रविवार | Raviwar | दूर देखती आंखें | रमेशचन्द्र शाह
पुस्तक अंश
दूर देखती
आंखें
विश्व कविता से एक चयन
अनुवादः रमेशचंद्र शाह
प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर,
नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
suryaprakashan@gmail.com
मूल्यः एक सौ पच्चीस रुपये
स्तेफान स्पेन्डर
ब्रिटिश
चौक के ऊपर वाला कमरा
लगता था अनन्त प्रकाश इस खिड़की का
रहते थे जब तुम यहां, मेरे लिए
छिपती थी पेड़ों के ऊपर वह पत्तों के झुरमुट से
मेरे भरोसे की तरह
अस्त हो गया है प्रकाश वह और हो चुके हो तुम भी कब के
ओझल एक खड्ग के उजले प्रायद्वीपों में
चिथड़े-चिथड़े हो चुकी है शान्ति समूचे यूरोप में
जो बहती थी हमारे आर-पार कभी
चढ़ता हूं अकेला अब मैं सीढ़ियां इस ऊंचे कमरे की
अंधेरे चौक के ऊपर
जहां पत्थर और जड़ों के बीच है कोई अन्य
अक्षत प्रेमीजन
अपनी बेटी के लिए
टहल रहे हम साथ आज ; मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उस के पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करुंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी- आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उस की अभी, आज ही
अनहोना
कभी नहीं होता, पर होने की कगार पर सदा टंगा-सा,
मेरा सिर-मत्यु का मुखैटा, लाया जाता है प्रकाश में.
छाया पड़ती आर-पार गाल के और मैं, होंठ हिलाता हूं छूने को ;
लेकिन मेरी पहुंच महज छूने तक ही सीमित रह जाती,
भले आत्मा कितना ही बाहर निकाल कर गरदन झांके.
निरख रहीं हों वे गुलाब, सोना, आंखें या दृश्य भला सा
ये मेरी इंद्रियां आंकती क्रिया चाहने भर की ;
होने की कामना दृश्य, सोना, गुलाब, दूसरा व्यक्ति वह.
“ करता हूं मैं प्यार ”- एक बस इसी तथ्य पर
दावा मेरा पूर्णकाम बनने का टिका हुआ है.
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टोमास ट्रान्सटोमर
स्वीडिश
इतिहास के बारे में
एक
मार्च का एक दिन
जा निकला हूं समुद्र तक और सुनता हूं.
बर्फ इतनी नीली है, जितना कि आसमान
तड़क रही धूप में
धूप, जो बर्फ की पर्त के नीचे भी फुसफसा रही है
एक माइक पर खुदबुदाती, बड़बड़ाती
और लगता है दूर कहीं कोई एक चादर झटक रहा है.
यह सब इतिहासनुमाः अभी, बिल्कुल अभी.
हम निमग्न हैं, हम सुनते हैं
दो
सम्मेलन, उड़ते द्वीपों से, जो कभी भी ढह सकते हैं...
तब फिरः एक लंबा कंपकंपाता पुल समझौतों का
गुजरेगा जिस पर समूचा यातायातः नक्षत्रों की छांव में.
अजन्मे सुस्त चेहरों की छांव में, बहिष्कृत जो
सूने अंतरिक्ष में, अनाम हिमकणों की तरह.
ग्योएटे घूम आया अफ्रीका सन् छब्बीस में, जीद के चोले में
और देख आया सब कुछ
तीन
कुछ चेहरे ज्यादा साफ हो आते हैं मरणोपरांत
देखी गई चीजों के कारण
जब बांचे गये दैनिक समाचार अल्जीरिया के
प्रगट हुआ, बड़ा-सा मकान एक, जहां सारी खिड़कियां
काली पुती हुई थीं.
सिर्फ-सिर्फ एक के. और वहां दीखा हमें ड्रेफस का चेहरा
चार
विद्रोही, प्रतिगामी साथ-साथ रहते हैं जैसे
एक दारुण दांपत्य में.
सांचों में एक-दूसरे के गढ़े जाते हुए
एक दूसरे पर अवलंबित.
हम, जो हैं उन की संतान किंतु
होना ही होगा हमें उन से अलग.
प्रत्येक प्रश्न की पुकार अलग
भाषा है.... खास उस की अपनी
जासूसी कुत्ते की तरह, वहां जाओ तुम,
जहां भी सच्चाई ने छोड़े हों चरण-चिन्ह
पांच
खुले मैदान में इमारतों के पास ही
रद्दी अखबार एक पड़ा है महीनों से, ठुंसा हुआ खबरों से
भींजता दिन रात बारिश में, धूप में, बूढ़ा हो रहा वह
पौधा या पातगोभी बनने की राह में
पृथ्वी से एकजान होने की राह में.
ठीक उसी तरह, जिस तरह कोई याददाश्त
रच-पच जाती है तुम्हारे स्वरूप में
12.12.2008,
00.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित