कितनी समृद्ध रही है. संगीत चित्र से जुड़ा मालूम पड़ता
है. मेरी नीरू बहिन हमेशा आख्यान पूरा गाती थी, रसोई करते समय.
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राठवा आदिवासी गाने के साथ पीठोरा का चित्र करते हैं - अन्य तत्वों के अलावा संगीत
भी वहां एक अपरिहार्य तत्व है. मुझे भी लगा कि कबीर, पलटूदास, मीराबाई के पदों पर
चित्र बनाने चाहिए. तब खयाल आया कि क्यों न ऐसा किया जाय कि इस बार संगीत को भी लिया
जाय. मैंने शुभा मुद्गल के सम्मुख अपना विचार रखा जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया.
कुछ कवियों के पद भी मुझे भेजे. लगभग दो साल तक मैं विभिन्न कवियों की कविताओं व पदों
पर चित्र बनाता रहा. चित्ररत रहते हुए संगीत सुनना मुझे बहुत भाता था. तब मेरे बेटे
पार्थिव ने एक दिन इन चित्रों का एक बहुत सुंदर शीर्षक सुझाया “हमन है इश्क”. यह
कबीर के मेरे प्रिय पदों में से ली गयी एक काव्य-पंक्ति है : हमन है इश्क मस्ताना,
हमन को होशियारी क्या.
इन चित्रों की प्रदर्शनी के समय फिर शुभा मुद्गल ने गाया भी. दिल्ली और मुम्बई दोनों
जगह. यूं मैंने कलाजगत में संगीत को चित्र के साथ जोड़ने की कोशिश की. हालांकि मैं
ऐसा नहीं कहता कि हर चित्र के साथ संगीत हो लेकिन यह भी एक आयाम है, तत्व है.
गान मनुष्य का एक अविभाज्य अंग है. अपने चित्रों संग संगीत को जोड़ना मुझे सार्थक लगा
; इसलिए भी कि यह भारत की कर्मभूमि , परम्परा व जीवन के अपने अभिनव पहलुओं को एक
तरह से कला में दाखिल करना भी था हालांकि यह एक बिलकुल दूसरा विषय है कि कलाकार इसके
लिए क्या क्या कर सकते हैं लेकिन कला में ये तत्व - जिन्हें हमने अन्य तत्व मान लिया
है - क्या व किस तरह आ सकते हैं यह हमेशा से ही मेरे जीवन के बुनियादी सरोकारों में
रहा है. क्या गंध आ सकती है और ह्यूमर ? गुजरात और महाराष्ट्र के सीमान्त पर बसने
वाली वसावा जनजाति में हुंवनो , लकड़ी का एक शिल्प होता है जो सांचे के माफिक उपयोग
में लाया जाता है ; इससे गेंहूं के आटे की सेवैया बनती है. यह लकड़ी का रूप एक शिल्प
जैसा लगता है यद्यपि मूलत: है यह सेवैया बनाने का एक सांचा. इसमें सेवैया बनती है
तो लगता है मानो बैल पेशाब कर रहा हो. यद्यपि यह भी एक ह्यूमर बनता होगा यह निfश्चत
नहीं है या ज़रूरी नहीं है मगर कोई शिल्प अपने रूप को बदले बिना ह्यूमर पैदा करे तो
यह क्या शिल्प के लिए दोष माना जाय ? इसे हम एक प्रकार के ह्यूमर के रूप में ले सकते
हैं. उड़ीसा की एक चित्रशैली में हाथी या घोड़ा बनाया जाता है जिसमें कई औरतें आती
हैं और उसमें से एक घोड़ा बनता है जो शक्ति का प्रतीक है. मुझे लगता है कि कला-रूपों
में भांति भाति तरह से ह्यूमर भी उपस्थित है जिसकी ओर बहुत कम ध्यान गया है.
दरअसल नवोन्मेष के प्रति मेरे मन में खास रूझान है. जब कुमार जी ( गन्धर्व ) गाते
हैं तो यूं महसूस होता है मानो शब्दों में कुछ है – वे सांस लेते लगते हैं. नाद बन
कर इस संसार में गूंजते हैं. मेरा ऐसा विश्वास है कि इस सबका नूर-तत्व तो सत्य है.
इस सत्य को अगर आप चित्रों में अवतरित कर सके तो यह अद्भुत बात होगी. सो मैंने अपने
कैनवास पर काव्य संग काम करना शुरू किया. अब भी ऐसा महसूस होता है कि आप एक थीम पर
हज़ारों चित्र बना सकते हैं.
मैं रूप के साथ ज्यादा से ज्यादा खेलने की कोfशश करता हूं जैसे शब्द खेलते हैं
काव्य में या संगीत में.
मेरे जीवन में दो शब्द है - हरेक क्षण का उत्सव और दूसरा है हरेक क्षण का साझा. यहां
मैंने संगीत के साथ अपने काम का साझा करते हुए शुरू किया. मुझे लगता है कि विभिन्न
कला-रूपों को परस्पर अन्तर्सम्बन्धित करने पर मेरा काम ज्यादा समृद्ध व ज्यादा सघन
होता है.
पलट कर पीछे देखता हूं तो मैं अब यह बोल सकता हूं कि मेरे समग्र कला-कर्म में इन
दोनों “चित्र-श्रृंखलाओं” का महत्व बिलकुल ऐसा है जैसा पौधों को पानी से सींचना. इन
दोनों कामों ने मेरी कला के रूपों को सींचा है और हमारे शरीर को जैसे खुराक चाहिए
वैसे ही कलाविष्कार में भी नयी नयी चुनौतियां आये तो आनन्द आता है.
दरअसल , चित्ररत होने पर व्यक्ति की बाह्य पहचान झर जाती है.
इन दिनों जो चित्र बना रहा हूं - अपनी वर्तमान चित्रश्रृंखला - इसमें भी मानुष-तत्व
पर मेरा आग्रह अधिक है. अपने जीवन के आरिम्भक दिनों से ही मुझ पर आदि-वासियों और
गांधी का असर बहुत गहरा रहा है जिसमें आगे जाकर मानुष-मात्र का सार्वभौमिक बोध जुड़
गया. मूलत: संवेदना-बोध वही है लेकिन उसका सतत विस्तार हुआ है. ऐसे देखें तो बहुत
शुरू से ही मानव व प्रकृति मेरे काम के केन्द्र में रहे हैं. मैंने इन्हें कभी बदला
नहीं, कोfशश भी नहीं की. कदाचित् अपने आप में वे बदलते रहे हो. - यूं तो तब से अब
तक दुनिया भी न जाने कितना बदल गयी है!
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भारतीय संस्कृति के वे तत्व मुझे बहुत प्रिय है जिनमें मनुष्य और प्रकृति साथ में
हैं. प्रकृति संग जीने पर हम कई मायनों में एक हो जाते हैं. अगर हम कला के बारे में
सोचते हैं तो हमें बाकायदा दो तत्वों की तरह प्रकृति व इfन्द्रयों को समझना होगा.
सच है कि मेरे दशकों पहले के चित्रों से आज के चित्रों में भिन्न तरह के अन्तर है
लेकिन बीज तो वही रहा होगा जो पकता चला गया. बीज तो वही होना चाहिए लेकिन यह
विभिन्न फूलों सरीखा है. सम्भवत: मेरे तात्विकपन का स्वभाव सघन गहनता व पारदर्शिताा
की ओर ज्यादा रहा है बजाय नाटकीय परिवर्तनों के. मैं ऐसा महसूस करता हूं कि मानव
प्राणी अपने में बहुत विलक्षण व अद्वितीय है और एक थीम के बतौर मानुष एक सार्वभौमिक
विषय है. आदमी और स्त्री अपने में कितनी सुंदर चीज़ है लेकिन न जाने कितने लोग, न
जाने किन रास्तों पर जाकर अपने जीवन में ऐसे फंस जाते हैं कि निराश हो कर मरते हैं.
आप अक्सर लोगों को विलाप करते हुए पाएंगे कि जीवन में यह रह गया, यह नहीं कर पाया
मैं, वह छूट गया, कि मेरे लड़के-बहू ने ऐसा बर्ताव किया - मरते दम तक तमाम तरह के
झंझट चलते ही रहते हैं - लोग सहजावस्था को नहीं पा पाते, जब मरते हैं तो अशान्ति व
झंझटों व विसंगतियों से घिरे हुए ही. लेकिन मानुष अपने में सर्वोपरि है जब हम उस पर
ईश्वर के सन्दर्भ में इस तरह विचार करते हैं कि वह ईश्वर के कितना क़रीब है.
