जिनके पास जनाधार है, वो जंगलों में है
जिनके पास
जनाधार है, वे जंगलों में हैं
गांधीवादी संगठनों को देशी –विदेशी पैसे पर
बहस करके
हमको निराश करने से कोई फायदा नहीं है
पी वी राजगोपाल से प्रसून लतांत की बातचीत
एकता परिषद के नेता पी वी राजगोपाल अपनी जनादेश यात्रा को गांधी के सत्याग्रह
से जोड़ कर देखते हैं. उनकी राय है कि जिनके पास जनाधार है वे जंगलों में हैं और
जनाधारहीन लोग सत्ता चला रहे हैं. यहां प्रस्तुत है उनसे बातचीत के अंश –
जनादेश पदयात्रा की कामयाबी को आप किस रुप में देखते हैं ?
नेपाल में एक हजार माओवादियों महिलाओं का ग्रुप काठमांडू आ रहा है और वो लोग चाहते
हैं कि जनादेश के विषय में बात करने के लिए मैं वहां पहँचु. मुझे लगता है कि कहीं
तो थोड़ी रोशनी दिखाई पड़ रही है कि अहिंसा के तरीके से कुछ हो सकता है. इस बीच
पंद्रह हजार लोगों ने हमसे पूछा कि नक्सलियों के लिए आपका संदेश क्या है तो मैंने
कहा कि नक्सली लोगों का जनाधार है और इस देश की सत्ता में बेठे लोगों का जनाधार नहीं
है. जनाधार वाले लोग जंगल में घूम रहे है और जिनका जनाधार नहीं है वो दिल्ली में
बैठे सत्ता चला रहे हैं. इसलिए जनाधार वालों को बंदूक छोड़कर आ जाना चाहिए. क्योंकि
जनाधार ही तो जीतने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है. ये तो उल्टा हो रहा है कि बिना
जनाधार वाले सरकार चलाएं और जनाधार वाले के पास दो गज़ जमीन भी नहीं है. इसलिए आज
जनाधार को डेमोक्रेटिक फेज़ में डालकर सीखने का समय आ गया है.
जनादेश सत्याग्रह की सफलता से यह सबसे बड़ा संदेश फैला है कि अहिंसक तरीके से भी
कुछ किया जा सकता है. दूसरा बड़ा संदेश है कि गरीब लोग भी संगठित रूप से बहुत कुछ
कर सकते हैं. इसके लिए संख्या से ज्यादा आर्गनाइजेशनल फ्रेमवर्क महत्व रखता है.
दिल्ली में आकर एक लाख से ज्यादा लोग बा-हा कर चला जाएं तो कुछ होने वाला नहीं है.
हमने संख्या के साथ-साथ संस्थागत तकनीक भी अपनाई, जिसे गांधी ने भी अपनाए थे. उस
समय लोग कहते थे कि और भी नए-नए तकनीक खोजना चाहिए. एक प्रकार से साबित हो रहा है
कि कुछ नए स्टाइल से वर्तमान विषमताओं के सामने भी गांधीवादी तरीके से, अहिंसात्मक
तरीके से काफी कुछ किया जा सकता है.
जैसे इस यात्रा में गांधी के चलने का टूल इस्तेमाल किया, दूसरा अवज्ञा का, जैसे
नेशनल हाईवे पर पदयात्रा कर हमने ट्रैफिक रूल का सम्मान नहीं किया. हम मानते हैं कि
ये सब सड़के अमीरों के लिए बने हैं, गरीबों के लिए नहीं. तो गरीबों को भी चाहिए.
खुद कठिनाईयों को उठाओ तो सामने वाले पर दबाव पड़ता है. गांधी जी ने अलग अलग टूल का
इस्तेमाल किया था, जिसको हमने एक साथ पिरोने की कोशिश की. ऐसे में तीन-चार टूल
मिलाकर एक नया टूल ईजाद होता है. सिर्फ आज के अनुसार इस्तेमाल करने का तरीका भिन्न
होगा.
जब तक शहरों में केंद्रित है सत्ता, हमें शहर में आने का कोई शौक नहीं है. महानगर
के लोगों को रैलियों, पदयात्रा और धरना से दिक्कत होती है तो उन्हें प्रधानमंत्री
पर सत्ता के विकेंद्रीकरण का दबाव डालना चाहिए. जमीन गांव में है और लोगों को दिल्ली
आना पड़ता है. हम जानते हैं कि मनमोहन सिंह के पास न जमीन है और न ही पट्टा देने का
अधिकार है, लेकिन उन्होंने सत्ता को केंद्रित कर रखा है. भूमिग्रहण कानून के तहत वो
काबिज हो रहे हैं. वह जिसको चाहते हैं, उसे दे रहे हैं.
गांधीवादी संगठनों की भूमिका कैसी रही ?
गांधीवादी लोगों में ज्यादातर लोग आए थे. बाल भाई आए थे. शुरु में ठाकुर दास बंग आए
थे. लेकिन प्रारंभिक अवस्था में गांधीजन भी समझ नहीं पा रहे थे कि मैं क्या कर रहा
हूं, क्या करने जा रहा हूं. मेरी बात को समझने में उन्हें भी दिक्कत हो रही थी.
उन्हें भी शायद शंका हो रही थी कि क्या वास्तव में हम पच्चीस हज़ार लोगों के साथ
पदयात्रा करने जा रहे हैं.
हम जो ग्राउंड वर्क पिछले तीन-चार साल से कर रहे थे, वे उस पर नोटिस नहीं कर रहे
थे. लेकिन फिर भी वो आए. सभी ने सहयोग किया. संतोष द्विवेदी तो पूरे समय साथ चले.
अच्छा होता अगर इस पदयात्रा में पहली पंक्ति में सभी गांधी जन चले होते. हम उम्मीद
कर रहे थे कि दो सौ, तीन सौ गांधीजन इस तरह चलते और कहते कि- बस बहुत हो गया हम
अंतिम लड़ाई लड़ने चल पड़े हैं !
हमने अपील भी की थी कि नैतिक शक्ति को जनशक्ति से जुड़ना चाहिए पर ऐसा हुआ नहीं. हम
दोनों शक्तियों के जुड़ने की योजना के पीछे जो अर्थ था, वह बहुतों को समझ में नहीं
आया. लेकिन अब अलग-अलग तरीके से इस योजना को समझने लगे हैं. एक विदेशी मित्र कह रहे
थे कि अब किसी को मैनेज कर सकते हैं – पचास-पचास ट्रक मूव कर रहा है, पचास-पचास पानी
की टंकी और जेनरेटर मूव हो रहा है. और सब मिलेट्री की गाड़ियों की तरह सुबह सात बजे
मूव हो रहा है. अगले पड़ाव पर पदयात्रियों के पहुँचने के पहले सब अड्डा जमा कर खाना
पका रहे हैं- यह क्या है? वाट इज़ दिस मैनेजमेंट स्टाईल? ये कैसे हो सकता है? आम
गरीब लोग, और उसके लिए इतना सब करना, उसके लिए संसाधन जुटाना, गरीबों के आंदोलन के
लिए संसाधन जुटाना, इसके लिए लोगों को कनविंस करना, संसाधन देने वाले को भी कनविंस
करना पड़ा कि ऐसा कुछ होने जा रहा है ; इसके अलावा विदेशों से पच्चीस हज़ार चिठ्ठी
प्रधानमंत्री को लिखवाना, फिर इतनी ही चिठ्ठियां यहां के ग्रामीणों से लिखवाना – यह
सब कुछ एक बड़े सिस्टम के तहत वर्क आउट हुआ. यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं था.
हम एक तरफ पिछले तीन-चार सालों से सरकार से बात करते रहे, दूसरी तरफ आम लोगों को
संगठित करते रहे. अब इन सब बातों की तरफ नज़र इस पदयात्रा की सफलता की वजह से पड़ी
है. नहीं तो उन्हें प्रारंभ में ये सब कुछ समझ में नहीं आ रहा था.
अब क्या लगता है कि आने वाले दिनों में सभी गांधीवादी संगठन खुलकर आपको सहयोग
करेंगे ?
मुझे लगता है कि वो करेंगे– उन्होंने पूरी प्रक्रिया को देखा है. उनको लगा है कि
व्यवस्थित रुप से युवाओं को प्रशिक्षण देने से, व्यवस्थित रुप से गांव-गांव में काम
करने से कुछ हो सकता है. सैद्धांतिक रुप से मीटिंगों में भाषण देना अलग बात है
लेकिन समय निकाल कर ग्राउंड में गांधीजी के तरीकों को प्रैक्टिस करके लोगों को
तैयार करना अलग बात है.
अब ये एजेंडा सभी ने छोड़ दिया है. सभी पॉलिटिकल पार्टियों ने भी छोड़ दिया है.
कम्यूनिस्ट पार्टी का अपना कैडर होता था. गांधीवादी संगठनों की शांति सेना होती थी.
अब सबने गांव का काम, ग्राउंड का काम छोड़ दिया है. सभी संस्थाओं में उलझ गये हैं.
उसी टीम-टाम को गांधीवाद मान लिया है. इसी टीम-टाम को राजनीति मान लिया गया है.
कांफ्रेंस और सम्मेलन को ज्यादा समय दिया जा रहा है. कैडर की बात सब भूल गये हैं.
जनादेश की सफलता कैडर बिल्डिंग है. एकता परिषद का एक हज़ार तीन सौ पच्चीस का कैडर
है. बाकी सब तो लोग हैं, हर पच्चीस के पीछे एक नेता. हर पचास के पीछे एक नेता. कुल
मिलाकर हम लोगों ने एक हज़ार तीन सौ पच्चीस लोगों को प्रशिक्षित करके तैयार किया.
इसलिए जब हम सबसे आगे चलते थे तो हमें इस बात की चिंता नहीं रहती थी कि सबसे पीछे
क्या हो रहा है. प्रशिक्षण के चलते मुझे विश्वास था कि जो सबसे आगे हो रहा है, वो
ही सबसे पीछे हो रहा है. मुझे आगे चलने वाले सौ नेता पर भरोसा था, और ढाई सौ लोग,
जिसके पास सौ-सौ लोगों की जिम्मेदारी थी, उनको मैं व्यक्तिगत रुप से जानता हूं.
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क्या संघर्ष के कार्यक्रम के बाद रचनात्मक दिशा में भी प्रयास करेंगे ?
हां, हमारी नज़र दोनों तरफ है. लोगों को पहले हल और ज़मीन मिले तो फिर रचना का काम
कर सकते हैं. तब पीपुल्स इकानॉमी को डेवलप करने का काम शुरु करेंगे, तब हमें विदेशी
पैसे की जरुरत नहीं पड़ेगी. गांधीवादी, मार्क्सवादी लोग विदेशी पैसे का सवाल उठाते
हैं. तीन सौ कार्यकर्ताओं को छात्रवृत्ति का पैसा देश के ही लोग दें तो फिर विदेशों
में लोगों से पैसे मांगने क्यों जाउंगा.
अब गांधीवादी संगठनों को भी देशी – विदेशी पैसे पर बहस करके हमको निराश करने से कोई
फायदा नहीं है. जो विरोध करते हैं तो यही कहते हैं कि राजगोपाल के साथ संघर्ष नहीं
करेंगे, वह विदेशी पैसे लेता है. हम कहते हैं कि वे देखें कि अगर हम विदेशी पैसे का
अपने व्यक्तिगत जीवन में ऐय्याशी के लिए खर्च करते हैं तो आलोचना करें. एक–एक पैसे
को उद्देश्य के लिए लिए खर्च किया जाता है.
वैसे भ्रष्टाचार करना हो तो देशी पैसे में भी कर सकते हैं. भ्रष्टाचार के लिए यह
जरूरी नहीं है कि पैसा देसी है या विदेशी है. इसलिए हम गांधीवादी संगठनों से कहते
हैं कि वे इस बहस को छोड़ दें. जय जगत का नारा लगाने वाले को पूरे जगत के प्रति
चिंता होनी चाहिए. महात्मा गांधी तो विदेशों में भी लड़ते थे. उनके भी बहुत से
दोस्त विदेशी थे. जनादेश में भी बहुत से विदेशी पूरी निष्ठा से शामिल हुए और अपना
योगदान भी दिया.
गांधीजनों को इकठ्ठा होकर एक व्यापक आंदोलन छेड़ना चाहिए. आज गांधीवादी विनोवा जी
को भूल गए हैं. विनोवा ने भूमि का सवाल उठाया पर गांधी जनों ने इसे नहीं पकड़ा. जेपी
ने सामूहिक संघर्ष का रास्ता दिखाया. मैंने तो गांधी के बाद इन दोनों नेताओं की बात
गांठ बांध ली. हमने गांधी के टूल्स का इस्तेमाल किया. मैंने अपनी तरफ से अलग से कुछ
नहीं किया. हम तो सिर्फ लोक सेवक तैयार करने में जुटे रहे. यह काम गांधी जी ने
कांग्रेस जनों को करने के लिए कहा था पर उन्होंने गांधी की इस सलाह का पालन नहीं
किया, हम कर रहे हैं.
10.11.2007, 00.18 (GMT+05:30) पर
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