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तेरा खाना मेरा खाना

विचार

 

तेरा खाना मेरा खाना

मनोज कुमार झा
 

खाना

खाने को लेकर बातें गांव के चौपाल से लेकर मीडिया के मंच तक फैली हुई हैं.खाने की बातें सामान्य से लेकर अजीब सन्दर्भ तक में सामने आती रहती हैं.खाने के लिए कुछ लोग जान देते हैं तो कुछ लोग जान लेने को तैयार रहते हैं.सर्वव्यापी कैमरा के युग में कब किस का खाना खबर बन जाए,कहना कठिन है.

खाने को लेकर राजनीति भी होती है और कूटनीति भी.खाने को लेकर राजनीति होना जीवनशैली की राजनीति (लाइफस्टाइल पॉलिटिक्स) का हिस्सा है जिसका लम्बा इतिहास है जो कि गांधी के कम कपड़े से लेकर नेहरू के मंहगे कपड़े तक फैला हुआ है.गांधी के बकड़ी का दूध आमजन के गप्पों में शामिल है.लेकिन जीवनशैली की वही राजनीति को आमजन ने पसन्द किया जो समावेशी हो.जिसमे मेरे खाने के साथ तेरे खाने की स्वीकार्यता हो.और उस दौर की जीवनशैली की राजनीति सिद्धान्तों के साथ चलती थी,यह केंद्रीय तत्त्व नहीं था.

मुद्दा तब और जटिल हो जाता है जब खाने की राजनीति के साथ अस्मिता की राजनीति खेलने लगती है.जब खाने की आदतों के आधार पर ऊंच-नीच का बंटवारा होने लगता है.बाजार ने खाना को रसोईघर से निकालकर होटल तक पहुंचाया जिसके प्रभाव कुछ हद तक सकारात्मक भी है, बशर्ते लोगों को पास क्रय शक्ति हों.

भारतीय सन्दर्भ में इन होटलों ने सवर्ण के पीढ़ा को समतल किया हालांकि बहुत दिनों तक चाय की दुकानों में दुगिलसिया सिस्टम था जहाँ अस्पृश्य समझे जाने वाली जातियों के लिए अलग ग्लास रखे जाते थे.लेकिन बाजार के नियमों ने इन्हें टिकने न दिया ,होटलों ने सस्ते नौकर के रूप में दलितों को रखना शुरू किया भले होटल का नाम अमुक वैष्णव भोजनालय हो.होटल पर ही टिक जाना विषयांतर होगा लेकिन एक बात कहा जाना जरूरी है कि मर्दों को किचेन तक पहुंचाने में भी इसने बड़ी भूमिका निभाई.

बात ' मेंरा खाना तेरा खाना" की हो रही थी और इस पर दिलचस्प बातचीत सुननी हो तो गांवों के चौपालों पर बैठिये जहाँ हर घर के खाने के तफ़सीलात दिये जाते हैं और मेरे खाने को तेरे खाने से श्रेष्ठ बताया जाता है, एक ही समुदाय के भीतर बल्कि एक ही जाति के भीतर.यहां से पता चलता है कि खानपान' निर्दोष शब्द नही है और बेटी के साथ रोटी-बेटी की सामंती उक्ति में रोटी के जुडने के अपने निहितार्थ हैं.

बहरहाल उच्च दार्शनिक-नैतिक प्रकरणों की चर्चा को लेकर समादृत गीता तक में भोजन की चर्चा है और वर्णगत भिन्नता के आधार पर रुचिगत भिन्नताओं की बाते हैं.संसार को मिथ्या मानने वाले आदि शंकराचार्य भी लोगों के द्वारा पेट के लिए वेश बदलने बात कहनी पड़ी(उदर निमित्तम बहुकृत वेशं) काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास में बताया है कि विवाह के बाद सर्वाधिक विधि-निषेध खाने को ही लेकर है.और ऐसा सभी समुदायों में है.सभी की अपनी अपनी शुचिताऐं हैं.

अपने समुदाय के खाने को लेकर श्रेष्ठताबोध को तोड़ने का काम एक लंबी सांस्कतिक प्रक्रिया में ही सम्भव है जो कि अभी दिख नहीं रहा.लेकिन मेरा खाना तेरे खाने से इतना अच्छा है कि मैं तेरी जान ले लूँगा--इस अतिरेकी आचरण को तो रोकना होगा.अपने घर के खाने के साथ पड़ोसी के घर का अचार आ जाए तो खाने का स्वाद बढ़ेगा ही.

20.07.2019
,11.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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