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एजाज अहमद | आज का दौर | aijaz ahamad
आज के दौर की तस्वीर:
चार | किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि
?
उपनिवेशवाद, फासीवाद और अंकल शाइलॉक
एजाज अहमद
अनुवादः श्री प्रकाश
लेखों की इस श्रृंखला
के पहले हिस्सों में समाजवाद, राष्ट्रीय मुक्ति और मानवीय जीवन के हर पहलू के
जनवादीकरण की बात उठाई गयी है और इनसे ही 20वीं सदी की मूल कहानी बनती है. क्रांति
व मुक्ति की इन ताकतों के खिलाफ जानलेवा आक्रमण (जो अधिकतर कारगर भी रहे) की कथा भी
उतनी ही मौलिक व महत्वपूर्ण है. इस दूसरे परिपेक्ष्य से देखने पर 20वीं सदी की कहानी
को प्रतिस्पर्धी औपनिवेशिक व साम्राज्यवादी राष्ट्र-राज्यों के बीच विभाजित दुनिया
के पूंजी-शासित एकीकृत विश्व साम्राज्य में बदलने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा
जा सकता है.
19वीं सदी की कसौटी यह है कि इसने
उन्नत पूंजी के राष्ट्र-राज्यों और उसके उपनिवेशों पर आधारित एक विश्व अर्थव्यवस्था
बनाने की प्रक्रिया पूरी की, जबकि 20वीं सदी की कसौटी यह रही कि इसने औपनिवेशिक
साम्राज्यों की व्यवस्था को ढहते हुए देखा. फिर नव उत्तर-औपनिवेशिक विश्व की संरचना
आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक और सौंदर्यशास्त्रीय आधार पर कैसे हो, इसे लेकर समाजवाद
और पूंजीवाद के बीच हुई संघातिक प्रतिस्पर्धा हुई, जिसकी गवाह भी 20वीं सदी रही है.
इस प्रतिस्पर्धा के अंत में सोवियत संघ के ढहने के बाद जो व्यवस्था आयी, उसे
ढीले-ढाले अर्थो में 'भूमंडलीकरण' कहा जाता है.
औपनिवेशिक युग की शुरुआत 15वीं सदी से मानी जा सकती है. 19वीं सदी के शुरु होने से
पहले एशिया और खासतौर पर अफ्रीका का काफी हिस्सा औपनिवेशिक संप्रभुता से बाहर ही रहा.
फिर गति तेज हुई. 19वीं सदी के पहले 75 वर्शों में औपनिवेशिक शक्तियों ने 210,000
वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से गैर-यूरोपीय धरती को अपने कब्जे में लिया.
1970 के दशक के मध्य से और प्रथम विश्व युध्द (1914-18) के बीच में जमीन हथियाने की
यह रफ्तार 620,000 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष रही. 1914 तक आते-आते भूमंडल का 85
प्रतिशत हिस्सा औपनिवेशिक शक्तियों, उनके उपनिवेशों और पूर्व उपनिवेशों का हो गया.
इस 20वीं सदी की शुरुआत ऐसे मोड़ पर हुई, जहां विश्व का औपनिवेशिक विभाजन पहले से ही
पूरा हो चुका था.
औपनिवेशीकरण की इस त्वरित गति को 19वीं सदी के अंतिम दशकों
में हुई दूसरी औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई प्रौद्योगिकी से आंशिक तौर पर सहयोग
मिला. जैसे भारी मात्रा में इस्पात निर्माण, औद्योगिक रसायन, आंतरिक-दहन इंजन, ऊर्जा
के स्रोत के रूप में बिजली व तेल, रेलवे-टेलीग्राफ का प्रसार. इस अपूर्व औद्यौगिक
रूपांतरण के दो पहलुओं का स्थायी असर पड़ा. ऐसे उद्योगों की खातिर निवेश के लिए पूंजी
का इतना केन्द्रीकरण हुआ कि वित्तीय पूंजी और औद्योगिक पूंजी में एक नये किस्म का
विभाजन पैदा हो गया. कई मर्तबे तो वित्तीय पूंजी, औद्योगिक पूंजी पर ही भारी पड़ गयी.
दूसरा पहलू था, इन नये किस्म के उद्योगों का पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों, अमरीका
और जापान तक भी फैलाव, जिसके कारण अमरीका, जर्मनी, इटली और बेल्जियम जैसे कुछ अन्य
देशों में भी अतंर-औपनिवेशिक शत्रुता बढ़ गई.
ऐसे विश्व में जो पहले से ही बड़े-बड़े औपनिवेशिक ताकतों में विभाजित था, किसी किस्म
के नये युध्द दुनिया को फिर से विभाजित करने वाले युध्द ही साबित होते. अब
प्रतिस्पर्धा सिर्फ नियंत्रण से बाहर वाले उस क्षेत्र को हथियाने के लिए न होकर
निर्यात बाजार, कच्चे माल के स्रोतों, व उस निवेश के अवसरों के लिए थी, जो क्षेत्र
पहले से ही स्थापित औपनिवेशिक ताकतों के कारण संकटग्रस्त था. इस तरह 20वीं सदी की
अंतिम बेला में औपनिवेशिक प्रसार व अंतर औपनिवेशिक शत्रुता में एक नये किस्म की तेजी
आयी जो एक क्रूर कांड में तब्दील हो गयी. इतिहास में ऐसा कोई युध्द नहीं हुआ, जिसमें
इतने सारे देश शामिल हों और इतना व्यापक भूमंडलीय दांव लगा हो और जिसे 'विश्व युध्द'
कहा जा सकता हो. 20वीं सदी की यह खास बात रही कि इसकी शुरुआत ,कम या अधिक, एक ऐसे
ही युध्द से हुई.
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इतिहास में ऐसा कोई युध्द नहीं हुआ, जिसमें
इतने सारे देश शामिल हों और इतना व्यापक भूमंडलीय दांव लगा हो और जिसे 'विश्व युध्द'
कहा जा सकता हो. |
लेकिन 1870-1914 के समय ने ही सारे मुख्य पूंजीवादी देशों में औद्योगिकीकरण के नये
रूपों व चढावों को देखा. साथ ही एशिया और अफ्रीका में औपनिवेशीकरण की तेज गति को
देखने के साथ ही यूरोप में मजदूरों की पहली पार्टियों के उभार और औपनिवेशिक महादेशों
में नये किस्म के पहले उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों की भी गवाह 20वीं सदी बनी. प्रथम
विश्व युध्द और उसके कारण यूरोपीय व्यवस्था के ढहने से यूरोप में और पूरी दुनिया के
स्तर पर खास एवं बड़े नतीजे निकले.
इस पतन ने ही यूरो-एशियाई धरती में चुपचाप पड़े भौगोलिक अर्थो में सबसे बड़े देश यानी
रूस में क्रांति की राह बनाने में मदद की. इससे यूरोप के इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रिया,
हंगरी और स्पेन जैसे कई देशों में महान क्रांतिकारी उथल-पुथल हुए. यूरोप से बाहर कई
देशों में, खास तौर पर भारत, चीन और पूर्व व दक्षिण-पूर्व के कई अन्य देशों में
कम्यूनिस्ट पार्टियों की नींव इसी समय पड़ी. यूरोपीय व्यवस्था के इसी पतन ने वह
वातावरण मुहैया कराया, जिसमें उभरते हुए उपनिवेश विरोधी आंदोलन जनांदोलनों में बदलना
शुरु हो गये. और जब यही यूरोपीय तंत्र दो दशकों बाद फिर ढहा, जिसके कारण द्वितीय
विश्व युध्द (1939-45) हुआ तो अगले तीस वर्ष (1945-75) यूरो-एशिया और अफ्रीका में
औपनिवेशिक साम्राज्यों के पतन और पूर्वी एशिया से पूर्वी और मध्य यूरोप और लातिन
अमेंरीका तक के दर्जनों देशों में समाजवादी सरकारों के उभार के गवाह बने.
यूरोपीय औपनिवेशिक तंत्र के संकट ने दो विश्व युध्द दिये और इस संकट से निकले
समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति के उभार की चर्चा इस श्रृंखला के पिछले लेखों (खास तौर
पर लोकतांत्रिक मांग की सदी) में हो चुकी है.
लेकिन अन्य दो नतीजे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे: एक, फासीवाद का वैश्विक स्वरूप का
हो जाना तथा कुछ देशों में उसका राज्य सत्ता तक पहुंच जाना. दूसरा, यूरोपीय व्यवस्था
को दरकिनार करते हुए अमरीका का विश्व प्रभुत्व के स्तर तक टिके रहने वाला उभार और
भूमंडलीकरण के रूप में साम्राज्यवाद की ऐतिहासिक तौर पर एक नयी अवस्था की नींव पड़ना.
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फासीवाद को समझना इस पर निर्भर करता है, कि कोई इसे कैसे देखता हैं अपने शुद्धतम
रूप में फासीवाद दो विश्व युध्दों के बीच में घटित इटली की खास परिघटना है, जो
मुसोलिनी के उत्थान व पतन के साथ प्रभावित हुई. जर्मनी में नाजियों का राष्ट्रवादी
समाजवाद भी (स्पेन में फ्रेंको की तानाशाही को छोड़ दें) मौलिक अर्थो में बिल्कुल
भिन्न था. लेकिन व्यापक अर्थ में जिसे आज हम फासीवाद कहते हैं, वह 19वीं सदी के अंत
से आज तक साम्राज्यवाद के युग में एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुका है. यह फासीवाद एक
स्थान व समय में दबा-सोया रहता है तो दूसरे स्थान व समय में उभर कर सामने आ जाता है
और कभी किसी देश में स्थानीय स्तर पर वर्चस्व कायम कर लेता है.
इस तरह यह संबंधित देश के इतिहास व राजनीतिक अर्थव्यवस्था के
अनुरूप खास आकार ग्रहण कर लेता है. इटलीवासियों द्वारा इसे 'फासीवाद' नाम दिये जाने
से पहले इस वैचारिक रूप को 'अखंड राष्ट्रवाद' कहा जाता था, जो 19वीं सदी के अंतिम
दौर में धुर दक्षिण पंथ की विचारधारा के रूप में उभरा. यह विचारधारा समाजवादी
वामपंथ की उस वर्ग आधारित विचारधारा के विरोध में खड़ी थी, जिसे कई यूरोपीय परिघटनाओं
में पहली बार व्यापक मजदूर-वर्ग का आधार मिला था. समाजवादी वामपंथ की यह विचारधारा
जर्मनी और फ्रांस में काफी मजबूत थी और उस वक्त भी यह ऐसी परियोजना के रूप में उभरी
जो यूरोप की सीमाओं का अतिक्रमण कर दिया. और जो 20वीं सदी के दौरान वास्तव में एक
भूमंडलीय परिघटना के बतौर सामने आयी, जिसकी चर्चा हम यहां करेंगे.
अपने मूल रूप में फासीवादी विचारधारा मार्क्सवाद के भौतिकवादी एवं तर्कवादी
विचारधारा के विरोध में जवाब के रूप में सामने आयी और 19वीं सदी के नस्लवादी
सिध्दांतों से काफी कुछ लिया. भौतिकवादी मार्क्सवादी स्थापना थी कि वर्ग संघर्ष ही
इतिहास का संचालक है, लेकिन फासीवाद ने मार्क्सवाद के खिलाफ जाते हुए मूल रूप से
आध्यात्मिक किस्म के ऐसे राष्ट्रवाद को प्रस्तावित किया, जहां प्रत्येक राष्ट्र की
एक विशेष नस्लवादी प्रजा व उसके विशेष सांस्कृतिक मूल्य होंगे . इस तरह से फासीवाद
विचारधारा के मुताबिक सभ्यता के संघर्ष इतिहास के प्राथमिक संघर्ष थे.
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इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई भी
विजेता देश इतनी बुरी तरह से बरबाद हुआ हो, जितना नाजियों द्वारा सोवियत संघ और
अमरीकियों द्वारा वियतनाम बरबाद हुआ |
मार्क्सवाद ने कहा कि राज्य वर्ग संघर्ष का ही एक उत्पाद है,
जो ताकतवर वर्ग (पूंजीवाद के अंतर्गत बुर्जुआ) के स्वार्थो का प्रतिनिधित्व करता
है, जबकि इसके खिलाफ फासीवाद में राज्य को समग्र तौर पर 'राष्ट्रीय चेतना' की एकता
का सर्वोच्च शिखर और वर्ग द्वंद्व की बात करने वाले को इस 'राष्ट्र' का दुश्मन बताया.
चुनावी संघर्षों वाले, सरकारों में बदलाव वाले और व्यक्तियों व अल्पसंसख्यको को
संवैधानिक अधिकारों की गारंटी देने वाले उदार-लोकतंत्र को भी फासीवाद ने राष्ट्र की
एकता के लिए खतरा माना.
यदि मार्क्सवाद ने उपनिवेशवाद को नकारा और लेनिन ने समाजवादी
विचार को राष्ट्रीय मुक्ति के विचारों से स्पष्ट तौर पर जोड़ा तो फासीवाद ने अपने
नस्लवादी सिध्दांत गढ़ते हुए उपनिवेशों में कैद जनता जो नस्ल के आधार निम्न कोटि की
मानी जाती थी, की मुक्ति की मांग नहीं की, बल्कि दुनिया के पुनर्विभाजन की मांग की
ताकि उपनिवेश बनाने की दौड़ में पीछे रह गये 'सभ्य' देशों को अपना 'उचित' भाग पाने
का एक मौका मिल सके.
ऐसी विचारधारा आम तौर पर बुर्जुआ वर्ग को आकर्षित करती थी, लेकिन ऐसे देशों के
बुर्जुआ को खास तौर पर आकर्षित किया, जहां मजदूर वर्ग का आंदोलन शक्तिशाली था. ये
बुर्जुआ इस मजदूर आंदोलनों को मुर्छाग्रस्त सैन्यीकृत दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद की
सहायता से दबाने में लगे थे. पूरी तरह विकसित फासीवाद जो यूरोप में प्रथम विश्व
युध्द के बाद प्रमुखता से उभर कर आया, वह बुर्जुआ वर्ग की विचारधारा ही था, जो एक
साथ उन्नत व युध्दोन्मत था. कोई आश्चर्य नहीं कि जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे देशों
में फासीवाद स्पष्ट तौर पर सामने आया, जहां मजदूर वर्ग के आंदोलन ताकतवर बनकर उभर
चुके थे.
आश्चर्य इसमें भी नहीं था कि द्वितीय विश्व युध्द के दौरान
नाजी आधिपत्य वाले यूरोप में हर तरफ फासीवाद विरोधी प्रतिरोध जुटाने में कम्यूनिस्ट
पार्टियां एक केंद्रीय बल के तौर पर उभर कर सामने आयी थीं. यह भी आश्चर्यजनक नहीं
था कि फासीवाद को पराजित करने में सोवियत संघ ने ऐसी मुख्य भूमिका निभायी और इस
प्रक्रिया में काफी संख्या में इतने प्राणों की आहुति दी, जितनी युध्द के इतिहास
में शायद ही किसी देश ने दिया हो. (इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई भी विजेता
देश इतनी बुरी तरह से बरबाद हुआ हो, जितना नाजियों द्वारा सोवियत संघ और अमरीकियों
द्वारा वियतनाम बरबाद हुआ)
लेकिन इस विचाराधारा ने उन देशों के बुर्जुआ को भी आकर्षित किया जो 19वीं सदी के
अंतिम भाग में द्वितीय औद्योगिक क्रांति के दौरान ही बड़े औद्योगिक शक्तियों के रूप
में उभरे, परंतु उपनिवेश नहीं बनाये थे, जबकि ब्रिटेन विश्व के अधिकांश भाग पर अपना
कब्जा बढ़ाये चले जा रहा था. खास तौर पर जर्मनी और इटली का नाम भी इसी श्रेणी में
प्रमुखता से शामिल रहा.
