वामपंथ का बही-खाता
आज के दौर की तस्वीर
किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि
?
वामपंथ का बही-खाता
एजाज अहमद
हंगरी के एक
इतिहासकार
ने कहा था : 'छोटी-सी
20वीं
सदी, 1914-1989'.
इस कथन को ब्रिटेन के इतिहासकार
एरिक हॉब्सवाम ने यह कह कर मशहूर कर दिया कि
20वीं
सदी की असल गत्यात्मकता वह है,
जो प्रथम विश्व युध्द और
बोल्शेविक
क्रांति ने दिखाया.
इसी गत्यात्मकता को समझाने
के लिए हमें वामपंथ के बही-खाते जैसी चीज चाहिए.
ऐसा कोई वर्णनात्मक
लेखा-जोखा इस सदी में समाजवाद की स्थायी उपलब्धियों के साथ-साथ कुछेक समस्याओं व
विफलताओं के बारे में भी बतायेगा ही,
लेकिन सबसे पहले तो वह उन
भौतिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों का खुलासा करेगा,
जिनमें उपरोक्त समूची
गत्यात्मकता संभव हुई थी.
|
चीन में भी यही
ऐतिहासिक परिस्थिति थी,
जहां
1949
की क्रांति के वक्त
एक औसत चीनी नागरिक पूरे दिन में आधा किलोग्राम चावल,
पांच वर्षों
में एक जोड़ी जूते पर जिंदा रहा और उसकी औसत उम्र
35
वर्ष रही. |
सबसे पहले ऐतिहासिक परिस्थितियां!
बोल्शेविक क्रांति की महान सफलता ने आगे चलकर हमारी स्मृति से इस तथ्य को ओझल कर
दिया कि 1917-21
के बीच जर्मनी,
हंगरी,
इटली और कई अन्य देशों में
भी विद्रोह उठ खड़े हुए थे.
लेनिन का अनुमान था कि
मास्को एक तात्कालिक मुख्यालय बन सकता है,
जो बाद में बर्लिन
स्थानांतरित हो जाएगा.
उधर जर्मन
को
बतौर मुख्य भाषा अपनाया गया और
जारी रखा गया.
इस परिप्रेक्ष्य
में सारे यूरोप के आर्थिक व सामाजिक तौर पर उन्नत देशों में क्रांति के पिछड़ने का
तथ्य सामने आया था,
तो ऐसे रूस में क्रांति की सफलता
का तथ्य भी सामने था,
जो अभी दो पीढ़ी पहले ही
कृषि दासों का समाज था.
वहां तो लोकतांत्रिक शासन
का कोई ढ़ांचा भी न था.
महज एक-दो शहरों में
औद्योगिक संस्कृति या बुर्जुआ संस्कृति
की
बिल्कुल शुरूआती समझ भर थी.
आप रूस के संदर्भ में
अयातोल्लाह खुमैनी के कब्जे वाले उस इरान को याद कर सकते हैं,
जो रूस की तुलना में
सामाजिक,
सांस्कृतिक,
शैक्षणिक,
औद्योगिक और अपनी तरह के
शहरीकरण के स्तर पर अधिक उन्नत था.
इरान में आधुनिक सर्वहारा
की जनसंख्या भी 1917
के रूस के मुकाबले काफी
ज्यादा थी. 1926
तक सिर्फ
7.6
फीसदी जनता को खेती के
बाहर रोजगार मिला था.
चीन में भी यही ऐतिहासिक
परिस्थिति थी,
जहां
1949
की क्रांति के वक्त एक औसत चीनी
नागरिक पूरे दिन में आधा किलोग्राम चावल,
पांच वर्षों में एक जोड़ी
जूते पर जिंदा रहा और उसकी औसत उम्र
35
वर्ष रही.
प्रथम विश्व युध्द में पहले से ही
बरबाद हो चुका देश गृह युध्द (1918-1920)
और सोवियत धरती पर ब्रिटेन,
फ्रांस,
अमरीका,
जापान,
पोलैंड,
सर्ब,
ग्रीक और रोमानिया
की सेनाओं
द्वारा नष्ट हुआ था.
युध्द में अधिकांश
बोल्शेविक मारे गये.
फ्रांसीसी अर्थशास्त्री
चार्ल्स बैटलहेम का अनुमान है कि सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण में लगे तीन
चौथाई राज्य कर्मचारी जार की नौकरशाही के सदस्य थे.
एक क्रांतिकारी समाज बनाने
के लिए जरूरी मानव रूपी कच्चा माल न के बराबर था.
तब तक सोवियत अर्थव्यवस्था
युध्द पूर्व के मुकाबले 10
फीसदी गिर चुकी थी.
अपनी जीविका अन्यत्र भी
कमा सकने में सक्षम 20
लाख लोग रूस से बाहर निकल
गये,
जिसमें रूस के अधिकांश शिक्षित
लोग भी शामिल थे.
सोवियत संघ को भीषण अलगाव भी
झेलना पड़ा,
जिसका संकेत इस तथ्य से मिलता है
कि 1933
तक
अमरीका
ने सोवियत संघ को मान्यता तक नहीं
दी.
ठीक वैसे
ही जैसे उसने क्यूबा को 40
साल से अधिक समय से आर्थिक
प्रतिबंध झेलने के लिए मजबूर कर दिया है.
इस तरह जब तक द्वितीय
युध्द खत्म नहीं हो गया,
अन्य कोई समाजवादी क्रांति
नहीं हुई. 1917-1919
के दौरान स्वीडन,
फिनलैंड,
जर्मनी,
बेल्जियम में और इसके कुछ
बाद में ब्रिटेन,
डेनमार्क और नार्वे में सामाजिक
जनवादी सरकारें या गठबंधन सरकारें बोल्शेविक क्रांति के गहरे विरोध में खड़ी हो गयीं
और उनमें से कुछ के पास जो भी मार्क्सवादी
विरासत थी और जिसका वे दावा किया करती थीं,
उससे भी पल्ला झाड़ने में
देरी नहीं की.
गृह युध्द के बाद जब लेनिन ने नयी
आर्थिक नीति घोषित किया तो सामाजिक जनवादियों सहित किसी भी पूंजीवादी देश
ने
उस
पर
अपनी राय नहीं जतायी और रूस को
तकनीक,
निवेश और सामग्री-संसाधन उपलब्ध
कराने से इंकार किया गया.
1933 तक चर्चिल मुसोलिनी
को बोल्शेविकवाद के खिलाफ खड़ा रक्षक बता कर उसकी प्रशंसा में लगे रहे.
1934 के बाद यद्यपि
स्टालिन ने फासीवाद के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा संधि का भी प्रस्ताव रखा,
लेकिन
1938-39
के दौरान पश्चिमी देशों ने सोवियत
संघ के खिलाफ और फासीवाद से गठबंधन के पक्ष में अपने विकल्प खुले रखे.
द्वितीय विश्व युध्द के
बाद सोवियत संघ ने युरोप सहित पश्चिम व पूरब में ऐसे राज्यों के गठन की वकालत की,
जो सोवियत संघ के मॉडल पर
नहीं,
बल्कि बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र के
मॉडल पर बनें.
पूर्वी यूरोप में नीति परिवर्तन
1947
में वामपंथ से पीछे हटने की
ट्रूमैन सिध्दांत की घोषणा के बाद ही संभव हुआ.
1970
के पहले इतिहास के किसी भी मोड़ पर
सोवियत संघ आसन्न सैन्य तबाही के भय से मुक्त नहीं रहा.द्वितीय विश्व युध्द खतम
होने के 10
हफ्ते बाद अमरीकी सेना के प्रमुख
अधिकारियों ने सेवियत संघ के
20
प्रमुख शहरों पर बमबारी के लिए एक
गुप्त योजना बनायी,
जबकि इसके ठीक विपरीत सोवियत संघ ने
अपनी लाल सेना में सैनिकों की संख्या
1945
के
1
करोड़
20
लाख से घटा कर
1948
में
30
लाख कर दिया था. सोवियत संघ का पुन:
सैन्यीकरण तथा परमाणु व नाभिकीय बम प्रौद्योगिकी की दौड़ अमरीका की उन घोषित नीतियों
की प्रतिक्रिया थी,
जो
1947
में नाटो के गठन के रुप में सामने
आयीं. इटली में 1948
के चुनाव पूर्व अमरीका धमकी
दी थी,
जिसमें अमरीका ने कहा था कि यदि
कम्यूनिस्ट (20
लाख सदस्य) चुनाव जीतते हैं तो वह
सैन्य हस्तक्षेप करेगा. सोवियत संघ द्वारा अपना परमाणु निवारक और प्रक्षेपण तंत्र
विकसित करने के बाद भी थोड़ा भय बना रहा,
क्योंकि रक्षा सचिव कैस्पर
वेनबर्गर सहित उच्चस्तरीय अमरीकी नीति के स्तर पर परमाणु हमले की संभावना बनी हुयी
थी,
जिसमें अमरीका का कम,
लेकिन रूस का काफी अधिक
नुकसान होता.