सारे समय मैं एक चीज़ के बारे में सोचता रहा हूं और वह है ईश्वर. मानुषात्मा में
सत्य ही क्या ईश्वर नहीं है ? अपनी इस चित्र-श्रृंखला का शीर्षक रखना चाहता हूं:
तेज तूं अथाZत् तुम तेज/वही हो. जिसे उपनिषदों में तत्वमसि कहा गया है. केन्द्र में
मैंने “मनुष्य में देव की तलाश” को रखा है. ईश्वर को तलाशते हुए गुजराती के एक कवि
नरसिंह मेहता ने कहा है कि तुम पानी हो, पवन हो, धरती हो..... पवन तुं ….पाणी तुं….
भूमि तुं.... भूधरा ..... मैं ईश्वर के साथ भी वही चीज़ कर रहा हूं जो मैं सत् के
बारे में कर रहा हूं. हरेक पत्ती, हरेक फूल यहां तक कि जर्रे जर्रे में ईश्वर को
पाना कितना सहज-सरल है.
तब भी मैं इसे ठोस बनाना चाहता हूं कि यह है यहां या कुछ तत्व है यहां. मैं वह
मंदिर या मस्जिद वाले भगवान की बात नहीं करता - उसमें मेरा यक़ीन नहीं - मैं वह पान
की बात करता हूं, पत्थर की बात करता हूं, जनात्मा की बात करता हूं, मानुष-मात्र की
बात करता हूं क्योंकि उसमें मुझे दिखता है बहुत भगवान. मुझे तो अपने हाथ में चाहिए
भगवान सबके लिए मुझे हाथ में बिलकुल ठोस चाहिए भगवान. ठोस ही चाहिए कि मेरे सामने
है........ कल्पना नहीं करना है....... कल्पना से फिर मैं अपने को गंवा देता हूं.
मेरे लिए तो ऐसा है कि वह जो दिखता है मेरे सामने उसमें ही ढूंढ लूं तो वो ही काफ़ी
है मेरे लिए. देव ही सब जगह है. सभी को ऐसा बोलते सुनता भी हूं तो मनुष्य में देव
क्यों नहीं है ? तो मनुष्य में देवत्व की तलाश है.
सोचे ज़रा कि एक बीज इतने बड़े पेड़ में बदल जाता है - यह क्या है ?
मनुष्य के लिए कहा गया है कि “मनुष्यात् श्रेष्ठतम् नु किंचित्” यानी मनुष्य से
श्रेष्ठ कुछ नहीं है - साबार ऊपर मानुष. मगर आजकल कुछ बदला बदला सा लगता है. कितना
पलट गया है मनुष्य. वो पाया की चीज़ भूल गया है.
सोएत्सु यानागी को सब जानते हैं. दुनिया के लोककलाविदों में वे अग्रणी है. लोककला
पर उनका एक संग्रहालय भी है. टोकियो, जापान में यह संग्रहालय है. इसका नाम है -
मिंगेकान. उनके बेटे मि. सोरी यानागी, मेरे मित्र, एक अग्रणी डिजाइनर है और यह
संग्रहालय भी चलाते हैं. मैंने उनके साथ एक दो प्रदर्शनी भी इस संग्रहालय में की
थी. मैं जब जापान गया तो वे यह चाहते थे कि मैं उनके घर पर ही रहूं. वे मुझे लेने
आये और हम एक रेल में बैठे, उसके बाद दूसरी रेल में बैठे उसके बाद तीसरी रेल में
बैठे वहां से फ़ोन पर अपनी पत्नी को जहां हम उतरने वाले थे वहां गाड़ी ले आने को कहा.
तीनों रेल ग्रे सूट पहने लोगों से भरी पड़ी थी. हम उतरे, गाड़ी में बैठे और उनके घर
गये. मतलब कि घर काफ़ी दूर था. इतनी दूरी पर उनका घर था और इतनी मेहनत करके आना जाना
पड़ता था.
मि. यानागी की पत्नी मुझे नहानघर के बटनों बारे में बता रही थी कि ये दबाओगे तो ये
निकलेगा. तब यानागी अपनी पत्नी से बोले कि तुम रहने दो मैं बताता हूं और उन्होंने
मुझे काग़ज़ पर डायग्राम बना कर बताया कि कौन सा बटन कौन सा व क्या क्या काम करेगा.
अब यह जानने के बाद ही आप नहानघर जा सकते थे !
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जापान कैसा हो गया है - यंत्र उनके ऊपर कितना हावी हो गया है - यह इन दो प्रसंगों
से मालूम होता है. बल्कि मैंने तो उधर एक जापान का परम्परागत घर बताने का प्रस्ताव
रखा था. हम मीलों तक घूमे थे. अन्त में एक गिटारवाला आदमी तातामी पर बैठ कर सुनाता
हुआ देखने को मिला. मुझे वहां दिखावापन महसूस हुआ.
हम मानुष को मानुष-भाव में लेना भूल गये हैं. हेरारकी और यंत्र हमारी टोपी बन गया
है. कोई आम आदमी कि रोज़मर्रा का कोई मज़दूर हमारे लिए पशु पक्षी और पत्थर से भी कम
है. तो उनके बरताव, लागणी, जीवन जीने की रीत इस सब के सौंदर्य की तो बात ही क्या !
हमारे भारत में तो आधी आबादी ऐसी होगी तो फिर हम कितना गंवाते हैं पता नहीं. कहने
का आशय यह कि सुख दुख बीच में है जिसके साथ साथ मेरी संवेदनशीलता चलती है.
मनुष्य ने अपने पर एक ऐसा मुखौटा पहन लिया है कि उससे अलग करके उसको देख पाना लगभग
असम्भव सा लगता है - एक ओर वह रूपयों-पैसों के लिए हाय हाय करता रहता है तो दूसरी
ओर न जाने कितनी बीमार क़िस्म की वर्जनाओं व धारणाओं के बाड़े में फंसा हुआ अपने अंदर
से इतना गिर गया लगता है कि मानो यह भुला ही बैठा है कि उसका सौंदर्य, सत्य व आनन्द
मानुषिकता के आलोक में है.अपने सर्जन में मैं इसी विस्मृत मानवीय संवेदनशीलता को
जगाना व पनपने देना चाहता हूं - एक तरह से उसका पुनर्वास.
सन् 1965 में जब हम रातड़ी नामक गांव में काम कर रहे थे तो वहां रूपीआई नाम की एक
तेजस्विनी महिला रहती थी. बिलकुल शेरनी की माफिक और पूरे गांव की मां जैसे. गांव
में जब हमें रहने के लिए जगह नहीं मिल रही थी तो उन्होंने हमें वहां रहने के लिए
अपना पूरा घर दे दिया था और स्वयं अपने घर-आंगन के पास बने गोशालानुमा छपरे में रहने
लगी और मुझसे कहा कि कोई तकलीफ़ हो तो मैं उनसे कहूं तो अपनी यह तकलीफ़ जब मैंने उन्हें
बतायी कि हमारे घर के सामने रहने वाला आदमी मेरी हत्या करना चाहता है तो वह बोली –
“क्यों ?” मैंने कहा कि – “वह यह सोचता है कि मैंने उसकी युवा पुत्री की तसवीरें ली
है. हालांकि वह बहुत सुंदर है लेकिन मैंने तो उसकी तसवीरें नहीं खींची है. और इसी
ग़लतफहमी के चलते वह मुझे मार डालना चाहता है” एकाध मर्तबा जब मेरा अपने
कार्यक्षेत्र की ओर जाना हुआ था तो वह वहां सो रहा था और मैं यह सोच कर भयभीत रहने
लगा था कि वह मुझे मार देगा. रूपीआई ने मुझसे कहा - आप चिन्ता न करे और देखें कि कल
क्या होता है” अगले दिन सुबह वह अपने छपरे से बाहर आयी तो उस समय वह आदमी दातुन कर
रहा था. रूपीआई उससे कड़क स्वर में बोली – “तुम यह कह रहे हो कि तुम शाह भाई को मार
दोगे - तुम उनकी जीप तक को छू कर तो देखो - यह जान लो तुम और आइंदा के लिए बाज आ
जाओ” उस दिन के बाद से क़िस्सा पूरा हो गया-उस आदमी ने फिर कभी पलट कर मुझे हैरान नहीं
किया.
यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि एक साधारण स्त्री - जिसे हम अबला कहते हैं - तक यह
कर सकती है. अब यह रूपीआई एक मानुष ही है. प्रसंग की बात नहीं है, शक्ति की है.
मन-हृदय की है, प्रेम की है. चित्र में ये आप से आप आता है, लाया नहीं जाता. कितना
भीना होता है एक मानुषिक सम्बन्ध - उसकी लागणी किसी भी बयान से बाहर है, उसकी थाह
लेना ही असम्भव है.
एक थीम के बतौर भी जिस तरह से मानुष का बीज मुझमें पनपता रहा है उसके पीछे मेरे
रोज़मर्रा के जीवनानुभव, अनुभूतियां व अवलोकन एक खास तरह से काम करते रहे हैं. यही
बीज मेरे अंदर अपने से पकता चला जा रहा है और धीरे धीरे मेरे काम में उतरने लगता
है. सर्वोपरि बात यह है कि मानुष है. दो आंखें बहुत अच्छी है, उससे बहुत अच्छा देख
सकता है, कर सकता है.... मूल बात यही है कि इश्क है, प्रेम है ....
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प्रेम/इश्क के बारे में मुझे लगता है कि जब मां बच्चे को दूध पिलाती है तब मां व
बच्चे की आंख में जो अमी, पानी है, वही इश्क है. गुजराती में हम कहते हैं कि आंख
में अमी है. मानुष-भाव से मेरे इस साक्षात्कार में मैं फिर एक व्यक्ति को उसकी
बाहरी पहचान से नहीं देखता कि यह ऑफिसर है कि राजा है कि गरीब है. आप एक भिखारी को
ले. पता नहीं क्यों हमारे समाज में इनके लिए एक तरह की घृणा का भाव है कि यह
भीखमंगू है. जबकि मेरे लिए वह एक मानुष है. भिखारी या सफाईकर्मी या एक मज़दूर या एक स्त्री मेरे
चित्र की एक बड़ी रूपाकृति हो सकती हैं. या एक दादा की टूटी हुई आरामकुर्सी मेरे
चित्र का प्रेरणास्त्रोत बन सकती है. जब मैं मानवाकृति देखता हूं तो मेरे मन में कई
सारी चीजें आती हैं. मिट्टी और मानव-प्राणी मेरे लिए एक ही है. यहां न तो राजा है न
कार सिर्फ मिट्टी है जो मां है.
पूरी दुनिया में जितनी जगहों पर जाता हूं कभी कभी लोगों को कठपुतली-सा प्रदर्शन करते
हुए पाता हूं. वे हंसते हैं पर हंसते नहीं है और कहने को लाफ्टर-क्लब बना रखे हैं.
तो स्वयं को बहुत असहज व अशान्त महसूस करता हूं. हज़ारों लोग अमेरिका में ताला पर
ताला लगाये रहते हैं. यहां भारत में भी लोहे की जाली ही जाली मानो चिडियाघर में कोई
प्राणी रखा है, बात भी करेंगे तो जाली में से. पुलिस को देखता हूं. लोग बोलते हैं
कि कलकत्ता में दो रूपये का पुलिस हमारे ऊपर ही हमारे साथ. हम रेल में जाते हैं तो
चेन, ताला सब साथ में ले के जाते हैं. दूसरी मशीन की तो क्या बात ! आदमी शब्द में,
व्यवहार में, जीने में झूठ करे वो बड़ा आदमी है. एक दिन ऐसा न आ जाय कि आदमी और हवा
बाज़ार में मिले.