महत्वपूर्ण है कि यूरोपीय पैमाने पर खुद का औद्योगिकरण कर चुका
एक एशियाई देश जापान भी अकेला एशियाई देश था, जिसने उपनिवेशीकरण की परियोजना को पूरे
दम-खम के साथ आरंभ किया और जहां फासीवाद विचारधारा एक मजबूत ताकत बनकर उभरी. फिर
फासीवाद उन देशों की विचारधारा बना जो पुराने औपनिवेशिक ताकतों से आर्थिक व सैन्य
आधारों पर प्रतिस्पर्धा शुरु करने के लिए पर्याप्त औद्योगिक साधन जुटा लिये थे,
लेकिन औपनिवेशिक कब्जा जमाने की प्रतिस्पर्धा में काफी देर से उतरे. द्वितीय
विश्वयुध्द की छाप इतनी मजबूत थी कि हम अब फासीवाद की घटना को लगभग खास तौर पर
जर्मनी और इटली के साथ जोड़ते है, जहां फासीवाद अपने सबसे नंगे रूप में खड़ा था.
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हम अब भूल जाते हैं कि फासीवाद तब भी एक सरलीकृत यूरोपीय
परिघटना था, जो कहीं-कहीं अन्य स्थानों की अपेक्षा मजबूत था. मसलन फ्रांस में यह
भयावह आकार ग्रहण कर चुके जनांदोलन के रूप में था. सत्ता हथियाने से रोक दिये जाने
के बाद भी जब नाजियों उनके देश पर आधिपत्य जमा लिया, तब फ्रांसीसी फासीवादियों ने
नाजियों का असरदार तरीके से समर्थन किया था और आल्जीरियाई युध्द के दौरान फ्रांसीसी
औपनिवेशिक सेना के लिए समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभायी थी.
आज फ्रांस के नव फासीवादी कुल राष्ट्रीय मतों के लगभग पांचवे
हिस्से को प्रभावित करते हैं, और पूर्व उपनिवेशों से आये अतिनिर्धनों तथा नस्ली
आधार पर भेदभाव के शिकार मजदूरों पर बंदूके तानते हैं. वे 'असल' फ्रांसीसियों की
उच्च बेरोजगारी दर के लिए फ्रांस में मौजूद उत्तरी अफ्रीकी मुसलमानों को ठीक उसी
तरह दोषी ठहराते हैं, जिस तरह एक वक्त नाजियों ने यहूदियों को जर्मन (आर्यन) नस्लीय
शुद्धता के लिए खतरा बताया था.
फासीवाद 20वीं सदी के किसी भी मोड़ पर बिल्कुल यूरोपीय परिघटना भी नहीं था. जापान से
अर्जेंटीना तक, दक्षिण अफ्रीका से उत्तरी यूरोप तक इसकी स्पष्ट तौर पर भूमंडलीय
पहुंच थी. लेबनान के फासीवादियों ने तो स्पेनी फासीवादियों का नाम हासिल किया था और
स्वयं को फलैंज कहा था. इराक में जहां 1940 के दशक में जनाधारित कम्यूनिस्ट पार्टी
थी, मूसोलिनी व हिटलर से प्रेरित लोगों ने खुद को 'अरब राष्ट्रीय पुनरूथान की पार्टी'
कहा और बाद में 'समाजवादी' शब्द अपने नाम के साथ जोड़ लिया था, जिससे नाजियों के
आधिकारिक नाम 'राष्ट्रीय समाजवादी' की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती थी.
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नेहरु ने
भारत में नाजी एजेंटो की गतिविधियों के खिलाफ लगातार चेतावनी दी थी और 'बहुसंख्यक
सांप्रदायिकता' के 'फासीवाद' में तब्दील होने के खतरे के खिलाफ वे जीवन पर्यंत आगाह
करते रहे. |
भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) की स्थापना उपनिवेश विरोधी संघर्ष के
रोलेट सत्याग्रह के साथ जनांदोलन बनने तथा 1920 के दशकों में उभरे संगठित मजदूर
वर्ग की हिंसक गतिविधियों के जवाब में ही हुई थी. आर एस एस और अखिल भारतीय मजदूर सभा
दोनों के कई जाने-माने नेता यूरोपीय फासीवाद से सीधे-सीधे प्रभावित थे (बी एस मुंजे
तो मुसोलिनी से मिलने और सीख लेने तक चले गये थे).
उन्होंने मध्दिम सुर में हिंदू 'नस्ल' की भी बात की और हर्ष
के साथ 'मुस्लिम समस्या' का जर्मन शैली का 'समाधान' भी सुझाया था. जैसा कि हिंदू
महासभा के अध्यक्ष वी0 डी0 सावरकर का प्रसिध्द कथन है-''जर्मनी ने हमें रास्ता
दिखाया है कि कैसे जड़ों तक जाती विभिन्नताओं के कारण नस्लों व संस्कृतियों के लिए
एक संयुक्त पूर्ण ईकाई में बदल जाना असंभव है. हिंदुस्तान में रहने वाले हमलोगों को
सीखने और उससे लाभ लेने के लिए यह अच्छा सबक है.''
तो ऐसी थी वह जमीन जहां बहु-ज़ातीय धर्मनिरपेक्ष उपनिवेशवाद
विरोध को खारिज कर दिया गया. मसलन, गांधी पर हिंदुओं को धोखा देने का आरोप लगाया गया
क्योंकि उन्होंने स्पष्ट तौर पर 'जातियों व धर्मों में बंटे उन समुदायों के एक दूसरे
में विलय' का सटीक प्रयास किया था जिन्हें सावरकर ने अलग व विपरीत प्रकृति वाला
प्रति-नस्ल व प्रति-संस्कृति की तरह देखा था. जहां तक जवाहरलाल नेहरु का प्रश्न है,
वह फासीवाद विरोधी थे और उन्होंने इसका विरोध काफी गहराई से किया था. 1940 के दशक
में उन्होंने भारत में जारी नाजी एजेंटो की गतिविधियों के खिलाफ लगातार चेतावनी दी
थी और 'बहुसंख्यक सांप्रदायिकता' के 'फासीवाद' में तब्दील होने के खतरे के खिलाफ वे
जीवन पर्यंत आगाह करते रहे.
हिंदू राष्ट्रवाद के फासीवादी चरित्र पर हम फिर कभी बात करेंगे. वर्तमान बहस के लिए
हम द्वितीय विश्व युध्द के बाद हुए चार परिवर्तनों पर गौर करेंगे.
पहला, 'फासीवाद' शब्द इतना बदनाम हो गया कि स्वयं को गर्व से फासीवादी कहने या
फासीवाद के उन्नयन के दौरान नाजी जर्मनी को एक अनुकरणीय राष्ट्र के बतौर सम्मान देने
वाले लोग भी स्वयं को सिर्फ राष्ट्रवादी कहना शुरु कर दिया. जैसे फ्रांस में नेशनल
फ्रंट, इटली में नेशनल अलायंस, पूर्व सोवियत संघ और यूगोस्लाविया में घातक
राष्ट्रवाद व शुद्धीकरण वाली परियोजनाओं के आधार पर बने समूह और भारत में हिंदू
राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र के झंडाबरदार आदि.
दूसरा, स्पष्ट व खुले तौर पर नस्लवाद का एक खुली नीति व सम्मानजनक विमर्श के रूप
में बने रहना असंभव हो गया. जैसा कि यह पूंजी के इतिहास में अधिकतर समय दो बिल्कुल
भिन्न कारणों से बना रहा. एक, उपनिवेश विरोधी आंदोलनों की सफलता ने यूरोपीय शैली के
नस्लवाद को खुले तौर पर बने रहना असंभव बना दिया. दूसरे, नस्लवादी हिंसा के उन औजारों
को, जिन्हें उपनिवेशवाद ने लगभग आधी सदी के दौरान लातिन अमरीका, एशिया और अफ्रीका
में काफी सख्ती से आकार दिया था, फासीवाद ने यूरोप के केंद्र में ला दिया.
जब नाजियों ने लाखों यहूदियों को गैस चैम्बरों में फेंका, तब
औद्योगिक दक्षता का सारा वैभव नाजी अतार्किकतावाद की सेवा में ही लगा हुआ था. नस्ली
श्रेष्ठता का उपदेश देना अब संभव नहीं था और नस्ली शुद्धता की हिंसा को अब उसके नाम
पर सिर्फ बडे पैमाने पर ही नहीं, बल्कि किसी भी स्तर पर चलाना संभव नहीं था. इसलिए
जैसे ही फासीवाद 'राष्ट्रवाद' की शक्ल में फिर से सामने आया, नस्लवाद भी पहले से
अधिक रहस्यमयी आभा लेकर 'संस्कृति' या 'राष्ट्रीय संस्कृति' के नाम पर सतह पर आ गया.
तीसरा परिवर्तन धर्म के साथ 'राष्ट्र' व 'संस्कृति' की बढ़ती पहचान के रूप में आया,
कई स्थानों पर तो इसका आगमन अधिक मजबूती और खुले तौर पर हुआ. लेकिन यह 'परंपरा' की
'वापसी' नहीं थी. राष्ट्र/संस्कृति/धार्मिक समुदाय की तिकड़ी अति आधुनिक इजराइल में
जितनी पवित्र हो सकती है, उतनी ही 'कट्टरपंथी' ईरान में भी. अपने हिंदुत्व रूप में
यही तिकड़ी जितना विश्व हिंदू परिशद के महंतों को आकर्षित करती है, उतना ही मुंबई के
भगवा यप्पियों व हिपस्टर्स को भी आकर्षित करती है.
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अपने सर्वाधिक हिंसक रूप में इस तिकड़ी ने युगोस्लाविया के
खंडहरों पर उगने वाले कई लघु राज्य सत्ताओं में असंख्य जानें ली है. काफी चतुराई से
अमरीका के सर्वोतम बुध्दिजीवियों ने बिना किसी शक-सुबहे के 'पश्चिम' को
जुडा-क्रिश्चियन मान लिया है. आज तीसरी दुनिया के कई देशों में राष्ट्रवाद के
दक्षिणपंथी विचारधाराओं के भीतर धर्म वैसे ही सक्रिय है जैसे राष्ट्रीयता ( नेशनहुड
) के नाजी विमर्श में 'नस्ल' सक्रिय रहा था.
