उत्तर वनवासः अरुण आदित्य
पुस्तक अंश
उत्तर वनवासः अरुण आदित्य
उपन्यास
प्रकाशकः आधार प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, एस सी एफ-267, सेक्टर 16, पंचकूला, हरियाणा. सेल फोन-09417267004
कीमतः 200 रुपये

आज केंद्र में नई सरकार शपथ ले रही है.
राजधानी का मौसम बड़ा सुहावना है. महीनों की उमस के बाद शीतल मंद पवन के झोंके चल
रहे हैं. खुद राजधानी को इस बदले हुए मौसम पर विश्वास नहीं हो रहा है. राजधानी से
दूर के गांवों तक तो अभी यह ठंडी हवा पहुंची भी नहीं है. वहां तो मौसम बदलने की
सिर्फ खबर पहुंची है. और खबरें उनके लिए विश्वास करने की नहीं जुगाली करने की चीज
हैं.
''सुना है कि राजधानी के चौक का बूढ़ा बरगद जो पूरी तरह सूख गया था, फिर से हरा हो
गया है.'' एक गांव दूसरे से पूछता है.
''हां, हमने भी सुना है कि राजधानी की नदी में अब कीचड़ की जगह पानी की लहरें उठ रही
हैं.'' दूसरा पहले से कहता है.
''किले की प्राचीर पर, सुना है कि मोर फिर से नाचने लगे हैं.'' तीसरे गांव की भाषा
इस तरह है कि पता नहीं चलता कि वह सूचना दे रहा है या सूचना लेना चाहता है.
''हां, मोर के पंखों पर चमकने वाले सिक्के जो गायब हो गए थे, फिर वापस आ गए हैं.''
चौथे गांव की हर बात में दृढ़ निश्चय झलकता है.
''हमारे पेड़ कब हरे होंगे? हमारी नदियां कब भरेंगी? हमारे आंगन में मोर कब नाचेंगे?
और हमारा सिक्का कब वापस आएगा?'' पांचवां गांव अक्सर चुप रहता है, लेकिन जब बोलता
है तो सवालों की ऐसी झड़ी लगा देता है कि सबकी बोलती बंद हो जाती है. शपथ ग्रहण
समारोह में विशिष्ट अतिथियों के बीच बैठे रामचंद्र को ताज्जुब हुआ कि राजधानी से
बहुत दूर कहीं बसे इन गांवों की आवाज उन्हें यहां कैसे सुनाई दे रही है. विकल होकर
उन्होंने गुरुदेव की ओर देखा. गुरुदेव एक नवनियुक्त मंत्री से बातचीत में डूबे हुए
हैं. उनके चेहरे पर जिस तरह की संतुष्टि है, उसे देखकर रामचंद्र को लगा कि गुरुदेव
का सिक्का वापस आ गया है.
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गुरुदेव का सिक्का वाकई वापस आ गया है. अखबारों में धड़ाधड़ उनके इंटरव्यू छप रहे
हैं. बड़े-बड़े मंत्री उनके पास सलाह लेने आते हैं. स्वामी जी अक्सर राजधानी में ही
नजर आते हैं. लेकिन रामचंद्र ने अपने को आश्रम तक ही सीमित कर लिया है.
आश्रम की दिनचर्या बड़ी नियमित है. रामचंद्र इस दिनचर्या में रम चुके हैं.
प्रवचन, भजन, शयन अरु भोजन. संन्यासिन्ह के चार प्रयोजन॥
यह आश्रम के संन्यासियों का सूत्र वाक्य है. लेकिन रामचंद्र ने अपने खाते में इन
चार चीजों के अलावा श्रमदान भी लिख लिया है. उनका मानना है कि संन्यासी हो या
गृहस्थ, किसी को भी बिना श्रम किए भोजन करने का अधिकार नहीं है. कुल मिलाकर इस
दिनचर्या में रामचंद्र काफी खुश हैं. बस कभी कभी जब अम्मा की याद आती है तो जरूर
उदास हो जाते हैं. या फिर कभी-कभी पांचवें गांव का सवाल उन्हें विचलित कर देता है,
''हमारे पेड़ कब हरे होंगे? हमारी नदियां कब भरेंगी? हमारे आंगन में मोर कब नाचेंगे?
और हमारा सिक्का कब वापस आएगा?''
चेहरा चांद और नयन चकोर
पर पिछले तीन दिनों से रामचंद्र कुछ ज्यादा ही उदास हैं. यह उदासी न तो अम्मा की
याद के कारण है और न ही पांचवें गांव के सवाल के कारण. तीन दिन पूर्व प्रयाग में
गंगा-यमुना के संगम पर उनका प्रवचन चल रहा था. राम चरित मानस में श्री राम लक्ष्मण
द्वारा जनक की पुष्प वाटिका के निरीक्षण का प्रसंग था. भक्ति-रस में डूबे रामचंद्र
एक-एक चौपाई का अर्थ बड़े मनोयोग से समझा रहे थे.
असि कहि फिरि चितए तेहि ओरा, सिय मुख ससि भए नयन चकोरा
और ऐसा कहकर भगवान श्री राम ने सीता की ओर देखा और देखते ही रह गए. ऐसा लगा जैसे
सीता जी का मुख चांद हो और भगवान के नयन चकोर हो गए हों.
इसी समय राम चंद्र की निगाह प्रवचन सुन रहे लोगों के बीच बैठी एक रूपसी के चेहरे पर
पड़ी. बस फिर क्या था, प्रथम दृष्टि में ही रूपसी का चेहरा चांद और उनके नयन चकोर हो
गए. अगली चौपाई की व्याख्या करते हुए उन्हें लगा कि वे चौपाई की व्याख्या नहीं कर
रहे हैं बल्कि यह चौपाई उनकी स्थिति की व्याख्या कर रही है
भए विलोचन चारु अचंचल, मनहुं सकुचि निमि तजे दृगंचल.
सीता जी की अद्भुत रूप-राशि को देखते हुए भगवान राम पलक झपकाना तक भूल गए. मानो
संकोच करते हुए निमि पलकों से हट गए हों. चौपाई की व्याख्या करते हुए राम चंद्र को
लगा कि उनकी पलकों पर से भी निमि पलायन कर गए हैं. (निमि राजा जनक के पूर्वज थे.
वशिष्ठ ऋषि के शापवश वे मृत हो गए थे. लेकिन महर्षि भृगु ने निमि पर कृपा करते हुए
वरदान दिया कि वे अमर होकर लोगों की आंखों की पलकों पर निवास करेंगे. कहा जाता है
कि उनकी उपस्थिति के बोझ के कारण ही पलकें झपकती हैं. इसीलिए पलक झपकने भर के समय
को निमिष कहा जाता है. सीता उनके कुल की कन्या हैं, इसलिए जब राम सीता को देख रहे
थे तो सकुचा कर निमि राजकुमार राम की पलकों से हट गए. और उनके हट जाने के कारण राम
की पलकों ने झपकना बंद कर दिया. )
इसके बाद वे जितनी देर तक प्रवचन देते रहे, बार-बार उनके नयन चकोर होते रहे और
पलकों पर से निमि पलायन करते रहे.
अगले दिन फिर प्रवचन शुरू किया. अयोध्याकांड में राम के वनवास का प्रसंग था. लेकिन
उनका मन तो जनकपुर की पुष्पवाटिका में ही अटका हुआ था. उनके नयन-चकोर तो कल वाले
शशिमुख को ही तलाश रहे थे. उधर प्रवचन के भीतर तुलसी के राम वनवास काटते हुए प्रयाग
पहुंच चुके थे और तीर्थराज के महात्म्य को सुनकर अभिभूत थे.
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रामचंद्र को इतना सम्मान पहली बार मिल रहा था. उन्होंने सोचा, यदि इस समय यहां मां
और पिता जी होते तो कितना खुश होते. मां मन ही मन भगवान को धन्यवाद देती कि उसने एक
गरीब के बेटे को इस काबिल बनाया कि बड़े-बड़े मंत्री-संत्री उसके पैर छूते हैं. और
पिताजी! वे तो यहां से जाने के बाद आस-पास के गांवों में इस घटना का आंखों देखा हाल
इतनी बार सुनाते कि क्षेत्र का बच्चा-बच्चा जान जाता कि कि किस तरह मंत्री जी ने
मायाराम के बेटे के पैर छुए.
रामचंद्र को यह सब स्वप्न जैसा लग रहा था. लेकिन यह स्वप्न नहीं यथार्थ था कि वे
मंत्री जी के बैठक कक्ष में सब लोगों से ऊपर बैठे हुए राजनीति और धर्मनीति पर चर्चा
कर रहे थे. हालांकि रामचंद्र को इन दोनों विषयों का बहुत ज्ञान नहीं था, लेकिन बाकी
लोग उन्हें इस तरह सुन रहे थे जैसे वे इन विषयों के महान अध्येता हों. रामचंद्र इस
स्थिति का आनंद ले रहे थे, लेकिन गुरु जी का आदेश था कि मंत्री जी को चिट्ठी देकर
शीघ्र वापस आ जाना. मन मारकर रामचंद्र ने मंत्री जी से विदा मांगी.
मंत्री जी स्वयं उन्हें छोड़ने बंगले के गेट तक आए. विदा करते हुए एक बार फिर चरण
स्पर्श किया और साथ ही यह निवेदन भी ''स्वामी जी कभी-कभी दर्शन देने की कृपा करते
रहिएगा. आप जैसे सद्पुरुषों का मार्गदर्शन मिलता रहेगा तो हमें सही रास्ते पर चलने
में सुविधा होगी.''
मंत्री जी के बंगले से लौटते हुए उनके मन में एक ही सवाल बार-बार आ रहा था कि
उन्हें इतना सम्मान मिलने की वजह क्या है? ''क्या भगवा वस्त्रों के कारण मुझे यह
सम्मान मिला है?...नहीं, मेरे जैसे भगवाधारी साधु संन्यासी तो इस देश में हजारों
में होंगे, क्या सबको इतना सम्मान मिलता है.''
''तो फिर क्या मेरे ज्ञान के कारण मुझे इतना मान दिया गया.''
''लेकिन मंत्री जी को मेरे ज्ञान के बारे में क्या पता? वे मेरे क्षेत्र के भी नहीं
हैं कि चुनावों के दौरान कभी मेरा भाषण सुन लिया हो और प्रभावित हो गए हों. आज से
पहले कभी मिले भी नहीं. ऐसे में मेरे ज्ञान से प्रभावित होने का तो सवाल ही नहीं
उठता.''
अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इतना सारा सम्मान मिलने की मिलने की एकमात्र वजह
यह है कि वे स्वामी सत्यानंद के शिष्य हैं. निश्चित ही गुरु जी के कारण यह सम्मान
मिला है. इस सम्मान के बोझ से रामचंद्र का आत्म-ज्ञान और आत्माभिमान थोड़ा झुक गया.
मंत्री जी के बंगले में घुसने के पूर्व उन्होंने मन में निश्चय कर लिया था कि गुरु
जी के लिए वे यह अंतिम कार्य कर रहे हैं. मंत्री जी को पत्र देने के बाद वे वापस
आश्रम नहीं जाएंगे. कहीं एकांत में कुटिया बनाकर भगवान का ध्यान करेंगे. कुटिया न
भी बना सके तो करतल भिक्षा, तरुतल वास करते भगवान के ध्यान में जिंदगी गुजार देंगे.
वकील ने जो कुछ बताया था उससे रामचंद्र के मन में गुरु जी की छवि एक धूर्त और
धोखेबाज व्यक्ति की बन गई थी. उन्हें इस बात को लेकर आत्मग्लानि भी हुई कि एक लालची
और काइयां आदमी को महान संत मानकर वे वर्षों उसकी पूजा करते रहे.
मंत्री जी से विदा लेने के बाद सम्मान की लहर में आत्मग्लानि का तिनका बह गया. इस
लहर ने उनके सोचने की दिशा भी बदल दी. गुरु जी अगर धूर्त होते तो सारी दुनिया उनका
इतना सम्मान क्यों करती? आखिर एक आदमी सारी दुनिया को तो मूर्ख नहीं बना सकता.