मेरे मन में हमेशा यह होता है कि ये ताला क्यों - ताला क्यों - हमने हमारे लिए ताला
बनाया. यह कोई आदमी की, मानुष की बात है ? अपने आप के लिए ताला बनाया: अमेरीका में
देखो अपने आप ताले में है - लॉक करके जाएंगे अंदर. तो ताला अपने लिए बनाया, कैद अपने
लिए बनाई, पुलिस अपने लिए रखी. हम जिस समय में सांस ले रहे हैं उसमें आप देखें कि
चारों ओर रूपयों और ऐसी प्रौद्योगिकी का बोलबाला है जहां मरना भी तत्काल चाहिए !
अब
मेरे लिए लोगों के बीच में जाना बहुत सरल नहीं रहा है. बच्चों के साथ या अपने प्रिय
आदि-वासियों के साथ यानी सरल-सादा व सहृदय लोक के साथ मुझे दूरी नहीं लगती लेकिन जहां
तर्कणा या अहं या सांसारिकता का बोलबाला-सा हो वहां मुझे बहुत दूरी लगती है और मैं
अपने को अकेला महसूस करता हूं. आप मानव को देखें जिसमें हज़ारों सालों से दो परस्पर
बिलकुल भिन्न ध्रुवों पर खड़े चरम है - देव और असुर. लेकिन मानुष में मेरी आस्था
बहुत गहरी है. मुझे अब भी यह भरोसा है कि उसमें प्रेम यानी इश्क है, देव है - आप
बच्चों को देखें कितने अच्छे हैं वे, फूल जैसे. लेकिन हमने तो अपनी शिक्षण-संस्थाओं
तक को ऐसा बना दिया है कि बच्चे फूल की भांति खिलने के बजाय जब वहां से बाहर आते
हैं तो मानो कीचड़ में बदल कर. एक आदमी के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि वह किन
तत्वों से बना है. हमने आदमी को मशीन की माफिक बना दिया है जबकि मूलत: वह एक भिन्न
तरह का प्राणी है.
मनुष्य के सिलसिले में यह कितना बड़ा बिन्दु है कि वह चीज़ों को जानना चाहता है. मुझे
सृष्टि की हर चीज़ अपनी ओर आर्कषित करती है - एक सूखी पत्ती से लेकर जीर्ण कपड़ा तक.
समाज में लोग कहते हैं कि यह कपड़ा फटा हुआ है या जीर्ण-शीर्ण हो गया है लेकिन मैं
इसी कपड़े के धागों से आनिन्दत होता हूं, जो इसमें से निकल रहे हैं. छेदों वाली कमीज़
तक एक कलाकार के लिए अनमोल कोहिनूर जैसी भूमिका निभा सकती है.
हमें इस बारे में बहुत अच्छा महसूस करना चाहिए कि हम इस जीवन में आये हैं. आप सुबह
भोर में उठते हैं और मोर का स्वर सुनते हैं - गहरी नीलाभ पाश्र्वभूमि में ; यह कितना
सुंदर है - आप प्रकृति में महसूस करते हैं कि वहां एक दिव्य ऋत है. मैं स्वयं को
बहुत उम्मीदभरा महसूस करता हूं कि मैं इस जीवन में हूं और थोड़ा बहुत जो कर सकता हूं
वह कर रहा हूं. इसी भांति यह जो कुछ भी मैं देखता हूं धागा, काग़ज़, मिट्टी, रंग,
रेखा, सभी चीजें हौले हौले क्रमश: मेरे चित्रफलक पर आने लगती हैं - आप से आप और मैं
इन्हे आने देता हूं, ऐसा होने को रोकता नहीं. प्रकृति में मुझे सब कुछ जादू जैसा
लगता है - नारियल के अन्दर पानी होना या फूल का खिलना या कुछ भी. हम सभी की दो मां
है - प्रकृति दूसरी मां है.
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मेरे चित्रों में आप वह पहला मानुष पाएंगे जो भूखा नहीं है. सिर्फ संस्कृति से
संस्कारित और सभ्यतामूलक बाड़ों में ही महदूद नहीं है. यह वह मानुष है जिसे इस पृथ्वी
व जीवन में होने का संतोष है: कला है, आनन्द है.