और आज 'संस्कृति' वही है, जहां खुले नस्लवाद के सम्मानजनक दौर में जीवविज्ञान हुआ
करता था. ब्रिटिश मध्य वर्ग का प्रतिष्ठित नस्लवाद अब दक्षिण एशियाई या वेस्ट
इंडियन अप्रवासियों के ब्रिटेन में होने से नस्लवादी अर्थों में भयाक्रांत नहीं होता,
बल्कि अब वह सांस्कृतिक विभिन्नता की भाषा और 'ब्रिटिश जीवन शैली पर खतरे' के रूप
अपना भय व्यक्त करता है.
फ्रांसीसी नेशनल फ्रंट का सांस्कृतिक विमर्श निसंदेह गर्व से
भरा पड़ा है, लेकिन जर्मनी के नव फासीवादी गुटों का तर्क विरोधी सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद उससे अधिक अश्लील है. हिटलर की जीवित छत्र-छाया में रहते हुए सावरकर
आसानी से 'हिंदू नस्ल' की बात कर सकते थे. आज के मलकानी और सुदर्शन 'हिंदू नस्ल' की
जगह 'हिंदू संस्कृति' की बात करेंगे लेकिन 'राष्ट्रीय मुख्यधारा' के नाम यह वही बात
ठहरी.
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गंभीरता से देखें तो फासीवादी राजनीति का
गुरूत्व केंद्र अब या तो पूर्वी या मध्य यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों में पहुंच
गया है, जहां इन राजनीतिक ताकतों को साम्राज्यवाद से खाद-पानी मिलता रहा है |
चौथा परिवर्तन वर्ग विचारधारा और साम्राज्यवाद के संबंधों के संदर्भ में है.
क्रांतिकारी दौर का शास्त्रीय फासीवाद स्पष्ट तौर पर समाजवादी परियोजना के सामने और
उपनिवेशों में उपनिवेश विरोधी राष्ट्रवाद के दौर में खड़ा हुआ. इस फासीवाद ने
उपनिवेशों में कुछ देशभक्तिपूर्ण आकांक्षा पैदा की. इसने मजदूर वर्ग, अप्रभावित पेटी
बुर्जुआ और छोटे पूंजीपतियों की आकांक्षाओं को लेकर एक खास तरह के शास्त्रीय
रैडिकलिज्म को तैयार किया, जैसा कि नाजियों के नाम में यह दिखायी देता है:
राष्ट्रीय समाजवादी.
मुसोलिनी खुद सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिष्ठित नेता से इटली के
फासीवाद का संस्थापक और फासीवादी राज्य का प्रमुख बना था. उस 'राष्ट्रवाद' का
अधिकांश स्वयं में साम्राज्यवादी था, जबकि वर्ग रैडिकलिज्म अधिकांश लोकप्रिय एवं
जनोत्तेजक बना हुआ था और फासीवाद के एकाधिकार पूंजी के साथ समायोजित हो जाने के बाद
यह अलग-थलग पड़ गया था. युध्दों के बीच में आये फासीवाद के बारे में हम न्यायोचित
आधार पर यह कह सकते हैं कि यह भूमंडलीय स्तर पर जारी प्रति-क्रांति का गुरूत्व
केंद्र रहा तो भी उन्होंने खुद की गतिविधियों को क्रांति के दायरे में रख कर ही देखा.
रैडिकल दक्षिणपंथ की क्रांति!
हमारे दौर के फासीवादी रूप अलग किस्म के हैं. युध्दोत्तर यूरोप में दरअसल फासीवाद
के व्यापक सांस्कृतिक व बौध्दिक विरासत का यूरोपीय बुध्दिजीवियों के आकलन के मुकाबले
अधिक फैलाव हुआ. फिर भी वास्तविक फासीवादी आंदोलनों की ऐसी पराजय हुई और फासीवादी
ताकतें कम्यूनिस्ट विरोधी व आप्रवासी विरोधी अभियानों/युध्दों में ऐसे उलझीं कि वे
अपने ही बुर्जुआ वर्ग की धुर दक्षिण सहायक बन कर रह गईं. ऐसी सहायक जिनका अपना कोई
कार्यभार (प्रोजेक्ट) नहीं था.
गंभीरता से देखें तो फासीवादी राजनीति का गुरूत्व केंद्र अब
या तो पूर्वी या मध्य यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों में पहुंच गया है, जहां इन
राजनीतिक ताकतों को हमेशा ही साम्राज्यवाद से खाद-पानी मिलता रहा है; या फिर
फासीवादी राजनीति का केंद्र तीसरी दुनिया के उन देशों में चला गया है, जिनका
बुर्जुआ वर्ग दबंग साम्राज्यवाद से प्रतिस्पर्धा करने की सोच भी नहीं सकता. जैसे कि
कभी नाजियों ने विश्वसनीयता के साथ कर दिखाया था. हिंदुत्व के फासीवाद का प्रमुख
लक्षण है कि वह संपूर्ण इतिहास में कभी न तो उपनिवेश विरोधी रहा और न ही
साम्राज्यवाद विरोधी ही बना. आजादी के पहले इसने धर्मनिरपेक्ष उपनिवेशवाद विरोधी
नेताओं के खिलाफ ब्रिटिश का साथ दिया.
आजादी के तुरंत बाद के दशकों में जब भारतीय राज्य अपेक्षाकृत
एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण में लगा था, हिंदुत्व ब्रिगेड हमेशा
भारतीय बुर्जुआ वर्ग की सर्वाधिक साम्राज्यवाद-समर्थक शाखा की तरफ झुकता रहा. नेहरू
युग के दौरान निसंदेह यह हमेशा ही भारतीय अर्थव्यवस्था के 'समाजवादी' नियमन के
विरुध्द रहा, लेकिन इसने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उस फासीवादी तरीके को भी नहीं
अपनाया, जिसे नाजियों ने सांस्थानिक ढ़ांचे में व्यवस्थित किया था, या इसने उस
अधिनायकवादी मॉडल को भी उपयोग में नहीं लिया, जिसने पूर्वी एशिया में औद्योगिकीकरण
को संभव व सुगम बनाया था.
वर्तमान हिंदुत्ववादी विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अवमानना के
लहजे में आजादी के बाद के भारत के शुरुआती दौर को 'बेकार हो गये दशक' कहते हुए
खारिज कर दिया है. यह वह समय था जब भारत पर अपनी अर्थव्यवस्था को महानगरीय (मेंट्रोपालिटन)
पूंजी के नाजायज दबाव से बचाने की जिम्मेवारी थी.
बावजूद इसके हमारे सामने जो है, वह बहुसंख्यकों का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, जिसको
राष्ट्रीय पुनरुत्थान विदेशी ताकतों द्वारा मिल रही चुनौतियों से निबटने की
महात्वाकांक्षा में नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों और वामपंथियों के खिलाफ भ्रामक
सांस्कृतिक युध्दों में दिखता है (जो राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वास्तविक दुनिया में
व्याप्त नपुंसकता के लिए सांकेतिक तौर पर भरपाई करते हैं).
अंतर-युध्दकालीन शास्त्रीय फासीवाद अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता के दौर के
विकसित बुर्जुआ के आंदोलन (और सत्ता) थे, जिसमें एक मुसोलिनी भी अपने दायरे में ही
सही, एक स्वतंत्र साम्राज्यवादी, या बेल्जियम का शत्रु या फ्रांस का ही
प्रतिद्वन्द्वी बनने का सपना देख सकता था. हमारे दौर के हिन्दुत्व मार्का फासीवाद
पिछड़े बुर्जुआ के आंदोलन ( और सत्ता) हैं, जो परिपक्व होने से पहले ही ढ़ल चुके हैं
और भूमंडलीकरण के दौर में खुद अपने लिए कोई ऐतिहासिक मिशन को हाथ में नहीं ले सकते.
तीसरी दुनिया का जो फासीवाद है, वह राष्ट्रीय बुर्जुआ कार्यभार के ढ़हने के बाद आता
है. इनमें से किसी भी बुर्जुआ ने ईमानदारी से स्वतंत्र होने की अपनी पहल नहीं की.
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जब तक सोवियत संघ रहा, इनमें से कुछ बुर्जुआ, स्पष्ट तौर पर
भारतीय बुर्जुआ, सोवियत संघ से मिलने वाली सहायता और कुछ हद तक साम्राज्यवाद से
आजादी हासिल करने की गारंटी लेता रहा. लेकिन आधे मन से प्रतिरोध करने की यह इच्छा
भी सोवियत संघ के विघटन से पहले ही खत्म हो गयी थी. पूरी तरह से वस्तुगत यथार्थ में
तब्दील होने से पहले ही अमरीकी वर्चस्व दिल में कहीं गहराई से स्वीकृत हो चुका था.
और इस तरह हमें 1914 की लड़ाई के रूप में चौथे व अंतिम सर्वाधिक गंभीर नतीजे का सामना
करना पड़ा और वह नतीजा था - यू एस यानी अमरीका का विश्व शक्ति के रूप में उदय. पहला
नतीजा यह निकला कि प्रतिस्पर्धा में लगे साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्वियों
(1914-1945) में सबसे शक्तिशाली, फिर सोवियत गुट और आम तौर पर समाजवाद के विरुध्द
दुर्धर्ष लड़ाई में (1945 -1989) में पूंजीवादी गुट में वर्चस्ववादी ताकत के रूप
में, और सोवियत संघ के टूटने और फलस्वरूप तीसरी दुनिया के राष्ट्रीय कार्यभार के
अंतत: धराशायी होने के कारण अमरीका का सुपर पॉवर और नवउदारवादी 'भूमंडलीकरण' की
शक्तियों के सर्वोच्च कमांडर बनकर उभरना.
इस सीरीज में अगला लेख इसी 'भूमंडलीकरण' के बारे में होगा, जो आज हमारे समय की
दुनिया का चेहरा बन चुका है. चाहे हम इस शब्द को स्वीकार करें या न करें. यहां कुछ
शब्दों की पूर्व सूची बन सकती है, जिनके बिना यह 'भूमंडलीकरण' - समाजवाद का सबसे नया
और सबसे भयावह दौर- का आना संभव नहीं हो पाता.
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जिस तरह दूसरी औद्योगिक क्रांति की
प्रौद्योगिकी जरुरी थी, उसी तरह से इस नये भूमंडलीकृत साम्राज्यवाद की शुरुआत के
लिए युध्दोत्तर व्यापक प्रौद्योगिकी के नवाचार जरुरी थे. |
पहली पूर्वशर्त यह तथ्य है कि अमरीका पूंजीवादी विश्व में एक
दबंग आर्थिक व सैन्य ताकत के रूप में पहले ही उभर चुका था, जबकि इससे कमतर
प्रतिद्वन्द्वियों के पुराने औपनिवेशिक साम्राज्य अभी काफी हद तक मुस्तैद थे. उस
भयावहता के लिए धन्यवाद, जिससे अमरीका ने प्रथम विश्व युध्द के बाद यूरोप से अपने
उधार वसूले. उस वक्त यूरोपीय प्रेस के अच्छे-खासे हिस्से ने अमरीका की पद्वी 'अंकल
सैम' (चचा सरकार) से बदल कर 'अंकल शाइलॉक' (चचा सूदखोर) कर दी थी.
दूसरे, 'भूमंडलीकरण' की वास्तविक प्रक्रिया तब तक शुरु नहीं हो सकती थी, जब तक कि
औपनिवेशिक साम्राज्य खत्म नहीं हो जाते. उपनिवेशवाद ने एक तरह की विश्व अर्थव्यवस्था
जैसा ढांचा खड़ा किया था, लेकिन यह दरअसल अर्थव्यवस्थाओं को एक-दूसरे से बांधने का
तंत्र था. इसके अंतर्गत विभिन्न किस्म की औपनिवेशिक ताकतों ने विभिन्न हिस्सों को
नियंत्रित किया.
जैसा कि औपनिवेशीकरण ने काफी पहले वह ढांचा खड़ा किया, जिस पर
पहले पहल पूंजीवादी विश्व व्यवस्था का जन्म हुआ था, अब इस नये दौर में एक पूरी तरह
से एकीकृत भूमंडलीय अर्थव्यवस्था के रूप में पूंजीवाद के अगले विकास के लिए
औपनिवेशीकरण का खत्म होना अब जरूरी था. और यदि इसके प्रतिद्वन्द्वियों ने अपने
साम्राज्य और अपने साम्राज्यवादी कार्यभार नहीं खोया होता तो अमरीका के लिए एक
वर्चस्वकारी ताकत के रूप में उभरना संभव नहीं होता.
तीसरे, शास्त्रीय उपनिवेशवाद के युग ने दुनिया को औद्योगिकीकृत देशों के एक
केन्द्रीय समूह तथा गैर-औद्योगिकीकृत क्षेत्रों के बृहद पिछवाडे में विभाजित कर दिया
था. एक सार्वभौमिक तंत्र के रूप में आगे बढ़ने के लिए पूंजीवाद के लिए विश्व का
उन्नत व पिछड़े पूंजीवादी देशों के रूप में एक बिल्कुल ही नये किस्म का विभाजन करना
जरूरी था. औपनिवेशिक साम्राज्य के खत्म होने से तीसरी दुनिया में एक हद तक के
औद्योगिकीकरण का राष्ट्रीय बुर्जुआ का कार्यभार संभव हो पाया और इस तरह पूंजीवाद के
व्यापक फैलाव के दायरे को बदल डाला. दुनिया की महत्वपूर्ण वित्तीय, प्रौद्योगिकी और
सैन्य ताकत बनने से पहले अमरीका ने इस तरह से इस पूरी नयी व्यवस्था को आकार देने का
कार्यभार ले लिया, जैसा कि किसी औपनिवेशिक ताकत ने कभी नहीं किया था.
चौथे, जिस तरह से औपनिवेशिक विजय को पूरा करने के लिए दूसरी औद्योगिक क्रांति की
प्रौद्योगिकी जरुरी थी, उसी तरह से इस नये भूमंडलीकृत साम्राज्यवाद की शुरुआत के
लिए युध्दोत्तर व्यापक प्रौद्योगिकी के नवाचार जरुरी थे. बाद के एक लेख में
भूमंडलवाद की प्रौद्योगिकी के गंभीर मामले और उनकी अर्थव्यवस्था और सामाजिक प्रभावों
पर चर्चा होगी.
हां, इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि ऐसी प्रौद्योगिकी के बगैर
एक एकीकृत भूमंडलीय वित्तीय बाजार नहीं उभर सकता था, जो इसे इस तरीके से संचालित
होने के लिए संभव बनाये ताकि कुछ सेकेन्डों में ही अरबों डॉलर के बहुस्तरीय लेन-देन
दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक किये जा सकें. अंतत: कहना न होगा कि सोवियत गुट
और पूर्वी एशियाई समाजवादी देशों के अस्तित्व ने 'भूमंडलीकरण' को तीन तरीके से रोका
था.
ये मिलकर लगभग दुनिया का तीसरा हिस्सा बनते हैं और दुनिया का
यह एक तिहाई हिस्सा पूंजीवादी भूमंडलीकरण के लिए उपलब्ध नहीं था. एक हद तक पूरे
विश्व के पैमाने पर ये देश पूंजीवादी तंत्र के लिए चुनौती की संभावना बनाये हुए थे
और, ये देशों ने तीसरी दुनिया के देशों के लिए प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण, वित्त और
सैन्य आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत बने हुए थे. सोवियत गुट के ढहने और विश्व बाजार की
गोद में चीन के पूरी तरह दुबकने के बाद ही पूंजीवाद वास्तविक अर्थों में एक वैश्विक
व्यवस्था बन पाया.
12.11.2008,
17.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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