फिर युध्द का अपना सच मौजूद था.
1930
के दशक के दौरान सोवियत अर्थव्यवस्था ने जापान को छोड़कर किसी भी अन्य देशों की
तुलना में काफी तेज प्रगति की.
लेकिन सोवियत संघ के औद्योगिक संपत्ति का चौथाई हिस्सा द्वितीय विश्व युध्द के समय
ही नष्ट हो चुका था,
जबकि इसी दौरान अमरीकी अर्थव्यवस्था ने
10
फीसदी सालाना की दर से प्रगति किया,
जो पहले से काफी तेज थी.
जर्मनी में
50
लाख
70
हजार युद्धबंदियों
से
30
लाख
30
हजार युद्धबंदी
मर गये.
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कुल मिलाकर
5
करोड़ घायलों के अलावा
2
करोड़ लोगों में सोवियत संघ ने खो दिया.
मानव इतिहास में इतनी बड़ी आफत किसी देश
ने
नहीं झेली.
1959
में सोवियत संघ में
35-40
वर्ष के
4 पुरुषों
पर उसी उम्र की
7
महिलाएं थी.
1950
के समाजवाद से प्रभावित तीन क्षेत्रों (कोरिया,
चीन और अफ्रीका के पुर्तगाली उपनिवेशों) में मौत के मुंह में जाने वालों की संख्या
लगभग
8
लाख रही.
इसमें मलाया से लेकर अल सल्वाडोर तक दुनिया में हुए उन दर्जनों
युद्धों
का ब्यौरा नहीं है,
जिनको पश्चिमी देशों ने साम्यवाद को रोकने के लिए लड़ा था.
मसलन यूनान का गृह युद्ध,
जिसमें
80
हजार जानें गईं.
|
जब सोवियत संघ का नाश ही दुनिया की सभी सत्ताओं का लक्ष्य बन गया हो तो
यही तार्किक व ठीक लगता है कि दक्षता व उत्पादकता को एकमात्र आधार
बनाते हुए
युद्ध
स्तर पर समाज निर्माण का कार्य
चले. |
शुरुआती दौर के अति पिछड़ेपन,
लगातार एक के बाद एक होने वाले रक्तपात और असहनीय
रक्षा खर्च न अपूर्व विकास दर को महत्वहीन बना दिया और समाजवादी देशों की सारी
उपलब्धियों को अंधेरे में डाल दिया.
ख्याति प्राप्त आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन के मुताबिक आधी सदी तक (1965
तक) सोवियत संघ का प्रति व्यक्ति आर्थिक विकास दुनिया में सबसे तेज था.
यह विकास दर जापान से भी तेज थी.
1950
के बाद
20
वर्षों के दौरान सोवियत संघ में खाद्य उपभोग दो गुना हो गया था,
खर्च करने की क्षमता में
400
फीसदी बढ़ोत्तरी हो चूकी
थी और उपभोक्ता
सामग्री की खरीद
1200
गुना बढ़ गई थी.
1950
से
1980
के बीच पूर्वी जर्मनी की विकास दर पश्चिम जर्मनी जितनी ही तेज थी.
दरअसल सारे पूर्वी यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं ने ब्रिटेन के मुकाबले काफी तेज प्रगति
की.
फिर भी
1970
के मध्य तक सोवियत संघ का सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) स्पेन और आधी जर्मनी के
बराबर था.
पूर्वी यूरोप के देशों का सालाना सकल उत्पाद नाटो देशों
की
एक चौथाई के बराबर भी नहीं था.