यूं अपने आपा को ढूंढना बहुत मुश्किल है. यद्यपि जन्म से ही यह हम में होता है. आपा
में क्या है, यह पता नहीं. हां, इतना ज़रूर लगता है कि हमारे जन्म लेते ही आपा का
बदलाव शुरू हो जाता है - अन्तत: जिसे आप संस्कार कहे या संस्कृति - एक तरह की
नामालूम चौहद्दी बनती - बिगड़ती रहती है – “हां” “ना” के दरमियान डोलती. इन्हीं सब
से हमारा गढ़तन भी होता-बनता है जिसमें हज़ारों धाराएं अन्त:सलिल है.
लेकिन आपा की तात्विक पहचान के लिए इस सब से ऊपर उठ कर देखना होता है. अपने जीवन के
लिए मुझे लगता है कि दूसरे आवरण शून्यवत् हो जाय - वहां/उसी में / मेरा आपा है. अपने
जीने में मुझे यह कभी ज़रूरी नहीं लगा कि वाचाल होना चाहिए - व्यक्तित्व के नकाबदार
ढंगों के बजाय सरल सादगी ही मेरे लिए वरेण्य रही है.
सन् 1999 में बनाया अपना एक चित्र ध्यान में आ रहा है. चित्र का शीर्षक है - साधु.
मानवाकृति में मेरी रूचि बहुत गहरी है और सादगी व ऋजुता में आस्था. मेरी कोशिश थी
कि इसे जितना हो सके उतना सादा बनाऊं : पूरे चित्र से एक तरह की शान्ति नि:सृत हो -
साधु का छोटे घड़े सरीखा कमण्डल, पेड़, भूमि, आकाश, झरी हुई पत्तियां - सभी से
सहजावस्था उजागर हो. रंगों को बरतने के ढंगों में भी यह खयाल था कि पूरे चित्र का
एक खास माहौल बने व गाम्भीर्य भी उजागर हो. यहां तक कि पेड़ की जड़ों तक से भी. जब आप
कोई रूप बनाते हैं तो वह आपसे बात करना चाहिए. इस चित्र में पांव व एडी तक भी आप
देख सकते हैं. आंखें, मुंह और नाक भी खास तरह से रखी है ताकि पूरे चित्र से मौन
अभिव्यक्त हो सके - रूपों संग रंगों का प्रयोग कुछ ऐसा हो कि पूरे चित्र में आलोक-सा
व्याप्त हो.
रंग-योजना में ऑकर, पीला, भूरा है. भूरा कम व ऑकर, पीला और सफ़ेद के साथ है. इस
चित्र के जरिये आकाश की निस्सीमता व भूमि की मजबूती भी प्रदर्शित होती है. घड़ा या
भिक्षा-पात्र या कमण्डल जिसे साधु थामे हैं, लाल है - सिर्फ इसे ही देखें तब भी यह
पाएंगे कि यह सारी चीज़ को जीवित बना देता है - गहरेपन की वजह से जो कि वहां है. घड़े
की गहराई. घड़े का विन्यस्त लालपन. रंगों की हल्की रंगतें भी इस चित्र में हैं.
इस पूरे चित्र में रंग ज़रा भी वाचाल नहीं है. एक गम्भीर वातावरण वहां है. और चित्र
अपने से अपने पायो में खड़ा है.
सच तो यह है कि अपने चित्रों के जरिये मैं सभी से साझा करना चाहता हूं क्योंकि यह
पृथ्वी बहुत सुंदर है और मनुष्य भी.
20.05.2008, 07.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | anurag vats(vatsanurag78@gmail.com) | | | | piyushji, mujhe nhi maloom tha ki haku shah ne chitrkaron ki us wiral parampara ko jiwit rkha hai jismen kala aur chintan ka sang-saath hota hai.achi baat yh hai ki kala men chahe jaisa amurtan ho, hakku bhai ke wicharon men gajab ki pardarshita hai.manushyata ka itna-nirmal,ujjwal aur utkat bodh aur uske prati preeti ek sachhe kalakaar ke mn men hi ho sakti hai.piyush ji,aap ne itne lambe samay tk chuppi sadhi ki hammen se kai mitron ko to laga ki aap na jane kb bahar aayenge.lekin aap to gahre paith rahe the.hakku bhai ke shabdon men main aapko bhi padh sakta hun.yh kaam hamare liye atyant prerak hai.ham is warta ke pustakakaar prakashan ki utkat pratiksha kar rahe hain. | | | | | |
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