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नंदीग्राम डायरी
पुस्तक अंश
नंदीग्राम
डायरी
पुष्पराज
पेंगुइन बुक्स इंडिया
11 कम्युनिटी सेंटर, पंचशील पार्क, नई दिल्ली 110 017
मूल्यः दो सौ पचास रुपये
18 मार्च 2007
हमारी जमीन, हमारी फैक्ट्री
नंदीग्राम की हर रात एक तरह की होती है। हम रक्तरंजित संग्राम के बाद की चौथी रात
की बात बता रहे हैं। हम नंदीग्राम के लड़ाकू गांव सोनाचूड़ा के पास गांगारा के कृषक
हरेंद्रनाथ मैती के दो मंजिले माटीघर से रात की भयावहता को ठीक से देख रहे हैं। तीन
बीघा जमीन के स्वामी हरेंद्रनाथ मैती अच्छी तरह जानते हैं, वे अपनी जमीन पर जब तक
खड़े हैं तब तक कितने अमीर कितने खुशहाल हैं। इस घर से 200 मीटर पिछवाड़े एक
बड़ा अहाता जो हम देख रहे हैं, यहां भारत भारी उद्योग लिमिटेड के निर्देशन में
जेलिंघम प्रोजेक्ट नामक कोई कंपनी 1976 में आयी थी। तब सरकार ने किसानों को धोखे
में रखकर नौकरी और अमीरी का प्रलोभन देकर 350 एकड़ जमीन सी.पी.टी. कंपनी को दिलायी।
जमीन से बेदखल हुए 142 कृषक तब कंपनी में कुछ वर्ष ठेका मजदूर भी रखे गये, पर जल्दी
ही जेलिंघम प्रोजेक्ट की हवा निकल गयी। जमीन अब तक सी.पी.टी. कंपनी के कब्जे में
है। हरेंद्र मैती अच्छी तरह जानते हैं, जब कोई कंपनी किसानों के गांव में आती है तो
क्या होता है? क्या सी.पी.टी. कंपनी बंद पड़े जेलिंघम की कब्जायी जमीन पर दूसरा
उद्योग लगायेगी? किसान चाहते हैं मुआवजे के बिना धोखे में ली गयी जमीन हमें वापस कर
दी जाये। क्या आप हरेंद्र मैती के इस कथ्य को महज भावनात्मक कहकर टाल देंगे कि हम
जमीन के साथ इसी तरह जुड़े हैं जैसे मछली पानी के साथ। अब देखिए तीन बीघा जमीन में
इनकी संपन्नता के आधार क्या-क्या हैं। घर के आगे दस कट्ठे का पोखर पानी से लबालब
भरा है। पोखर के चारों तरफ मेड़ पर सौ से ज्यादा नारियल, सुपारी के पेड़ खड़े हैं।
पोखरे में हर किस्म की मछली है। पोखरे के पास 2 बीघा धान सरकार के नलकूप से नहीं,
पोखरे के पानी से लहलहा रहा है। पान का दस कट्ठा बागान हर माह घर में औसतन दो हजार
रुपये तो दे ही देता है। दूध के लिए एक गाय काफी है। 30 साल से बिजली-पानी तक नहीं
देनेवाली सरकार बंदूक लेकर जमीन छीनने खड़ी है। 14 मार्च के 'जमीन बचाओ संग्राम' पर
हुए हमले को मैती संत्रास कहते हैं। संत्रास के दिन हमारे 200 मुर्गे सी.पी.एम. की
बमबारी की दहशत में मर गये। मैती की तरह के कई किसान हैं, जिनकी शिकायत है कि
संत्रास के दिन मुर्गे बम की धमक से अचानक चल बसे। बम की धमक से सैकड़ों मुर्गों की
जानें गयीं। मुर्गे कितने संवेदनशील हैं, इंसान से ज्यादा। सरकार जिस रक्तपात से
सिहरती तक नहीं है, वहां मुर्गे सिहरने से पहले खत्म हो गये। सवाल मुर्गे बनाम
सत्ता की भोथरी संवेदना का नहीं है। यह समझने का है कि हरेंद्र मैती अपनी अमीरी की
परत-दर-परत दिखाते हुए एक बार पूछते हैं, “ क्या आप जानते हैं कि हमारी जमीन ही
हमारी फैक्ट्री है। सालेम की एक फैक्ट्री लगाने के लिए हमारी तरह के हजारों किसान
अपनी-अपनी फैक्ट्री से अपना स्वामित्व क्यों छोड़ दें?”
शहराती बिजली की चकमक के बिना भी माटीघर के दो मंजिले अतिथि कक्ष में वातानुकूलित
कमरे का सुकून महसूसते हुए हम ठेठ देहाती आदर्शवाद के चिंतन में बिला नहीं गए हैं।
अभी रात के नौ बज रहे हैं और हम बम के जोरदार धामाकों की गिनती कर रहे हैं। हम एक
के बाद दूसरा धमाका सुन रहे हैं। क्या हमें बम-गोलियों की बरसात वाली रात में सोने
की कोशिश करनी चाहिए? गांव के कृषक नारों के साथ इस डरावनी रात में हमारी नींद की
पहरेदारी कर रहे हैं। मां सुषमा मैती हमें दिलासा दिलाती हैं-“डरो मत, सो जाओ बेटे।
तीन माह से हम जो रोज सुन रहे हैं, आज आप भी सुन लीजिए.” तड़के बंग सागर के इस इलाके
में कुहरा भरा है और धमाकों की धमक से सुबह की धड़कन तेज हो गई है। यहां सूरज भी
उनके आदेश से उतरता है!
गोकुल नगर के किसान दिलीप दास अधिकारी का शरीर सौष्ठव कितना आकर्षित करता है। रात
के 10 बजे घर पर अचानक पहुंचे अतिथि के लिए पांच तरह की स्वादिष्ट सब्जी के साथ
चावल, दाल, घी, दूध, केला परोसने वाली बहन महामाया के हाथ कितने ताकतवर हैं। दिन भर
खेतों में जमीन खोदने वाली महामाया ने रबड़ बुलेट से घायल होने से पहले दो महिला
पुलिस अधिकारियों को दबोचकर पकड़ लिया था। अचानक घर आये अतिथि के आतिथ्य में जिस तरह
का उत्तम भोजन महामाया परोस रही है, यह 4 बीघा खेत की ताकत पर टिका है, न कि सरकारी
दया पर। 2 से 4 बीघा औसत जमीन के जोतदार नंदीग्राम के इलाके में जितने खुशहाल हैं,
यह खुशहाली एशिया का सबसे पहला किसान पैदा करने वाले निमाड़, नर्मदा घाटी क्षेत्र या
बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र के गांवों में कहां दिखती है! क्या 1943 में जीवन
पर अकाल और भूख के ऐतिहासिक हमले के बाद नंदीग्राम के किसानों ने माटी को सोने में
बदलने का पराक्रम सीख लिया?
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19 मार्च की सुबह सोनाचूड़ा में पुष्पेंदु मंडल की शवयात्रा में शरीक होकर हम शहादत
के आंसू में साथ होते हैं। प्रतापचंद मंडल बताते हैं-पुष्पेंदु गोली से घायल छटपटा
रहा था, इलाज के लिए लोग भांगाभेड़ा से अस्पताल की तरफ ले जा रहे थे तो सी.पी.एम.
कैडरों ने घायल पुष्पेंदु को अपने कब्जे में ले लिया। गांव के लोग इलाज के लिए
पुष्पेंदु को ढूंढ़ते रहे और बीती रात अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में लाश दिखायी
गयी। जान-बूझकर समय पर घायल का इलाज रोका गया और पुष्पेंदु मंडल अब लौटकर नहीं
आयेगा। सैकड़ों जन साथ होकर रो रहे हैं। सामूहिक क्रंदन के इस पहर में साथ होकर नारे
लगाइये 'पुष्पेंदु बाबू अमर रहे, शहादत तोमार भूलवो ना, भूलवो ना...।‘
हम देख रहे हैं, लिख रहे हैं। बंग मीडिया को सरकार ने अपनी तरह से देखने का निर्देश
दिया है। जिन्होंने अपनी आंखों का दिखा सच दिखाने-लिखने की कोशिश की उनकी क्या हालत
है, जानिए नंदीग्राम रिर्पोटिंग के स्टार पत्रकार सुकुमार मित्रा से। स्टेट्समेन
बांग्ला के कार्यालय संवाददाता सुकुमार ने गांवों में भटकने का फैसला क्यों लिया?
अगर सुकुमार के इस फैसले से सरकार की भद पिटी है तो क्या कॉमरेड कैडर आपकी शक्ल
बिगाड़ सकते हैं? हां, हमारे पास एक-दो नहीं, श्रृंखलाबद्ध धमकियां आ रही हैं। जन
पत्रकारिता का प्राथमिकी पत्रकारिता से कोई रिश्ता नहीं होता है। पत्रकारिता की
पहली शर्त है, संवाददाता अपनी आंखों से जो देख रहा है, उस घटना के सच को परख रहा
है, वह कितना सच है? जान जोखिम में देकर संग्राम की पत्रकारिता करने वाले सुकुमार
मित्रा को हमारा मुल्क कितना जानता है, हम नहीं जानते, पर मूल्य की पत्रकारिता के
जो पक्षधर हैं, उन्हें सुकुमार मित्रा से एक बार जरूर हाथ मिलाना चाहिए।
एक प्रतिष्ठित चैनल के नंदीग्राम संवाददाता गोरांगो देव हाजरा के हाथ में प्लास्टर
और कंधो पर कैमरा है, यह क्या सीन है! गोरांगो की सुनिये। “ 14 मार्च की सुबह मैं
तारा चैनल के लिए पूजा का कवरेज कर रहा था। हम हमले का कैसेट जल्दी कोलकाता बस से
भिजवाने चंडीपुर जा रहे थे। साढ़े ग्यारह बजे नंदीग्राम से 10 कि.मी. आगे रेयापाड़ा
में हमें सी.पी.एम. कैडरों ने अपने कब्जे में लिया। पहले बेतरह पीटा फिर लोडेड
पिस्तौल कान से सटाकर गोली मारने की धामकी दी।“
टूटे हाथों का प्लास्टर कंधो से लटकाये गोरांगो हौले से कैमरा संभालता है और
गोकुलनगर की राह अपने मिशन में लग जाता है। मुफस्सिल पत्रकारिता से कॉरपोरेट
पत्रकारिता को कुछ नहीं चाहिए, लेकिन भारतीय पत्रकारिता को अगर एक सही राह चाहिए,
तो लीक नंदीग्राम से शुरू होती है। गोरांगो के टूटे हाथ, टूटे कैमरे और सुकुमार
मित्रा की बेचैन आंखों व आग उगलती कलम से शुरू होती है जन पत्रकारिता की कार्य
संहिता।
19 से 22 मार्च, 2007
जान देबो, जमीन देबो ना
वामपंथ का सत्तापंथी चरित्र 30 वर्ष में क्यों जनद्रोही हो गया? एक तरफ
पूंजीवाद-समाजवाद के घालमेल का नया संस्करण सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) दूसरी तरफ
विकास की नाक पर मजबूत हथौड़ा नंदीग्राम का कृषक संग्राम। सिंगुर का जवाब नंदीग्राम
माननेवाले, कलिंग नगर का दूसरा चरण नंदीग्राम मान सकते हैं। इधर खेतों में पसीने के
साथ लहू बह रहा है। खेतिहर भारत में कृषक विद्रोह का प्रतीक बना नंदीग्राम 14 मार्च
के राज्य प्रायोजित रक्तरंजित बर्बर हमले के बावजूद अभी पस्त नहीं हुआ है।
जनसंहार के तीसरे दिन सी.बी.आई. ने देशी-विदेशी हथियारों के जखीरे के साथ जिन्हें
गिरफ्रतार किया है, वे पेशेवर अपराधी नहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे
वफादार रेड ब्रिगेड कैडर हैं। रेड ब्रिगेड जेल भेजे जा रहे हैं तो मीडिया के लिए
नंदीग्राम पहुंचना थोड़ा आसान हो गया है।
हम नंदीग्राम में खड़े हैं। नंदीग्राम संग्राम का केंद्र अभी शहर से 18 कि.मी. दूर
है। नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण से प्रभावित किसानों ने अपने संघर्ष का केंद्र
जिला या प्रखंड मुख्यालय की बजाय अपने गांवों को क्यों बनाया? सिंगुर में ममता
बनर्जी के 25 दिन के अनशन का नतीजा क्या हुआ? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,
मुख्यमंत्री स्तर के वायदे कितने खोखले, निकम्मे साबित हुए। नंदीग्राम ने सिंगुर के
मजबूत संघर्ष के साथ हुए छलावे और झूठ से सबक लिया। नंदीग्राम का वोट लेकर
सी.पी.आई.(एम) से सांसद हुए (हल्दिया विकास प्राधिकरण) के प्रमुख लक्ष्मण सेठ ने 28
दिसंबर 2006 को जमीन अधिग्रहण की विज्ञप्ति नंदीग्राम बस पड़ाव की एक आम सभा में
जरूर जारी की थी, पर जमीन के जोतदार किसानों से विज्ञप्ति से पूर्व यह राय जानने की
कोशिश नहीं की गयी कि क्या वे इंडोनेशिया के किसी बदनाम उद्योगपति सालेम समूह को
केमिकल हब के लिए अपनी जमीन देने के लिए तैयार हैं? इधर दिल्ली से खबर आ रही है कि
नंदीग्राम अध्याय को सही और जायज बताने के लिए जो पक्ष देश भर में प्रचारित किये जा
रहे हैं, उसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि प. बंगाल सरकार ने नहीं, केंद्र
सरकार ने केमिकल हब की स्वीकृति दी थी। सी.पी.एम. के शीर्षस्थ नेताओं ने मीडिया से
यहां तक कहा है कि नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण का कोई पत्र जारी नहीं हुआ था। हमें
12 सितंबर, 2006 को जारी पत्रांक 888/HAD/V11-M-72/05 का हल्दिया विकास प्राधिकरण
का एक पत्रक प्राप्त हुआ है, जिसमें नंदीग्राम के 38 मौजे के 19196.36 एकड़ जमीन का
सेज के तहत मेगा केमिकल हब के लिए अधिग्रहण प्रस्तावित है। नंदीग्राम प्रखंड 1 के
प्रखंड कार्यालय के सूचना पट पर जब इसे सार्वजनिक किया गया तो अधिग्रहण से प्रभावित
होने वाले गांव अचानक गोलबंद होने लगे।
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15 नवंबर, 2006 के स्टेट्समेन (अंग्रेजी) में एक खबर छपी-'नंदीग्राम को सिंगुर का
झटका'। इस समाचार के अनुसार नंदीग्राम में कृषि जमीन अधिग्रहण के खिलाफ लोग एकजुट
हो रहे हैं और प्रतिरोध की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। सी.पी.एम. के एक युवा कॉमरेड
ने अति उत्साह में हमें यह बताने की कोशिश की कि जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सबसे पहले
सी.पी.एम. और सी.पी.आई. ने प्रतिरोध की हवा बनायी, जिसे तृणमूल कांग्र्रेस ने
हाइजेक कर लिया। 16 नवंबर, 2006 को पूर्वी मेदिनीपुर के पुलिस अधीक्षक ने सरकार को
भेजी अपनी गोपनीय रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है कि वाममोर्चा के घटक दल सी.पी.आई.
ने नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सरकार के विरुद्ध लोगों को संगठित करना
शुरू कर दिया है। एस.पी. ने इस रिपोर्ट में उन तिथियों और सही समय की सूचना दी जब
सी.पी.आई. ने जमीन अधिग्रहण के खिलाफ नुक्कड़ सभाएं कीं। सी.पी.आई. से नंदीग्राम के
विधायक इलियास मोहम्मद ने 16 नवंबर को अपने आवास पर 'कर्मी सभा' की बैठक में साफ
कहा 'हमलोग मांग कर रहे हैं, सरकार को जमीन अधिग्रहण करने नहीं दिया जायेगा।' कर्मी
सभा की इस बैठक में मेदिनीपुर के सांसद प्रबोध पंडा भी उपस्थित थे। 16 नवंबर से 18
नवंबर के बीच सी.पी.आई. ने जमीन अधिग्रहण के खिलाफ कई नुक्कड़ सभाएं कीं। प. बंगाल
में वाममोर्चा होने के कारण सी.पी.आई., सी.पी.एम., फॉरवर्ड ब्लॉक की गतिविधियां
लगभग एक ही रिमोट से संचालित होती हैं। स्थानीय विधायक की भूमिका के कारण स्थानीय
सी.पी.एम. कैडर भी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ एकजुट होने लगे। शायद यह सब सांसद
लक्ष्मण सेठ की इच्छा के विरुद्ध हो रहा था, लेकिन सांसद सेठ सरकार की पुलिस से
एक-एक पल की खुफिया रिपोर्ट सरकार के पास भिजवा रहे थे कि यह सब अच्छा नहीं हो रहा
है। हमें एक बांग्ला चैनल के संवाददाता ने दावे के साथ बताया है कि एस.पी. स्तर के
उच्च अधिकारी सी.पी.एम. सांसद के निर्देश के अनुसार सरकार को रिपोर्ट भेजते हैं। 20
नवंबर, 2006 को सी.पी.एम. के समर्थकों ने भी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ नंदीग्राम बस
पड़ाव में संध्या 3 बजे एक सभा बुलायी। यह सब जिला नेतृत्व की इच्छा के विरुद्ध हो
रहा था, नंदीग्राम सी.पी.एम. के जोनल कमेटी सेक्रेटरी सुनीलमल गिरी ने यह सभा
बुलायी थी। इस सभा में तीन हजार के करीब लोग जमा हुए थे। सबके हाथ में लाल पताका थी
और 'कृषि बचाओ, देश बचाओ' का बैनर लगाया गया था। गिरी ने इस सभा में कहा था-'उद्योग
का विकास होना चाहिए। यह राष्ट्रीय मुद्दा है, लेकिन सरकार को कृषि और कृषि जमीन को
पहली प्राथमिकता देनी होगी।'
यह सभा दो घंटे तक चली। नंदीग्राम के भीतर लाल झंडे के साथ जमीन अधिग्रहण के खिलाफ
यह अंतिम सभा थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य और जिला नेतृत्व के लिए
यह चुनौती की तरह हो गया कि लाल झंडा लेकर सरकार के खिलाफ कोई सभा बंगाल में कैसे
हो सकती है। नंदीग्राम के विधायक को सी.पी.एम. ने सी.पी.आई. के उपरी नेतृत्व से
दबाव दिलाया और विधायक भूमिगत प्रवास में चले गये।
29 दिसंबर, 2006 को सांसद और हल्दिया विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष लक्ष्मण सेठ ने 38
मौजे के बजाय 29 मौजे की 14 हजार एकड़ जमीन के अधिग्रहण की दूसरी अधिसूचना जारी की।
सुधार कर दूसरी अधिसूचना जारी करने की बात सांसद ने खुली सभा से जरूर की लेकिन
सांसद की नियत से चोट खाये कृषकों ने दूसरी अधिसूचना से हटाये गये मौजे को भी
अधिगृहित मान लिया। इस अधिसूचना में नंदीग्राम के 27 मौजे सहित खेजूरी के 2 मौजे
शामिल किये गये। पहले की अधिसूचना से अधिग्रहण के संशय के घेरे में आये जिन गांवों
में सुगबुगाहट शुरू हुई, वे सी.पी.एम. की तरफ नहीं लौट पाये।
प. बंगाल के पंचायती राज में दलगत आधर पर चुनाव और दलीय पंचायती राज का खतरनाक
नतीजा नंदीग्राम में देखिये। 3 जनवरी 2007 को भूता मोड़ पर सैकड़ों किसानों ने
कालीचरणपुर की सी.पी.एम. के अंचल प्रधान समेरूण बीबी से जमीन अधिग्रहण विज्ञप्ति का
सच जानने की कोशिश की। किसान गुस्से में थे और नारे लगा रहे थे। अंचल प्रधान को
किसानों का मुर्दाबाद पसंद नहीं आया और उसने पुलिस बुलायी। पुलिस की गोली से 19
किसान घायल हो गये। बेवजह गोलीबारी से किसानों को पक्का यकीन हुआ कि वे सच को
छुपाने के लिए गोली चला रहे हैं। 4 जनवरी से भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति की गोलबंदी
शुरू हो गई। दो दिनों के अंदर गांव-गांव में स्वत:स्फूर्त भूमि उच्छेद का बैनर
चमकने लगा। 80 फीसदी वोट सी.पी.एम. को देने वाले इस इलाके के पुराने कैडरों ने
सी.पी.आई.(एम) की सदस्यता के पहचान पत्रों को फाड़कर अपनी जमीन और जीवन को बचाने की
लड़ाई शुरू कर दी। 7 जनवरी, 2007 को सी.पी.आई.(एम) के राज्य सचिव मंडल सदस्य विनय
कोनार ने कहा-'केसपुर में हमने तृणमूल कांग्रेस का प्रतिकार करने के लिए हथियार
उठाया था। अगर वे हमारे सामने अभी भी मुश्किल खड़ी करेंगे तो नंदीग्राम के लोगों की
लाइफ को हम हेल (नरक) कर देंगे।' भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के संघर्ष का एकसूत्री
एजेंडा तय हुआ- 'जान देबो, जमीन देबो ना।'
04.09.2009,
09.44 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | amit patna | | | | यह डायरी नंदीग्राम में बलत्कृत औरतों के प्रति ज्यादा संवेदित दिखती है। बलत्कृत औरतों के प्रति मीडिया की दिलचस्पी की आलोचना करते हुए भी खुद लेखक की चेतना बार-बार इससे ही ज्यादा आहत दिखती है। समर्पण का पहली पंक्ति गौरतलब है- नंदीग्राम की उन स्त्रियों के नाम जिनकी इज्जत लूट ली गई जिन्हें न्याय नहीं। हमारी भाषा भी कई बार हमारे मकसद और हमारी सीमा का पता दे देती है।
सवाल यह है कि यह समर्पण उन औरतों के नाम क्यों नहीं है, जिन्होंने प्रतिरोध किया। हालांकि अपनी डायरी में वे यह जानने की ‘कोशिश करते हैं कि जिनके साथ बलात्कार हुआ है, वे महिलायें हतोत्साहित होने की बजाय ज्यादा आक्रामक होकर बलात्कारी को खोजने- पाया है! जहां कैडर बलात्कारी हैं, क्रूर हत्यारे और लूटेरे हैं, रंगदारी टैक्स वसूलते हैं, वहां उनके प्रति नफरत तो पैदा होगी ही। पुष्पराज ने नंदीग्राम की जो कथाएं कहीं हैं, उनमें सीपीएम पूरी तरह खलनायक है, उनमें किसानों का जीवट, धर्म के पार उनकी एकजुटता, स्त्रियों का जागरण सबकुछ है।
लेकिन आपत्तिजनक यह लगता है कि लेखक भारी आत्ममुग्धता और उद्धारक भाव से भरा हुआ है। कुछ इस तरह का भाव है कि संघर्ष की इन अंदरूनी जानकारियों को हमने उजागर किया, वर्ना दुनिया को पता नहीं चलता। | | | | | |
| | rajnesh (rajnesh.reporter@gmail.com) wardha | | | | पुष्प, बहुत बढ़िया दोस्त, तुमने पी. साईनाथ जैसा काम किया है. उनकी किताब तीसरी फसल में भी जमीन अधिग्रहण की ऐसी ही कहानी है. यार, इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों को तुम्हारी इस किताब से सबक लेना चाहिए. भारत की कम्यूनिस्ट सरकार गिरेगी, शर्म आती है. | | | | | |
| | harekrishna (harekrishna.duboliya@gmail.com) gwalior | | | | पुष्पराज जी जो आपने देखा उसे देश शासन करने वाले नेता क्यों नहीं देख पाते. मजदूर और किसान के नाम पर सत्ता में आने वाले वामपंथी उन पर अच्याचार करते हैं. नंदीग्राम को इन्होंने गोधरा से भी ज्यादा विभत्स बना दिया. | | | | | |
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