यदि
जापान को भी साथ जोड लें तो यह और नीचे चला गया था.
ऐसी परिस्थिति में नाटो की सैन्य क्षमता के साथ हल्की होड़ में भी इन गरीब
अर्थव्यवस्थाओं को अपने संसाधनों का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल करना पड़ा.
उधर नाटो की सैन्य प्रौद्योगिकी इतनी आगे रही कि नाभिकीय प्रौद्योगिकी में हुई
नयी खोज और पारंपरिक युध्द कौशल के अधिकांश औजार नाटो देशों ने ही उपलब्ध कराया.
अब समाजवाद की प्रभावशाली उपलब्धियों पर भी गौर करेंगे.
कहना न होगा कि उपरोक्त कारकों ने समाजवादी प्रक्रिया को काफी नुकसान पहुंचाया.
पूंजीवादी दुनिया के कुछ हिस्सों में भी उदारवादी लोकतंत्र से श्रेष्ठ समाजवादी
लोकतंत्र का निर्माण दरअसल उस राजनीतिक दल के सहारे असंभव था,
जिसके सर्वोत्तम
कार्यकर्ता युध्द में मारे जा चुके हों,
जो लोकतांत्रिक आबोहवा में सांस लेने के बजाय लगातार पुलिस नाके बंदी में रही हो,
जो जारशाही के बचे-खुचे अवशेषों व औजारों से राज्य मशीनरी से समाजवादी समाज बनाने
का सपना देखता हो और जो लगातार खात्मे की धमकी के बीच जी रहा हो.
यदि संसाधनों की उपलब्धता न होने पर भी गलातोड़ औद्योगिक विकास को ही अस्तित्व रक्षा
की गारंटी मानना क्या मजदूर-किसान गठजोड़ को तोड़ने वाला प्रलोभन साबित नहीं
होगा?
इससे मजदूर वर्ग अधिकतम औद्योगिक
उत्पादन
के लक्ष्य को पूरा करने में जुट जाएगा और किसान उस
'आदिम
समाजवादी संचयन'
में लगेगा,
जिसे अमानवीय व्यवहार कहते हुए मार्क्स
ने पूंजी के आदिम संचयन संबंधी अध्यायों में उल्लेख किया है.
और जब सोवियत संघ का नाश ही दुनिया की सभी सत्ताओं का लक्ष्य बन गया हो तो यही
तार्किक व ठीक लगता है कि दक्षता व उत्पादकता को एकमात्र आधार बनाते हुए
युद्ध
स्तर पर समाज निर्माण का कार्य
चले,
न कि समाजवादी लोकतंत्र के उस आधार पर न हो,
जिसकी कल्पना
सैद्धांतिक
मार्क्सवाद
ने हमेशा की है.
सैद्धांतिक
दायरे में सर्वाधिक दुष्परिणाम
ऐतिहासिक दबाव में अपनाये गये तौर-तरीकों
व मॉडलों को लेकर सामने आये,
जिन्हें समाजवाद की मूलभूत सामग्री की तरह परोसा गया.
इस तरह समाजवादी परिप्रेक्ष्य से निकलने वाले वैकल्पिक मॉडलों की मौजूदगी,
खासकर उन समाजवादी देशों के भीतर ही न के बराबर रही,
जहां ऐसे वैकल्पिक मॉडलों की बखूबी जांच हो सकती थी.
इस बीच परिस्थितिवश पार्टी और राज्य में ऐसा तादात्म्य हो गया कि राजनीतिक दायरे और
प्रशासनिक क्रियाकलापों का फर्क गायब हो गया.
विचारधारा
के क्षेत्र में भी यही विकृतियां आयीं,
जिनमें से समझ विकसित करने के लिए दो की व्याख्या यहां प्रस्तुत है.
उत्पादन वृध्दि और प्रति व्यक्ति जीएनपी की शानदार उपलब्धियों के बावजूद समाजवादी
देशों में जीवन स्तर उन्नत पूंजी वाले प्रमुख देशों के मुकाबले निम्न कोटि का रहा.
क्रांति के
50
या
50
से अधिक वर्षों के बाद भी जीवन स्तर में इस हद तक की असमानता ने यह समझ बनायी कि
पूंजीवाद श्रेष्ठ है.
लेकिन
न तो बुल्गारिया की तूर्की से,
रूस की यूनान और स्पेन से तुलना की गयी और न ही इस पर घ्यान दिया गया कि पूर्वी
जर्मनी को पश्चिमी जर्मनी के मुकाबले निम्न स्तर का आर्थिक आधार मिला था.
घ्यान में यह भी नहीं रखा गया कि समाजवादी देशों ने पूंजीवादी देशों की तरह तीसरी
दुनिया को लूटा भी नहीं था.
बस,
पैमाना यही बना कि सोवियत संघ या पूर्वी यूरोप के नागरिकों का औसत जीवन स्तर अमरीकी
या जापानियों की तरह नहीं है.
ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों व तीसरी दुनिया के कुछ देशों को
सोवियत संघ से मिलने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता को अलोकप्रियता का सामना करना पड़ा
और इसे महान,
किंतु दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों का अनावश्यक दान कहा गया.
इससे विदेशियों के प्रति भय-द्वेष और राजनीतिक रूढ़िवाद को ही बल मिला,
वैसे इनके उभरने के पीछे अन्य कारण भी थे.
दरअसल रूढ़िवादी रूसी राष्ट्रवाद इसी जमीन पर विकसित हुआ और यह भावना भी पैदा हुई कि
पूर्वी यूरोपीय गठबंधनों
को सोवियत संघ की तरफ से अच्छी-खासी आर्थिक सहायता और सब्सिडी मिल रही है.
समाजवाद की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए उसकी राह में आयी सारी समस्याओं को भी
ध्यान में रखना
पड़ा है.
वैश्विक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो फासीवाद से दुनिया को बचाना सोवियत संघ
की प्रमुख उपलब्धि रही.
सोवियत संघ की प्रशंसा कभी न करने वाले एरिक हॉब्सवाम तक ने कहा है कि
'फासीवाद
और इसके अधिनायकवादी आंदोलनों व सरकारों के सामने आते ही
1922
और
1942
के बीच यूरोप की परिधि पर मौजूद देशों को छोड़कर सभी जगहों से उदारवादी लोकतंत्र
गायब हो गया.
लेकिन सोवियत संघ और उसकी जनता ने बलिदान नहीं दिया होता तो उदार पश्चिमी पूंजीवाद
इस खतरे का शिकार हो चूका होता और आज की पश्चिमी दुनिया (अलग-थलग पड़े
अमरीका
से अलग) उदारवादी सरकारों के बजाय अधिनायकवादी व
फासीवादी
सरकारों का समूह होती.
सोवियत संघ की लाल सेना के बगैर धुरी देशों को हराना संभव नहीं था.'
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इतिहास का यह एक क्रूर विरोधाभास रहा कि उदारवादी पूंजीवाद सोवियत संघ की उसी
शक्तिशाली सैन्य शक्ति व आर्थिक सत्ता के खिलाफ खड़ा हो गया,
जिस सोवियत संघ ने उसे बचाया था.
समाजवाद ने दुनिया के ऐसे पहले राज्य तंत्र की रचना की,
जो व्यापक सामूहिकता व पुनर्वितरण वाले आर्थिक अधिकारों के आधार पर खड़ा था.
इसे
'साम्यवादी
राज्य'
कहा गया.
यह अनुदार व्यक्तिवाद पर आधारित उदार पूंजीवाद के खिलाफ था.
इसने साबित किया कि निम्न स्तर की आर्थिक संपन्नता में भी (सबको रोजगार के सतर को
छोड़ भी दें तो) सभी स्तरों पर सबको मुफ्त शिक्षा,
सबको मुफ्त स्वास्थ्य जैसे मौलिक अधिकारों को लागू किया जा सकता है.
यह अब तक की पहली व्यवस्था थी,
जिसमें व्यक्तिगत बेहतरी को बाजार और उसकी अंतहीन प्रतिस्पर्धाओं के हवाले करने के
बजाय आम बेहतरी
की
सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बनायी जा सकती है.
समाजवादी समाज आधुनिक दुनिया की पहले समतावादी अर्थव्यवस्थाएं थीं,
जो आधुनिक औद्योगिक उत्पादन पर आधारित थीं.
|
फ्रांस और इटली में युध्द और फासीवाद विरोधी प्रतिरोध से ही कम्यूनिस्ट
पार्टियां अपने-अपने देशों में सबसे बड़ी पार्टियों के रूप में उभरी.
|
ये अर्थव्यवस्थाएं
1970
के दशकों वाली नौकरशाही के भ्रष्टाचार पनपने तक जारी रहीं.
लिंग भेद के मुद्दों पर समाजवादी समाजों का रिकॉर्ड कम खराब है,
लेकिन स्मरणीय है कि बोल्शेविक क्रांति के पहले
5
वर्षों के दौरान नारी मुद्दों संबंधी कानून उस दौर के पूंजीवादी देशों के मुकाबले
बेहतर थे.
सोवियत संघ के एशियाई गणतंत्रों की मुसलमान महिलाओं के पास तुर्की और टयूनिशिया
सहित अन्य मुस्लिम देशों के मुकाबले अधिक अधिकार थे.
वामपंथ के ढ़हने के बाद जर्गेन हैबरमास जैसे दार्शनिक ने,
जिनकी कम्यूनिस्ट विरोधी विचारधारा जगजाहिर है,
जर्मनी के एकीकरण का विरोध किया था.
हैबरमास का कहना था कि पूर्वी जर्मनी में महिलाओं के लिए कानून पश्चिमी जर्मनी के
मुकाबले काफी श्रेष्ठ हैं और इस एकीकरण से पूर्वी जर्मनी की महिलाओं को अपनी
सुरक्षा व हैसियत खोनी पड़ेगी.
समाजवादी अनुभवों के असर व अन्य जगहों पर समाजवादी क्रांति की संभावना ने पूंजीवाद
पर गहरा असर डाला और उसे सभ्य बनाने का काम किया.
मंदी से उबरने के लिए पूंजीवाद पहले से ही सोवियत पंचवर्षीय योजनाओं से सीख लेना और
योजनाओं व प्रावधानों के संदर्भ में राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी समझते हुए
अर्थव्यवस्थाओं को राष्ट्रीकृत,
निगमित और नियंत्रित करना शुरू कर दिया था.
दुनिया भर में किसानों की लामबंदी के दौरान समाजवाद ने किसानों के सवाल को लोकतंत्र
के मुद्दे के केंद्र में रखा.
एशिया और अफ्रीका में सर्वाधिक
दूरगामी भूमि सुधार या तो स्वयं कम्यूनिस्टों द्वारा किये गये या साम्यवाद से
भयाक्रांत कम्यूनिस्ट-विरोधियों द्वारा किये गये.
जैसे दक्षिण कोरिया में उत्तरी कोरिया की वजह से,
ताइवान में चीन के दबाव में,
मलेशिया में साम्यवादी विद्रोह,
को
दबा दिया गया.
अन्य देशों,
खास तौर पर भारत में कुछ आंशिक कृषि सुधार समाजवादी मॉडल से प्रभावित रहे और इसके
लिए साम्यवादियों की तरफ से पड़ने वाले दबाव और रैडिकल राष्ट्रवाद की संयुक्त भूमिका
रही.
पाकिस्तान या
1978
के पहले के
अफगानिस्तान जैसे देशों में जहां साम्यवादी आंदोलन बहुत कमजोर या अस्तित्व में नहीं
रहे,
कोई भूमि सुधार नहीं हुआ.
तो पहले के मुकाबले रैडिकल कृषि सुधारों के बारे में जो कहा गया और जिनसे एशियाई
कृषि समाजों को फायदा मिला,
वैसा ही फायदा यूरोप के पूंजीवादी क्षेत्रों में मजदूर वर्गों को भी मिला.
तथ्य है कि यूरोप में साम्यवादी क्रांति के खिलाफ यूनान के उस गृह युध्द ने ही
निर्णायक रेखा खींची थी,
जिसमें
80
हजार जानें गई थीं.
फ्रांस और इटली में युध्द और फासीवाद विरोधी प्रतिरोध से ही कम्यूनिस्ट पार्टियां
अपने-अपने देशों में सबसे बड़ी पार्टियों के रूप में उभरी.
1974
के पुर्तगाली क्रांति के दमन और
1976
में इटली के कम्यूनिस्टों की निर्णायक चुनावी पराजय के बाद ही दक्षिण यूरोप में
साम्यवाद के सवाल पर राय बनी थी.
इसी परिप्रेक्ष्य में पश्चिमी यूरोप का कल्याणकारी राज्य खड़ा हुआ,
जिसके पीछे निसंदेह कीन्सवादी अर्थशास्त्र और मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के
पुर्नगठन के लिए अमेरीकी वित्त पोषण था.
इसके साथ ही मजदूर वर्गों के भीतर कम्यूनिस्ट विचारधारा के न फैलने देने का स्पष्ट
उद्देश्य था.
इस तरह की राज्य सत्ता स्कैन्डिनेविया में सामाजिक जनवादी प्रबंधन के सहारे,
जर्मनी में कंजरवेटिव पार्टी के सहारे,
इटली में साम्यवादियों के दबाव सहित इसाई जनवादियों के सहारे खड़ी हुई.
फिर भी हर जगह मजदूर वर्ग का सामाजिक जनवादीकरण हुआ,
जिसे साम्यवाद के दमन के नतीजे के तौर पर सामने आना ही था.
इस दबाव में बुर्जुआ वर्ग ने सामाजिक खर्च में हुई भारी बढ़ोत्तारी और
अपने शेयर में भारी कटौती को स्वीकार किया और कल्याणकारी राज्य के लिए मजदूरी व
टैक्स बढ़ाने की नीति को स्वीकार कर लिया.
कहा जा सकता है कि पश्चिमी यूरोप के मजदूर वर्ग को परोक्ष तौर पर पूर्वी मजदूरों के
मुकाबले आर्थिक व सामाजिक अधिकारों के मामले में अधिक फायदा मिला,
क्योंकि पश्चिमी यूरोप के पास अधिक धन था,
जिससे वह भुगतान भी अधिक कर सकता था.
सोवियत संघ के पतन तक पूरे यूरोप के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में सेटलमेंट यथावत रहने
के साथ ही स्पेन व पूर्तगाल तक फैल गया,
जहां कम्युनिस्ट पार्टियों की संख्या अच्छी-खासी थी.
अब जबकि साम्यवाद का भय खत्म हो चुका है और कीन्सवाद की संभावना कम से कम हो गयी है,
समझौते को वित्तीय
जिम्मेवारी,
पुनर्संरचना और ऐसे ही जुमलों के नीचे दफन कर दिया गया.
या इसे ऐसे समझें कि अब तीसरा इंटरनेशनल पराजित हो चूका है तो दुसरा इंटरनेशनल ही,
जिसे मैंने बैंकर्स यूरोप कहा है,
उस पर नजर रख सकता है.
और मुझे भरोसा है कि किसी भी भारी हमले के दौरान यूरोपीय मजदूर वर्ग की उपलब्धियों
की बदौलत उसका कुछ हिस्सा और रैडिकल बन कर उभरेगा.
सारे अटलांटिक क्षेत्र में पिछले साल वर्षों की निष्क्रियता के बाद अमेरीकी
यूनियनों में
5
फीसदी वृध्दि आने वाले समय का एक छोटा ही सही,
पर उम्मीदों भरा संकेत है.
अंतरराष्ट्रीय समाजवादी लहर को कई तरह के अनुभव
मिले,
जो हमारी विरासत के हिस्से हैं.
दुनिया के लगभग एक तिहाई लोग इस स्मृति,
इस अनुभव और इसके मूल्यांकन से होकर गुजरे हैं.
अब सर्वोत्कृष्ट या सबसे बुरे दोनों ही अनुभव या स्मृतियां हमारी मुक्तिकामी
राजनीति का अटूट हिस्सा बनी रहेंगी.
कहा जाता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान चीन में मजदूरों की दो लाख गतिविधियां
सामने आयीं.
अब सहज ही कोई अंदाजा लगा सकता है कि ये गतिविधियां उसी क्रांति की स्मृति में थीं,
जो कभी घटित हुईं थी और आज भी स्मृति में जिंदा हैं.
आगे पढ़ें
पूर्वी यूरोप के कुछ हिस्सों में जारी हल