_लेकिन गुरु जी धर्मानंद जी के साथ जो कर रहे हैं वह धोखेबाजी नहीं तो क्या है?
_ये भी तो हो सकता है कि गुरु जी किसी महान उद्देश्य के लिए ये छोटी सी धोखेबाजी कर
रहे हों.
_परंतु वकील साहब तो कह रहे थे कि पचास साठ लाख रूपए की प्रॉपर्टी के चक्कर में
गुरु जी यह केस लड़ रहे हैं. गुरु जी दूसरों को तो उपदेश देते हैं कि माया महा ठगिनी
हम जानी, और खुद....
_तो क्या गुरु जी माया के जाल में पूरी तरह फंस चुके हैं?
_यदि ऐसा है तो भी सिर्फ इस कारण गुरु जी की महानता कम नहीं हो जाती. उनका ज्ञान,
उनकी भक्ति अलग चीज है और ये मोह-माया अलग चीज है. अगर वाकई वे मोहजाल में फंस गए
हैं तो एक अच्छे शिष्य के नाते मेरा फर्ज बनता है कि मैं उनकी निंदा या उपहास करने
के बजाय उन्हें इस दलदल से मुक्त कराने का प्रयास करूं.
_ परंतु सच तो यह है कि अभी मुझे पता भी नहीं कि गुरु जी प्रॉपर्टी के मोह में यह
मुकदमा लड़ रहे हैं या किसी बड़े लक्ष्य के लिए. हकीकत जाने बिना किसी नतीजे पर
पहुंचना मूर्खता होगी.
_ तो हकीकत जानने के लिए क्या मुझे गुरु जी से सीध-सीधे बात करनी चाहिए.
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''गुरुदेव आप से कुछ पूछना चाहता हूं.'' राम चंद्र की निगाह गुरुदेव के चरणों की ओर
थी.
''पूछो वत्स, क्या पूछना चाहते हो?'' स्वामी जी स्नेह से रामचंद्र के सिर पर हाथ
फेर रहे थे.
''गुरुदेव, हम लोग ये मुकदमा क्यों लड़ रहे हैं.''
''समय आने पर तुम्हें इस सवाल का जवाब मिल जाएगा.''
रामचंद्र समझ गए कि अब इस विषय में बात करना उचित नहीं. लेकिन इस सवाल को अनंतकाल
तक लटकाया भी तो नहीं जा सकता. सो उन्होंने प्रकारांतर से गुरुदेव को पटरी पर लाने
की कोशिश की- ''गुरुदेव एक बार मैंने आपको बताया था कि जिस दिन मैं गिरफ्तार हुआ
था, मैंने दातून का एक गठ्ठर फैजाबाद स्टेशन पर एक पानवाले के यहां रखा था. जेल से
छूटने के बाद वह गठ्ठर लेने मैं आप के साथ ही तो गया था. आपने स्वयं अपनी आंखों से
देखा था सूखी और कड़क लकड़ियों के उस गठ्ठर को. गुरुदेव जब मैंने वह गठ्ठर रखा था तब
वे हरी लचकदार टहनियां थीं, लेकिन 19 महीने में वे सूखकर लकड़ी हो गई थीं.''
''मैं तुम्हारा आशय समझ गया. तुम कहना चाहते हो कि कोई भी समस्या शुरू में लचीली
रहती है, लेकिन बहुत समय तक उसका समाधान न किया जाए तो वह सूखकर सख्त और कड़ी हो
जाती है. इस मामले में तुम निश्चिंत रहो वत्स. तुम्हारी इस शंका के समाधान में इतना
वक्त नहीं लगेगा कि यह सूखकर और सख्त हो जाए. तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर बहुत
शीघ्र मिल जाएगा.''
रामचंद्र समझ गए कि गुरु जी से उतना ही पता किया जा सकता है जितना वे बताना चाहते
हैं. अब सच जानने के लिए पता नहीं कितने समय तक इंतजार करना पड़ेगा.
18.02.2010,
20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित