गांधी की अहिंसा का फलितार्थ
गांधी की अहिंसा का फलितार्थ
कनक तिवारी
अपने देश में गांधी 1915 में लगभग अजनबी की हैसियत से संयोगवश ही लौटे. कानून के
पेचीदे पेशे ने उनके अन्त:करण को उद्वेलित किया और वे स्वार्थ की पगडंडियों से
भटकते-भटकते लोकसेवा के राजमार्ग पर आ खड़े हुए. उन्होंने व्यक्तिगत और सार्वजनिक
जीवन में मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य प्रकृति तथा चिन्तन और कर्म के सभी क्षेत्रों
में नैतिक आदर्शों के अंतर और विसंगतियों को खत्म कर दिया. यहाँ तक कि प्रथम विश्व
युध्द के दिनों में बर्तानवी हुकूमत की मजबूरी का फायदा उठाने के बजाय उन्होंने
स्वयं को सेवा के लिए उपस्थित किया था क्योंकि यह अहिंसा की मूल भावना के विरुध्द
था. परन्तु अंग्रेजों द्वारा पराधीन भारतीयों की भावना की खिल्ली उड़ाने पर वे देश
के अगुवा के रूप में अपना अहिंसा-दर्शन लेकर सामने आये. बापू ने राजनीति की
व्यावसायिकता के रुख का परिहार किया.
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बलवान की अहिंसा की जरुरत |
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एक तरफ तो जबान महात्मा गांधी
और अहिंसा की आरती उतारे और दूसरी तरफ बन्दूकें और तलवारें खुद
अपनी जनता के ऊपर चलती रहें. नये हिन्दुस्तान की बुनियाद में
निर्बल की नहीं बलवान की अहिंसा की जरूरत की वकालत गांधी ने
की. |
बारदोली में पीड़ित किसानों के संगठित अहिंसक विद्रोह ने न केवल अंग्रेजी राज बल्कि
औपनिवेषिक और साम्राज्यवादी विचारधाराओं को ही नष्ट करने का संकेत सूत्र प्रदान किया.
कांग्रेस के चवन्नी सदस्य नहीं रहते हुए भी वे कांग्रेस के माध्यम से (भी) सम्पूर्ण
भारत के सबसे सच्चे प्रतिनिधि थे. लेकिन गांधी का चित्र केवल राजनीतिक कैनवास पर
खींचने का प्रयास हास्यास्पद ही होगा. राजनीति वस्तुत: उनका आखिरी चयन था. अन्याय
के खिलाफ लड़ने की उनकी स्वाभाविक जिद ने उन्हें देश का राजनीतिक संदर्भ चुनने पर
विवश कर दिया था.
महानता एक तरह से किसी व्यक्तित्व का चरमोत्कर्ष तो है परंतु वह हीनतर व्यक्तित्वों
का मनोवैज्ञानिक शोषण भी है. महानता में एक तरह का सात्विक अहंकार और नैतिक
अहम्मन्यता का पुट अपने आप गुंथ जाता है. एकांगी महान व्यक्ति किसी क्षेत्र में इतना
ऊँचा हो जाता है कि बाकी लोग बौनों की तरह उसकी ओर टकटकी लगाए रहते हैं. गांधी अलग
तरह के महान व्यक्ति थे. उन्होंने सदैव व्यापारिक कुशलता बरती कि उनमें कहीं देवत्व,
पांडित्य या आसमानी अंश नहीं उग आएँ. यह कहना मुश्किल है कि अपनी किसी तरह की महानता
का बोध उन्हें नहीं रहा होगा क्योंकि उन्होंने सतर्क रहकर बार-बार इस बात के विपरीत
उल्लेख किये हैं.
गांधी असल में महान बनने के बदले भारत के हर खेत में इंसानियत की फसल उगाने के फेर
में थे. उन्होंने अपने चरणों का उपयोग दूसरों के सिर पर रखने के बदले सड़कें और
पगडंडियाँ नापने में किया. उन्होंने धवल, भगवा या भड़कीले वस्त्र पहनने के बदले
वस्त्रों की न्यूनता को ही आकर्षक बनाया. उन्होंने अपने शरीर का धूल, मिट्टी और
पसीने से श्रृँगार किया. यह पहली बार हुआ जब आराध्य अपने भक्तों के मुकाबले दिखाऊ
नहीं बना. गांधीजी प्रखर, प्रभावशाली या निर्णायक दिखने तक से परहेज करते थे. उनके
लेखे विनम्रता सायास हथियार भी नहीं थी. वह उनका नैसर्गिक गुण थी. नैसर्गिक जन्मजात
के अर्थ में नहीं, उनकी व्यापक रणनीति की केन्द्रीय संवेदना के अर्थ में. उन्हें
भीरुता, कायरता तथा हीन आत्मसमर्पण से बेसाख्ता नफरत थी. यह कहना सरल नहीं है कि वे
इसी नस्ल और क्रम के औरों की तरह अहिंसा के प्रवर्तक पुरोहित थे.
गांधीजी ने वस्तुत: अहिंसा को महसूस करने वाले तत्व के बदले लोक हथियार के रूप में
तब्दील किया था. अन्य महापुरुषों की शिक्षाओं से आगे बढ़कर उन्होंने व्यक्तिगत अहिंसा
के साथ-साथ समूहगत अहिंसा के कायिक प्रदर्शन का पुख्ता उदाहरण भी पेश किया है. यही
वह बीजगणित है जो गांधीजी को आज तक हमारे सामाजिक व्यवहार का ओसजन बनाये हुए है.
कहा जाता है कि गांधी की अहिंसा की बात करने से मन का मैल निकलता है. क्या है अहिंसा?
एक तरफ तो जबान महात्मा गांधी और अहिंसा की आरती उतारे और दूसरी तरफ बन्दूकें और
तलवारें खुद अपनी जनता के ऊपर चलती रहें. नये हिन्दुस्तान की बुनियाद में निर्बल की
नहीं बलवान की अहिंसा की जरूरत की वकालत गांधी ने की. उन्होंने कहा था-''सारा समाज
अहिंसा पर उसी प्रकार स्थिर है, जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी अपनी स्थिति
में बनी हुई है. लेकिन दुर्भाग्यवश हिंसा को जीवन का शाश्वत नियम बना दिया गया है.
मैं विश्वव्यापी अहिंसा का हिमायती हूँ परन्तु मेरा प्रयोग हिन्दुस्तान तक ही सीमित
है. जब तक प्रजातंत्र का आधार हिंसा पर है, तब तक वह दीन-दुर्बलों की रक्षा नहीं कर
सकता. संसार में आज एक भी देश ऐसा नहीं है जहाँ कमजोरों के अधिकार की रक्षा कर्तव्य
के रूप में होती है. अगर गरीबों के लिए कुछ किया भी जाता है तो वह कृपा के रूप में
किया जाता है. आजादी की लड़ाई में हमने कमजोरों की अहिंसा का भी उपयोग किया लेकिन
आजाद हिन्दुस्तान में हमारा उद्देश्य बलवान की अहिंसक लड़ाई का विकास करना है''.
विश्व के इतिहास में आजादी के लिए भारतीयों से ज्यादा अहिंसक संघर्ष किसी ने नहीं
किया. इसलिये बापू की कल्पना का प्रजातंत्र अहिंसक भारत में ही आधारित हो सकता था.
किसी ने उनसे प्रश्न किया कि पूर्ण अहिंसा सामाजिक जीवन में कैसे संभव है. बापू ने
कहा-''यह सही है कि हिन्दुस्तान ने एक तरह से मिलावटी अहिंसा द्वारा ही काफी शक्ति
प्राप्त कर ली थी, लेकिन जिस तरह युक्लिड ने कहा है कि रेखा वही हो सकती है जिसमें
चौड़ाई न हो, लेकिन ऐसी रेखा न तो आज तक कोई बना पाया है और न बना पायेगा. फिर भी ऐसी
रेखा को ख्याल में रखने से गणित में प्रगति हो सकती है. जो बात विज्ञान के इस आदर्श
के बारे में सच है, वही अहिंसा के आदर्श के बारे में भी सच है.''
यह समझना भी गलत है कि गांधी अहिंसा के अतिवादी पुजारी थे. 1942 में उन्होंने इशारा
किया था. उन्होंने कहा था, ''जब आखिरी इंकलाब या क्रांति करते हो और अंग्रेज जब
पकड़कर जेल ले जाने लगे, तो मत जाओ. जेल के कानून को मत मानो और उपवास करो.'' और अपनी
बात को तेज बनाने के लिए उन्होंने यहाँ तक कहा था कि जेल की दीवार से सर टकरा-टकरा
कर मर जाओ लेकिन गलत बात मत मानो, अन्याय के आगे मत झुको. गांधी दरअसल अन्याय का
विरोध करने की अहिंसक राष्ट्रीय आदत बनाने के पक्षधर थे.
हिंसक राष्ट्रीय आदत संभव है लेकिन हर वक्त उतनी भौतिक ताकत कहाँ होगी. एक दूसरे
अवसर पर गांधी ने कहा था कि यदि मुझे सत्य और अहिंसा में से एक चुनना पड़े तो मैं
सत्य को चुनूँगा. अहिंसा का आदर्श गांधी का मौलिक योगदान नहीं था. उपनिषदों, भगवान
बुध्द और चौबीसों जैन तीर्थंकरों ने सामाजिक जीवन में अहिंसा पर जोर दिया है.
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चीन
के लाओ त्से, ईसा, कुरान शरीफ की कई आयतों और तॉल्स्तॉय के जीवन दर्शन में भी अहिंसा
है. देश की आजादी हासिल करने के लिए साधना और साध्य (जरिया और मुराद) में कोई ठोस
तालमेल होना गांधी के हिसाब से जरूरी था. इसलिये उन्हें लगता था कि मशीनगनों पर
गरजने वाले अंग्रेजों को सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी के द्वारा ही शिकस्त दी जा
सकती थी.
बापू
के लेखे ऐटम से आत्मा की आवाज बड़ी है और रहेगी. उनका सत्याग्रह महाभारत के महान वचन
'अहिंसा परमोधर्म:' का भारतीय जीवन में विनियोग रहा है. अमरीकी विचारक थोरो से
प्राप्त सिविल नाफरमानी का मतलब मामूली इंसान का ही महत्व है. सिविल नाफरमानी का
मतलब है मामूली इंसान का मामूली वीरता से काम चलाना. सिविल नाफरमानी नया इंसान पैदा
करती है, जो जालिम के सामने घुटने नहीं टेकता लेकिन साथ ही उसकी गर्दन भी नहीं काटता.
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आजादी के साठ बरस बाद भी आज
देहातों में रहने वाले करोड़ों इन्सानों के हक में सुनने को कान तरस
गये. दरिद्रनारायण की सेवा का ध्येय अपनाकर राष्ट्रीय आय का अधिकतम
हिस्सा मुट्ठी पर लोग उड़ा ले गये और मेहनतकश इन्सान की मुट्ठियाँ खाली
की खाली रह गईं. |
कभी कभी कुछ लोग गांधी जी को प्रतिगामी कहते हैं. वे कहते हैं कि ऐटम के युग में
गांधी चरखे और कुटीर उद्योग की बात करते हैं. जब आर्मस्ट्रांग ने चाँद पर पाँव रखा
तो एक बार भारतीयों का मन भी उछला. लेकिन अगले क्षण जो चीज और ज्यादा गहरी होकर मन
में रह गई, वह यह भी कि हम हिन्दुस्तानी नहीं जा सकते. अमरीकी गया, रूसी भी गया. हम
नहीं जा सके. हमारे हिस्से में है भूख, अकाल, निरक्षरता, बीमारी और उदासी. ऐसा लगता
है गोरे आदमी को दुनिया में गरीबी का खात्मा करने से कोई सरोकार नहीं है. एक और
प्रश्न इससे उभरा है-क्या इस अन्तरिक्ष यात्रा में भी सामरिक हेतु नहीं है. क्या
इससे युध्द की सम्भावना तीखी नहीं होती?
गांधी के समय में भी दो विश्वयुध्द हुए. हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाएँ उनके सामने
हुईं. इसलिये गांधी ने एक हिन्दुस्तानी और इन्सान के रूप में वक्त की जो चुनौतियाँ
का सामना करने के लायक ताकत विज्ञान की बजाय धर्म के चिन्तन से हासिल की. यह मानना
गलत है कि विज्ञान के बढ़ने से नैतिक मूल्य घटेंगे. यहाँ भी गांधी से हमें मदद मिल
सकती है. गांधी जी एक फेनोमेना थे जिन्होंने आन्तरिकता को ब्रम्हाण्ड के साथ जोड़ा.
वह चित्ता विज्ञान के सबसे बड़े प्रवक्ता थे. जरूरत यह है कि चित्ता विज्ञान
यांत्रिक मानवता के नीचे दब नहीं जाये. गांधी ने आन्तरिक मूल्य देकर बाह्य व्यवस्था
में अद्भुत क्रांति की और मनुष्य को अपनी समग्र, संभावनाओं के प्रति अभिमुख किया.
गांधी जी की सार्थकता तब होगी जब स्पर्धा के भाव से प्रार्थना का स्वर फूटेगा. जब
आदमी साहसिक के साथ अनायास धार्मिक भी होगा. यह शताब्दी बड़ी बेरहम है, लेकिन उसमें
यह सम्भावना, यह बीज भी है, कि शायद उसमें आदमी नाइंसाफी और गैर बराबरी से मुक्त
हो. यह गांधी की अहिंसा-थ्योरी का विस्तार है.
लोकतंत्र शासन का वह तरीका है जिसमें सर तोड़े नहीं जाते, गिने जाते हैं यानी प्रेम
और सहानुभूति से सर में घुसा जाता है. गांधी के अनुसार इसके लिए पहले जनमानस के
हृदय परिवर्तन की जरूरत है. इसके बाद ही कानून बनने चाहिए. आज स्थिति ठीक इसके
विपरीत है. पहले कानून बनता है. फिर कानून से समाज सुधार का काम शुरु किया जाता है.
कानून से छुआछूत को समाप्त कर दिया गया लेकिन वह हर गाँव में कायम है. इसलिये समाज
को बनाना है तो पहले आदमी को बनाना होगा. मोटी भाषा में हृदय को पहले छुआ जाना
चाहिए, फिर मस्तिष्क को. इसलिये जिस समाजवाद की स्थापना की बात हुई, वह गांधी का
समाजवाद नहीं बल्कि अफसरवाद और लालफीताशाही का समाजवाद था.
आज
सर्वत्र राजशक्ति का बोलबाला है. गांधी ने जनशक्ति की वापसी के लिए संघर्ष किया था.
रस्किन के अन्तिम व्यक्ति के सिध्दांत से प्रभावित होकर उन्होंने देश को आजादी की
दहलीज पर एक सार्थक नारा दिया था. धर्म की बहुत से लोग चर्चा करते हैं बल्कि नैतिकता
और ईश्वर की. गांधी से बढ़कर दुनिया में कितने लोगों ने ईश्वर को पहचाना और वह भी
गरीबों में बल्कि गरीबों की रोटी में. उसने हाड़-मांस वाले दरिद्रनारायण की स्थापना
की. वह कहता था-''जो गरीब हैं, भूखे हैं, उनकी निस्तेज ऑंखें और निष्प्राण देह रोटी
के सिवाय किसी भगवान को मान्यता देने को तैयार नहीं हैं. उनके लिए हमारा धर्म,
लोकतंत्र और संविधान कोई मायने नहीं रखते.''
उनकी
सेवा का व्रत गांधी ने लिया था. उसने अपने खून के हर कतरे में, अपने कड़े परिश्रम के
पसीने की हर बूँद में दरिद्रनारायण के स्वाभिमान को जिंदा रखा. उसने दरिद्रनारायण
की रोटी में ईश्वर को इसी से देखा था कि दरिद्रनारायण के हित-अहित को ही यदि किसी
अर्थ में धर्म समझा जाए, तो करोड़ों लोगों के फायदे नुकसान की बातें हमेशा दिमाग पर
टकराती रहेंगी. लेकिन आज हमें यह जानकर शर्म आनी चाहिये कि हिन्दुस्तान में सबसे
ज्यादा नेत्रहीन, कुष्ठरोगी, बीमार, सन्यासी, विधवाएँ, वेश्याएँ, बेकार, भिखारी और
अब तो एड्स के रोगी भी हैं. इन्सान मूल रूप से अभी भी जानवर है और तरक्की के सभी
दावे बेबुनियाद हैं.
आजादी के साठ बरस बाद भी आज देहातों में रहने वाले करोड़ों इन्सानों के हक में सुनने
को कान तरस गये. दरिद्रनारायण की सेवा का ध्येय अपनाकर राष्ट्रीय आय का अधिकतम
हिस्सा मुट्ठी पर लोग उड़ा ले गये और मेहनतकश इन्सान की मुट्ठियाँ खाली की खाली रह
गईं. डेढ़ हजार बरस से झुकी हुई जनता इतनी काहिल, लिजलिजी और निकम्मी होती जा रही है
कि हमारी दुबारा गुलामी भी असम्भव नहीं है-चाहे राजनीतिक या आर्थिक. अहिंसा के
आर्थिक दर्शन की गांधी की यह समसामयिकता है.
अंग्रेजी शब्द 'इंडिपेंडेंस' हिन्दी में स्वाधीनता या स्वतन्त्रता के अर्थ में यदि
अनुवादित किया जाए तो शायद सही अर्थ नहीं उपजता. यदि हम खुद पर नियंत्रण के लिए कोई
तंत्र गढ़ें या हम खुद के अधीन रहें अथवा अपने लोगों के तंत्र के या उनके अधीन रहें
तो भी हम उस अर्थ में आज़ाद नहीं हैं जिस अर्थ में हम शायद होना चाहते थे या अंतत:
हमें हो जाना चाहिए था. आज़ादी के साठ वर्ष बाद जब हम चारों ओर देखते हैं तो ऐसा कोई
व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ता जिसकी गाँठ में कोई नया विचार हो. जिसकी ऑंखों में कोई नया
सपना हो. जिसके हाथों में विचारों की कोई नई मशाल हो.
दूर-दूर तक अंधियारा दिखाई पड़ता है. कभी-कभी हमें बोध होता है कि शायद रात्रि के इस
अन्तिम पहर के बाद अरुणोदय होने वाला है. एक सवाल यह भी है कि अंग्रेजों को भारत से
हटाकर आज़ादी की स्थापना के जितने भी सतरंगी सपने देखे गये थे उनमें बुनियादी,
प्रतिनिधिक और वास्तविक सपना किसका था? क्या यह सपना हमने बहुवचन में देखा था अथवा
किसी एक नेता के एकवचन में? क्या यह कोई ठोस ज्यामितीय सपना था या अस्फुट सांकेतिक
छितराये हुए सपनों का कोलाज़ था? हम किस अर्थ में अंतत: आज़ाद हुए?
