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माओवादी प्रचण्ड! प्रधानमंत्री प्रचण्ड !!

माओवादी प्रचंड ! प्रधानमंत्री प्रचंड!!

 

आनंद स्वरूप वर्मा



1949 में चीन के बाद दुनिया में यह पहली घटना है कि माओवादियों के नेतृत्व में किसी देश में सरकार बनी हो. 18 अगस्त को नेपाल में माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचण्ड के प्रधान मंत्री की शपथ लेने के साथ ही नेपाल की राजनीति भी एक नये युग में प्रवेश कर जायेगी. प्रचण्ड ने अपने प्रतिद्वन्द्वी नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा को 113 के मुकाबले 464 मतों से हराया है.

सिंहासन खाली करो कि जनता आती हैः प्रचंड को बधाई देते कोइराला


गौरतलब बात यह भी है कि जहां इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की यह क्रांति अमरीका की नींद उड़ाने के लिए काफी है (क्योंकि अमरीका ने आतंकवादी संगठनों की अपनी सूची से माओवादियों का नाम अब तक नहीं हटाया है), वहीं माओवादियों के सामने देश को एक ऐसा संविधान देने की चुनौती भी है, जो नेपाल की सदियों पुरानी सामंती ढांचे में आमूल बदलाव लाते हुए हाशिये पर पड़े लोगों को राहत दे सके. माओवादी नेतृत्व को यह भी ध्यान में रखना होगा कि संसदीय राजनीति की अनुभवी पार्टियों के साथ सरकार चलाते हुए जोड़-तोड़ के इस जंगल में कहीं खुद न खो जाएं.

अप्रैल में हुए चुनावों में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी तो जरूर, लेकिन 601 सदस्यों वाली संविधान सभा में उसे बहुमत प्राप्त नहीं था, जिसका लाभ लेते हुए नेपाली कांग्रेस, नेकपा (एमाले) और मधेसी जनाधिकार फोरम ने अपनी राजनीति की और राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान उनको इसमें सफलता भी मिली.

राष्ट्रपति चुनाव में माओवादियों को मात मिली, लेकिन तसल्ली इस बात की रही कि जीत उनकी राजनीति की ही हुई. उन्होंने एक वरिष्ठ क्रांतिकारी नेता (माओवादी नहीं) रामराजा प्रसाद सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया जो मधेसी समुदाय के नेता थे. हालांकि बाद में नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले दोनों ने भी मधेस समुदाय के डॉ0 रामबरन यादव और रामप्रीत पासवान को ही अपना-अपना उम्मीदवार बनाया.

फिर नेकपा एमाले ने अपने उम्मीदवार रामप्रीत पासवान को डॉ0 यादव के पक्ष में बैठा भी दिया था और नतीजे में रामराजा प्रसाद सिंह को पराजय मिली. लेकिन तराई की जनता मानती है कि आज अगर एक मधेसी नेपाल का राष्ट्रपति बन सका तो यह माओवादियों की वजह से ही संभव हुआ. माओवादियों ने उस दौरान कहा भी था कि समावेशी राजनीति को ध्यान में रखते हुए किसी महिला, दलित, जनजाति या मधेसी को उम्मीदवार बनाया जाता है तो पार्टी उसे अपना समर्थन देगी.

1 अगस्त को दिये गये नेकपा एमाले के महासचिव झलनाथ खनाल के बयान से नेकपा एमाले का रुख भी साफ हो गया था. उन्होंने कहा था कि अगर माओवादी आम सहमति से सरकार नहीं बना पाते हैं तो नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर हम बहुमत की सरकार बनाएंगे. नेपाली कांग्रेस के रामबरन यादव के राष्ट्रपति बनने के बाद कामचलाऊ प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की महत्वाकांक्षा और बढ़ गई और उन्होंने प्रचण्ड को प्रधानमंत्री न बनने देने के वे सभी उपाय किये जो वे कर सकते थे.

हैरानी की बात है कि माओवादियों को सरकार बनाने के लिए चार महीने से भी अधिक इंतजार करना पड़ा, जबकि चुनाव में वे सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे थे. इस दौरान अमेरिका ने भी माओवादियों को हाशिये पर डालने की हर कोशिश की और यह कोइराला और अन्य नेताओं की मदद से बहुत खामोशी से की गई. इसका एक खास नतीजा सार्क सम्मेलन के वक्त दिखा, जब इस्तीफा देने के बावजूद एक कामचलाऊ प्रधानमंत्री की भूमिका निभाते हुए कोइराला कोलंबो पहुंचे. मतलब साफ है कि माओवाद विरोधी ताकतों ने तय कर रखा था कि किसी भी हालात में प्रधानमंत्री पद का चुनाव सार्क सम्मेलन से पहले संपन्न न हो ताकि प्रचण्ड अपनी टीम के साथ नेपाल का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकें. आखिर इससे सारी दुनिया में जो संदेश जाता उससे अमेरिका को कितनी 'परेशानी' होती?

संविधान सभा में कुल 25 पार्टियां हैं, जिनमें से 20 पार्टियां माओवादी नेतृत्व वाली सरकार के पक्ष में थीं और इसके लिए वे प्रचण्ड और उनके साथियों पर दबाव भी डाल रही थीं. लेकिन संख्या बल के आधार पर सत्ता की चाबी नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और मधेसी जन अधिकार फोरम के पास थी, जिसे राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इन पार्टियों ने दिखा भी दिया था. राष्ट्रपति चुनाव के बाद प्रचण्ड ने अपना नैतिक आधार खोने, विपक्ष में बैठने और संविधान निर्माण करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात भी रखी थी.

लेकिन जनमत और तमाम छोटी पार्टियों के दबाव को देखते हुए प्रचण्ड ने अपनी तीन शर्तों को रखते हुए कहा कि हम सरकार बनाने के लिए तैयार हैं. वे तीन शर्तें इस प्रकार थीं- 1. नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और मधेसी जन अधिकार फोरम का गठबंधन समाप्त हो, 2. साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति हो जिसमें देश के पुनर्निमाण के एजेंडे को प्रमुखता दी जाये और 3. सभी पार्टियां यह गारंटी दें कि संविधान निर्माण प्रक्रिया के दो वर्ष पूरा होने तक वे हमारी सरकार गिराने की कोशिश या षडयंत्र नहीं करेंगी.

लेकिन तीन पार्टियों के गठबंधन ने इन शर्तों को साफ तौर पर अस्वीकार कर दिया और संसदीय राजनीति के विश्लेषकों द्वारा शर्त रखने के लिए प्रचण्ड की आलोचना की गई. जवाब में प्रचंड ने साफ कहा कि “ हमारा अभिप्राय तीनों पार्टियों को यह निर्देश देना नहीं था कि वे अपना गठजोड़ समाप्त कर दें, बल्कि हमारे कहने का सीधा-सीधा अर्थ यह था कि उन्हें इस गठजोड़ की प्रकृति का खुलासा करना चाहिए.”

कोइराला कोलंबो के सार्क सम्मेलन के बाद दिल्ली में भारतीय नेताओं से मुलाकात करते हुए जब नेपाल लौटे तो कुछ ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो उन्हें भारत सरकार का आशीर्वाद प्राप्त हो गया हो और वे नेपाल के भावी प्रधान मंत्री बनने जा रहे हों.


राष्ट्रपति यादव द्वारा माओवादियों को विधिवत सरकार बनाने का निमंत्रण और इसके लिए आम सहमति बनाने के लिए एक सप्ताह का समय मिलने के बाद लगा कि अब जल्द ही राजनीतिक अनिश्चितता दूर हो जाएगी. लेकिन हुआ कुछ विपरीत ही. माओवादी समय सीमा के अंदर सहमति नहीं बना पाये और उधर कोइराला कोलंबो के सार्क सम्मेलन के बाद दिल्ली में सोनिया गांधी, प्रणव मुखर्जी और कर्ण सिंह आदि से मुलाकात करते हुए जब नेपाल लौटे तो कुछ ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो उन्हें भारत सरकार का आशीर्वाद प्राप्त हो गया हो और वे नेपाल के भावी प्रधान मंत्री बनने जा रहे हों. नेपाल में भारत के राजदूत राकेश सूद ने भी कोइराला के निवास पर जाकर उनसे मुलाकात की.


नेपाली राजनीति में भारतीय हस्तक्षेप एवं कोइराला के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा ने एक खिलाफ वातावरण बना दिया, जबकि भारत सरकार का मानना है कि माओवादियों को सत्ता से अलग रखना उस शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने जैसा साबित होगा, जो 2006 में मुकम्मल रूप में हुए शांति समझौते से शुरू हुई थी. दूसरी तरफ, कोइराला की कवायद से नेकपा एमाले कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष बढ़ने लगा जो कोइराला के पीछे अमरीकी हाथ होने को बखूबी समझ रहे थे. उन्हें पता है कि अमरीका नेपाल में शांति प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने के बजाय गृहयुध्द के उभार की मंशा पाले हुए है. अमरिकी मंशा को ध्यान में रखते हुए नेकपा एमाले ने माओवादियों के साथ सरकार में शामिल होने की इच्छा जताई और उनके साथ मंत्रालय के बंटवारे को लेकर बात आगे बढ़ायी. राष्ट्रपति ने समय सीमा तीन दिन और बढ़ा दी.

बलुआटार के प्रधानमंत्री निवास को शायद ही छोड़कर कहीं जाने वाले कोइराला को झटका लगा और वे नेकपा एमाले के नेता माधव नेपाल के घर पहुंच गये. माधव नेपाल को माओवादियों के सत्ता में आने के खतरे गिनाये गये, लेकिन माधव नेपाल ने यही कहा कि यदि माओवादियों को सरकार बनाने का मौका नहीं दिया गया तो जनता के अंदर काफी असंतोष पैदा हो जाएगा और शांति प्रक्रिया खतरे में पड़ जाएगी.

फिर कोई रास्ता न देख नेपाली कांग्रेस ने यह राग अलापना शुरू किया कि माओवादी नेतृत्व में सरकार बने लेकिन रक्षा मंत्रालय नेपाली कांग्रेस को दिया जाये. पर इसके लिए माओवादियों के न तैयार होने पर कोइराला ने माओवादियों को अलग कर सरकार बनाने की कवायद शुरू की, लेकिन तीन दिनों की समयावधि भी बीत गई और कोई आम सहमति न बन सकी. अंत में राष्ट्रपति ने तय किया कि अंतरिम संविधान के अनुच्छेद-38 (2) के अनुसार संविधान सभा ही प्रधानमंत्री का चुनाव करेगी. 14 अगस्त को यह भी तय हो गया कि नेकपा (माओवादी), नेकपा (एमाले) और मधेसी जनाधिकार फोरम मिलकर काम करेंगे और प्रचण्ड देश के भावी प्रधानमंत्री होंगे.

 

17.08.2008, 03.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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