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नंदीग्राम डायरी

पुस्तक अंश

 

नंदीग्राम डायरी

पुष्पराज

 

नंदीग्राम डायरी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः यात्रा बुक्स

पेंगुइन बुक्स इंडिया

11 कम्युनिटी सेंटर, पंचशील पार्क, नई दिल्ली 110 017

मूल्यः दो सौ पचास रुपये

 

 

18 मार्च 2007
हमारी जमीन, हमारी फैक्ट्री

नंदीग्राम की हर रात एक तरह की होती है। हम रक्तरंजित संग्राम के बाद की चौथी रात की बात बता रहे हैं। हम नंदीग्राम के लड़ाकू गांव सोनाचूड़ा के पास गांगारा के कृषक हरेंद्रनाथ मैती के दो मंजिले माटीघर से रात की भयावहता को ठीक से देख रहे हैं। तीन बीघा जमीन के स्वामी हरेंद्रनाथ मैती अच्छी तरह जानते हैं, वे अपनी जमीन पर जब तक खड़े हैं तब तक कितने अमीर कितने खुशहाल हैं। इस घर से 200 मीटर पिछवाड़े एक
बड़ा अहाता जो हम देख रहे हैं, यहां भारत भारी उद्योग लिमिटेड के निर्देशन में जेलिंघम प्रोजेक्ट नामक कोई कंपनी 1976 में आयी थी। तब सरकार ने किसानों को धोखे में रखकर नौकरी और अमीरी का प्रलोभन देकर 350 एकड़ जमीन सी.पी.टी. कंपनी को दिलायी। जमीन से बेदखल हुए 142 कृषक तब कंपनी में कुछ वर्ष ठेका मजदूर भी रखे गये, पर जल्दी ही जेलिंघम प्रोजेक्ट की हवा निकल गयी। जमीन अब तक सी.पी.टी. कंपनी के कब्जे में है। हरेंद्र मैती अच्छी तरह जानते हैं, जब कोई कंपनी किसानों के गांव में आती है तो क्या होता है? क्या सी.पी.टी. कंपनी बंद पड़े जेलिंघम की कब्जायी जमीन पर दूसरा उद्योग लगायेगी? किसान चाहते हैं मुआवजे के बिना धोखे में ली गयी जमीन हमें वापस कर दी जाये। क्या आप हरेंद्र मैती के इस कथ्य को महज भावनात्मक कहकर टाल देंगे कि हम जमीन के साथ इसी तरह जुड़े हैं जैसे मछली पानी के साथ। अब देखिए तीन बीघा जमीन में इनकी संपन्नता के आधार क्या-क्या हैं। घर के आगे दस कट्ठे का पोखर पानी से लबालब भरा है। पोखर के चारों तरफ मेड़ पर सौ से ज्यादा नारियल, सुपारी के पेड़ खड़े हैं। पोखरे में हर किस्म की मछली है। पोखरे के पास 2 बीघा धान सरकार के नलकूप से नहीं, पोखरे के पानी से लहलहा रहा है। पान का दस कट्ठा बागान हर माह घर में औसतन दो हजार रुपये तो दे ही देता है। दूध के लिए एक गाय काफी है। 30 साल से बिजली-पानी तक नहीं देनेवाली सरकार बंदूक लेकर जमीन छीनने खड़ी है। 14 मार्च के 'जमीन बचाओ संग्राम' पर हुए हमले को मैती संत्रास कहते हैं। संत्रास के दिन हमारे 200 मुर्गे सी.पी.एम. की बमबारी की दहशत में मर गये। मैती की तरह के कई किसान हैं, जिनकी शिकायत है कि संत्रास के दिन मुर्गे बम की धमक से अचानक चल बसे। बम की धमक से सैकड़ों मुर्गों की जानें गयीं। मुर्गे कितने संवेदनशील हैं, इंसान से ज्यादा। सरकार जिस रक्तपात से सिहरती तक नहीं है, वहां मुर्गे सिहरने से पहले खत्म हो गये। सवाल मुर्गे बनाम सत्ता की भोथरी संवेदना का नहीं है। यह समझने का है कि हरेंद्र मैती अपनी अमीरी की परत-दर-परत दिखाते हुए एक बार पूछते हैं, “ क्या आप जानते हैं कि हमारी जमीन ही हमारी फैक्ट्री है। सालेम की एक फैक्ट्री लगाने के लिए हमारी तरह के हजारों किसान अपनी-अपनी फैक्ट्री से अपना स्वामित्व क्यों छोड़ दें?”

शहराती बिजली की चकमक के बिना भी माटीघर के दो मंजिले अतिथि कक्ष में वातानुकूलित कमरे का सुकून महसूसते हुए हम ठेठ देहाती आदर्शवाद के चिंतन में बिला नहीं गए हैं। अभी रात के नौ बज रहे हैं और हम बम के जोरदार धामाकों की गिनती कर रहे हैं। हम एक के बाद दूसरा धमाका सुन रहे हैं। क्या हमें बम-गोलियों की बरसात वाली रात में सोने की कोशिश करनी चाहिए? गांव के कृषक नारों के साथ इस डरावनी रात में हमारी नींद की पहरेदारी कर रहे हैं। मां सुषमा मैती हमें दिलासा दिलाती हैं-“डरो मत, सो जाओ बेटे। तीन माह से हम जो रोज सुन रहे हैं, आज आप भी सुन लीजिए.” तड़के बंग सागर के इस इलाके में कुहरा भरा है और धमाकों की धमक से सुबह की धड़कन तेज हो गई है। यहां सूरज भी उनके आदेश से उतरता है!

गोकुल नगर के किसान दिलीप दास अधिकारी का शरीर सौष्ठव कितना आकर्षित करता है। रात के 10 बजे घर पर अचानक पहुंचे अतिथि के लिए पांच तरह की स्वादिष्ट सब्जी के साथ चावल, दाल, घी, दूध, केला परोसने वाली बहन महामाया के हाथ कितने ताकतवर हैं। दिन भर खेतों में जमीन खोदने वाली महामाया ने रबड़ बुलेट से घायल होने से पहले दो महिला पुलिस अधिकारियों को दबोचकर पकड़ लिया था। अचानक घर आये अतिथि के आतिथ्य में जिस तरह का उत्तम भोजन महामाया परोस रही है, यह 4 बीघा खेत की ताकत पर टिका है, न कि सरकारी दया पर। 2 से 4 बीघा औसत जमीन के जोतदार नंदीग्राम के इलाके में जितने खुशहाल हैं, यह खुशहाली एशिया का सबसे पहला किसान पैदा करने वाले निमाड़, नर्मदा घाटी क्षेत्र या बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र के गांवों में कहां दिखती है! क्या 1943 में जीवन पर अकाल और भूख के ऐतिहासिक हमले के बाद नंदीग्राम के किसानों ने माटी को सोने में बदलने का पराक्रम सीख लिया?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

amit patna

 
 यह डायरी नंदीग्राम में बलत्कृत औरतों के प्रति ज्यादा संवेदित दिखती है। बलत्कृत औरतों के प्रति मीडिया की दिलचस्पी की आलोचना करते हुए भी खुद लेखक की चेतना बार-बार इससे ही ज्यादा आहत दिखती है। समर्पण का पहली पंक्ति गौरतलब है- नंदीग्राम की उन स्त्रियों के नाम जिनकी इज्जत लूट ली गई जिन्हें न्याय नहीं। हमारी भाषा भी कई बार हमारे मकसद और हमारी सीमा का पता दे देती है।

सवाल यह है कि यह समर्पण उन औरतों के नाम क्यों नहीं है, जिन्होंने प्रतिरोध किया। हालांकि अपनी डायरी में वे यह जानने की ‘कोशिश करते हैं कि जिनके साथ बलात्कार हुआ है, वे महिलायें हतोत्साहित होने की बजाय ज्यादा आक्रामक होकर बलात्कारी को खोजने- पाया है! जहां कैडर बलात्कारी हैं, क्रूर हत्यारे और लूटेरे हैं, रंगदारी टैक्स वसूलते हैं, वहां उनके प्रति नफरत तो पैदा होगी ही। पुष्पराज ने नंदीग्राम की जो कथाएं कहीं हैं, उनमें सीपीएम पूरी तरह खलनायक है, उनमें किसानों का जीवट, धर्म के पार उनकी एकजुटता, स्त्रियों का जागरण सबकुछ है।

लेकिन आपत्तिजनक यह लगता है कि लेखक भारी आत्ममुग्धता और उद्धारक भाव से भरा हुआ है। कुछ इस तरह का भाव है कि संघर्ष की इन अंदरूनी जानकारियों को हमने उजागर किया, वर्ना दुनिया को पता नहीं चलता।
 
   
 

rajnesh (rajnesh.reporter@gmail.com) wardha

 
 पुष्प, बहुत बढ़िया दोस्त, तुमने पी. साईनाथ जैसा काम किया है. उनकी किताब तीसरी फसल में भी जमीन अधिग्रहण की ऐसी ही कहानी है. यार, इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों को तुम्हारी इस किताब से सबक लेना चाहिए. भारत की कम्यूनिस्ट सरकार गिरेगी, शर्म आती है. 
   
 

harekrishna (harekrishna.duboliya@gmail.com) gwalior

 
 पुष्पराज जी जो आपने देखा उसे देश शासन करने वाले नेता क्यों नहीं देख पाते. मजदूर और किसान के नाम पर सत्ता में आने वाले वामपंथी उन पर अच्याचार करते हैं. नंदीग्राम को इन्होंने गोधरा से भी ज्यादा विभत्स बना दिया.  
   

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