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हमने निस्संदेह ब्रिटेन की हुकूमत को भारत से हटा दिया और भारत के लाल गुलाब
जवाहरलाल के हाथों लाल किले की प्राचीर पर यूनियन जैक को हटाकर तिरंगा झण्डा फहरा
दिया. हमारे महान देशभक्तों ने, जो श्रेष्ठ बुध्दिजीवी भी थे, संविधान सभा में भारत
का संविधान 26 नवम्बर 1949 को दिया, जिसे हमने 26 जनवरी 1950 को आख्यापित किया
क्योंकि 26 जनवरी 1930 को रावी के तट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता का नारा बुलन्द किया गया
था. हमने परतंत्रता और स्वतंत्रता के तंत्र में कोई बुनियादी तब्दीली नहीं की.
आज
वायसराय की जगह प्रधानमंत्री है. वेस्टमिन्स्टर पध्दति की संसद कायम है. अंग्रेजी
भाषा आज भी हमारे सर्वोच्च वर्ग का परिष्कार करती है. हमारी रेल, डाकतार, संचार,
आवागमन, प्रतिरक्षा, कृषि उत्पादन और सभी तरह की शैक्षिक व्यवस्थाएँ अंग्रेजों
द्वारा स्थापित परम्परा के महज अगले पड़ाव पर है. जिस अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछने
का संकल्प गांधी जैसे लोगों ने किया था, वैसे कई करोड़ अंतिम व्यक्ति आज अंग्रेज
हुक्मरानों के बदले भारतीय हुक्मरानों के लिए 'महाराज', 'जी हुजूर', 'मालिक' या 'साहब'
की संज्ञाओं का अपनी पीठ की काठी पर बोझ लिये झुक कर खड़े रहने के लिए अभिशप्त हैं.
शायद बहुत से लोगों को यह पता ही नहीं है कि वे कब, क्यों और कितने आज़ाद हो गये?
गोविन्दचंद्र पांडेय के अनुसार यह विचित्र बात है कि संविधान सभा में गांधी का कोई
खास प्रयोजनीय उल्लेख नहीं हुआ. गांधी ने भी संविधान बनाने में किसी प्रकार की
प्रतिभागिता नहीं की. धर्मपाल कहते हैं कि बहुतों को यह बात नहीं मालूम होगी कि
1920 में गांधी ने कांग्रेस के लिए एक नया संविधान बनाया और कांग्रेस को बिल्कुल
बदल दिया. 1920 में तिलक के अवसान के बाद गांधी राष्ट्रीय राजनीति के नियामक बनकर
उभरे. उन्होंने 1920 की पुरानी कांग्रेस को परिवर्तन कर एक क्रान्तिकारी संगठन के
रूप में विकसित करने की कोशिश की. 1920 की कांग्रेस एक तरह से 'हिन्द स्वराज' के
सपने के अनुरूप बना हुआ राजनीतिक संगठन ही है.
यह
बात गांधी जी ने 1931 में लंदन में कौंसिल की बैठक में कही थी. उनसे पूछा गया था कि
अगर भारत को आज़ादी दे दी गई तो देश कैसे आगे चलाया जाएगा. उन्होंने कहा था कि
कांग्रेस का जो संविधान है, वही हिन्दुस्तान का संविधान बन सकता है क्योंकि
कांग्रेस का संविधान तो हमने खुद ही बनाया है. इस संविधान में इस बात का प्रावधान
था कि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बीस प्रतिशत से कम लोग शहरों से आएँगे जबकि
पचहत्तर प्रतिशत से ज्यादा प्रतिनिधि गाँवों से चुने जाएँगे. दूसरे प्रस्ताव के
जरिए 1920 की कांग्रेस में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ भी बनाने की बात कही गयी
थी. अंग्रेज चौकन्ने हो गये कि इससे तो गांधी गाँव गाँव में प्रवेश कर रहे हैं.
इसलिए गांधी जी 1922 में छ: वर्ष के लिए पकड़े भी गये. अलबत्ता दो बरस में छोड़ भी
दिये गये.
यह सवाल आजादी के पचास बरस बल्कि गांधी के निधन के साठवें बरस के आसपास क्यों नहीं
पूछा जाना चाहिए कि जिस व्यक्ति ने विचार बनकर दुनिया के इतिहास में शायद पहली और
आखिरी बार एक नैतिक क्रांति के जरिए देश आजाद कराया, उसके सहकर्मियों द्वारा रचे गये
संविधान की आस्थाओं में उसका उल्लेख तक क्यों नहीं है? उस आदमी की उन गवेषणाओं का
क्या हुआ जिन्हें स्थापित करने के लिए वह जीवन भर जूझता रहा और इस कोशिश में सदियों
पीछे गया. पूरब और पश्चिम को एक किया तथा अपनी दृष्टि सुदूर भविष्य पर गड़ाकर वह आज
भी रोशन बना बैठा है.
क्यों
नहीं यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि अपने देश, धरती, इतिहास, परम्पराओं, संस्कृति और
समकालीनता को जिस व्यक्ति ने सर्वाधिक आत्मसात होकर अनुभूत किया, क्या उसकी सलाह से
भी यह देश नहीं चलेगा? या तर्क की किस डाली पर बैठकर मौजूदा हुक्मरानों को कालिदास
बनने के पहले की स्थिति में ही भारत का जनमानस स्वीकार करने पर मजबूर किया जाएगा.
गांधी लेकिन फ़कत आयोजनों या विमर्श के मोहताज नहीं हैं. उनके सम्बन्ध में ठोस
वैचारिक निर्णय लिये जाने की जरूरत है. मर गई बेरहम बीसवीं सदी औपनिवेशिकवाद तथा
आर्थिक वैश्वीकरण की वजह से विचार अध्ययन और किताबों के विरुध्द जेहाद करती रही है.
राजनीति के चखचख बाजार में गांधी के यश का साधारणीकरण किया जाना गांधी का अध्ययन
माना जाता है. जिन्होंने गांधी के यश की राजनीतिक दूकानें सजा रखी हैं वे हर मुद्दे
पर यही फिकरा कसते हैं कि हमें गांधी के रास्ते पर चलते हुए गाँवों में जाना चाहिए.
लेकिन जाता कोई नहीं है.
अंधेरे के घटाटोप अट्टहास के बीच यदि कोई नन्हीं कन्दील जलने की कोशिश करती है तो
उसे यह बताने की जुर्रत की जाती है कि जब सूरज तक अंधेरे का स्थायी उत्तर नहीं है,
वह तो केवल आधा उत्तर है, तब कन्दील जलाने की क्या जरूरत है. यदि मुट्ठी भर लोग
तालाब के ठहरे पानी में एक पत्थर फेंककर हलचल मचाने की कोशिश करते हैं तो उनसे कहा
जाता है कि वे नदियों की यात्रा क्यों नहीं करते और समुद्र में पत्थर क्यों नहीं
फेंकते? विचारहीनता यदि शासनतंत्र का अवसर है तो गांधी एक तिलिस्मी, वायवी और
आकारहीन फेनोमेना की तरह मुट्टियों में पकड़ने लायक नहीं हैं. मोहनदास करमचंद गांधी,
सिकंदर, सीजर, हिटलर या क्रामवेल की तरह युध्दनायक नहीं हैं. वे लेनिन या जॉर्ज
वाशिंगटन की तरह क्रांति से शुरु करके सत्ता-सूत्र सम्हालने को उद्यत नहीं रहे. उनसे
हो ची मिन्ह, मार्टिन लूथर किंग और नेलसन मंडेला ने प्रेरणाएँ पाईं हैं. उनकी सलाह
को अनिवार्यता देने में क्या मजबूरी है? गांधी हमारी गवेषणा के विषय हैं, जिज्ञासा
के प्रश्नवाचक चिन्ह हैं, परेशान दिमाग लोगों के लिए अब भी अनसुलझी पहेली हैं.
लेकिन वे कब हमारा गहरा सरोकार बन पायेंगे यह देखना है!
10.06.2008, 14.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित